भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ श्वेतदूर्वा । तस्या नामानि गुणाँश्चाह दूर्वा शुक्ला तु गोलोमी शतवीर्या च कथ्यते । श्वेता दूर्वा कषाया स्यात्स्वाद्वी व्रण्या च जीवनी । तिक्ता हिमा विसर्पास्रतृट्पित्तकफदाहहृत् ।।१७४।। ८७. श्वेत दूर्बा हिं०-सफेद दूर्बा । यह भी दूब के समान ही घास है जिसके पत्ते सफेदीपन लिये होते हैं । यह कोई भिन्न जाति है या केवल स्थान- भेद से इसमें सफेद पत्ते होते हैं यह कहना कठिन है । अभी इसमें अनुसंधान की आवश्यकता हैं । यह अधिक पित्तशामक मानी जाती है । अथ गण्डदूर्वा (गांडरदूब) तस्या नामानि गुणाँश्चाह गण्डदूर्वा तु गण्डाली मत्स्याक्षी शकुलादनी । गण्डदूर्वा हिमा लोहद्राविणी ग्राहिणी लघुः ।।१७५।। तिक्ता कषाया मधुरा वातकृत्कटुपाकिनी । दाहतृष्णाबलासास्रकुष्ठपित्तज्वरापहा ।।१७६।। गांडर दूब के नाम तथा गुण-गण्डदूर्वा, गण्डाली, मत्स्याक्षी और शकुलादनी, ये सब नाम गांडर दूब के हैं । गांडर दूब-शीतवीर्य, लोहे को पिघलाने वाली, मलसंग्राहक (मल को रोकने वाली), लघु, तिक्त, कषाय एवं मधुर रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, वातकारक एवं दाह, तृषा कफ, रक्तविकार, कुष्ठ तथा पित्तज्वर को दूर करने वाली होती है । [१७५-१७६] ८८. गण्डदूर्वा हिं०-गांडरदूब, गठीलादूब, गण्डदूर्वा । गांडरदूब-दूब की जाति की एक वनस्पति है, जो दूब से बड़ी होती है और यह प्रायः जलाशयों के किनारे अधिक उत्पन्न होती है । उसकी डंठी मोटी और बड़ी होती है । पत्ते-दूब के समान परन्तु दूब से बहुत बड़े होते हैं । गाँठे मोटी होती हैं । वाराहीकन्दः (गेठी इति लोके) । तस्य लक्षणनामगुणानाह वाराहीकन्दसंज्ञस्तु पश्चिमे गृष्टिसंज्ञकः । वाराहीकन्द एवान्यैश्चर्मकारालुको मतः ।।१७७।। अनूपसम्भवे देशे वराह इव लोमवान् । वाराहवदना गृष्टिर्वरदेत्यपि कथ्यते ।।१७८।। वाराही तु रसे स्वाद्धी तिक्ता पाके पुनः कटुः । शुक्रायुःस्वरवर्णाग्निबलपित्तविवर्द्धिनी । कफकुष्ठमरुन्मेहकृमिहृच्च रसायनी ।।१७९।। वाराहीकन्द के लक्षण नाम और गुण-जिसका 'वाराहीकन्द' नाम है, उसी को पश्चिम देश में 'गृष्टि' कहते हैं और 'वाराहीकन्द' को ही कुछ लोग 'चर्मकारालुक' कहते हैं । अनूप (जलप्राय) देश में यह सूअर के बालों की तरह कठिन रोम से युक्त कन्द वाला होता है । इसके वाराहवदना, गृष्टि, वरदा ये सब नाम हैं । वाराहीकन्द-यह मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, पाक में कटु और रसायन एवं शुक्र, आयु, स्वर, वर्ण, जठराग्नि, बल और पित्त को बढ़ाने वाला एवं कफ, कुष्ठ, वात, प्रमेह तथा कृमि को दूर करने वाला होता है । [१७७-१७९] नोट-वाराही कंद के स्थान पर डायोस्कोरिआ बल्बिफेरा (Dioscoea bulbifera) एवं टेक्का एस्पेरा (Tecca aspera) इन दो द्रव्यो का उपयोग किया जाता है । अधिकांश विद्वान् प्रथम के कंद को वाराही कन्द मानते हैं । उसकी अनेक उपजातियाँ भी पाई जाती हैं । यहाँ दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA