भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५५५ ८९ वाराही कन्द (१) हिं०-वाराही कन्द, नेंठी । म०-डुक्कर कन्द, कडूकरंदा । गु०-डुक्करकंद, बणा बेल । बं०-रतालु । ले०-Dioscorea bulbifera Linn. (डायोस्कोरिआ बल्विफेरा लिन.) । Fam. Doscoreaceae (डायोस्कोरिएसी) । यह दून और सहारनपुर के वनों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक तथा सभी स्थानों में पाया जाता है । इसकी लता-आरोही तथा वामावर्त होती है । कांड-चिकने तथा पत्रकोणों में लगभग १ इञ्च व्यास की कन्द सदृश रचनाएँ होती हैं । पत्ते-साधारण एकान्तर, २।।-६ इञ्च लम्बे, १।।।-४ इञ्च चौड़े, पतले, पुच्छाकार लम्बे नोकवाले तथा आधार पर तांबूलाकार होते हैं । इनके आधारीय खण्ड गोल और पत्राधार पर ९ शिराएँ होती हैं । पुष्प-नरपुष्पों की मंजरियाँ नीचे की ओर लटकी हुई, २-४ इञ्च लम्बी और प्रायः पत्रकोणों में समूहबद्ध होकर निकली हुई रहती हैं । नारीपुष्पों की मञ्जरियाँ ४-१० इञ्च लम्बी होती हैं । फल-३ पंख वाले और बीज भी आधार पर सपंख होते हैं । कन्द- छोटे आकार का भूरे रंग का होता है जिस पर सूअर की तरह रोम होते हैं । यह भीतर से पीताभ श्वेत होता है । इसकी अन्य जातियों का भी प्रयोग किया जाता है । कुछ में कन्द बहुत गहरे बैठते हैं तथा वे अधिक मुलायम होते हैं । रासायनिक संगठन-इसकी लता में एक विषैला ग्लूकोसाइड पाया जाता है । इसके कंद में स्टार्च होता है । गुण और प्रयोग-यह कुछ रक्तसंग्राहक तथा ग्राही है । रक्तातिसार, प्रवाहिका, उदरशूल, अर्श आदि रोगों में इसके फलों को जीरा तथा शर्करा के साथ देते हैं । त्वचा के रोगों में भी इसका व्यवहार किया जाता है । मात्रा-३-६ माशा । ९०. वाराहीकंद (२) हिं०-वाराहीकंद, भेवर के कंद, भेवर की बेल । ले०-Tacca aspera Roxb. (टॅक्का एस्पेरा राक्स.) । Fam. Taccaceae (टॅक्केसी) । यह वर्मा, बहुवर्षायु, तेनासरिम तथा मलय प्रायद्वीप में होता है । इसका क्षुप-बहुवर्षायु एवं मूलस्तंभ कंदवत्, आयताकार एवं मुड़ा हुआ रहता है । पत्ते-दीर्घवृत्ताकार, अंडाकार, ८-१६ × ४-८ इञ्च; लम्बाग्र, शिराएँ स्पष्ट एवं उनके बीच का भाग उभरा हुआ होता है । पुष्प-हरिताभ बैंगनी कुछ पीत होते हैं । फल-करीब १।। इञ्च लम्बा, आयताकार तथा मांसल होता है । गुण और प्रयोग-इसके कंद बल्य होते हैं तथा इनका उपयोग रक्तपित्त एवं चर्मरोगों में किया जाता है । मात्रा-३-६ माशा । अथ विदारीकन्दः । तस्य नामगुणानाह विदारी स्वादुकन्दा च सा तु क्रोष्ट्री सिता स्मृता । इक्षुगन्धा क्षीरवल्ली क्षीरशुक्ला पयस्विनी ।।१८० ।। विदारी मधुरा स्निग्धा बृंहणी स्तन्यशुक्रदा ।।१८१।। शीता स्वर्या मूत्रला च जीवनी बलवर्णदा । गुरुः पित्तास्रपवनदाहान् हन्ति रसायनी ।।१८२।। विदारी कन्द के नाम तथा गुण-विदारी, स्वादुकन्दा, क्रोष्ट्री, सिता, इक्षुगन्धा, क्षीरवल्ली, क्षीरशुक्ला तथा पयस्विनी के सब नाम विदारीकन्द के हैं । विदारीकन्द-मधुर रसयुक्त, स्निग्ध, बृंहण, दुग्धवर्धक और शुक्र को बढ़ाने वाला, शीतवीर्य, स्तर को उत्तम बनाने वाला, मूत्रकारक, जीवनी शक्ति बढ़ाने वाला, बल तथा वर्ण को देनेवाला, गुरु, रसायन एवं पित्त, रक्त, वायु और दाह को नष्ट करने वाला होता है । [१८१-१८२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA