भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 610, कुल 1167 में से

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गुडूच्यादिवर्गः ५५९ मूलस्तम्भ से श्वेत, कन्दसदृश तथा लम्बगोल मूलों का गुच्छा निकला रहता है । छाल निकालकर सुखाई हुई सफेद, झुर्रीदार, २-२ १/२ इञ्च लम्बी, सूजा के इतनी मोटी, कुछ ऐंठी हुई, कड़ी तथा आसानी से टूटने वाली, जड़ें बाजार में मिलती हैं । अधिक-से-अधिक यह १/४ इञ्च मोटी रहती हैं। इसका स्वाद लबाबदार किन्तु अच्छा रहता है । इसे पानी में डालने से यह फूलकर शतावरी जैसी दिखलाई देती है । रासायनिक संगठन-इसके जल में घुलनशील भाग ७७ १/२%, जल ६% तथा सीठी १२ १/२% रहती है । जलविलेय भाग में मांसल पदार्थ रहता है । इसमें पिष्ट बिल्कुल नहीं रहता । सूखी हुई जड़ में ३ १/२% राख रहती है । गुण और प्रयोग-यह शीत, लघु, स्नेहन एवं उत्तम बल्य है । इसमें स्टार्च न होने के कारण इसको मधुमेह में दिया जा सकता है । सभी प्रकार के दौर्बल्य में १ तोला चूर्ण १ तोला चीनी मिलाकर दूध के साथ देते हैं। नपुंसकता, शुक्रमेह, प्रदर, अतिसार तथा प्रवाहिका में इसे देते हैं । मात्रा-चूर्ण १/२ से १ तोला । ९५. सफेद मूसली (२) हिं०-सफेद मूसली, गेरेंग अडा । ले०-Chlorophytum arundinaceum Baker (क्लोरोफाइटम् एरुण्डिनेसिअम् बेकर) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह इस देश के कई प्रान्तों में प्रायः बरसात के दिनों में देखने में आती है, इसका क्षुप होता है । पत्ते- १५" × २.५" बड़े तथा प्रासवत् होते हैं। पुष्पध्वज पहले, ५-१५" इञ्च लम्बा और पुष्प श्वेत होते हैं। पुष्पों की भाजी बनाकर खाई जाती है। इसकी जड़ के पास लम्बे सूत्राकार जड़ों के गुच्छे निकलते हैं। जिनके अग्र पर मोटे, बेलनाकार, १-१.५" × .५-.६ इञ्च बड़े कन्द होते हैं जो भीतर से भूरे सफेद रंग के होते हैं। इसकी अन्य दो जातियाँ C. laxum Br. (क्लो. लॅक्सम्) एवं C. tuberosum Baker (क्लो. ट्युबरोजम्) भी पाई जाती है । इन कन्दों को कुछ लोग सफेद मुसली मानते हैं तथा पहले जिस सफेद मुसली का वर्णन किया जा चुका है उसे शतावरी भेद मानते हैं । इसका भी उपयोग सफेद मूसली के समान किया जाता है । अथ शतावरी महाशतावरी च । तयोर्नामानि तयोस्तदङ्कुरस्य च गुणाँश्चाह शतावरी बहुसुता भीरूरिन्दीवरी वरी । नारायणी शतपदी शतवीर्या च पीवरी ॥१८४॥ महाशतावरी चान्या शतमूल्यूर्ध्वकण्टिका । सहस्रवीर्या हेतुश्च ऋष्यप्रोक्ता महोदरी ॥१८५॥ शतावरी गुरुः शीता तिक्ता स्वाद्वी रसायनी । मेधाऽग्निपुष्टिदा स्निग्धा नेत्र्या गुल्मातिसारजित् ॥१८६॥ शुक्रस्तन्यकरी वल्या वातपित्तास्रशोथजित् । महाशतावरी मेध्या हृद्या वृष्या रसायनी ॥१८७॥ शीतवीर्या निहन्त्यर्शोग्रहणीनयनामयान् । तदङ्कुरस्त्रिदोषघ्नो लघुरर्शःक्षयापहा ॥१८८॥ 'छोटी शतावर' तथा 'बड़ी शतावर' के नाम और गुण तथा उन दोनों के अङ्कुर के क्रम से गुण- शतावरी, बहुसुता, भीरुः, इन्दीवरी, वरी, नारायणी, शतपदी, शतवीर्या और पीवरी ये सब नाम 'छोटी शतावर' के हैं । 'बड़ी शतावर' के नाम-महाशतावरी, शतमूली, ऊर्ध्वकण्टिका, सहस्रवीर्या, हेतुः, ऋष्यप्रोक्ता और महोदरी ये सब हैं । छोटी शतावर-मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, गुरु, शीतवीर्य, रसायन, मेधा (धारणा शक्ति) कारक, जठराग्निवर्धक, पुष्टिदायक, स्निग्ध, नेत्रों के लिये हितकर, शुक्रवर्धक, स्तनों में दूध बढ़ाने वाली, बलकारक एवम् गुल्म, अतिसार, वात,

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