भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५८ भावप्रकाशनिघण्टुः मुसली अबियज। ले०-Curculigo orchioides Gaertn. (कर्क्युलिगो ऑर्किओइडिस् गार्टे)। Fam. Amaryllidaceae (अॅमेरिलिडेसी)। यह बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, दक्षिण देश के बाँस के वनों में तथा हिमालय में यमुना से खासिया पहाड़ तक प्रायः सर्वत्र उत्पन्न होती है। काली मूसली-तृणजातीय वनौषधि, वर्षा ऋतु में घास अथवा दूसरे वृक्षों की छाया में देखने में आती है। ४- ५ पत्ते वाले खजूर के वृक्ष की तरह इसका नवीन क्षुप होता है। मूलस्तम्भ सीधा और मोटा होता है। पुरानी चक्राकार पत्र सन्धियों के कारण यह ताल वृक्ष के स्कन्ध जैसा दिखलाई देता है। इसकी ग्रन्थियों से सूत्राकार परन्तु मांसल उपमूल निकलते रहते हैं और शीर्ष से लगभग ३ या ४ पत्ते भूमि के ऊपर निकलते रहते हैं। इसके पत्ते-बिना डंठल के खजूर के पत्तों से कुछ पतले, सकरे और प्रासवत् होते हैं। इसकी लम्बाई ६ से १८ इञ्च तक और चौड़ाई १-१।। इञ्च तक होती है। पुष्पदण्ड-छोटा, बीच से निकला हुआ, ऊपर की ओर क्रमशः मोटा (Clavate) और कुछ चिपटा होता है। इसके फूल-नलिकाकार पीले रंग के दो कतारों में होते हैं। फल-¹/२ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार होते हैं। बीज- काले और चमकीले होते हैं। इसके मूलस्तम्भ का चिकित्सा में व्यवहार होता है। यह बाहर से काले भूरे रंग का तथा अन्दर से श्वेत होता है। दो वर्ष पुराने क्षुप का कन्द प्रयोग में लाना चाहिये। इसका स्वाद कुछ कडुवा तथा लबाबदार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें तैलीय द्रव्य १ ¹/४%, राल तथा कषाय द्रव्य ४%, गोंद २०%, पिष्टमय पदार्थ ४३%, सीठी १४% एवं जल ४ ¹/४% रहता है। सूखे कन्द से ८ ¹/२% राख मिलती है जिसमें कॅल्शियम ऑक्सॅलेट (Calcium oxalate) रहता है। गुण और प्रयोग-काली मुसली स्नेहन, मूत्रजनन, बल्य तथा कुछ वृष्य है। मूत्रमार्ग पर इसकी विशेष क्रिया होती है। अर्श, कामला, श्वास, अतिसार तथा शूल में इसका उपयोग किया जाता है। त्रावणकोर की तरफ दूध के साथ इसकी पेया बनाकर सोजाक, मूत्रकृच्छ्र तथा अस्यार्तव में बहुत प्रयोग करते हैं। रोगयुक्तावस्था में इसका सेवन किया जाता है। अनेक वृष्य पाकों में इसका उपयोग किया गया है। जंगली लोग चोट तथा अस्थिभङ्ग पर इसका बाह्य प्रयोग करते हैं। मात्रा-कन्द ¹/४-¹/२ तो०। ९४. सफेद मूसली (१) सं०-श्वेत मुशली, मुसली। हिं०-सफेद मुशली, खैरूव। म०-सफेद मुसली, पाटली मुसली। गु०-धोली मुसली। ता०-तन्निराविट्टर्ग। ते०-सल्लोगड्डा। मल०-शेडिबेली। अ, फा०-शाकाकुले हिन्दी। ले०-Asparagus adscendens Roxb. (एस्पेरेगस् एड्स्केन्डेन्स् राक्स.)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। यह पश्चिम हिमालय, पञ्जाब, गुजरात, रतलाम, बम्बई, रुहेलखण्ड, अवध तथा मध्य भारत में पाया जाता है। उत्तम सफेद मुसली रतलाम से आती है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा काँटेदार होता है। शाखाएँ-झुकी हुई, आरोहणशील, धूसरवर्ण की नालीदार और कोणयुक्त होती हैं। प्रधान कांड-लम्बा, ऊँचा, मोटा, गोल और चिकना होता है। काँटे-आधे से पौन इञ्च लम्बे, सीधे और मोटे होते हैं। पत्राभास काण्ड-आधे से दो इञ्च लम्बे, केशाकार, गोल ६-२० की संख्या में एक साथ गुच्छबद्ध रहते हैं।