भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५६० भावप्रकाशनिघण्टुः पित्तरक्त तथा शोथ को दूर करने वाली होती है। बड़ी शतावर-मेधा तथा हृदय के लिये, हितकर, वृष्य, रसायन, शीतवीर्य, एवम् अर्श, ग्रहणी तथा नेत्ररोग को दूर करने वाली होती है। इन दोनों के अङ्कूर-लघु एवम् त्रिदोष, अर्श तथा क्षय के नाशक होते हैं। [१८४-१८८] ९६. शतावर हिं०-सतावर, सतावरि, सतमूली, शतावर, सरनोई। बं०-शतमूली। म०-शतावरी। गु०-शतावरी। ता०-पाणियनाकु। ले०-Asparagus racemosus Willd. (एस्पेरैगस् रेसिमोसस् विल्ड.)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। शतावर-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होती है। उत्तरी भारत में यह अधिक होती है। इसका क्षुप- काँटेदार, बहुवर्षायु, आरोहणशील तथा लता की तरह अनेक शाखाओं से युक्त फैला हुआ रहता है। शाखायें-त्रिकोण युक्त, चिकनी किन्तु रेखान्वित होती हैं। इसमें वास्तविक पत्र के स्थान पर काँटे होते हैं। काँटे-कुछ-कुछ टेढ़े तथा १/४-१/२ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्राभासकाण्ड-पत्र की तरह दिखलाई देने वाले, काँटों के कोणों में सूत्राकार पतले १/२-१ इञ्च लम्बे तथा दृढ़ पत्राभास काण्ड के गुच्छे होते हैं। फूल-छोटे, सफेद रंग के तथा सुगन्धित गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे-छोटे, गोल तथा पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं, जिनमें १-२ बीज रहते हैं। मूलस्तम्भ से कन्दसदृश श्वेत लम्बगोल परन्तु दोनों सिरों पर पतले मूलों के गुच्छे निकले रहते हैं जिनका चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। जाति-इसकी एक बड़ी जाति होती है जिसे सं०-महाशतावरी एवं ले०-A. sarmentosus Linn. (ए. सार्मेण्टोसस् लिन.) कहते हैं। यह दक्षिण में होती है। इसकी लता बड़ी होती है तथा इसके मूलस्तम्भ से बहुत से कन्द निकले रहते हैं जो स्वादहीन होते हैं। इसकी एक कण्टकहीन जाति 'शरजोई', कौण्टा, ले०-A. filicinus Buch. & Ham. (ए. फिलिसिनस् बु. हैम.) जौनसार में ९ हजार फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह स्वावलम्बी होती है। इसमें काँटे नहीं होते एवं पत्राभासकाण्ड चिपटे होते हैं। सफेद मुसली (१), शतावरी जाति की है। रासायनिक संगठन-दोनों शतावरी के ताजे कन्दों में जल में घुलने वाला पदार्थ ५२ १/२%, सीठी ३३ १/२% तथा जल ९% रहता है। जल में घुलनशील भाग में ७% शर्करा होती है। शुष्ककन्द की राख ४% निकलती है। गुण और प्रयोग-शतावरी मधुर, शीत, गुरु, स्नेहन, स्तन्यजनन, मूत्रजनन, शुक्रजनन, बल्य, वृष्य, वयःस्थापन, चक्षुष्य, अग्निवर्धक, अल्पसग्राहक एवं त्रिदोषघ्न है। इसका उपयोग अन्य औषधों के साथ नपुंसकता, शुक्रमेह, शुक्रतारल्य, नेत्ररोग, अतिसार, ग्रहणी, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त तथा अपस्मार में किया जाता है। बलवृद्धि के लिये दुग्ध एवं शर्करा के साथ इसकी पेया बनाकर देते हैं। इसके अङ्कूरों की तरकारी कुपचन में देते हैं। इससे सिद्ध तैलों का बाह्य प्रयोग शिरोरोग, चर्मरोग, वातव्याधि तथा दौर्बल्य में करते हैं। मात्रा-२ तोला दुग्ध के साथ। अथाश्वगन्धा । तस्या नामगुणानाह गन्धान्ता वाजिनामादिरश्वगन्धा हयाह्वया । वराहकर्णी वरदा बलदा कुष्ठगन्धिनी ॥ १८९ ॥ अश्वगन्धाऽनिलश्लेष्मश्वित्रशोथक्षयापहा । बल्या रसायनी तिक्ता कषायोष्णाऽतिशुक्रला ॥ १९० ॥ 'असगन्ध' के नाम और गुण-अश्वगन्धा, हयाह्वया (हय के पर्यायवाची समस्त शब्द इसके द्योतक हैं), वराहकर्णी, वरदा, बलदा, कुष्ठगन्धिनी और वाजी (घोड़ा) के जितने पर्यायवाची शब्द है वे आदि में बनाकर अन्त में 'गन्ध' शब्द लगाने से जितने शब्द हों, उन सबों को इसका पर्यायवाची शब्द समझना चाहिये, जैसे-वाजिगन्धा, हयगन्धा इत्यादि।