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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

५५२ भावप्रकाशनिघण्टुः

या तांबुलाकार होते हैं। पत्तों को मसलने से सुगन्ध आती है। पुष्प-लाल, बादामी रंग के पत्रकोश से ढँकी हुई विदण्डिक मञ्जरियां आती हैं। वर्षा एवं शीतकाल में फूल-फल आते हैं। रासायनिक संगठन-इसकी पत्तियों से एक सुगन्धित तेल (Geranium oil- जिरेनियम् ऑयल) निकाला जाता है। कोमल घास से तेल अधिक एवं उत्तम प्रकार का निकलता है। इसका रंग फीका ललाई लिये जामुनी रंग का होता है। इसमें गन्ध गुलाब जैसी तथा स्वाद में यह अदरख की तरह चरपरा एवं रुचिकर होता है। गुण और प्रयोग-इसमें का तेल उष्ण, स्वेदजनन, मूत्रजनन, ज्वरघ्न, उत्तेजक, चेतनाकारक एवं त्वग्भागकारक है। नूतन आमवात में तैल मलने से लाभ होता है। गंजापन (इन्द्रलुप्त) पर इस तैल को मलते हैं। प्रतिश्याय, ज्वर, अजीर्ण तथा कफविकारों में इसके क्वाथ से लाभ होता है। मात्रा-३-६ माशा। अथ भूतृणम् (शरबाण) तस्य नामगुणानाह गुह्यबीजं तु भूतीकं सुगन्ध्यं जम्बुकप्रियम्। भूतृणं तु भवेच्छत्रा मालातृणकमित्यपि ।।१६९।। भूतृणं कटुकं तिक्तं तीक्ष्णोष्णं रेचनं लघु। विदाहि दीपनं रूक्षमनेत्र्यं मुखशोधनम् ।।१७०।। अवृष्यं बहुविट्कञ्च पित्तरक्तप्रदूषणम् ।।१७१।। शरबाण के नाम तथा गुण-गुह्यबीज, भूतीक, सुगन्ध्य, जम्बुकप्रिय, भूतृण, छत्रा और मालातृणक ये सब शरबाण के नाम हैं। शरबाण-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रेचक, लघुपाकी, दाहजनक, अग्निदीपक, रूक्ष, नेत्रों के लिये अहितकर, मुख को शुद्ध करनेवाला, अवृष्य (वीर्यवृद्धि नहीं करने वाला), अत्यन्त मल उत्पन्न करने वाला और पित्तरक्त को दूषित करने वाला होता है। [१६९-१७१] नोट-भृतृण के लेटिन नाम के सम्बन्ध में मतभेद हैं। श्री यादवजी ने साइम्बोपोगोन् ज्वरांकुश (Cymbopogon jwarankusa) को भूतृण माना है जिसका वर्णन पहले पृष्ठ २६१ पर 'लामज्जक' के अन्तर्गत किया जा चुका है। कुछ विद्वानों ने हरी चाय, साइम्बोगोन् साइट्रोटस् (Cymbopogon citratus) को भूतृण माना है किन्तु इसे श्री यादवजी 'जम्बीरतृण' मानते हैं जिसका चरक सू० अ० २७ में हरित वर्ग में एवं सुश्रुत सू० अ० ४६ में शाक वर्ग लिखित में वर्णन आया है। यहाँ पर निम्नलिखित वर्णन हरीचाय का किया गया है। ८५. भूतृण (हरीचाय) हिं०-शरबाण, भूतृण, गन्धतृण, अगियाखर, हरीचाय, गन्धबेना। बं०-गन्धतृण। गु०-लीलीचा। म०- हिरवा चहा, ओला चहा। क०-मज्जिगेहुल्लु। पं०-गन्धतृण, शरवाण, रामकर्पूर। ता०-कर्पूर पुल्ल। ते०- चिप्पगंड्डि। अं०-Lemon Grass (लेमन् ग्रास); ले०-Cymbopogon-citratus (DC.) Stapf. (साइम्बोपोगॉन् साइट्रेट्स् डीसी. स्टा.); Andropogon citratus DC. (एण्ड्रोपोगॉन साइट्रेटस डीसी.)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। यह भारतवर्ष के अनेक प्रान्तों में विशेषकर पंजाब और संयुक्त प्रान्त की पहाड़ी भूमि तथा वाटिकाओं में भी उत्पन्न होती है। यह ५-७ फीट ऊँची घास है। पत्ते-३-४ फीट लम्बे, पौन इञ्च चौड़े होते हैं। पुष्प-उभयलिङ्गी पुष्प की मञ्जरियाँ वर्षाकाल में आती हैं। इसकी पत्ती को मसलने से उसमें से नींबू की तरह सुगन्ध आती है। इस तृण का फांट बनाकर उसमें दूध और चीनी मिलाकर चाय की तरह पीते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धित उड़नशील तैल होता है जिसे Indian Melissa oil (इंडियन् मेलिसा ऑइल), Indian oil of Verbena (इंडियन् ऑइल् ऑफ वर्बेना) कहते हैं। यह गहरे पीत या भूरे से लाल रंग का नींबू की गन्ध जैसा होता है। इस तैल में प्रधान रूप से सिट्राल (Citral, C10 H16 O) नामक पदार्थ होता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५५३ है जिसे आयोनॉन् (Ionone) नामक एक अन्य पदार्थ में रासायनिक विधि से परिवर्तित किया जा सकता है। आयोनॉन् का सुगन्धि द्रव्यों एवं विटामिन् ए (Vitamin A) के बनाने में उपयोग होता हैं। आयोनॉन् में ह्वायोलेट जैसी तीव्र सुगन्ध होती है। गुण और प्रयोग-हरी चाय उष्ण, स्वेदजनन, मूत्रजनन, ज्वरघ्न, वातानुलोमन, उत्तेजक, चेतनाकारक, उद्वेष्टननिरोधि, मुखशुद्धिकर, कफवातहर, दीपन, पाचन एवं रुचिकर है। इसका तैल बाह्य प्रयोग में त्वग्रागकारक एवं वातहर है। प्रतिश्याय, ज्वर, वमन, अतिसार, आध्मान, शूल, आक्षेप एवं विसूचिका में इसके फाण्ट से बहुत लाभ होता है। विसूचिका में इससे वमन रुकता है एवं उत्तेजना आती है। इसका तैल आध्मान, शूल तथा विसूचिका में १/२-३ बूँद की मात्रा में देते हैं। मलेरिया ज्वर में हरी चाय का उपयोग किया जाता है। कटिशूल, आमवात तथा पीड़ा आदि में इसके तैल की मालिश की जाती है। मात्रा-तैल १/२-३ बूँद, तृण ३-६ माशा। अथ नीलदूर्बा (हरीदूब) तस्या नामानि गुणाँश्चाह नीलदूर्वा रुहाऽनन्ता भार्गवी शतपर्विका। शष्पं सहस्रवीर्या च शतवल्ली च कीर्तिता ।।१७२।। नीलदूर्वा हिमा तिक्ता मधुरा तुवरा हरेत्। कफपित्तास्रवीसर्पतृष्णादाहत्वगामयान् ।।१७३।। 'हरी दूब' के नाम तथा गुण-नीलदूर्वा, रुहा, अनन्ता, भार्गवी, शतपर्विका, शष्य, सहस्रवीर्या और शतवल्ली ये सब 'हरी दूब' के नाम हैं। हरी दूब-शीतवीर्य, तिक्त, मधुर तथा कषायरसयुक्त एवं कफ, पित्तरक्त, विसर्प, तृषा, दाह और चर्मरोग को दूर करने वाली होती है। [१७२-१७३] हिं०-हरी दूब, नीली दूब, रामघास। बं०-नीलदुर्बा, दूर्वा। म०-नीलदूर्वा, हरली, नीलीहारेयाली। संथाल०- धोबीघास। गु०-खडध्रो, लीलीध्रो, धरो। क०-गरिके। पं०-दूबड़ा। ते०-दूलु, गरिकेग। ता०-अरुवमपिल्लू। अ०-उश्व। फा०-मर्ग। अं०-Creeping Cynodon (क्रीपिंग साइनोडोन्)। ले०-Cynodon dactylon (Linn.) Pers. (साइनोडॉन् डॅकटीलोन पर्स.)। Fam. Gramineae (ग्रॅमिनी)। दूब-तृणजाति की वनस्पति सब प्रान्तों के वन, उपवन, खेत सब जगह उत्पन्न होती है। गर्मी के दिनों में प्रायः सूख सी जाती है, परन्तु बरसात का पानी पड़ने से फिर हरी-भरी हो जाती है। जलाशय और कुएँ के पास बारहौं मास हरी-भरी देखने में आती है। इसकी डंडियाँ पतली-पतली होती हैं, और भूमि पर फैली हुई रहती हैं। अन्तवाली शाखायें जिन पर कोमल बारीक फूल आते हैं, वे जमीन से उठी रहती हैं। पत्ते-पतले, ४-६ लम्बे, रेखाकार होते हैं। बीज- बहुत छोटे होते हैं। गुण और प्रयोग-दूर्वा शीतल, वर्ण्य, प्रजास्थापन, रक्तस्कंदन, व्रणरोपण, मूत्रजनन तथा कफपित्तहर है। (१) बस्तिशोथ, सोजाक तथा मूत्रमार्ग के दाह में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। (२) त्वचा के रोगों में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। सद्योव्रण तथा त्वचा के रोगों में इसकी पतियों का लेप उपयोगी है। इससे रक्तस्राव रुकता है। (३) अतिसार, पैत्तिक, वमन, उदर, जलोदर, अत्यार्तव, गर्भपात, उन्माद, अपस्मार तथा रक्तमेह आदि में इसका स्वरस पिलाया जाता है। (४) नेत्राभिष्यंद में पत्र-कल्क का लेप करते हैं। (५) अर्श में जलन कम करने के लिये पत्तों का लेप किया जाता है। मात्रा-स्वरस ६ माशा-१ तोला; मूल ३-६ माशा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

५५४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ श्वेतदूर्वा । तस्या नामानि गुणाँश्चाह दूर्वा शुक्ला तु गोलोमी शतवीर्या च कथ्यते । श्वेता दूर्वा कषाया स्यात्स्वाद्वी व्रण्या च जीवनी । तिक्ता हिमा विसर्पास्रतृट्पित्तकफदाहहृत् ।।१७४।। ८७. श्वेत दूर्बा हिं०-सफेद दूर्बा । यह भी दूब के समान ही घास है जिसके पत्ते सफेदीपन लिये होते हैं । यह कोई भिन्न जाति है या केवल स्थान- भेद से इसमें सफेद पत्ते होते हैं यह कहना कठिन है । अभी इसमें अनुसंधान की आवश्यकता हैं । यह अधिक पित्तशामक मानी जाती है । अथ गण्डदूर्वा (गांडरदूब) तस्या नामानि गुणाँश्चाह गण्डदूर्वा तु गण्डाली मत्स्याक्षी शकुलादनी । गण्डदूर्वा हिमा लोहद्राविणी ग्राहिणी लघुः ।।१७५।। तिक्ता कषाया मधुरा वातकृत्कटुपाकिनी । दाहतृष्णाबलासास्रकुष्ठपित्तज्वरापहा ।।१७६।। गांडर दूब के नाम तथा गुण-गण्डदूर्वा, गण्डाली, मत्स्याक्षी और शकुलादनी, ये सब नाम गांडर दूब के हैं । गांडर दूब-शीतवीर्य, लोहे को पिघलाने वाली, मलसंग्राहक (मल को रोकने वाली), लघु, तिक्त, कषाय एवं मधुर रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, वातकारक एवं दाह, तृषा कफ, रक्तविकार, कुष्ठ तथा पित्तज्वर को दूर करने वाली होती है । [१७५-१७६] ८८. गण्डदूर्वा हिं०-गांडरदूब, गठीलादूब, गण्डदूर्वा । गांडरदूब-दूब की जाति की एक वनस्पति है, जो दूब से बड़ी होती है और यह प्रायः जलाशयों के किनारे अधिक उत्पन्न होती है । उसकी डंठी मोटी और बड़ी होती है । पत्ते-दूब के समान परन्तु दूब से बहुत बड़े होते हैं । गाँठे मोटी होती हैं । वाराहीकन्दः (गेठी इति लोके) । तस्य लक्षणनामगुणानाह वाराहीकन्दसंज्ञस्तु पश्चिमे गृष्टिसंज्ञकः । वाराहीकन्द एवान्यैश्चर्मकारालुको मतः ।।१७७।। अनूपसम्भवे देशे वराह इव लोमवान् । वाराहवदना गृष्टिर्वरदेत्यपि कथ्यते ।।१७८।। वाराही तु रसे स्वाद्धी तिक्ता पाके पुनः कटुः । शुक्रायुःस्वरवर्णाग्निबलपित्तविवर्द्धिनी । कफकुष्ठमरुन्मेहकृमिहृच्च रसायनी ।।१७९।। वाराहीकन्द के लक्षण नाम और गुण-जिसका 'वाराहीकन्द' नाम है, उसी को पश्चिम देश में 'गृष्टि' कहते हैं और 'वाराहीकन्द' को ही कुछ लोग 'चर्मकारालुक' कहते हैं । अनूप (जलप्राय) देश में यह सूअर के बालों की तरह कठिन रोम से युक्त कन्द वाला होता है । इसके वाराहवदना, गृष्टि, वरदा ये सब नाम हैं । वाराहीकन्द-यह मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, पाक में कटु और रसायन एवं शुक्र, आयु, स्वर, वर्ण, जठराग्नि, बल और पित्त को बढ़ाने वाला एवं कफ, कुष्ठ, वात, प्रमेह तथा कृमि को दूर करने वाला होता है । [१७७-१७९] नोट-वाराही कंद के स्थान पर डायोस्कोरिआ बल्बिफेरा (Dioscoea bulbifera) एवं टेक्का एस्पेरा (Tecca aspera) इन दो द्रव्यो का उपयोग किया जाता है । अधिकांश विद्वान् प्रथम के कंद को वाराही कन्द मानते हैं । उसकी अनेक उपजातियाँ भी पाई जाती हैं । यहाँ दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५५५ ८९ वाराही कन्द (१) हिं०-वाराही कन्द, नेंठी । म०-डुक्कर कन्द, कडूकरंदा । गु०-डुक्करकंद, बणा बेल । बं०-रतालु । ले०-Dioscorea bulbifera Linn. (डायोस्कोरिआ बल्विफेरा लिन.) । Fam. Doscoreaceae (डायोस्कोरिएसी) । यह दून और सहारनपुर के वनों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक तथा सभी स्थानों में पाया जाता है । इसकी लता-आरोही तथा वामावर्त होती है । कांड-चिकने तथा पत्रकोणों में लगभग १ इञ्च व्यास की कन्द सदृश रचनाएँ होती हैं । पत्ते-साधारण एकान्तर, २।।-६ इञ्च लम्बे, १।।।-४ इञ्च चौड़े, पतले, पुच्छाकार लम्बे नोकवाले तथा आधार पर तांबूलाकार होते हैं । इनके आधारीय खण्ड गोल और पत्राधार पर ९ शिराएँ होती हैं । पुष्प-नरपुष्पों की मंजरियाँ नीचे की ओर लटकी हुई, २-४ इञ्च लम्बी और प्रायः पत्रकोणों में समूहबद्ध होकर निकली हुई रहती हैं । नारीपुष्पों की मञ्जरियाँ ४-१० इञ्च लम्बी होती हैं । फल-३ पंख वाले और बीज भी आधार पर सपंख होते हैं । कन्द- छोटे आकार का भूरे रंग का होता है जिस पर सूअर की तरह रोम होते हैं । यह भीतर से पीताभ श्वेत होता है । इसकी अन्य जातियों का भी प्रयोग किया जाता है । कुछ में कन्द बहुत गहरे बैठते हैं तथा वे अधिक मुलायम होते हैं । रासायनिक संगठन-इसकी लता में एक विषैला ग्लूकोसाइड पाया जाता है । इसके कंद में स्टार्च होता है । गुण और प्रयोग-यह कुछ रक्तसंग्राहक तथा ग्राही है । रक्तातिसार, प्रवाहिका, उदरशूल, अर्श आदि रोगों में इसके फलों को जीरा तथा शर्करा के साथ देते हैं । त्वचा के रोगों में भी इसका व्यवहार किया जाता है । मात्रा-३-६ माशा । ९०. वाराहीकंद (२) हिं०-वाराहीकंद, भेवर के कंद, भेवर की बेल । ले०-Tacca aspera Roxb. (टॅक्का एस्पेरा राक्स.) । Fam. Taccaceae (टॅक्केसी) । यह वर्मा, बहुवर्षायु, तेनासरिम तथा मलय प्रायद्वीप में होता है । इसका क्षुप-बहुवर्षायु एवं मूलस्तंभ कंदवत्, आयताकार एवं मुड़ा हुआ रहता है । पत्ते-दीर्घवृत्ताकार, अंडाकार, ८-१६ × ४-८ इञ्च; लम्बाग्र, शिराएँ स्पष्ट एवं उनके बीच का भाग उभरा हुआ होता है । पुष्प-हरिताभ बैंगनी कुछ पीत होते हैं । फल-करीब १।। इञ्च लम्बा, आयताकार तथा मांसल होता है । गुण और प्रयोग-इसके कंद बल्य होते हैं तथा इनका उपयोग रक्तपित्त एवं चर्मरोगों में किया जाता है । मात्रा-३-६ माशा । अथ विदारीकन्दः । तस्य नामगुणानाह विदारी स्वादुकन्दा च सा तु क्रोष्ट्री सिता स्मृता । इक्षुगन्धा क्षीरवल्ली क्षीरशुक्ला पयस्विनी ।।१८० ।। विदारी मधुरा स्निग्धा बृंहणी स्तन्यशुक्रदा ।।१८१।। शीता स्वर्या मूत्रला च जीवनी बलवर्णदा । गुरुः पित्तास्रपवनदाहान् हन्ति रसायनी ।।१८२।। विदारी कन्द के नाम तथा गुण-विदारी, स्वादुकन्दा, क्रोष्ट्री, सिता, इक्षुगन्धा, क्षीरवल्ली, क्षीरशुक्ला तथा पयस्विनी के सब नाम विदारीकन्द के हैं । विदारीकन्द-मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, बृंहण, दुग्धवर्धक और शुक्र को बढ़ाने वाला, शीतवीर्य, स्तर को उत्तम बनाने वाला, मूत्रकारक, जीवनी शक्ति बढ़ाने वाला, बल तथा वर्ण को देनेवाला, गुरु, रसायन एवं पित्त, रक्त, वायु और दाह को नष्ट करने वाला होता है । [१८१-१८२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA

५५६ भावप्रकाशनिघण्टुः विदारीकन्द के विदारी एवं क्षीरविदारी ये दो भेद चरक ने मधुरस्कंध (वि० अ० ८) में लिखे हैं। प्यूरेरिआ ट्युबरोजा (Pueraria tuberosa) को विदारी एवं आइपोमिआ डिजिटेटा (Ipomoea digitata) को क्षीरविदारी अधिकांश विद्वानों ने माना है। 'भुइकुम्हडा' नाम उपर्युक्त दोनों कन्दों को तथा ट्राईकोसॅन्थिस् कॉर्डेटा राक्स (Trichosanthes cordata Roxb.) के कन्द को भी देते हैं। सम्भव है डायोस्कोरिएसी (Dioscoreaceae) वर्ग जिस वर्ग का वाराहकन्द है उसी वर्ग के विदारी एवं क्षीरविदारी भी हों। उत्तर प्रदेश में अधिकतर प्यु. ट्युबरोजा को एवं बंगाल में आ. डिजिटेटा को विदारीकन्द माना जाता है। एक क्षीर युक्त लता लेट्सोमिया सेटोसा राक्स (Lettsomia setosa, Roxb.) के कन्द का स्तन्यवर्धक के रूप में प्रयोग प्रचलित है। संभव है यह क्षीरविदारी हो। यहाँ पर प्रथम दो का अलग-अलग वर्णन किया गया है। ९१. विदारीकन्द (१) हिं० - विदारीकन्द, विलाईकन्द, भुइकुम्हड़ा, सुराल, पाताल कोहड़ा। म० - बेंदर, घोडवेल। गु० - खाखर बेल, फगियो, फगड़ानो वेली, विदारी। बं० - शिमीय। ते० - दारी, नेल्लगुम्मुडु। मा० - गोरवेल। ले० - Pueraria tuberosa DC. (प्युरॅरिआ ट्युबरोजा डीसी.)। Fam. Leguminosae (लेम्युमिनोसी)। 'यह कोंकण के पहाड़ों पर, दक्षिण, कनारा, पश्चिम-हिमालय, शिमला, कुमाऊ, नेपाल, विन्ध्याचल, उड़ीसा और छोटा नागपुर में उत्पन्न होता है और बिहार में भी कहीं-कहीं पाया जाता है। यह नदी-नालों के करारों में अधिक पाया जाता है। यह अत्यन्त विस्तार में फैलने वाली लता जाति की वनस्पति अचिरस्थायी होती है। इसका कांड पोला-सा होता है। छाल - भूरे रंग की आध इञ्च मोटी होती है। लकड़ी - छिद्रयुक्त कोमल होती है। पत्ते - पलाश के समान पक्षाकार त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक - ४-६ इञ्च लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, अग्र्य पत्रक तिर्यगायताकार और पार्श्वपत्रक तिरछे लट्वाकार तथा अधरतल पर श्वेत तलशायी रेशमतुल्य सघन रोओं से युक्त होते हैं। पुष्प - ६-१८ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। पुष्प नीले या नीलरक्त रंग के सुन्दर दिखलाई देते हैं। फलियाँ - २-३ इञ्च तक लम्बी, चिपटी, बीजों के बीच दबी हुई और खाकी रंग के रोवों से भरी रहती हैं। प्रत्येक फली में २-६ तक बीज रहते हैं। प्रायः पत्तों के गिरने पर नवीन पत्तों के निकलने के प्रथम ही फूल आते हैं। जमीन के नीचे इसमें प्रायः कई कन्द रहते हैं, जो कांड से दृढ़मूल शाखा के द्वारा जुड़े रहते हैं और नीचे भी मूल शाखा पुनः निकली रहती है। इन्हीं को विदारीकन्द कहते हैं। यह गोल कुम्हड़े के आकार के भूरे रंग का एवं लम्बाई में २ फीट तक तथा घेरे में २।। फीट तक बड़ा होता है। पुराना कन्द २० सेर से भी अधिक वजन का देखने में आता है, किन्तु छोटे कन्द की अपेक्षा बड़े कन्द हीनवीर्य समझे जाते हैं। छोटे कन्द उखाड़ने के बाद कुछ दिनों तक बिगड़ते नहीं हैं परन्तु बड़े कन्द बहुत जल्द सड़-गल जाते हैं। छोटे-छोटे कन्दों के पतले-पतले कतरे कर सुखाने से व दूध के समान श्वेत दिखाई पड़ते हैं तथा विदारीकन्द नाम से बाजार में बिकते हैं। बड़े कन्द की अपेक्षा छोटे कन्द का स्वाद अच्छा और मीठा होता है। छोटे-छोटे मुलायम और नवीन कन्द हरिद्वार आदि की सब्जीमण्डियों में 'सराल' के नाम से बिकते हैं। कन्दों में कुछ-कुछ मुलेठी का स्वाद आता है इसलिये विदारी को 'स्वादुकन्दा', 'इक्षुविदारी' आदि नाम दिया गया है। ये लताएँ घोड़ों को बहुत प्रिय होती हैं जिससे इन्हें 'गजवाजिप्रिया' 'घोड़ेबेल' कहा गया है। गुण और प्रयोग - यह स्तन्यजनन, मूत्रजनन तथा पौष्टिक है। शोथ पर पीस कर इसे बाँधते हैं। बल एवं दुग्धवृद्धि के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। अधिक मात्रा से इससे वमन होता है। मात्रा - १/४ - १/२ तोला। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ५५७ ९२. विदारीकन्द (२) क्षीरविदारी हिं०-बिलाईकन्द, विदारीकन्द, भुइकुम्हड़ा। बं०-भुइ कुमड़ा। म०-भुईकोहला। गु०-विदारीकन्द। क०- नेलकुम्बल। ते०-मत्तपलतिगा, नेल्लगुम्मुडु। मल०-मोतलकंद। ता०-फलमोदिक। ले०-Ipomoea digitata Linn. (आइपोमिया डिजिटॅटा लिन.)। Fam. Convolvulaceae (कॉन्वॉल्व्युलेसी)। यह भारतवर्ष के उष्ण कटिबंध में विशेषकर आर्द्र प्रदेशों जैसे बंगाल, आसाम आदि में पाया जाता है। यह लता जाति की वनस्पति झाड़दार और विस्तार में फैलने वाली होती है। पत्ते-३-७ इञ्च के घेरे में हाथ के पंजे के समान ५-७ भागों में विभक्त रहते हैं। फूल-नलिकाकार, चौथाई इञ्च गोल ऊपर का भाग १॥ इञ्च से २॥ इञ्च के घेरे में होता है और यह बैंगनी रंग का दिखाई पड़ता है। फल-चार छिलके वाले गोलाकार छोटे-छोटे होते हैं और वे झूमकों में आते हैं। उनके भीतर एक प्रकार की पर्तदार रूई से ढँके हुये त्रिकोणाकार अर्द्धगोल बीज रहते हैं। बीजों के रोपण करने से लता उत्पन्न होती है। इसके नीचे जो बन्द बैठता है वह रतालू के आकार का होता है इसका वजन एक सेर से अधिक नहीं होता। कन्द बाहर से भूरे रंग का तथा खुरदरा होता है। काटने पर अन्दर से यह श्वेत रंग का दिखाई देता है तथा उसमें से बहुत क्षीर निकलता है। इसकी सुखाई हुई कचरी बहुत हलकी रहती है तथा उसमें मंडल दिखलाई देते हैं। इसका स्वाद पिष्टमय, कुछ कसैला एवं कडुवा सा होता है। रासायनिक संगठन-इसके कन्द में पिष्टमय पदार्थ अधिक होता है। इसके अतिरिक्त १०% शर्करा एवं अत्यन्त अल्प प्रमाण में जालप में पायी जाने वाली आनुलोमिक राल होती है। गुण और प्रयोग-यह अनुलोमक, पित्तसारक, स्तन्यजनक, स्नेहक तथा उत्तम पौष्टिक है। इससे भूख लगती है, अन्न पचता है, शौच साफ होता है, शरीर का वर्ण सुधरता है एवं वजन बढ़ता है। काडलीव्हर तैल से अधिक अच्छा इससे कार्य होता है। किसी भी कारण से शिथिलता आयी हो और वजन कम हुआ हो तो इसके चूर्ण को घृत में भूनकर दूध एवं शर्करा के साथ पेया बनाकर देने से बहुत जल्दी वजन बढ़ता है। यकृत् एवं प्लीहावृद्धि में इसका चूर्ण देने से पित्तस्राव ठीक होकर शौच साफ होता है। दुग्धवृद्धि के लिये द्राक्षासव के साथ इसे देते हैं। मात्रा-कन्द चूर्ण १/४-१/२ तोला। अथ मुशलीकन्दः। तस्य लक्षणगुणानाह तालमूली तु विद्वद्भिर्मुशली परिकीर्त्तिता। मुशली मधुरा वृष्या वीर्योष्णा बृंहणी गुरुः। तिक्ता रसायनी हन्ति गुदजान्यानिलं तथा ॥१८३॥ काली मूसली के नाम तथा गुण-विद्वान् लोग 'तालमूली' ही को 'मुशली' कहते हैं, अर्थात् तालमूली, मुशली ये दोनों नाम 'काली मूसली' के हैं। काली मूसली-मधुर तथा तिक्त रस युक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), उष्णवीर्य, बृंहण (रक्तादिधातुवर्धक), गुरुपाकी, रसायन एवम् अर्श (बवासीर) तथा वात का नाशक होता है।।१८३] मुसली दो प्रकार की होती है। काली एवं सफेद। काली मुसली का लेटिन नाम कर्बुलिगो ओर्किओइडिस् (Curculigo orchioides) एवं सफेद मुसली का एस्पेरगस् एडस्केण्डेन्स् ((Asparagus adscendens) है। जो दो विभिन्न वर्गों की है। कुछ लोग क्लोरोफाइटम् एरूण्डिनेसिअम् (Chlorophytum arundinaceum) को सफेद मुसली मानते हैं। यहाँ पर इनका अलग-अलग वर्णन किया गया है। ९३. काली मूसली हिं०-स्याह मूसली, काली मूशली। म०, गु०-काली मूसली। बं०-तालमूली। क०-नेलताल। ते०- नेल तडि गड्डुा। ता०-निलधनैका। पं०-स्याह मूसली। मा०-काली मूसली। फा०-मुशली स्याह। अ०-

५५८ भावप्रकाशनिघण्टुः मुसली अबियज। ले०-Curculigo orchioides Gaertn. (कर्क्युलिगो ऑर्किओइडिस् गार्टे)। Fam. Amaryllidaceae (अॅमेरिलिडेसी)। यह बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, दक्षिण देश के बाँस के वनों में तथा हिमालय में यमुना से खासिया पहाड़ तक प्रायः सर्वत्र उत्पन्न होती है। काली मूसली-तृणजातीय वनौषधि, वर्षा ऋतु में घास अथवा दूसरे वृक्षों की छाया में देखने में आती है। ४- ५ पत्ते वाले खजूर के वृक्ष की तरह इसका नवीन क्षुप होता है। मूलस्तम्भ सीधा और मोटा होता है। पुरानी चक्राकार पत्र सन्धियों के कारण यह ताल वृक्ष के स्कन्ध जैसा दिखलाई देता है। इसकी ग्रन्थियों से सूत्राकार परन्तु मांसल उपमूल निकलते रहते हैं और शीर्ष से लगभग ३ या ४ पत्ते भूमि के ऊपर निकलते रहते हैं। इसके पत्ते-बिना डंठल के खजूर के पत्तों से कुछ पतले, सकरे और प्रासवत् होते हैं। इसकी लम्बाई ६ से १८ इञ्च तक और चौड़ाई १-१।। इञ्च तक होती है। पुष्पदण्ड-छोटा, बीच से निकला हुआ, ऊपर की ओर क्रमशः मोटा (Clavate) और कुछ चिपटा होता है। इसके फूल-नलिकाकार पीले रंग के दो कतारों में होते हैं। फल-¹/२ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार होते हैं। बीज- काले और चमकीले होते हैं। इसके मूलस्तम्भ का चिकित्सा में व्यवहार होता है। यह बाहर से काले भूरे रंग का तथा अन्दर से श्वेत होता है। दो वर्ष पुराने क्षुप का कन्द प्रयोग में लाना चाहिये। इसका स्वाद कुछ कडुवा तथा लबाबदार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें तैलीय द्रव्य १ ¹/४%, राल तथा कषाय द्रव्य ४%, गोंद २०%, पिष्टमय पदार्थ ४३%, सीठी १४% एवं जल ४ ¹/४% रहता है। सूखे कन्द से ८ ¹/२% राख मिलती है जिसमें कॅल्शियम ऑक्सॅलेट (Calcium oxalate) रहता है। गुण और प्रयोग-काली मुसली स्नेहन, मूत्रजनन, बल्य तथा कुछ वृष्य है। मूत्रमार्ग पर इसकी विशेष क्रिया होती है। अर्श, कामला, श्वास, अतिसार तथा शूल में इसका उपयोग किया जाता है। त्रावणकोर की तरफ दूध के साथ इसकी पेया बनाकर सोजाक, मूत्रकृच्छ्र तथा अस्यार्तव में बहुत प्रयोग करते हैं। रोगयुक्तावस्था में इसका सेवन किया जाता है। अनेक वृष्य पाकों में इसका उपयोग किया गया है। जंगली लोग चोट तथा अस्थिभङ्ग पर इसका बाह्य प्रयोग करते हैं। मात्रा-कन्द ¹/४-¹/२ तो०। ९४. सफेद मूसली (१) सं०-श्वेत मुशली, मुसली। हिं०-सफेद मुशली, खैरूव। म०-सफेद मुसली, पाटली मुसली। गु०-धोली मुसली। ता०-तन्निराविट्टर्ग। ते०-सल्लोगड्डा। मल०-शेडिबेली। अ, फा०-शाकाकुले हिन्दी। ले०-Asparagus adscendens Roxb. (एस्पेरेगस् एड्स्केन्डेन्स् राक्स.)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। यह पश्चिम हिमालय, पञ्जाब, गुजरात, रतलाम, बम्बई, रुहेलखण्ड, अवध तथा मध्य भारत में पाया जाता है। उत्तम सफेद मुसली रतलाम से आती है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा काँटेदार होता है। शाखाएँ-झुकी हुई, आरोहणशील, धूसरवर्ण की नालीदार और कोणयुक्त होती हैं। प्रधान कांड-लम्बा, ऊँचा, मोटा, गोल और चिकना होता है। काँटे-आधे से पौन इञ्च लम्बे, सीधे और मोटे होते हैं। पत्राभास काण्ड-आधे से दो इञ्च लम्बे, केशाकार, गोल ६-२० की संख्या में एक साथ गुच्छबद्ध रहते हैं।

गुडूच्यादिवर्गः ५५९ मूलस्तम्भ से श्वेत, कन्दसदृश तथा लम्बगोल मूलों का गुच्छा निकला रहता है । छाल निकालकर सुखाई हुई सफेद, झुर्रीदार, २-२ १/२ इञ्च लम्बी, सूजा के इतनी मोटी, कुछ ऐंठी हुई, कड़ी तथा आसानी से टूटने वाली, जड़ें बाजार में मिलती हैं । अधिक-से-अधिक यह १/४ इञ्च मोटी रहती हैं। इसका स्वाद लबाबदार किन्तु अच्छा रहता है । इसे पानी में डालने से यह फूलकर शतावरी जैसी दिखलाई देती है । रासायनिक संगठन-इसके जल में घुलनशील भाग ७७ १/२%, जल ६% तथा सीठी १२ १/२% रहती है । जलविलेय भाग में मांसल पदार्थ रहता है । इसमें पिष्ट बिल्कुल नहीं रहता । सूखी हुई जड़ में ३ १/२% राख रहती है । गुण और प्रयोग-यह शीत, लघु, स्नेहन एवं उत्तम बल्य है । इसमें स्टार्च न होने के कारण इसको मधुमेह में दिया जा सकता है । सभी प्रकार के दौर्बल्य में १ तोला चूर्ण १ तोला चीनी मिलाकर दूध के साथ देते हैं। नपुंसकता, शुक्रमेह, प्रदर, अतिसार तथा प्रवाहिका में इसे देते हैं । मात्रा-चूर्ण १/२ से १ तोला । ९५. सफेद मूसली (२) हिं०-सफेद मूसली, गेरेंग अडा । ले०-Chlorophytum arundinaceum Baker (क्लोरोफाइटम् एरुण्डिनेसिअम् बेकर) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह इस देश के कई प्रान्तों में प्रायः बरसात के दिनों में देखने में आती है, इसका क्षुप होता है । पत्ते- १५" × २.५" बड़े तथा प्रासवत् होते हैं। पुष्पध्वज पहले, ५-१५" इञ्च लम्बा और पुष्प श्वेत होते हैं। पुष्पों की भाजी बनाकर खाई जाती है। इसकी जड़ के पास लम्बे सूत्राकार जड़ों के गुच्छे निकलते हैं। जिनके अग्र पर मोटे, बेलनाकार, १-१.५" × .५-.६ इञ्च बड़े कन्द होते हैं जो भीतर से भूरे सफेद रंग के होते हैं। इसकी अन्य दो जातियाँ C. laxum Br. (क्लो. लॅक्सम्) एवं C. tuberosum Baker (क्लो. ट्युबरोजम्) भी पाई जाती है । इन कन्दों को कुछ लोग सफेद मुसली मानते हैं तथा पहले जिस सफेद मुसली का वर्णन किया जा चुका है उसे शतावरी भेद मानते हैं । इसका भी उपयोग सफेद मूसली के समान किया जाता है । अथ शतावरी महाशतावरी च । तयोर्नामानि तयोस्तदङ्कुरस्य च गुणाँश्चाह शतावरी बहुसुता भीरूरिन्दीवरी वरी । नारायणी शतपदी शतवीर्या च पीवरी ॥१८४॥ महाशतावरी चान्या शतमूल्यूर्ध्वकण्टिका । सहस्रवीर्या हेतुश्च ऋष्यप्रोक्ता महोदरी ॥१८५॥ शतावरी गुरुः शीता तिक्ता स्वाद्वी रसायनी । मेधाऽग्निपुष्टिदा स्निग्धा नेत्र्या गुल्मातिसारजित् ॥१८६॥ शुक्रस्तन्यकरी वल्या वातपित्तास्रशोथजित् । महाशतावरी मेध्या हृद्या वृष्या रसायनी ॥१८७॥ शीतवीर्या निहन्त्यर्शोग्रहणीनयनामयान् । तदङ्कुरस्त्रिदोषघ्नो लघुरर्शःक्षयापहा ॥१८८॥ 'छोटी शतावर' तथा 'बड़ी शतावर' के नाम और गुण तथा उन दोनों के अङ्कुर के क्रम से गुण- शतावरी, बहुसुता, भीरुः, इन्दीवरी, वरी, नारायणी, शतपदी, शतवीर्या और पीवरी ये सब नाम 'छोटी शतावर' के हैं । 'बड़ी शतावर' के नाम-महाशतावरी, शतमूली, ऊर्ध्वकण्टिका, सहस्रवीर्या, हेतुः, ऋष्यप्रोक्ता और महोदरी ये सब हैं । छोटी शतावर-मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, गुरु, शीतवीर्य, रसायन, मेधा (धारणा शक्ति) कारक, जठराग्निवर्धक, पुष्टिदायक, स्निग्ध, नेत्रों के लिये हितकर, शुक्रवर्धक, स्तनों में दूध बढ़ाने वाली, बलकारक एवम् गुल्म, अतिसार, वात,

५६० भावप्रकाशनिघण्टुः पित्तरक्त तथा शोथ को दूर करने वाली होती है। बड़ी शतावर-मेधा तथा हृदय के लिये, हितकर, वृष्य, रसायन, शीतवीर्य, एवम् अर्श, ग्रहणी तथा नेत्ररोग को दूर करने वाली होती है। इन दोनों के अङ्कूर-लघु एवम् त्रिदोष, अर्श तथा क्षय के नाशक होते हैं। [१८४-१८८] ९६. शतावर हिं०-सतावर, सतावरि, सतमूली, शतावर, सरनोई। बं०-शतमूली। म०-शतावरी। गु०-शतावरी। ता०-पाणियनाकु। ले०-Asparagus racemosus Willd. (एस्पेरैगस् रेसिमोसस् विल्ड.)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। शतावर-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होती है। उत्तरी भारत में यह अधिक होती है। इसका क्षुप- काँटेदार, बहुवर्षायु, आरोहणशील तथा लता की तरह अनेक शाखाओं से युक्त फैला हुआ रहता है। शाखायें-त्रिकोण युक्त, चिकनी किन्तु रेखान्वित होती हैं। इसमें वास्तविक पत्र के स्थान पर काँटे होते हैं। काँटे-कुछ-कुछ टेढ़े तथा १/४-१/२ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्राभासकाण्ड-पत्र की तरह दिखलाई देने वाले, काँटों के कोणों में सूत्राकार पतले १/२-१ इञ्च लम्बे तथा दृढ़ पत्राभास काण्ड के गुच्छे होते हैं। फूल-छोटे, सफेद रंग के तथा सुगन्धित गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे-छोटे, गोल तथा पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं, जिनमें १-२ बीज रहते हैं। मूलस्तम्भ से कन्दसदृश श्वेत लम्बगोल परन्तु दोनों सिरों पर पतले मूलों के गुच्छे निकले रहते हैं जिनका चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। जाति-इसकी एक बड़ी जाति होती है जिसे सं०-महाशतावरी एवं ले०-A. sarmentosus Linn. (ए. सार्मेण्टोसस् लिन.) कहते हैं। यह दक्षिण में होती है। इसकी लता बड़ी होती है तथा इसके मूलस्तम्भ से बहुत से कन्द निकले रहते हैं जो स्वादहीन होते हैं। इसकी एक कण्टकहीन जाति 'शरजोई', कौण्टा, ले०-A. filicinus Buch. & Ham. (ए. फिलिसिनस् बु. हैम.) जौनसार में ९ हजार फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह स्वावलम्बी होती है। इसमें काँटे नहीं होते एवं पत्राभासकाण्ड चिपटे होते हैं। सफेद मुसली (१), शतावरी जाति की है। रासायनिक संगठन-दोनों शतावरी के ताजे कन्दों में जल में घुलने वाला पदार्थ ५२ १/२%, सीठी ३३ १/२% तथा जल ९% रहता है। जल में घुलनशील भाग में ७% शर्करा होती है। शुष्ककन्द की राख ४% निकलती है। गुण और प्रयोग-शतावरी मधुर, शीत, गुरु, स्नेहन, स्तन्यजनन, मूत्रजनन, शुक्रजनन, बल्य, वृष्य, वयःस्थापन, चक्षुष्य, अग्निवर्धक, अल्पसग्राहक एवं त्रिदोषघ्न है। इसका उपयोग अन्य औषधों के साथ नपुंसकता, शुक्रमेह, शुक्रतारल्य, नेत्ररोग, अतिसार, ग्रहणी, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त तथा अपस्मार में किया जाता है। बलवृद्धि के लिये दुग्ध एवं शर्करा के साथ इसकी पेया बनाकर देते हैं। इसके अङ्कूरों की तरकारी कुपचन में देते हैं। इससे सिद्ध तैलों का बाह्य प्रयोग शिरोरोग, चर्मरोग, वातव्याधि तथा दौर्बल्य में करते हैं। मात्रा-२ तोला दुग्ध के साथ। अथाश्वगन्धा । तस्या नामगुणानाह गन्धान्ता वाजिनामादिरश्वगन्धा हयाह्वया । वराहकर्णी वरदा बलदा कुष्ठगन्धिनी ॥ १८९ ॥ अश्वगन्धाऽनिलश्लेष्मश्वित्रशोथक्षयापहा । बल्या रसायनी तिक्ता कषायोष्णाऽतिशुक्रला ॥ १९० ॥ 'असगन्ध' के नाम और गुण-अश्वगन्धा, हयाह्वया (हय के पर्यायवाची समस्त शब्द इसके द्योतक हैं), वराहकर्णी, वरदा, बलदा, कुष्ठगन्धिनी और वाजी (घोड़ा) के जितने पर्यायवाची शब्द है वे आदि में बनाकर अन्त में 'गन्ध' शब्द लगाने से जितने शब्द हों, उन सबों को इसका पर्यायवाची शब्द समझना चाहिये, जैसे-वाजिगन्धा, हयगन्धा इत्यादि।

गुडूच्यादिवर्गः ५६१ असगन्ध-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य, बलकारक अत्यन्त शुक्रवर्धक, रसायन एवं वात, कफ, श्वित्र (श्वेत कुष्ठ), शोथ और क्षय को दूर करने वाला होता है। [१८९-१९०] ९७. असगन्ध हिं०-असगन्ध, अश्वगन्धा, नागोरी असगन्ध। बं०-अश्वगन्धा, आसकन्द, ढोरगुंज। गु०-आसन्य। संथा०- घोड़ाइन, घोड़ाआकुन। क०-अंगरबेरु। ते०-पैन्नेरुगड्डु, पिल्ली आंड्रा, अश्वगन्धी। ता०-चुवदिगं। फा०- बहमनबरीं। अं०-Winter cherry (विंटरचेरी)। ले०-Withania somnifera Dunal (विथेनिआ सॉम्नीफेरा)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। असगन्ध इस देश के अनेक भागों के कुछ गरम और साधारण प्रान्तों में विशेषकर पश्चिम के शुष्क प्रदेशों में अधिक होती है। भारत के अतिरिक्त यह लङ्का, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, सिंध, भूमध्यसागरीय प्रदेश, उत्तमाशाअन्तरीप आदि देशों में पाई जाती है। मालवा में इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप-भंटा के क्षुप के समान सघन होता है। इसकी ऊँचाई-३-४ फीट की होती है। शाखायें-टेढ़ी-मेढ़ी तारकाकार रोमों से युक्त होती हैं। पत्ते-अखंड, लटवाकार, लगभग कुंठिताग्र, सरलधार से युक्त, २-४ इञ्च लम्बे १-२ इञ्च चौड़े, सूक्ष्म तारकाकार रोमों से युक्त, फलकमूल क्रमशः संकुचित एवं १/४-१/२ इञ्च तक लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-प्रायः ५ एक साथ सचूड़ाकार गुच्छों में, छोटे, हरिताभ या पीताभ पत्रकोणों में निकलते हैं। फल-पत्रदण्ड के पास १/४ इञ्च बड़े फल लगते हैं और वे प्रवृद्ध बाह्य कोश के पतले छिलके के परदे में रहते हैं। उनका आकार मटर के समान होता है और पकने पर वे लाल हो जाते हैं। फलों से दूध जम जाता है। बीज-वनभण्टा के बीज के समान छोटे-छोटे चिपटे बीज होते हैं। इसका क्षुप ३- ४ वर्ष के बाद नष्ट हो जाता है। इसकी जड़ १-१ १/२ फीट लम्बी, १-१ १/२ इञ्च मोटी, मूली की तरह शंक्वाकार, मजबूत, चिकनी, बाहर से हलके भूरे रंग की तथा अन्दर से श्वेत होती है। मूल का भन छोटा तथा स्टार्च युक्त होता है। ताजी जड़ में अश्व के मूत्र सदृश गन्ध आती है जिससे इसे अश्वगन्धा कहा जाता है। इसका स्वाद कड़वा तथा तीक्ष्ण होता है। नोट-असगन्ध दो प्रकार की होती है। एक जिसका ऊपर वर्णन किया गया है तथा दूसरी नागौरी असगन्ध के नाम से बाजार में बिकने वाली। इन दोनों की जड़ें भिन्न दिखलाई देने के कारण ऐसा अनुमान था कि नागौरी असगन्ध यह उपर्युक्त असगंध का कोई कृषिजन्य परिवर्तित रूप हो। किन्तु नई खोज से यह सिद्ध किया गया है कि नागौरी असगंध की स्वतन्त्र जाति (Species) ही होती है जिसका नया नामकरण विथेनिया अश्वगंधा (Withania ashwagandha) किया गया है। बाजीकर, बल्य तथा बृंहण गुण के लिये खाने के काम में बाजारी असगन्ध (नागौरी) लेना चाहिये तथा वातघ्न गुण के लिये अपस्मारादि व्याधियों में, लेपादि बाह्य प्रयोगों में तथा तैलादि में उपर्युक्त असगन्ध के मूल लेने चाहिये। इसका दुग्ध में स्वेदन करके शोधन कर लेना चाहिये। असगन्ध के पञ्चांग तथा विशेषकर जड़ का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में उड़नशील तैल, रवेदार विथेनियॉल (Withaniol C₂₅ H₃₅ O₅) नामक पदार्थ, हेण्ट्रियाकॉण्टेन् (Hentriacontane), फाइटोस्टेरॉल तथा तैल ये पदार्थ होते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें ३ विभिन्न क्षाराभ (Alkaloid) होते हैं जिनमें से सॉम्निफेरिन् (Somniferin C₁₂ H₁₆ N₂) रवेदार होता है। गुण और प्रयोग-नागौरी (बाजारी) असगन्ध उष्ण, मधुर, बृंहणीय, बल्य, रसायन, वृष्य, एवं शोथहर है। क्षय, बालशोष, सुखण्डी, वार्धक्य आदि में इसके १/२-१ तो० चूर्ण को थोड़े घृत में गरम कर दूध एवं शर्करा मिलाकर देते हैं। यह उत्तम पौष्टिक है। बच्चों के लिये यह बहुत ही अच्छा है। इससे बच्चों का सूखना बन्द हो जाता है। स्त्रियों के कटिशूल एवं श्वेत प्रदर में इससे लाभ होता है। ३९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५६२ भावप्रकाशनिघण्टुः जंगली असगन्ध-अवसादक, स्वापजनक एवं मूत्रजनक है । इसका अवसादक प्रभाव वातनाड़ियों पर होता है न कि हृदय पर । अल्प मात्रा में धतूरे जैसा मद इससे उत्पन्न होता है तथा कामोत्तेजना होती है । वद, ग्रन्थि, शोथ तथा फोड़े आदि पर इसके लेप से लाभ होता है । तिलाओं में इसका उपयोग किया जाता है । इससे सिद्ध तैल दौर्बल्य तथा वातव्याधि में मालिश के उपयोग में आता है । इसके बीज स्वापजनन एवं मूत्रजनन हैं । अधिक मात्रा में विषैले होते हैं । आमवात में इसके ताजे पत्ते बाँधते हैं । मात्रा-नागौरी असगन्ध चूर्ण ३-६ माशा । अथ पाठा (पाठी) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पाठाऽम्बष्ठाऽम्बष्ठकी च प्राचीना पापचेलिका। एकाष्ठीला रसा प्रोक्ता पाठिका वरतिक्तिका ।। १९९१।। पाठोष्णा कटुका तीक्ष्णा वातश्लेष्महरी लघुः । हन्ति शूलज्वरच्छर्दिकुष्ठातीसारहृद्रुजः । दाहकण्डूविषश्वासकृमिगुल्मगरव्रणान् ।।१९९२।। 'पाठ' के नाम तथा गुण-पाठा, अम्बष्ठा, अम्बष्ठकी, प्राचीना, पापचेलिका, एकाष्ठीला, रसा, पाठिका और वरतिक्तिका ये सब नाम 'पाठ' के हैं । पाठ-उष्णवीर्य, कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, लघु, वात-कफनाशक एवं शूल, ज्वर, वमन, कुष्ठ, अतीसार, हृद्रोग, दाह, कण्डू (खुजली), विष, श्वास, क्रिमि, गुल्म, उदररोग और व्रण को दूर करने वाली होती है । [१९९१-१९९२] प्राचीनों ने पाठा के दो भेद माने हैं। एक लघु पाठा तथा दूसरी राजपठा (बड़ी पाठा) इनमें से लघु पाठा यह सिसँम्पेलोस् पेरैरा (Cissampelos pareira) है । राजपठा या पाठा ही के स्थान पर इसी वर्ग की अन्य वनस्पतियों का भी उपयोग विभिन्न स्थानों में किया जाता है। साइक्लिआ पेल्टेटा (Cyclea peltata) एवं साइक्लिआ वर्मेनी (Cyclea burmanni)-यह केवल आसाम एवं खासिया पर्वत से पूर्व की तरफ तथा दक्षिण में पश्चिमी, पूर्वी घाट एवं कोंकण में पाई जाती है तथा दक्षिण में इन्हीं का अधिक प्रयोग छोटी एवं बड़ी पाठा के नाम से किया जाता है यद्यपि सि. पेरैरा भी वहाँ पाई जाती है । उत्तरी भारत में यह (साइक्लिआ) नहीं पाई जाती, किन्तु स्टिफेनिआ हर्नैण्डिफोलिआ (Stephania hernandifolia) नामक बड़ी जाति पाई जाती है, जिसे राजपठा कह सकते हैं । बंगाल की तरफ आकनादि नाम से इसका अधिक उपयोग किया जाता है । गुजरात तथा काठियावाड़ में इसी वर्ग की पातालगरुडी का उपयोग पाठा के स्थान पर करते हैं जो उचित नहीं है । एक ही वर्ग तथा स्वरूप-गुणादि में साम्य होने के कारण पाठा नाम से इनका उपयोग भिन्न-भिन्न स्थानों में किया जाता है । ९८. पाठा सं०-लघुपाठा, पीलुफला, अविद्धकर्णी । हिं०-पाठा, पाठ, पाढ, पाठी, पाढी, पुरइन पाठी । बं०-आकनादि, निमुक, एकलेजा । म०-पहाड़ वेल । गु०-वेणीवेल, करेढियुं । क०-षडवलि । ता०-अप्पाट्टा, पोंमुतूत्तै । गोवा०- पारवेल । ते०-पाटा, विरुबोड्डि । ले०-Cissampelos paeira Linn. (सिसँम्पेलोस् पेरैरा लिन.) । अं०- Velvet leaf (वेल्वेट लीफ) । Fam. Menispermaceae (मेनिसपर्मेसी) । यह इस देश के सभी उष्ण एवं साधारण भागों में सिंध, पंजाब, शिमला, देहरादून तथा दक्षिण में कोंकण से लंका तक पाई जाती है । एशिया, पूर्व अफ्रिका तथा अमेरिका के उष्ण प्रदेशों में भी होती है । यह लता-खुली हुई पथरीली जगहों में प्रायः छोटे वृक्षों और झाड़ियों पर फैली हुई पाई जाती है । शाखाएँ- पतली, सीधी एवं क्वचित् लोमयुक्त होती हैं। पत्र-लटूवाकार या कभी-कभी वृत्ताकार-वृक्काकार हृदयाकृति, एकांतर, १-४ इञ्च बड़े, नोकरहित एवं क्वचित् नुकीले रहते हैं । पर्णनाल प्रायः पृष्ठ भाग से जुड़ा हुआ तथा पृष्ठ के बारबर या

गुडूच्यादिवर्गः ५६३ अधिक लम्बा होता है। पुष्प-एकलिंग, छोटे, श्वेताभ, किंचित् पीत वर्ण के वर्षा काल में आते हैं। नरमंजरी लम्बी, अनेक पुष्पों से युक्त, मृदुरोमश तथा पत्रकोणों से निकली रहती है। फल-रक्त या नारंग वर्ण के, कुछ गोलाकार, ४ मि० मि० बड़े एवं रोमावृत रहते हैं। बीज-मुड़े हुए होते हैं। इसके मूल का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। इसकी सूखी हुई जड़ के लम्बे गोल, अंडाकार या दबे हुये टुकड़े, कभी-कभी लम्बाई में टूटे हुये मिलते हैं। ये व्यास में १/२ से ४ इञ्च तक मोटे एवं ४ इञ्च से लेकर ४ फीट तक लम्बे होते हैं। बाहर से ये भूरे बादामी रंग के तथा लम्बाई में झुर्रीदार होते हैं। इन झुर्रियों पर अनुप्रस्थ चक्राकार कुछ उभार रहते हैं। अन्दर से ये काष्ठमय, पीताभ भूरे रंग के एवं सुषिर होते हैं तथा इनमें स्पष्ट किन्तु प्रायः अपूर्ण चक्राकार रेखाएँ तथा मज्जक किरणें (Medullary rays) दिखलाई देती हैं। इनका स्वाद प्रारम्भ में कुछ मधुर एवं सुगन्धित तथा बाद में अत्यन्त कडुवा होता है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में ०.७२% क्षाराभ पाये जाते हैं जिसमें बेबीराइन (Bebeerine) भी रहता है। अल्प मात्रा में एक रवेदार डेयामेट्रीन (Deyamettin) नामक पदार्थ एवं एक राल पाई जाती है। गुण एवं प्रयोग-पाठामूल, उष्ण, तिक्त, ग्राही, स्तन्यशोधक, ज्वरहर, बल्य, बस्तिशोधक एवं मूत्रजनक है। अल्प मात्रा में इससे भूख बढ़ती है, अन्न का पाचन होता है तथा आंत्र की श्लेष्मलकला को बल मिलता है। अधिक मात्रा से पाखाना साफ होता है। सम्पूर्ण क्षाराभ का अनैच्छिक मांसपेशी पर अवसादक प्रभाव पड़ता है। इसका उपयोग कुपचन, अतिसार, ज्वर, मूत्रविकार, शोफ, कास, आर्तव-विकार एवं अर्श में किया जाता है। पैरेरारूट (Pareira root) जो कि कोण्ड्रोडेण्ड्रोन टोमेण्टोजम् (Chondrodendron tomentosum Ruiz & Pav.) की जड़ है उसके स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। मूत्रमार्ग की श्लेष्मल त्वचा पर इसका शामक संग्राही एवं बलदायक प्रभाव पड़ता है। यह बस्ति के लिये उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। (१) मूत्रसंस्थान के विकारों में इसकी जड़ का फांट दिया जाता है। बस्तिशोथ, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, सान्द्रमेह, रक्तमूत्र तथा अन्य विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। इन विकारों में इसे अधिक मात्रा में देते हैं। इसके साथ मुलेठी तथा गुडूची का प्रयोग अधिक उपयोगी है। (२) कुपचन, उदरशूल, अतिसार, रक्तातिसार एवं ज्वरातिसार आदि विकारों में इसको अन्य सुगन्धि द्रव्यों के साथ देते हैं। मात्रा-चूर्ण १ से ३ माशा। प्रतिनिधि- (१) ले०-Stephania hernandifolia (Willd.) Walp. (स्टिर्फेनिआ हर्नैण्डिफोलिआ, वाल्प)। सं०- राजपाठा। बं०-आकनादि, नेमुक। यह भी देखने में पाठा के समान लता होती है किन्तु दोनों की पुष्पमंजरियों में अन्तर होता है। पाठा में बाह्यकोश के दल ४ (पुं.-पुष्प) और २ (स्त्री-पुष्प) एवं आभ्यंतर दल ४ संयुक्त (पुं.-पुष्प) और १ (स्त्री-पुष्प) होते हैं। इसमें बाह्य कोश के दल ६.१० एवं आभ्यंतर दल ३.५ होते हैं। इसमें पाठा की अपेक्षा पत्ते बड़े (३-५" x २ १/२-४") और शिराजाल कम सघन होता है। इसके फल बड़े एवं बीज मुड़कर करीब-करीब गोल हो जाते हैं। इसमें कुछ सॅपोनिन् (Saponin) होते हैं। इसकी जड़ का भी उपयोग पाठा की तरह अतिसार, कुपचन तथा मूत्रविकारों में किया जाता है। इसका सत्त्व मेढक के लिये अत्यन्त विषैला होता है। (२) ले०-Cyclea peltata H. f. & T. (साइक्लिआ पेल्टेटा)। सं०-राजपाठा भेद। म०-पाडल, पाडावल। गु०-कालीघाट। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५६४ भावप्रकाशनिघण्टुः यह लता आसाम तथा खासिया से पूर्व की तरफ एवं दक्षिण में कोंकण, माथेरान, महाबलेश्वर तथा सिलोन तक पाई जाती है। इसकी शाखाएँ—धारीदार एवं अल्प रोमश होती हैं। पत्ते—पतले, रोमश, ३-६" × २-४" बड़े एवं १-२ १/२" लम्बे पर्णवृन्त से युक्त रहते हैं। पर्णवृन्त पाठा की तरह ही फलक से पृष्ठ की ओर जुड़ा रहता है। पुष्प— बहुत छोटे, हरे रंग के एवं फल—वृक्काकार तथा रोमश रहते हैं। इसी का एक और भेद सा. वर्मेनी (C. burmanni Miers.) भी पाया जाता है। लघु पाठा (सि. परेरा) में बाह्य कोश के दल आपस में मिले नहीं रहते किन्तु इसमें ये मिले हुवे तथा संख्या में ४-८ होते हैं। दक्षिण में पाठा नाम से इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इसके पंचांग का उपयोग होता है। गुण और प्रयोग—यह कड़वी, वातहर, स्वेदजनक एवं मूत्रजनक है। छोटे बच्चों के उदर शूल, आँव, अतिसार एवं अर्श में इसकी जड़ पीस कर देते हैं। इसके साथ अतीस एवं करंज देते हैं। पैत्ति कुपचन में इसका स्वरस सोंठ के साथ देते हैं। प्रमेह में मट्ठे के साथ जड़ देते हैं। मात्रा—मूल चूर्ण १/२ से १ माशा। अथ श्वेता त्रिवृत् (निसोत श्वेत)। तस्या नामगुणानाह श्वेता त्रिवृत् त्रिभण्डी स्यात् त्रिवृता त्रिपुटाऽपि च। सर्वानुभूतिः सरला निशोत्त्रा रेचनीति च ॥१९३॥ श्वेता त्रिवृद्रेचनी स्यात्स्वादुरुष्णा समीरहत्। रूक्षा पित्तज्वरश्लेष्मपित्तशोथोदरापहा ॥१९४॥ सफेद निसोत के नाम तथा गुण—श्वेता त्रिवृत्, त्रिभण्डी, त्रिवृता, त्रिपुटा, सर्वानुभूति, सरला, निशोत्रा और रेचनी ये सब नाम सफेद निसोत के हैं। सफेद निसोत—रेचक, स्वादु, उष्णवीर्य, रूक्ष, वातनाशक एवं पित्तज्वर, कफ, पित्त, शोथ और उदररोग को दूर करने वाली होती है। [१९३-१९४] ९९. निसोत हिं०—निसोत, निशोथ, पितोहरी। बं०—तेउड़ी, तिउरी, दूधकलमी। म०—निशोत्तर, तेंड, फुटकरी, शेतवड। क०—तिगडे। ते०—तेल्ल, तेगड़। ता०—शिवदै, चिवदै। गु०—नसोतर। अ०—तुर्बुद। अं०—Turpeth root (टरपेथ रूट); Indian Jalap (इंडियन जालप)। ले०—Operculina turpethum, Silva Manso (ऑपेक्युलिना टर्पेथम्, सिल्वा मॅन्सो); Syn. Ipomoea turpethum R. Br. (आइपोमिआ टरपेथम्)। Fam. Convolvulac (क्वॉन्वॉल्व्यूलेसी)। निशोत इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में ३००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। बगीचों में लगाई हुई भी मिलती है। लंका, मलाया द्वीप एवं ऑस्ट्रेलिया में भी यह अधिक होती है। यह लता जाति की वनौषधि बारहो मास पाई जाती है परन्तु वर्षा ऋतु में विस्तार से फैली अधिक देखने में आती है। इसका काण्ड—तीन धार वाला होता है इसलिये इसको त्रिवृता कहते हैं। यह बहुत लम्बा, आरोही तथा ऐंठा हुआ रहता है। पुराना होने पर यह कुछ कड़ा, भूरे रंग का तथा मृदु रोमश हो जाता है। स्राव कुछ-कुछ दुग्धसदृश होता है। पत्ते—नीचे के पत्ते चौड़ाई लिये हुए लट्वाकार, हृद्गत, प्रायः २-४ इञ्च लम्बे, १/२ से ३ इञ्च तक चौड़े, लम्बाग्र तथा तीक्ष्णाग्र होते हैं। ऊपर के पत्ते प्रायः आयताकार, कुण्ठित रोमश अग्रयुक्त एवं सवृन्त (वृन्त .७५-३ इञ्च लम्बे) होते

हैं। पुष्प-घण्टिकाकार सफेद तथा २-३ इञ्च लम्बे होते हैं। परागाशय (Anthers) जल्दी ही आपस में ऐंठ जाते हैं। फल- ½-⅔ इञ्च बड़े तथा गोल होते हैं। फलत्वक् का बाहरी भाग जब फट जाता है तो भीतरी पारदर्श परदा रह जाता है जिसके अन्दर दो गह्वर और ४-१ काले एवं चिकने बीज होते हैं। इसकी जड़ लम्बी, पतली, मांसल एवं बहुत शाखायुक्त होती है। बाहर से भूरे या अरुणाभ धूसर रंग के ½-२ इञ्च तक मोटे तथा एक तरफ फटे हुए टुकड़े मिलते हैं। इस पर बाहर से गहरी धारियां होती हैं जिससे यह देखने में रस्सी की तरह दिखलाई देती है। इसका भग्न छाल में छोटा एवं काष्ठ में रेशेदार होता है। इसमें साधारण गन्ध एवं स्वाद में यह अरुचिकर होती है। आयुर्वेद में दो प्रकार की त्रिवृत् का वर्णन किया गया है। एक अरुण (श्वेताभ) या दूसरी श्याम (काली) रंग की। काली निशोथ अधिक तीव्र होने के कारण मूर्च्छा, दाह, भ्रम आदि उपद्रव करती है। अधिक दोष होने पर तथा क्रूरकोष्ठवालों के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। अच्छी भूमि में उत्पन्न, गम्भीर, श्लक्ष्ण तथा सरल मूल को लेकर उसके भीतर का काष्ठ भाग निकाल दें और बाहरी त्वचा को सुखाकर रख लें (च० अ० अ० ७)। बाजार में इसमें काण्ड के टुकड़े भी मिले रहते हैं जिनमें विरेचक गुण कम रहता है। वास्तव में निसोत की एक ही लता पाई जाती है। बाजार में श्वेत और कृष्ण ये भेद बिकते हैं और यह चिन्नार नामक लता (जिसके मूर्वा होने की अधिक संभावना है) के काण्ड हैं। वास्तविक निसोत कहीं-कहीं विधारा नाम से भी बेची जाती है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में ५-१०% एक राल पाई जाती है जिसका कुछ भाग ईथर में घुलनशील रहता है जो ऑल्फा-टर्पेथिन् (A-turpethin) एवं बीटा-टर्पेथिन (B-turpethin) का मिश्रण होता है। ईथर में अविलेय राल को टर्पेथिन् (Turpethin) कहते हैं। राल के अतिरिक्त कुछ उड़नशील तैल, वसायुक्त द्रव्य, अल्ब्यूमिन, स्टार्च, पीत रञ्जक पदार्थ, लिगनिन् एवं लौहऑक्साइड पाया जाता है। गुण और प्रयोग-निशोथ विरेचक, भेदनीय एवं अधोभागहर है। यह सुखविरेचनों में श्रेष्ठ मानी गई है। पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयुक्त जालप (Jalap) की तरह ही इसके भी गुण हैं। इससे पतले एवं पीले रंग के दस्त होते हैं। पेट में मरोड़ न हो इसलिये इसके साथ सोंठ जैसे सुगन्धि पदार्थ तथा सैंधव का उपयोग किया जाता है। जालप की अपेक्षा यह अल्प एवं विलम्ब से कार्य करती है इसलिये इसकी अपेक्षा अधिक मात्रा में देना पड़ता है किन्तु इससे किसी प्रकार का दुष्परिणाम नहीं होता। इसका स्वाद एवं गन्ध भी हृल्लासकारक नहीं होती। ज्वर, रक्तपित्त, अर्श, विसर्प, वातशोफ, कामला एवं राजयक्ष्मा आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। वातरोग, विशेषतः आघातयुक्त या खिन्नवृत्ति रहने पर यह उपयोगी है। अर्श, उदर एवं गुल्म में इसकी शाक का उपयोग करते हैं। मात्रा-३-५ माशा। अथ श्यामा त्रिवृत् (काली निसोत)। तस्या नामानि गुणांश्चाह त्रिवृच्छ्यामाऽर्द्धचन्द्रा च पालिन्दी च सुषेणिका। मसूरविदला काली कैशिका कालमेशिका ॥१९५॥ श्यामा त्रिवृत्ततो हीनगुणा तीव्रविरेचिनी। मूर्च्छादाहमदभ्रान्तिकण्ठोत्कर्षणकारिणी ॥१९६॥ 'काली निसोत' के नाम तथा गुण-श्यामा, त्रिवृत्, अर्धचन्द्रा, पालिन्दी, सुषेणिका, मसूरविदला, काली, कैशिका और कालमेशिका ये सब 'काली निसोत' के नाम हैं। काली निसोत सफेद निसोत की अपेक्षा हीन गुणवाली तथा तीव्र रेचक होती है एवं मूर्च्छा, दाह, मद और भ्रान्ति को उत्पन्न करने वाली एवं कण्ठ का उत्कर्षण करने वाली होती है (पृष्ठ ३९८ भी देखें)। [१९५-१९६]

५६६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ लघुदन्ती बृहद्दन्ती च (एरण्डवत्पत्रविटपा) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह लघुदन्ती विशल्या च स्यादुदुम्बरपर्ण्यपि । तथैरण्डफला शीघ्रा श्येनघण्टा घुणप्रिया ॥१९७॥ वाराहाङ्गी च कथिता निकुम्भश्च मकूलकः । द्रवन्ती शम्बरी चित्रा प्रत्यक्पर्ण्यखुपर्ण्यपि ॥१९८॥ उपचित्रा श्रुतश्रोणी न्यग्रोधी च तथा वृषा । दन्तीद्वयं सरं पाकं रसे च कटु दीपनम् ॥१९९॥ गुदाङ्कुराश्मशूलास्रकण्डूकुष्ठविदाहनुत् । तीक्ष्णोष्णं हन्ति पित्तास्रकफशोथोदरकृमीन् ॥२००॥ छोटी दन्ती तथा बड़ी दन्ती के नाम और गुण—लघुदन्ती, विशल्या, उदुम्बरपर्णी, एरण्डफला, शीघ्रा, श्येनघण्टा, घुणप्रिया, वाराहाङ्गी, निकुम्भ और मकूलक ये सब नाम छोटी दन्ती के हैं। द्रवन्ती, शम्ब

गुडूच्यादिवर्गः ५६७ आकार भिन्न-भिन्न होता है। नीचे वाले पत्ते ६ से १२ इञ्च लम्बे, अञ्जीर के पत्तों के समान कटे किनारे वाले ३ से ५ भागों में विभक्त तथा किञ्चित् नुकीले होते हैं और ऊपर वाले पत्ते गूलर के पत्तों के आकार वाले २-३ इञ्च लम्बे और भालाकार होते हैं। फूल-एकलिंगी, गुच्छाकार हरिताभ रंग के होते हैं। फूल-किंचित् रोमश, ३ खण्ड का एवं करीब १/२ इञ्च लम्बा होता है। बीज-भूरे, बाह्यवृद्धि से युक्त तथा एरण्ड से छोटे होते हैं। इसकी जड़ एवं बीज औषधि के काम में आते हैं। जड़-अङ्गुली के बराबर मोटी, सीधी और कभी-कभी टूटी हुई होती है। जड़ की छाल भूरे रंग खुरदरी एवं काष्ठ भाग श्वेत, पीताभ, मुलायम किन्तु चीमड़ रहता है। यद्यपि जमालगोटे को दन्तीबीज कहते हैं तथापि जमालगोटा उक्त दन्ती का बीज नहीं है। संग्रहविधि-दन्ती तथा द्रवन्ती के हाथी दाँत के सदृश कठिन, स्थूल एवं श्याम ताम्र वर्ण के मूल को छोटी पीपल के चूर्ण एवं मधु का लेप करके कुशा के बीच में रख कर मिट्टी का लेप करके पुटपाक करे। फिर धूप में सुखा लें। इस प्रकार अग्नि एवं धूप से इसका विकाशी गुण नष्ट हो जाता है। (च. क. अ. १२) रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में राल एवं स्टार्च पाया जाता है। गुण और प्रयोग-दन्ती की जड़, कटु, उष्ण, शोथघ्न, ज्वरघ्न, रेचन एवं कफपित्तनाशक है। इसका उपयोग, उदर, जलोदर, शोथ, कामला, यकृद्विकार, आध्मान, गुल्म, अर्श एवं ज्वर में किया जाता है। इसके बीज अत्यन्त तीव्र रेचन होते हैं। इसके बीजों का तैल तिक्त, कटु, कषाय एवं अधोभाग दोषहर है तथा कृमि, कुष्ठ, कफ, वात और दूष्योदर को दूर करने वाला एवं दुष्टव्रणशोधक है। (१) ज्वर में तक्र के साथ इसकी जड़ देने से यकृत् की क्रिया ठीक होकर शौच के द्वारा दूषित पित्त निकल जाता है। (२) जलोदर, हृदयोदर, यकृदुदर, वृक्कविकृतिजन्य उदर आदि में इसकी जड़ का विरेचनार्थ प्रयोग करते हैं। कामला में भी विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। (३) श्वास में इसके पत्तों का उपयोग किया जाता है। (४) त्वचा के विकारों में इसका उपयोग किया जाता है। (५) इसके बीज एवं तैल जमालगोटे की तरह तीव्र रेचक होते हैं। प्रयोगविधि-इसको सौफ आदि सुगन्धित पदार्थों के साथ क्वाथ के रूप में देना चाहिये। अधिक मात्रा में यह क्षोभक एवं मादक है जिसके निवारण के लिये मधुर-स्निग्ध पदार्थ, शर्बत तथा दूध आदि का उपयोग करना चाहिये। मात्रा-१-३ माशा; बीज १/२-१ र०। अथ लघुदन्तीफलम्। तस्य गुणानाह क्षुद्रदन्तीफलं तु स्यान्मधुरं रसपाकयोः। शीतलं सृष्टविण्मूत्रं गरशोथकफापहम्॥२०१॥ छोटी दन्ती के फल का गुण-छोटी दन्ती का फल-रस और पाक में मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, मल और मूत्र को निकालने वाला, विष, शोथ तथा कफ का नाशक होता है। [२०१] अथ जयपालः (जमालगोटा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह जयपालो दन्तिबीजं विख्यातं तिन्तिडीफलम्। जयपालो गुरुः स्निग्धो रेची पित्तकफापहः॥२०२॥ जमालगोटा के नाम तथा गुण-जयपाल, दन्तिबीज, तिन्तिडीफल ये सब जमालगोटा के विख्यात नाम हैं। जमालगोटा-गुरु, स्निग्ध, रेचक एवं पित्त-कफ का नाशक होता है। [२०२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

५६८ भावलोकननिघण्टुः नोट-यहाँ दन्तिबीज का अर्थ बड़ीदन्ती (द्रवन्ती) का बीज उचित मालूम पड़ता है क्योंकि क्षुद्रदन्ती का बीज जयपाल नहीं है । १०१. जमाल गोटा (द्रवन्तीबीज) हिं०-जमाल गोटा। बं०, म०-जयपाल । पं०-जपोलोटा । गु०-नेपालो । ता०-नेवलिम् । ते०-नेपालवेमु । क०-नेपाल, जापालबीज । तुम्बे बेदअञ्जीर, तुम्बे बेदंजीरखताई । अ०-हब्बुरस्सलातीन । फा०-तुख्मे बेदअञ्जीर खताई । अं०-Croton oil seed (क्रोटन! ऑयल सीड) । ले०-Croton tiglium Linn. (क्रोटन् टिग्लिअम् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह आसाम, बंगाल, ब्रह्मा तथा समस्त भारत में पाया जाता है । इसका वृक्ष-छोटा होता है और वह बारहो मास हरा-भरा रहता है । इसकी शाखायें रोमयुक्त छोटी-छोटी होती हैं। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, चौड़े अंडाकार, चिकने, नोकीले, दन्तुर और ३-५ शिराओं से युक्त होते हैं। फूल-हरिताभ पीत रङ्ग के मंजरी के रूप में आते हैं । फल-प्रायः १ इञ्च लम्बे अंडाकार और त्रिकोणयुक्त होते हैं । बीज-बादामी रंग के होते हैं जिन्हें जयपाल (जमाल गोटा) कहा जाता है। इसके बीज एवं बीज तैल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। शोधन-आयुर्वेद में शोधन करके ही जमाल गोटे का व्यवहार किया जाता है । जमाल गोटे के छिलके एवं दो दलों के बीच के अंकुर (जीभ) को निकाल, गोदुग्ध में ३ घण्टे तक स्वेदन करे। फिर शीतल होने पर गरम जल से धो, नींबू के रस के साथ पीस, मिट्टी के कोरे तवे पर बिछा कर सुखा ले । इस प्रकार करने से यह शुद्ध हो जाता है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एक स्थिर तैल. टिग्लिनिक् अम्ल (Tiglinic acid), क्रोटनिक् या क्वार्टेनिलिक अम्ल (Crotonic or quartenylic acid) एवं क्रोटन तैल (Croton oil) रहता है। क्रोटन तैल में मुख्य क्रियाशील तत्त्व क्रोटोनोलिक अम्ल (Crotonolic acid) होता है जिसके अतिरिक्त टिग्लिक् अम्ल या मैथिल् क्रोटनिक अम्ल (Tiglic acid or Methyl crotonic acid), क्रोटोनाल् (Crotonol) जिसमें रेचनगुण नहीं होता किन्तु जो त्वचा के लिये प्रक्षोभक होता है, कुछ उड़नशील तैल जिनके कारण इसमें गन्ध होती है एवे कुछ स्नेहाम्ल पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-यह कटु, उष्ण, विरेचन, दीपन, कफ वातहर, कृमि एवं जलोदर नाशक है। बाह्य प्रयोग में यह प्रक्षोभक एवं विस्फोटजनक है। यह अत्यन्त तीव्र रेचन है। अधिक मात्रा में यह विष है। इसके तैल के एक बूँद प्रयोग से पचीसो पतले दस्त होते हैं तथा पेट में बहुत मरोड़ होता है। इससे आन्त्र की श्लेष्मकला में कुछ शोथ भी हो जाता है। यद्यपि इससे कृमि भी गिरते हैं तथापि कृमि के लिये इसका प्रयोग नहीं करते, रक्तगत जलीय अंश को जब जल्दी कम करना रहता है तब इसका उपयोग करते हैं। (१) मस्तिष्कगत रक्तस्रावजन्य अर्धांग आदि में इसका प्रयोग करते हैं। इससे जलीय अंश कम होकर रक्तस्राव कम होता है तथा मस्तिष्कगत दबाव कम होता है । रोगी बेहोश हो तो तैल का एक बूँद मक्खन में मिलाकर जीभ पर लगा दें। (२) हृदयोदर में भी जलीय अंश को कम करने के लिये इसका प्रयोग करते हैं, किन्तु कभी-कभी इसके प्रयोग के बाद दस्त बन्द नहीं होते । (३) आमवात, सन्धिशोथ, वातविकार तथा तिलाओं के रूप में इसके तैल का बाह्य प्रयोग किया जाता है। विषप्रभाव-इसकी अधिक मात्रा से दाह, मरोड़, शूल, रक्तयुक्त दस्त एवं दौर्बल्य आदि लक्षण होते हैं। इसके निवारण के लिये जल में कत्था घिसकर या नींबू का रस पिलावे । मात्रा-बीज १/४-१/२ २०, तैल १/२-१ बूँद मक्खन के साथ ।

गुडूच्यादिवर्गः ५६९ १०२. नागदन्ती नागदन्ती कटुस्तिक्ता रूक्षा वातकफापहा। मेधाकृद्विषदोषघ्नी पाचनो शोथनाशिनी ।। गुल्मशूलोदरव्याधिकुष्ठदोषनिकृन्तनी । (रा० नि०) सं०-हस्तिदन्ती (च० सू० अ० १), नागदन्ती (च० वि० अ० ८) । हिं०-हकूम, पुतेर, पुथरी, चुक । म०- घणसर । बं०-बरागाच्छ । ने०-अच । ते०-भुतन् कुसुम । ले०-Croton oblongifolius, Roxb. (क्रोटन् ऑब्लॉगिफोलिअस्, राक्स.) । Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी) । यह प्रायः समस्त भारत में विशेषकर दक्षिण कोंकण, लंका, बंगाल, बिहार एवं वर्मा में होता है। इसका वृक्ष- छोटे आकार का तथा दूर से देखने पर आम की तरह दिखाई देता है। मूलस्तम्भ-सीधा एवं छाल चिकनी तथा राख के रंग की होती है। पत्ते-६-१२ इञ्च लम्बे, सवृन्त, चिमड़े, एकान्तर तथा शाखाओं पर समूहबद्ध, दन्तुर, आयताकार या अंडाकार तथा चिकने होते हैं। पुष्प-एकलिङ्ग, हलके हरे रंग के, ५-१२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल- गोल, मांसल, ४५ इञ्च बड़े एवं ६ धारियों से युक्त होते हैं। बीज-चिकने और भूरे रंग के होते हैं। मूल-ऐंठी हुई एवं कुछ चिपटी होती है। इसकी छाल मोटी, खुरदरी, भूरे रंग की एवं अन्दर से पीली एवं उस पर कुछ भूरे रंग के धब्बे होते हैं। मूलत्वक् का स्वाद कपूर की तरह तीता एवं सुगन्धयुक्त होता है। इसकी मूलत्वक् पत्र एवं बीजों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी मूलत्वक् शोथघ्न, ज्वरघ्न, रेचक, शिरोविरेचक एवं विषनाशक है। (१) तीव्र शोथयुक्त आभ्यन्तर विकार (Acute inflammatory conditions) जैसे-न्युमोनिया, फुफ्फुसावरण शोथ, अंडशोथ, यकृत् शोथ, फोड़ा तथा गलका आदि अवस्थाओं में इनको निर्गुण्डी तथा करञ्ज के साथ देने से लाभ होता है। इनमें इसका बाह्य लेप भी करते हैं। इसकी अधिक मात्रा से सिवाय विरेचन के कोई अन्य तीव्र परिणाम नहीं होता एवं विरेचन से लाभ ही रहता है। (२) ज्वर में नवसादर के साथ इसका उपयोग करते हैं। इससे यकृत् की क्रिया ठीक होकर पित्त की शुद्धि होती है एवं दूषित पित्त शौच द्वारा निकल जाता है तथा यकृतदाह कम होता है। यकृत के शोथ में यह बहुत ही उत्तम औषध है। (३) सर्पविष में इसको १ से २ तोला की मात्रा में हर दो घण्टे पर देते हैं। कोंकण में इसका बहुत प्रचार है। मात्रा-⅛-½ तोला सुगन्धि द्रव्यों के साथ। अथेन्द्रवारुणी महेन्द्रवारुणी च। (इन्द्रायण-बड़ी इन्द्रायण)। तयोर्नामगुणानाह ऐन्द्रीन्द्रवारुणी चित्रा गवाक्षी च गवादनी। वारुणी च पराऽप्युक्ता सा विशाला महाफला ।।२०३।। श्वेतपुष्पा मृगाक्षी च मृगैर्वारुर्मृगादनी। गवादनीद्वयं तिक्तं पाके कटु सरं लघु ।।२०४।। वीर्योष्णं कामलापित्तकफप्लीहोदरापहम् ।।२०५।। श्वासकासापहं कुष्ठगुल्मग्रन्थिव्रणप्रणुत् । प्रमेहमूढगर्भामगण्डामयविषापहम् ।।२०६।। 'इन्द्रायण' तथा 'बड़ी इन्द्रायण' के नाम और गुण-ऐन्द्री, इन्द्रवारुणी, चित्रा, गवाक्षी, गवादनी और वारुणी ये सब नाम 'इन्द्रायण' के हैं। दूसरी जो 'बड़ी इन्द्रायण' है, उसके नाम-विशाला, महाफला, श्वेतपुष्पा, मृगाक्षी, मृगैर्वारु और मृगादनी ये सब हैं। इन्द्रायण-बड़ी इन्द्रायण ये दोनों-स्वाद में तिक्त रस और विपाक में कटु रसयुक्त, सारक, लघु, उष्णवीर्य एवम् कामला, पित्त, कफ, प्लीहा, उदररोग, श्वास, कास, कुष्ठ, गुल्म, ग्रन्थि व्रण, प्रमेह, मूढगर्भ, आमदोष, गण्डरोग (गलगण्ड, गण्डमाला आदि) तथा विष को दूर करने वाली होती हैं। [२०३-२०६]

३. तृतीय खण्ड: वातरोग, आमवात, वातरक्त, उरुस्तम्भ, शूल एवं प्रमेह चिकित्सा

५७० भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-उपर्युक्त इन्द्रवारुणी एवं विशाला के अतिरिक्त इन्द्रवारुणी का एक अन्य भी भेद पाया जाता है। ध० नि० ने भी ३ भेद लिखे हैं। १०३. इन्द्रायण हिं०-इनारुन, इन्द्रायण, इन्दायण, इन्द्रारुन। बं०-राखालशा। म०-इन्द्रावण, कडुजुंदावन, कडु इन्द्रायण। मा०-तूसणबेल, तूसतूंबा, तूस। गु०-इन्दरबरणा, इन्द्रावणा। क०-हामेक्के, हाबुमेक्के कायि। ते०-एतिपुच्छा, एटिपुच्छा, पुस्तकाय, पापर, एटि पुच्चकायि। ता०-पेयक्कूमुट्टी, पेदिकारि। कौड, तुम्बी, घोरूम्बा, तुम्बा। फा०- खुरबुज एतल्व, हिन्दबानहे तल्ख। अ०-इज्झल, अलकम। अं०-Colocynth (कोलोसिथ)। ले०-Citrullus colocynthis Schrad (सिट्रयुल्स् कोलोसिन्थ्िस् श्रँड)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। यह बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश, मध्य और दक्षिण भारत तथा राजपुताना आदि अनेक प्रान्तों में पाई जाती है। रेतीली भूमि में अधिक उत्पन्न होती है तथा गंगा, यमुना सोन, सरयू आदि नदियों के दियारे में बाहुल्य से देखने में आती है। जहाँ यह अधिक रहती है वहाँ दूसरे अन्न की उत्पत्ति अधिक परिमाण में नहीं होती। इस कारण किसान लोग इसको समूल नष्ट करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। यह एशिया एवं अफ्रिका के उष्ण प्रदेशों में भी पाई जाती है। यह लता जाति की वनस्पति वर्षजीवी या बहुवर्षजीवी भी होती है। वर्षा ऋतु के सिवा सब ऋतुओं में मिलती है। वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ के कारण रेतीली भूमि के पानी में डूबने से इसकी लता नष्ट हो जाती है, किन्तु जड़ सजीव रहती है और वही वर्षान्त के बाद अंकुरित होकर लता रूप में बढ़ करके वसन्त ऋतु तथा गरमी के दिनों में फूल, फल देती है। जिस भूमि में वर्षा का पानी इकट्ठा नहीं होता अथवा जहाँ नदियों की बाढ़ नहीं आती, वहाँ ऊँची भूमि वाली लता नष्ट नहीं होती, बल्कि वर्षा ऋतु में भी फूल-फल देती रहती है। फलों का संग्रह करना गरमी में ही अच्छा होता है, क्योंकि इसके फल कड़ी धूप के कारण खूब सूख जाते हैं और बिगड़ने नहीं पाते तथा बरसात में संग्रह किये हुए फल प्रायः सड़-गल कर खराब हो जाते हैं। इसकी लता बहुधा भूमि पर फैली एवं स्पर्श में अत्यन्त कर्कश होती है। इसके सूत्र (Tendrills) निःशाख या द्विशाख होते हैं। पत्ते-विषमवर्त्ती, २-२॥ इञ्च के घेरे में लम्बे-चौड़े, ऊपर से हलके हरे एवं नीचे से धूसर रंग के, स्पर्श में कर्कश, अनियमित कटे किनारे वाले तथा तरबूज के पत्तों के आकार वाले त्रिकोणाकार होते हैं। खेतों में रोपण की हुई इन्द्रायण के पत्ते बड़े एवं तरबूज के पत्तों के बराबर दिखलाई पड़ते हैं। फूल-पाँच पंखड़ी वाले, हलके पीले रंग के तथा व्यास में .५-.७ इञ्च होते हैं। फल-२-२॥ इञ्च के घेरे में गोलाकार, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर सन्तरे के समान पीले रंग के सफेद छींटेदार एवं चिकने होते हैं। फलों के भीतर किंचित् पीलापनयुक्त सफेद रंग की, सूखी हुई सुषिर एवं अत्यन्त कड़वी गूदी होती है और गूदी के बीच छोटे-छोटे १/४-१/६ इञ्च बड़े, चिपटे, तरबूज के बीज के आकार वाले, हलके भूरे रंग के बीज होते हैं। फल का छिलका-कोमल होता है। मूल एवं बीज विरहित फल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा में केवल अपक्व फल की सुखाई हुई मज्जा का व्यवहार करते हैं। इसके सभी अंग कड़वे होते हैं तथा इसकी सूखी गर्द नाक एवं आँखों में जाने से अत्यन्त प्रक्षोभ करती है। रासायनिक संगठन-इसकी फलमज्जा में एक कडुवा विरेचक क्षाराभ, विरेचक रालें एवं अल्प मात्रा में ग्लाइकोसाइड् पाया जाता है। ये सभी अनियत रूप (Amorphous) होते हैं इनके अतिरिक्त ऑल्फा एलंटेरिन् (aelaterin) आदि अन्य द्रव्य जो होते हैं उनको कोई विशिष्ट प्रभाव नहीं होता। छिलका निकाले फल में बीजों की मात्रा ७५% होती हैं। बीजों में १५% तैल, अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ, एक किण्व (Enzyme) एवं फाइटोस्टैरॉल (Phytosterol) द्रव्य होते हैं।

गुडूच्यादिवर्गः ५७१ इसके मूल में ऑल्फा एलटेरिन् (aelaterin), सॅपोनिन् (Saponin) तथा कुछ राल पाई जाती है । गुण और प्रयोग—इसकी फलमज्जा अत्यन्त कड़वी एवं तीव्र विरेचक है। इसकी १-२ रत्ती की मात्रा से २, ३ घंटे में पानी जैसे पतले दस्त होते हैं। इससे यद्यपि मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है तथापि इस कार्य के लिये इसका प्रयोग नहीं करते क्योकि इससे बहुत मरोड़ होती है। इसका अल्पमात्रा में शोषण होकर मूत्र एवं दुग्ध द्वारा उत्सर्ग होता है। इसकी अधिक मात्रा से विषैला परिणाम होकर मृत्यु होती है। इसकी विषैली मात्रा ०.६-१ ग्राम (४-८ रत्ती) एवं घातक मात्रा ४ ग्राम (३० रत्ती) है। एक स्त्री ने गर्भपात के लिए ६० रत्ती की मात्रा खाई किन्तु ५० घंटे में उसकी मृत्यु हुई । इसकी जड़ विरेचक एवं शोथहर है। बीजों में विरेचक गुण नहीं है। (१) कफप्रधान रोगों से इसका प्रयोग करते हैं। इससे स्रोतोवरोध दूर होता है। आमवात, संधिशोथ, जलोदर, कामला, यकृद्दाल्युदर, प्लीहोदर, तथा तीव्र विबन्ध में इसकी जड़ का चूर्ण सोंठ एवं गुड़ के साथ देते हैं। पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयुक्त एक्स्ट्रॅक्टम कोलोसिन्थिडिस् कम्पोजिटम् (Extractum Colocynthidis Compositum) का भी व्यवहार किया जा सकता है। अनार्तव में मूल का उपयोग करते हैं। (२) इसकी जड़ को नूतन शोथ पर लेप करते हैं। स्तनशोथ तथा बच्चों के उदर आदि पर इसको जल में घिस कर लगाते हैं। (३) इसके बीजों के तैल का उपयोग बाल काले रहने के लिये करते है। विष चिकित्सा—कषाय द्रव्य (Dil. Tannic acid solution) से आमाशय प्रक्षालन के पश्चात् दुग्ध पिलाना चाहिये । मात्रा—फलचूर्ण १-२ १/२ रत्ती; मूलचूर्ण १-३ माशा । १०४. इन्द्रायण भेद हिं०—भाकुरा । म०—विसलंबी । बं०—गोमुक्त । गु०—कोठिबन । पं०—कचरी । ले०—Cucumis trigonus, Roxb. (कुकुमिस्र ट्राइगोनस्, रॉक्स.) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) । यह भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में खुली हुई शुष्क जगहों में कहीं-न-कहीं पायी जाती है। यह लता—लता जाति की वनौषधि प्रसरणशील एवं स्पर्श में कर्कश होती है। इसमें तंतु (Tendrils) निःशाख होते हैं। यद्यपि इसके लता पत्र नष्ट हो जाते हैं परन्तु इसकी जड़ भूमि के भीतर जीवित रहती है। समय आने पर उसी जड़ में से अंकुर निकल कर लता रूप में परिणत होता है। पत्ते—स्पर्श में कर्कश, १-२ इञ्च लम्बे तथा चौड़े (कभी- कभी और बड़े), गोलाकार किन्तु पाँच से सात भागों में विभक्त रहते हैं और प्रत्येक भाग किंचित् लम्बाई युक्त गोलाकार, अग्र पर गोल और कुछ दंतुर सा होता है। पुष्प—पीले रंग के और व्यास में १/२ इञ्च बड़े होते हैं। पुरुष जाति के फूल गुच्छों में और स्त्री जाति के फूल एक-एक करके आते हैं। फल—चिकने तरबूज के आकारवाले गोलाकार, किंचित् त्रिकोणाकार, १।। इञ्च लम्बे और १। इञ्च मोटे तथा १० हरी रेखाओं से युक्त होते हैं। पकने पर ये रेखाएँ हलके पीले रंग की हो जाती हैं। इसकी मज्जा कडुवी होती है। बीज—खेत एवं दीर्घ वृत्ताभ होते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में कोलोसिन्थिन (Colocynthin) या तत्सम पदार्थ पाया जाता है। बीजों से निकाला तेल जलाने के काम आता है। गुण और प्रयोग—इन्द्रायण के स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। इसके मूल का क्वाथ सौम्य विरेचक होता है। इसके बीज शीतल, ग्राही तथा पित्त विकार में उपयोगी होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA