भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ५५३ है जिसे आयोनॉन् (Ionone) नामक एक अन्य पदार्थ में रासायनिक विधि से परिवर्तित किया जा सकता है। आयोनॉन् का सुगन्धि द्रव्यों एवं विटामिन् ए (Vitamin A) के बनाने में उपयोग होता हैं। आयोनॉन् में ह्वायोलेट जैसी तीव्र सुगन्ध होती है। गुण और प्रयोग-हरी चाय उष्ण, स्वेदजनन, मूत्रजनन, ज्वरघ्न, वातानुलोमन, उत्तेजक, चेतनाकारक, उद्वेष्टननिरोधि, मुखशुद्धिकर, कफवातहर, दीपन, पाचन एवं रुचिकर है। इसका तैल बाह्य प्रयोग में त्वग्रागकारक एवं वातहर है। प्रतिश्याय, ज्वर, वमन, अतिसार, आध्मान, शूल, आक्षेप एवं विसूचिका में इसके फाण्ट से बहुत लाभ होता है। विसूचिका में इससे वमन रुकता है एवं उत्तेजना आती है। इसका तैल आध्मान, शूल तथा विसूचिका में १/२-३ बूँद की मात्रा में देते हैं। मलेरिया ज्वर में हरी चाय का उपयोग किया जाता है। कटिशूल, आमवात तथा पीड़ा आदि में इसके तैल की मालिश की जाती है। मात्रा-तैल १/२-३ बूँद, तृण ३-६ माशा। अथ नीलदूर्बा (हरीदूब) तस्या नामानि गुणाँश्चाह नीलदूर्वा रुहाऽनन्ता भार्गवी शतपर्विका। शष्पं सहस्रवीर्या च शतवल्ली च कीर्तिता ।।१७२।। नीलदूर्वा हिमा तिक्ता मधुरा तुवरा हरेत्। कफपित्तास्रवीसर्पतृष्णादाहत्वगामयान् ।।१७३।। 'हरी दूब' के नाम तथा गुण-नीलदूर्वा, रुहा, अनन्ता, भार्गवी, शतपर्विका, शष्य, सहस्रवीर्या और शतवल्ली ये सब 'हरी दूब' के नाम हैं। हरी दूब-शीतवीर्य, तिक्त, मधुर तथा कषायरसयुक्त एवं कफ, पित्तरक्त, विसर्प, तृषा, दाह और चर्मरोग को दूर करने वाली होती है। [१७२-१७३] हिं०-हरी दूब, नीली दूब, रामघास। बं०-नीलदुर्बा, दूर्वा। म०-नीलदूर्वा, हरली, नीलीहारेयाली। संथाल०- धोबीघास। गु०-खडध्रो, लीलीध्रो, धरो। क०-गरिके। पं०-दूबड़ा। ते०-दूलु, गरिकेग। ता०-अरुवमपिल्लू। अ०-उश्व। फा०-मर्ग। अं०-Creeping Cynodon (क्रीपिंग साइनोडोन्)। ले०-Cynodon dactylon (Linn.) Pers. (साइनोडॉन् डॅकटीलोन पर्स.)। Fam. Gramineae (ग्रॅमिनी)। दूब-तृणजाति की वनस्पति सब प्रान्तों के वन, उपवन, खेत सब जगह उत्पन्न होती है। गर्मी के दिनों में प्रायः सूख सी जाती है, परन्तु बरसात का पानी पड़ने से फिर हरी-भरी हो जाती है। जलाशय और कुएँ के पास बारहौं मास हरी-भरी देखने में आती है। इसकी डंडियाँ पतली-पतली होती हैं, और भूमि पर फैली हुई रहती हैं। अन्तवाली शाखायें जिन पर कोमल बारीक फूल आते हैं, वे जमीन से उठी रहती हैं। पत्ते-पतले, ४-६ लम्बे, रेखाकार होते हैं। बीज- बहुत छोटे होते हैं। गुण और प्रयोग-दूर्वा शीतल, वर्ण्य, प्रजास्थापन, रक्तस्कंदन, व्रणरोपण, मूत्रजनन तथा कफपित्तहर है। (१) बस्तिशोथ, सोजाक तथा मूत्रमार्ग के दाह में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। (२) त्वचा के रोगों में इसकी जड़ का क्वाथ पिलाते हैं। सद्योव्रण तथा त्वचा के रोगों में इसकी पतियों का लेप उपयोगी है। इससे रक्तस्राव रुकता है। (३) अतिसार, पैत्तिक, वमन, उदर, जलोदर, अत्यार्तव, गर्भपात, उन्माद, अपस्मार तथा रक्तमेह आदि में इसका स्वरस पिलाया जाता है। (४) नेत्राभिष्यंद में पत्र-कल्क का लेप करते हैं। (५) अर्श में जलन कम करने के लिये पत्तों का लेप किया जाता है। मात्रा-स्वरस ६ माशा-१ तोला; मूल ३-६ माशा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA