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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

५५८ भावप्रकाशनिघण्टुः मुसली अबियज। ले०-Curculigo orchioides Gaertn. (कर्क्युलिगो ऑर्किओइडिस् गार्टे)। Fam. Amaryllidaceae (अॅमेरिलिडेसी)। यह बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, दक्षिण देश के बाँस के वनों में तथा हिमालय में यमुना से खासिया पहाड़ तक प्रायः सर्वत्र उत्पन्न होती है। काली मूसली-तृणजातीय वनौषधि, वर्षा ऋतु में घास अथवा दूसरे वृक्षों की छाया में देखने में आती है। ४- ५ पत्ते वाले खजूर के वृक्ष की तरह इसका नवीन क्षुप होता है। मूलस्तम्भ सीधा और मोटा होता है। पुरानी चक्राकार पत्र सन्धियों के कारण यह ताल वृक्ष के स्कन्ध जैसा दिखलाई देता है। इसकी ग्रन्थियों से सूत्राकार परन्तु मांसल उपमूल निकलते रहते हैं और शीर्ष से लगभग ३ या ४ पत्ते भूमि के ऊपर निकलते रहते हैं। इसके पत्ते-बिना डंठल के खजूर के पत्तों से कुछ पतले, सकरे और प्रासवत् होते हैं। इसकी लम्बाई ६ से १८ इञ्च तक और चौड़ाई १-१।। इञ्च तक होती है। पुष्पदण्ड-छोटा, बीच से निकला हुआ, ऊपर की ओर क्रमशः मोटा (Clavate) और कुछ चिपटा होता है। इसके फूल-नलिकाकार पीले रंग के दो कतारों में होते हैं। फल-¹/२ इञ्च तक लम्बे, अंडाकार होते हैं। बीज- काले और चमकीले होते हैं। इसके मूलस्तम्भ का चिकित्सा में व्यवहार होता है। यह बाहर से काले भूरे रंग का तथा अन्दर से श्वेत होता है। दो वर्ष पुराने क्षुप का कन्द प्रयोग में लाना चाहिये। इसका स्वाद कुछ कडुवा तथा लबाबदार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें तैलीय द्रव्य १ ¹/४%, राल तथा कषाय द्रव्य ४%, गोंद २०%, पिष्टमय पदार्थ ४३%, सीठी १४% एवं जल ४ ¹/४% रहता है। सूखे कन्द से ८ ¹/२% राख मिलती है जिसमें कॅल्शियम ऑक्सॅलेट (Calcium oxalate) रहता है। गुण और प्रयोग-काली मुसली स्नेहन, मूत्रजनन, बल्य तथा कुछ वृष्य है। मूत्रमार्ग पर इसकी विशेष क्रिया होती है। अर्श, कामला, श्वास, अतिसार तथा शूल में इसका उपयोग किया जाता है। त्रावणकोर की तरफ दूध के साथ इसकी पेया बनाकर सोजाक, मूत्रकृच्छ्र तथा अस्यार्तव में बहुत प्रयोग करते हैं। रोगयुक्तावस्था में इसका सेवन किया जाता है। अनेक वृष्य पाकों में इसका उपयोग किया गया है। जंगली लोग चोट तथा अस्थिभङ्ग पर इसका बाह्य प्रयोग करते हैं। मात्रा-कन्द ¹/४-¹/२ तो०। ९४. सफेद मूसली (१) सं०-श्वेत मुशली, मुसली। हिं०-सफेद मुशली, खैरूव। म०-सफेद मुसली, पाटली मुसली। गु०-धोली मुसली। ता०-तन्निराविट्टर्ग। ते०-सल्लोगड्डा। मल०-शेडिबेली। अ, फा०-शाकाकुले हिन्दी। ले०-Asparagus adscendens Roxb. (एस्पेरेगस् एड्स्केन्डेन्स् राक्स.)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। यह पश्चिम हिमालय, पञ्जाब, गुजरात, रतलाम, बम्बई, रुहेलखण्ड, अवध तथा मध्य भारत में पाया जाता है। उत्तम सफेद मुसली रतलाम से आती है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा काँटेदार होता है। शाखाएँ-झुकी हुई, आरोहणशील, धूसरवर्ण की नालीदार और कोणयुक्त होती हैं। प्रधान कांड-लम्बा, ऊँचा, मोटा, गोल और चिकना होता है। काँटे-आधे से पौन इञ्च लम्बे, सीधे और मोटे होते हैं। पत्राभास काण्ड-आधे से दो इञ्च लम्बे, केशाकार, गोल ६-२० की संख्या में एक साथ गुच्छबद्ध रहते हैं।

गुडूच्यादिवर्गः ५५९ मूलस्तम्भ से श्वेत, कन्दसदृश तथा लम्बगोल मूलों का गुच्छा निकला रहता है । छाल निकालकर सुखाई हुई सफेद, झुर्रीदार, २-२ १/२ इञ्च लम्बी, सूजा के इतनी मोटी, कुछ ऐंठी हुई, कड़ी तथा आसानी से टूटने वाली, जड़ें बाजार में मिलती हैं । अधिक-से-अधिक यह १/४ इञ्च मोटी रहती हैं। इसका स्वाद लबाबदार किन्तु अच्छा रहता है । इसे पानी में डालने से यह फूलकर शतावरी जैसी दिखलाई देती है । रासायनिक संगठन-इसके जल में घुलनशील भाग ७७ १/२%, जल ६% तथा सीठी १२ १/२% रहती है । जलविलेय भाग में मांसल पदार्थ रहता है । इसमें पिष्ट बिल्कुल नहीं रहता । सूखी हुई जड़ में ३ १/२% राख रहती है । गुण और प्रयोग-यह शीत, लघु, स्नेहन एवं उत्तम बल्य है । इसमें स्टार्च न होने के कारण इसको मधुमेह में दिया जा सकता है । सभी प्रकार के दौर्बल्य में १ तोला चूर्ण १ तोला चीनी मिलाकर दूध के साथ देते हैं। नपुंसकता, शुक्रमेह, प्रदर, अतिसार तथा प्रवाहिका में इसे देते हैं । मात्रा-चूर्ण १/२ से १ तोला । ९५. सफेद मूसली (२) हिं०-सफेद मूसली, गेरेंग अडा । ले०-Chlorophytum arundinaceum Baker (क्लोरोफाइटम् एरुण्डिनेसिअम् बेकर) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह इस देश के कई प्रान्तों में प्रायः बरसात के दिनों में देखने में आती है, इसका क्षुप होता है । पत्ते- १५" × २.५" बड़े तथा प्रासवत् होते हैं। पुष्पध्वज पहले, ५-१५" इञ्च लम्बा और पुष्प श्वेत होते हैं। पुष्पों की भाजी बनाकर खाई जाती है। इसकी जड़ के पास लम्बे सूत्राकार जड़ों के गुच्छे निकलते हैं। जिनके अग्र पर मोटे, बेलनाकार, १-१.५" × .५-.६ इञ्च बड़े कन्द होते हैं जो भीतर से भूरे सफेद रंग के होते हैं। इसकी अन्य दो जातियाँ C. laxum Br. (क्लो. लॅक्सम्) एवं C. tuberosum Baker (क्लो. ट्युबरोजम्) भी पाई जाती है । इन कन्दों को कुछ लोग सफेद मुसली मानते हैं तथा पहले जिस सफेद मुसली का वर्णन किया जा चुका है उसे शतावरी भेद मानते हैं । इसका भी उपयोग सफेद मूसली के समान किया जाता है । अथ शतावरी महाशतावरी च । तयोर्नामानि तयोस्तदङ्कुरस्य च गुणाँश्चाह शतावरी बहुसुता भीरूरिन्दीवरी वरी । नारायणी शतपदी शतवीर्या च पीवरी ॥१८४॥ महाशतावरी चान्या शतमूल्यूर्ध्वकण्टिका । सहस्रवीर्या हेतुश्च ऋष्यप्रोक्ता महोदरी ॥१८५॥ शतावरी गुरुः शीता तिक्ता स्वाद्वी रसायनी । मेधाऽग्निपुष्टिदा स्निग्धा नेत्र्या गुल्मातिसारजित् ॥१८६॥ शुक्रस्तन्यकरी वल्या वातपित्तास्रशोथजित् । महाशतावरी मेध्या हृद्या वृष्या रसायनी ॥१८७॥ शीतवीर्या निहन्त्यर्शोग्रहणीनयनामयान् । तदङ्कुरस्त्रिदोषघ्नो लघुरर्शःक्षयापहा ॥१८८॥ 'छोटी शतावर' तथा 'बड़ी शतावर' के नाम और गुण तथा उन दोनों के अङ्कुर के क्रम से गुण- शतावरी, बहुसुता, भीरुः, इन्दीवरी, वरी, नारायणी, शतपदी, शतवीर्या और पीवरी ये सब नाम 'छोटी शतावर' के हैं । 'बड़ी शतावर' के नाम-महाशतावरी, शतमूली, ऊर्ध्वकण्टिका, सहस्रवीर्या, हेतुः, ऋष्यप्रोक्ता और महोदरी ये सब हैं । छोटी शतावर-मधुर तथा तिक्त रसयुक्त, गुरु, शीतवीर्य, रसायन, मेधा (धारणा शक्ति) कारक, जठराग्निवर्धक, पुष्टिदायक, स्निग्ध, नेत्रों के लिये हितकर, शुक्रवर्धक, स्तनों में दूध बढ़ाने वाली, बलकारक एवम् गुल्म, अतिसार, वात,

५६० भावप्रकाशनिघण्टुः पित्तरक्त तथा शोथ को दूर करने वाली होती है। बड़ी शतावर-मेधा तथा हृदय के लिये, हितकर, वृष्य, रसायन, शीतवीर्य, एवम् अर्श, ग्रहणी तथा नेत्ररोग को दूर करने वाली होती है। इन दोनों के अङ्कूर-लघु एवम् त्रिदोष, अर्श तथा क्षय के नाशक होते हैं। [१८४-१८८] ९६. शतावर हिं०-सतावर, सतावरि, सतमूली, शतावर, सरनोई। बं०-शतमूली। म०-शतावरी। गु०-शतावरी। ता०-पाणियनाकु। ले०-Asparagus racemosus Willd. (एस्पेरैगस् रेसिमोसस् विल्ड.)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। शतावर-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होती है। उत्तरी भारत में यह अधिक होती है। इसका क्षुप- काँटेदार, बहुवर्षायु, आरोहणशील तथा लता की तरह अनेक शाखाओं से युक्त फैला हुआ रहता है। शाखायें-त्रिकोण युक्त, चिकनी किन्तु रेखान्वित होती हैं। इसमें वास्तविक पत्र के स्थान पर काँटे होते हैं। काँटे-कुछ-कुछ टेढ़े तथा १/४-१/२ इञ्च लम्बे होते हैं। पत्राभासकाण्ड-पत्र की तरह दिखलाई देने वाले, काँटों के कोणों में सूत्राकार पतले १/२-१ इञ्च लम्बे तथा दृढ़ पत्राभास काण्ड के गुच्छे होते हैं। फूल-छोटे, सफेद रंग के तथा सुगन्धित गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे-छोटे, गोल तथा पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं, जिनमें १-२ बीज रहते हैं। मूलस्तम्भ से कन्दसदृश श्वेत लम्बगोल परन्तु दोनों सिरों पर पतले मूलों के गुच्छे निकले रहते हैं जिनका चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। जाति-इसकी एक बड़ी जाति होती है जिसे सं०-महाशतावरी एवं ले०-A. sarmentosus Linn. (ए. सार्मेण्टोसस् लिन.) कहते हैं। यह दक्षिण में होती है। इसकी लता बड़ी होती है तथा इसके मूलस्तम्भ से बहुत से कन्द निकले रहते हैं जो स्वादहीन होते हैं। इसकी एक कण्टकहीन जाति 'शरजोई', कौण्टा, ले०-A. filicinus Buch. & Ham. (ए. फिलिसिनस् बु. हैम.) जौनसार में ९ हजार फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह स्वावलम्बी होती है। इसमें काँटे नहीं होते एवं पत्राभासकाण्ड चिपटे होते हैं। सफेद मुसली (१), शतावरी जाति की है। रासायनिक संगठन-दोनों शतावरी के ताजे कन्दों में जल में घुलने वाला पदार्थ ५२ १/२%, सीठी ३३ १/२% तथा जल ९% रहता है। जल में घुलनशील भाग में ७% शर्करा होती है। शुष्ककन्द की राख ४% निकलती है। गुण और प्रयोग-शतावरी मधुर, शीत, गुरु, स्नेहन, स्तन्यजनन, मूत्रजनन, शुक्रजनन, बल्य, वृष्य, वयःस्थापन, चक्षुष्य, अग्निवर्धक, अल्पसग्राहक एवं त्रिदोषघ्न है। इसका उपयोग अन्य औषधों के साथ नपुंसकता, शुक्रमेह, शुक्रतारल्य, नेत्ररोग, अतिसार, ग्रहणी, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त तथा अपस्मार में किया जाता है। बलवृद्धि के लिये दुग्ध एवं शर्करा के साथ इसकी पेया बनाकर देते हैं। इसके अङ्कूरों की तरकारी कुपचन में देते हैं। इससे सिद्ध तैलों का बाह्य प्रयोग शिरोरोग, चर्मरोग, वातव्याधि तथा दौर्बल्य में करते हैं। मात्रा-२ तोला दुग्ध के साथ। अथाश्वगन्धा । तस्या नामगुणानाह गन्धान्ता वाजिनामादिरश्वगन्धा हयाह्वया । वराहकर्णी वरदा बलदा कुष्ठगन्धिनी ॥ १८९ ॥ अश्वगन्धाऽनिलश्लेष्मश्वित्रशोथक्षयापहा । बल्या रसायनी तिक्ता कषायोष्णाऽतिशुक्रला ॥ १९० ॥ 'असगन्ध' के नाम और गुण-अश्वगन्धा, हयाह्वया (हय के पर्यायवाची समस्त शब्द इसके द्योतक हैं), वराहकर्णी, वरदा, बलदा, कुष्ठगन्धिनी और वाजी (घोड़ा) के जितने पर्यायवाची शब्द है वे आदि में बनाकर अन्त में 'गन्ध' शब्द लगाने से जितने शब्द हों, उन सबों को इसका पर्यायवाची शब्द समझना चाहिये, जैसे-वाजिगन्धा, हयगन्धा इत्यादि।

गुडूच्यादिवर्गः ५६१ असगन्ध-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य, बलकारक अत्यन्त शुक्रवर्धक, रसायन एवं वात, कफ, श्वित्र (श्वेत कुष्ठ), शोथ और क्षय को दूर करने वाला होता है। [१८९-१९०] ९७. असगन्ध हिं०-असगन्ध, अश्वगन्धा, नागोरी असगन्ध। बं०-अश्वगन्धा, आसकन्द, ढोरगुंज। गु०-आसन्य। संथा०- घोड़ाइन, घोड़ाआकुन। क०-अंगरबेरु। ते०-पैन्नेरुगड्डु, पिल्ली आंड्रा, अश्वगन्धी। ता०-चुवदिगं। फा०- बहमनबरीं। अं०-Winter cherry (विंटरचेरी)। ले०-Withania somnifera Dunal (विथेनिआ सॉम्नीफेरा)। Fam. Solanaceae (सोलेनेसी)। असगन्ध इस देश के अनेक भागों के कुछ गरम और साधारण प्रान्तों में विशेषकर पश्चिम के शुष्क प्रदेशों में अधिक होती है। भारत के अतिरिक्त यह लङ्का, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, सिंध, भूमध्यसागरीय प्रदेश, उत्तमाशाअन्तरीप आदि देशों में पाई जाती है। मालवा में इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप-भंटा के क्षुप के समान सघन होता है। इसकी ऊँचाई-३-४ फीट की होती है। शाखायें-टेढ़ी-मेढ़ी तारकाकार रोमों से युक्त होती हैं। पत्ते-अखंड, लटवाकार, लगभग कुंठिताग्र, सरलधार से युक्त, २-४ इञ्च लम्बे १-२ इञ्च चौड़े, सूक्ष्म तारकाकार रोमों से युक्त, फलकमूल क्रमशः संकुचित एवं १/४-१/२ इञ्च तक लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-प्रायः ५ एक साथ सचूड़ाकार गुच्छों में, छोटे, हरिताभ या पीताभ पत्रकोणों में निकलते हैं। फल-पत्रदण्ड के पास १/४ इञ्च बड़े फल लगते हैं और वे प्रवृद्ध बाह्य कोश के पतले छिलके के परदे में रहते हैं। उनका आकार मटर के समान होता है और पकने पर वे लाल हो जाते हैं। फलों से दूध जम जाता है। बीज-वनभण्टा के बीज के समान छोटे-छोटे चिपटे बीज होते हैं। इसका क्षुप ३- ४ वर्ष के बाद नष्ट हो जाता है। इसकी जड़ १-१ १/२ फीट लम्बी, १-१ १/२ इञ्च मोटी, मूली की तरह शंक्वाकार, मजबूत, चिकनी, बाहर से हलके भूरे रंग की तथा अन्दर से श्वेत होती है। मूल का भन छोटा तथा स्टार्च युक्त होता है। ताजी जड़ में अश्व के मूत्र सदृश गन्ध आती है जिससे इसे अश्वगन्धा कहा जाता है। इसका स्वाद कड़वा तथा तीक्ष्ण होता है। नोट-असगन्ध दो प्रकार की होती है। एक जिसका ऊपर वर्णन किया गया है तथा दूसरी नागौरी असगन्ध के नाम से बाजार में बिकने वाली। इन दोनों की जड़ें भिन्न दिखलाई देने के कारण ऐसा अनुमान था कि नागौरी असगन्ध यह उपर्युक्त असगंध का कोई कृषिजन्य परिवर्तित रूप हो। किन्तु नई खोज से यह सिद्ध किया गया है कि नागौरी असगंध की स्वतन्त्र जाति (Species) ही होती है जिसका नया नामकरण विथेनिया अश्वगंधा (Withania ashwagandha) किया गया है। बाजीकर, बल्य तथा बृंहण गुण के लिये खाने के काम में बाजारी असगन्ध (नागौरी) लेना चाहिये तथा वातघ्न गुण के लिये अपस्मारादि व्याधियों में, लेपादि बाह्य प्रयोगों में तथा तैलादि में उपर्युक्त असगन्ध के मूल लेने चाहिये। इसका दुग्ध में स्वेदन करके शोधन कर लेना चाहिये। असगन्ध के पञ्चांग तथा विशेषकर जड़ का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में उड़नशील तैल, रवेदार विथेनियॉल (Withaniol C₂₅ H₃₅ O₅) नामक पदार्थ, हेण्ट्रियाकॉण्टेन् (Hentriacontane), फाइटोस्टेरॉल तथा तैल ये पदार्थ होते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें ३ विभिन्न क्षाराभ (Alkaloid) होते हैं जिनमें से सॉम्निफेरिन् (Somniferin C₁₂ H₁₆ N₂) रवेदार होता है। गुण और प्रयोग-नागौरी (बाजारी) असगन्ध उष्ण, मधुर, बृंहणीय, बल्य, रसायन, वृष्य, एवं शोथहर है। क्षय, बालशोष, सुखण्डी, वार्धक्य आदि में इसके १/२-१ तो० चूर्ण को थोड़े घृत में गरम कर दूध एवं शर्करा मिलाकर देते हैं। यह उत्तम पौष्टिक है। बच्चों के लिये यह बहुत ही अच्छा है। इससे बच्चों का सूखना बन्द हो जाता है। स्त्रियों के कटिशूल एवं श्वेत प्रदर में इससे लाभ होता है। ३९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५६२ भावप्रकाशनिघण्टुः जंगली असगन्ध-अवसादक, स्वापजनक एवं मूत्रजनक है । इसका अवसादक प्रभाव वातनाड़ियों पर होता है न कि हृदय पर । अल्प मात्रा में धतूरे जैसा मद इससे उत्पन्न होता है तथा कामोत्तेजना होती है । वद, ग्रन्थि, शोथ तथा फोड़े आदि पर इसके लेप से लाभ होता है । तिलाओं में इसका उपयोग किया जाता है । इससे सिद्ध तैल दौर्बल्य तथा वातव्याधि में मालिश के उपयोग में आता है । इसके बीज स्वापजनन एवं मूत्रजनन हैं । अधिक मात्रा में विषैले होते हैं । आमवात में इसके ताजे पत्ते बाँधते हैं । मात्रा-नागौरी असगन्ध चूर्ण ३-६ माशा । अथ पाठा (पाठी) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पाठाऽम्बष्ठाऽम्बष्ठकी च प्राचीना पापचेलिका। एकाष्ठीला रसा प्रोक्ता पाठिका वरतिक्तिका ।। १९९१।। पाठोष्णा कटुका तीक्ष्णा वातश्लेष्महरी लघुः । हन्ति शूलज्वरच्छर्दिकुष्ठातीसारहृद्रुजः । दाहकण्डूविषश्वासकृमिगुल्मगरव्रणान् ।।१९९२।। 'पाठ' के नाम तथा गुण-पाठा, अम्बष्ठा, अम्बष्ठकी, प्राचीना, पापचेलिका, एकाष्ठीला, रसा, पाठिका और वरतिक्तिका ये सब नाम 'पाठ' के हैं । पाठ-उष्णवीर्य, कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, लघु, वात-कफनाशक एवं शूल, ज्वर, वमन, कुष्ठ, अतीसार, हृद्रोग, दाह, कण्डू (खुजली), विष, श्वास, क्रिमि, गुल्म, उदररोग और व्रण को दूर करने वाली होती है । [१९९१-१९९२] प्राचीनों ने पाठा के दो भेद माने हैं। एक लघु पाठा तथा दूसरी राजपठा (बड़ी पाठा) इनमें से लघु पाठा यह सिसँम्पेलोस् पेरैरा (Cissampelos pareira) है । राजपठा या पाठा ही के स्थान पर इसी वर्ग की अन्य वनस्पतियों का भी उपयोग विभिन्न स्थानों में किया जाता है। साइक्लिआ पेल्टेटा (Cyclea peltata) एवं साइक्लिआ वर्मेनी (Cyclea burmanni)-यह केवल आसाम एवं खासिया पर्वत से पूर्व की तरफ तथा दक्षिण में पश्चिमी, पूर्वी घाट एवं कोंकण में पाई जाती है तथा दक्षिण में इन्हीं का अधिक प्रयोग छोटी एवं बड़ी पाठा के नाम से किया जाता है यद्यपि सि. पेरैरा भी वहाँ पाई जाती है । उत्तरी भारत में यह (साइक्लिआ) नहीं पाई जाती, किन्तु स्टिफेनिआ हर्नैण्डिफोलिआ (Stephania hernandifolia) नामक बड़ी जाति पाई जाती है, जिसे राजपठा कह सकते हैं । बंगाल की तरफ आकनादि नाम से इसका अधिक उपयोग किया जाता है । गुजरात तथा काठियावाड़ में इसी वर्ग की पातालगरुडी का उपयोग पाठा के स्थान पर करते हैं जो उचित नहीं है । एक ही वर्ग तथा स्वरूप-गुणादि में साम्य होने के कारण पाठा नाम से इनका उपयोग भिन्न-भिन्न स्थानों में किया जाता है । ९८. पाठा सं०-लघुपाठा, पीलुफला, अविद्धकर्णी । हिं०-पाठा, पाठ, पाढ, पाठी, पाढी, पुरइन पाठी । बं०-आकनादि, निमुक, एकलेजा । म०-पहाड़ वेल । गु०-वेणीवेल, करेढियुं । क०-षडवलि । ता०-अप्पाट्टा, पोंमुतूत्तै । गोवा०- पारवेल । ते०-पाटा, विरुबोड्डि । ले०-Cissampelos paeira Linn. (सिसँम्पेलोस् पेरैरा लिन.) । अं०- Velvet leaf (वेल्वेट लीफ) । Fam. Menispermaceae (मेनिसपर्मेसी) । यह इस देश के सभी उष्ण एवं साधारण भागों में सिंध, पंजाब, शिमला, देहरादून तथा दक्षिण में कोंकण से लंका तक पाई जाती है । एशिया, पूर्व अफ्रिका तथा अमेरिका के उष्ण प्रदेशों में भी होती है । यह लता-खुली हुई पथरीली जगहों में प्रायः छोटे वृक्षों और झाड़ियों पर फैली हुई पाई जाती है । शाखाएँ- पतली, सीधी एवं क्वचित् लोमयुक्त होती हैं। पत्र-लटूवाकार या कभी-कभी वृत्ताकार-वृक्काकार हृदयाकृति, एकांतर, १-४ इञ्च बड़े, नोकरहित एवं क्वचित् नुकीले रहते हैं । पर्णनाल प्रायः पृष्ठ भाग से जुड़ा हुआ तथा पृष्ठ के बारबर या

गुडूच्यादिवर्गः ५६३ अधिक लम्बा होता है। पुष्प-एकलिंग, छोटे, श्वेताभ, किंचित् पीत वर्ण के वर्षा काल में आते हैं। नरमंजरी लम्बी, अनेक पुष्पों से युक्त, मृदुरोमश तथा पत्रकोणों से निकली रहती है। फल-रक्त या नारंग वर्ण के, कुछ गोलाकार, ४ मि० मि० बड़े एवं रोमावृत रहते हैं। बीज-मुड़े हुए होते हैं। इसके मूल का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। इसकी सूखी हुई जड़ के लम्बे गोल, अंडाकार या दबे हुये टुकड़े, कभी-कभी लम्बाई में टूटे हुये मिलते हैं। ये व्यास में १/२ से ४ इञ्च तक मोटे एवं ४ इञ्च से लेकर ४ फीट तक लम्बे होते हैं। बाहर से ये भूरे बादामी रंग के तथा लम्बाई में झुर्रीदार होते हैं। इन झुर्रियों पर अनुप्रस्थ चक्राकार कुछ उभार रहते हैं। अन्दर से ये काष्ठमय, पीताभ भूरे रंग के एवं सुषिर होते हैं तथा इनमें स्पष्ट किन्तु प्रायः अपूर्ण चक्राकार रेखाएँ तथा मज्जक किरणें (Medullary rays) दिखलाई देती हैं। इनका स्वाद प्रारम्भ में कुछ मधुर एवं सुगन्धित तथा बाद में अत्यन्त कडुवा होता है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में ०.७२% क्षाराभ पाये जाते हैं जिसमें बेबीराइन (Bebeerine) भी रहता है। अल्प मात्रा में एक रवेदार डेयामेट्रीन (Deyamettin) नामक पदार्थ एवं एक राल पाई जाती है। गुण एवं प्रयोग-पाठामूल, उष्ण, तिक्त, ग्राही, स्तन्यशोधक, ज्वरहर, बल्य, बस्तिशोधक एवं मूत्रजनक है। अल्प मात्रा में इससे भूख बढ़ती है, अन्न का पाचन होता है तथा आंत्र की श्लेष्मलकला को बल मिलता है। अधिक मात्रा से पाखाना साफ होता है। सम्पूर्ण क्षाराभ का अनैच्छिक मांसपेशी पर अवसादक प्रभाव पड़ता है। इसका उपयोग कुपचन, अतिसार, ज्वर, मूत्रविकार, शोफ, कास, आर्तव-विकार एवं अर्श में किया जाता है। पैरेरारूट (Pareira root) जो कि कोण्ड्रोडेण्ड्रोन टोमेण्टोजम् (Chondrodendron tomentosum Ruiz & Pav.) की जड़ है उसके स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। मूत्रमार्ग की श्लेष्मल त्वचा पर इसका शामक संग्राही एवं बलदायक प्रभाव पड़ता है। यह बस्ति के लिये उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। (१) मूत्रसंस्थान के विकारों में इसकी जड़ का फांट दिया जाता है। बस्तिशोथ, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, सान्द्रमेह, रक्तमूत्र तथा अन्य विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। इन विकारों में इसे अधिक मात्रा में देते हैं। इसके साथ मुलेठी तथा गुडूची का प्रयोग अधिक उपयोगी है। (२) कुपचन, उदरशूल, अतिसार, रक्तातिसार एवं ज्वरातिसार आदि विकारों में इसको अन्य सुगन्धि द्रव्यों के साथ देते हैं। मात्रा-चूर्ण १ से ३ माशा। प्रतिनिधि- (१) ले०-Stephania hernandifolia (Willd.) Walp. (स्टिर्फेनिआ हर्नैण्डिफोलिआ, वाल्प)। सं०- राजपाठा। बं०-आकनादि, नेमुक। यह भी देखने में पाठा के समान लता होती है किन्तु दोनों की पुष्पमंजरियों में अन्तर होता है। पाठा में बाह्यकोश के दल ४ (पुं.-पुष्प) और २ (स्त्री-पुष्प) एवं आभ्यंतर दल ४ संयुक्त (पुं.-पुष्प) और १ (स्त्री-पुष्प) होते हैं। इसमें बाह्य कोश के दल ६.१० एवं आभ्यंतर दल ३.५ होते हैं। इसमें पाठा की अपेक्षा पत्ते बड़े (३-५" x २ १/२-४") और शिराजाल कम सघन होता है। इसके फल बड़े एवं बीज मुड़कर करीब-करीब गोल हो जाते हैं। इसमें कुछ सॅपोनिन् (Saponin) होते हैं। इसकी जड़ का भी उपयोग पाठा की तरह अतिसार, कुपचन तथा मूत्रविकारों में किया जाता है। इसका सत्त्व मेढक के लिये अत्यन्त विषैला होता है। (२) ले०-Cyclea peltata H. f. & T. (साइक्लिआ पेल्टेटा)। सं०-राजपाठा भेद। म०-पाडल, पाडावल। गु०-कालीघाट। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५६४ भावप्रकाशनिघण्टुः यह लता आसाम तथा खासिया से पूर्व की तरफ एवं दक्षिण में कोंकण, माथेरान, महाबलेश्वर तथा सिलोन तक पाई जाती है। इसकी शाखाएँ—धारीदार एवं अल्प रोमश होती हैं। पत्ते—पतले, रोमश, ३-६" × २-४" बड़े एवं १-२ १/२" लम्बे पर्णवृन्त से युक्त रहते हैं। पर्णवृन्त पाठा की तरह ही फलक से पृष्ठ की ओर जुड़ा रहता है। पुष्प— बहुत छोटे, हरे रंग के एवं फल—वृक्काकार तथा रोमश रहते हैं। इसी का एक और भेद सा. वर्मेनी (C. burmanni Miers.) भी पाया जाता है। लघु पाठा (सि. परेरा) में बाह्य कोश के दल आपस में मिले नहीं रहते किन्तु इसमें ये मिले हुवे तथा संख्या में ४-८ होते हैं। दक्षिण में पाठा नाम से इसका बहुत उपयोग किया जाता है। इसके पंचांग का उपयोग होता है। गुण और प्रयोग—यह कड़वी, वातहर, स्वेदजनक एवं मूत्रजनक है। छोटे बच्चों के उदर शूल, आँव, अतिसार एवं अर्श में इसकी जड़ पीस कर देते हैं। इसके साथ अतीस एवं करंज देते हैं। पैत्ति कुपचन में इसका स्वरस सोंठ के साथ देते हैं। प्रमेह में मट्ठे के साथ जड़ देते हैं। मात्रा—मूल चूर्ण १/२ से १ माशा। अथ श्वेता त्रिवृत् (निसोत श्वेत)। तस्या नामगुणानाह श्वेता त्रिवृत् त्रिभण्डी स्यात् त्रिवृता त्रिपुटाऽपि च। सर्वानुभूतिः सरला निशोत्त्रा रेचनीति च ॥१९३॥ श्वेता त्रिवृद्रेचनी स्यात्स्वादुरुष्णा समीरहत्। रूक्षा पित्तज्वरश्लेष्मपित्तशोथोदरापहा ॥१९४॥ सफेद निसोत के नाम तथा गुण—श्वेता त्रिवृत्, त्रिभण्डी, त्रिवृता, त्रिपुटा, सर्वानुभूति, सरला, निशोत्रा और रेचनी ये सब नाम सफेद निसोत के हैं। सफेद निसोत—रेचक, स्वादु, उष्णवीर्य, रूक्ष, वातनाशक एवं पित्तज्वर, कफ, पित्त, शोथ और उदररोग को दूर करने वाली होती है। [१९३-१९४] ९९. निसोत हिं०—निसोत, निशोथ, पितोहरी। बं०—तेउड़ी, तिउरी, दूधकलमी। म०—निशोत्तर, तेंड, फुटकरी, शेतवड। क०—तिगडे। ते०—तेल्ल, तेगड़। ता०—शिवदै, चिवदै। गु०—नसोतर। अ०—तुर्बुद। अं०—Turpeth root (टरपेथ रूट); Indian Jalap (इंडियन जालप)। ले०—Operculina turpethum, Silva Manso (ऑपेक्युलिना टर्पेथम्, सिल्वा मॅन्सो); Syn. Ipomoea turpethum R. Br. (आइपोमिआ टरपेथम्)। Fam. Convolvulac (क्वॉन्वॉल्व्यूलेसी)। निशोत इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में ३००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। बगीचों में लगाई हुई भी मिलती है। लंका, मलाया द्वीप एवं ऑस्ट्रेलिया में भी यह अधिक होती है। यह लता जाति की वनौषधि बारहो मास पाई जाती है परन्तु वर्षा ऋतु में विस्तार से फैली अधिक देखने में आती है। इसका काण्ड—तीन धार वाला होता है इसलिये इसको त्रिवृता कहते हैं। यह बहुत लम्बा, आरोही तथा ऐंठा हुआ रहता है। पुराना होने पर यह कुछ कड़ा, भूरे रंग का तथा मृदु रोमश हो जाता है। स्राव कुछ-कुछ दुग्धसदृश होता है। पत्ते—नीचे के पत्ते चौड़ाई लिये हुए लट्वाकार, हृद्गत, प्रायः २-४ इञ्च लम्बे, १/२ से ३ इञ्च तक चौड़े, लम्बाग्र तथा तीक्ष्णाग्र होते हैं। ऊपर के पत्ते प्रायः आयताकार, कुण्ठित रोमश अग्रयुक्त एवं सवृन्त (वृन्त .७५-३ इञ्च लम्बे) होते

हैं। पुष्प-घण्टिकाकार सफेद तथा २-३ इञ्च लम्बे होते हैं। परागाशय (Anthers) जल्दी ही आपस में ऐंठ जाते हैं। फल- ½-⅔ इञ्च बड़े तथा गोल होते हैं। फलत्वक् का बाहरी भाग जब फट जाता है तो भीतरी पारदर्श परदा रह जाता है जिसके अन्दर दो गह्वर और ४-१ काले एवं चिकने बीज होते हैं। इसकी जड़ लम्बी, पतली, मांसल एवं बहुत शाखायुक्त होती है। बाहर से भूरे या अरुणाभ धूसर रंग के ½-२ इञ्च तक मोटे तथा एक तरफ फटे हुए टुकड़े मिलते हैं। इस पर बाहर से गहरी धारियां होती हैं जिससे यह देखने में रस्सी की तरह दिखलाई देती है। इसका भग्न छाल में छोटा एवं काष्ठ में रेशेदार होता है। इसमें साधारण गन्ध एवं स्वाद में यह अरुचिकर होती है। आयुर्वेद में दो प्रकार की त्रिवृत् का वर्णन किया गया है। एक अरुण (श्वेताभ) या दूसरी श्याम (काली) रंग की। काली निशोथ अधिक तीव्र होने के कारण मूर्च्छा, दाह, भ्रम आदि उपद्रव करती है। अधिक दोष होने पर तथा क्रूरकोष्ठवालों के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। अच्छी भूमि में उत्पन्न, गम्भीर, श्लक्ष्ण तथा सरल मूल को लेकर उसके भीतर का काष्ठ भाग निकाल दें और बाहरी त्वचा को सुखाकर रख लें (च० अ० अ० ७)। बाजार में इसमें काण्ड के टुकड़े भी मिले रहते हैं जिनमें विरेचक गुण कम रहता है। वास्तव में निसोत की एक ही लता पाई जाती है। बाजार में श्वेत और कृष्ण ये भेद बिकते हैं और यह चिन्नार नामक लता (जिसके मूर्वा होने की अधिक संभावना है) के काण्ड हैं। वास्तविक निसोत कहीं-कहीं विधारा नाम से भी बेची जाती है। रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में ५-१०% एक राल पाई जाती है जिसका कुछ भाग ईथर में घुलनशील रहता है जो ऑल्फा-टर्पेथिन् (A-turpethin) एवं बीटा-टर्पेथिन (B-turpethin) का मिश्रण होता है। ईथर में अविलेय राल को टर्पेथिन् (Turpethin) कहते हैं। राल के अतिरिक्त कुछ उड़नशील तैल, वसायुक्त द्रव्य, अल्ब्यूमिन, स्टार्च, पीत रञ्जक पदार्थ, लिगनिन् एवं लौहऑक्साइड पाया जाता है। गुण और प्रयोग-निशोथ विरेचक, भेदनीय एवं अधोभागहर है। यह सुखविरेचनों में श्रेष्ठ मानी गई है। पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयुक्त जालप (Jalap) की तरह ही इसके भी गुण हैं। इससे पतले एवं पीले रंग के दस्त होते हैं। पेट में मरोड़ न हो इसलिये इसके साथ सोंठ जैसे सुगन्धि पदार्थ तथा सैंधव का उपयोग किया जाता है। जालप की अपेक्षा यह अल्प एवं विलम्ब से कार्य करती है इसलिये इसकी अपेक्षा अधिक मात्रा में देना पड़ता है किन्तु इससे किसी प्रकार का दुष्परिणाम नहीं होता। इसका स्वाद एवं गन्ध भी हृल्लासकारक नहीं होती। ज्वर, रक्तपित्त, अर्श, विसर्प, वातशोफ, कामला एवं राजयक्ष्मा आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। वातरोग, विशेषतः आघातयुक्त या खिन्नवृत्ति रहने पर यह उपयोगी है। अर्श, उदर एवं गुल्म में इसकी शाक का उपयोग करते हैं। मात्रा-३-५ माशा। अथ श्यामा त्रिवृत् (काली निसोत)। तस्या नामानि गुणांश्चाह त्रिवृच्छ्यामाऽर्द्धचन्द्रा च पालिन्दी च सुषेणिका। मसूरविदला काली कैशिका कालमेशिका ॥१९५॥ श्यामा त्रिवृत्ततो हीनगुणा तीव्रविरेचिनी। मूर्च्छादाहमदभ्रान्तिकण्ठोत्कर्षणकारिणी ॥१९६॥ 'काली निसोत' के नाम तथा गुण-श्यामा, त्रिवृत्, अर्धचन्द्रा, पालिन्दी, सुषेणिका, मसूरविदला, काली, कैशिका और कालमेशिका ये सब 'काली निसोत' के नाम हैं। काली निसोत सफेद निसोत की अपेक्षा हीन गुणवाली तथा तीव्र रेचक होती है एवं मूर्च्छा, दाह, मद और भ्रान्ति को उत्पन्न करने वाली एवं कण्ठ का उत्कर्षण करने वाली होती है (पृष्ठ ३९८ भी देखें)। [१९५-१९६]

५६६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ लघुदन्ती बृहद्दन्ती च (एरण्डवत्पत्रविटपा) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह लघुदन्ती विशल्या च स्यादुदुम्बरपर्ण्यपि । तथैरण्डफला शीघ्रा श्येनघण्टा घुणप्रिया ॥१९७॥ वाराहाङ्गी च कथिता निकुम्भश्च मकूलकः । द्रवन्ती शम्बरी चित्रा प्रत्यक्पर्ण्यखुपर्ण्यपि ॥१९८॥ उपचित्रा श्रुतश्रोणी न्यग्रोधी च तथा वृषा । दन्तीद्वयं सरं पाकं रसे च कटु दीपनम् ॥१९९॥ गुदाङ्कुराश्मशूलास्रकण्डूकुष्ठविदाहनुत् । तीक्ष्णोष्णं हन्ति पित्तास्रकफशोथोदरकृमीन् ॥२००॥ छोटी दन्ती तथा बड़ी दन्ती के नाम और गुण—लघुदन्ती, विशल्या, उदुम्बरपर्णी, एरण्डफला, शीघ्रा, श्येनघण्टा, घुणप्रिया, वाराहाङ्गी, निकुम्भ और मकूलक ये सब नाम छोटी दन्ती के हैं। द्रवन्ती, शम्ब

गुडूच्यादिवर्गः ५६७ आकार भिन्न-भिन्न होता है। नीचे वाले पत्ते ६ से १२ इञ्च लम्बे, अञ्जीर के पत्तों के समान कटे किनारे वाले ३ से ५ भागों में विभक्त तथा किञ्चित् नुकीले होते हैं और ऊपर वाले पत्ते गूलर के पत्तों के आकार वाले २-३ इञ्च लम्बे और भालाकार होते हैं। फूल-एकलिंगी, गुच्छाकार हरिताभ रंग के होते हैं। फूल-किंचित् रोमश, ३ खण्ड का एवं करीब १/२ इञ्च लम्बा होता है। बीज-भूरे, बाह्यवृद्धि से युक्त तथा एरण्ड से छोटे होते हैं। इसकी जड़ एवं बीज औषधि के काम में आते हैं। जड़-अङ्गुली के बराबर मोटी, सीधी और कभी-कभी टूटी हुई होती है। जड़ की छाल भूरे रंग खुरदरी एवं काष्ठ भाग श्वेत, पीताभ, मुलायम किन्तु चीमड़ रहता है। यद्यपि जमालगोटे को दन्तीबीज कहते हैं तथापि जमालगोटा उक्त दन्ती का बीज नहीं है। संग्रहविधि-दन्ती तथा द्रवन्ती के हाथी दाँत के सदृश कठिन, स्थूल एवं श्याम ताम्र वर्ण के मूल को छोटी पीपल के चूर्ण एवं मधु का लेप करके कुशा के बीच में रख कर मिट्टी का लेप करके पुटपाक करे। फिर धूप में सुखा लें। इस प्रकार अग्नि एवं धूप से इसका विकाशी गुण नष्ट हो जाता है। (च. क. अ. १२) रासायनिक संगठन-इसकी जड़ में राल एवं स्टार्च पाया जाता है। गुण और प्रयोग-दन्ती की जड़, कटु, उष्ण, शोथघ्न, ज्वरघ्न, रेचन एवं कफपित्तनाशक है। इसका उपयोग, उदर, जलोदर, शोथ, कामला, यकृद्विकार, आध्मान, गुल्म, अर्श एवं ज्वर में किया जाता है। इसके बीज अत्यन्त तीव्र रेचन होते हैं। इसके बीजों का तैल तिक्त, कटु, कषाय एवं अधोभाग दोषहर है तथा कृमि, कुष्ठ, कफ, वात और दूष्योदर को दूर करने वाला एवं दुष्टव्रणशोधक है। (१) ज्वर में तक्र के साथ इसकी जड़ देने से यकृत् की क्रिया ठीक होकर शौच के द्वारा दूषित पित्त निकल जाता है। (२) जलोदर, हृदयोदर, यकृदुदर, वृक्कविकृतिजन्य उदर आदि में इसकी जड़ का विरेचनार्थ प्रयोग करते हैं। कामला में भी विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। (३) श्वास में इसके पत्तों का उपयोग किया जाता है। (४) त्वचा के विकारों में इसका उपयोग किया जाता है। (५) इसके बीज एवं तैल जमालगोटे की तरह तीव्र रेचक होते हैं। प्रयोगविधि-इसको सौफ आदि सुगन्धित पदार्थों के साथ क्वाथ के रूप में देना चाहिये। अधिक मात्रा में यह क्षोभक एवं मादक है जिसके निवारण के लिये मधुर-स्निग्ध पदार्थ, शर्बत तथा दूध आदि का उपयोग करना चाहिये। मात्रा-१-३ माशा; बीज १/२-१ र०। अथ लघुदन्तीफलम्। तस्य गुणानाह क्षुद्रदन्तीफलं तु स्यान्मधुरं रसपाकयोः। शीतलं सृष्टविण्मूत्रं गरशोथकफापहम्॥२०१॥ छोटी दन्ती के फल का गुण-छोटी दन्ती का फल-रस और पाक में मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, मल और मूत्र को निकालने वाला, विष, शोथ तथा कफ का नाशक होता है। [२०१] अथ जयपालः (जमालगोटा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह जयपालो दन्तिबीजं विख्यातं तिन्तिडीफलम्। जयपालो गुरुः स्निग्धो रेची पित्तकफापहः॥२०२॥ जमालगोटा के नाम तथा गुण-जयपाल, दन्तिबीज, तिन्तिडीफल ये सब जमालगोटा के विख्यात नाम हैं। जमालगोटा-गुरु, स्निग्ध, रेचक एवं पित्त-कफ का नाशक होता है। [२०२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

५६८ भावलोकननिघण्टुः नोट-यहाँ दन्तिबीज का अर्थ बड़ीदन्ती (द्रवन्ती) का बीज उचित मालूम पड़ता है क्योंकि क्षुद्रदन्ती का बीज जयपाल नहीं है । १०१. जमाल गोटा (द्रवन्तीबीज) हिं०-जमाल गोटा। बं०, म०-जयपाल । पं०-जपोलोटा । गु०-नेपालो । ता०-नेवलिम् । ते०-नेपालवेमु । क०-नेपाल, जापालबीज । तुम्बे बेदअञ्जीर, तुम्बे बेदंजीरखताई । अ०-हब्बुरस्सलातीन । फा०-तुख्मे बेदअञ्जीर खताई । अं०-Croton oil seed (क्रोटन! ऑयल सीड) । ले०-Croton tiglium Linn. (क्रोटन् टिग्लिअम् लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह आसाम, बंगाल, ब्रह्मा तथा समस्त भारत में पाया जाता है । इसका वृक्ष-छोटा होता है और वह बारहो मास हरा-भरा रहता है । इसकी शाखायें रोमयुक्त छोटी-छोटी होती हैं। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, चौड़े अंडाकार, चिकने, नोकीले, दन्तुर और ३-५ शिराओं से युक्त होते हैं। फूल-हरिताभ पीत रङ्ग के मंजरी के रूप में आते हैं । फल-प्रायः १ इञ्च लम्बे अंडाकार और त्रिकोणयुक्त होते हैं । बीज-बादामी रंग के होते हैं जिन्हें जयपाल (जमाल गोटा) कहा जाता है। इसके बीज एवं बीज तैल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। शोधन-आयुर्वेद में शोधन करके ही जमाल गोटे का व्यवहार किया जाता है । जमाल गोटे के छिलके एवं दो दलों के बीच के अंकुर (जीभ) को निकाल, गोदुग्ध में ३ घण्टे तक स्वेदन करे। फिर शीतल होने पर गरम जल से धो, नींबू के रस के साथ पीस, मिट्टी के कोरे तवे पर बिछा कर सुखा ले । इस प्रकार करने से यह शुद्ध हो जाता है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में एक स्थिर तैल. टिग्लिनिक् अम्ल (Tiglinic acid), क्रोटनिक् या क्वार्टेनिलिक अम्ल (Crotonic or quartenylic acid) एवं क्रोटन तैल (Croton oil) रहता है। क्रोटन तैल में मुख्य क्रियाशील तत्त्व क्रोटोनोलिक अम्ल (Crotonolic acid) होता है जिसके अतिरिक्त टिग्लिक् अम्ल या मैथिल् क्रोटनिक अम्ल (Tiglic acid or Methyl crotonic acid), क्रोटोनाल् (Crotonol) जिसमें रेचनगुण नहीं होता किन्तु जो त्वचा के लिये प्रक्षोभक होता है, कुछ उड़नशील तैल जिनके कारण इसमें गन्ध होती है एवे कुछ स्नेहाम्ल पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-यह कटु, उष्ण, विरेचन, दीपन, कफ वातहर, कृमि एवं जलोदर नाशक है। बाह्य प्रयोग में यह प्रक्षोभक एवं विस्फोटजनक है। यह अत्यन्त तीव्र रेचन है। अधिक मात्रा में यह विष है। इसके तैल के एक बूँद प्रयोग से पचीसो पतले दस्त होते हैं तथा पेट में बहुत मरोड़ होता है। इससे आन्त्र की श्लेष्मकला में कुछ शोथ भी हो जाता है। यद्यपि इससे कृमि भी गिरते हैं तथापि कृमि के लिये इसका प्रयोग नहीं करते, रक्तगत जलीय अंश को जब जल्दी कम करना रहता है तब इसका उपयोग करते हैं। (१) मस्तिष्कगत रक्तस्रावजन्य अर्धांग आदि में इसका प्रयोग करते हैं। इससे जलीय अंश कम होकर रक्तस्राव कम होता है तथा मस्तिष्कगत दबाव कम होता है । रोगी बेहोश हो तो तैल का एक बूँद मक्खन में मिलाकर जीभ पर लगा दें। (२) हृदयोदर में भी जलीय अंश को कम करने के लिये इसका प्रयोग करते हैं, किन्तु कभी-कभी इसके प्रयोग के बाद दस्त बन्द नहीं होते । (३) आमवात, सन्धिशोथ, वातविकार तथा तिलाओं के रूप में इसके तैल का बाह्य प्रयोग किया जाता है। विषप्रभाव-इसकी अधिक मात्रा से दाह, मरोड़, शूल, रक्तयुक्त दस्त एवं दौर्बल्य आदि लक्षण होते हैं। इसके निवारण के लिये जल में कत्था घिसकर या नींबू का रस पिलावे । मात्रा-बीज १/४-१/२ २०, तैल १/२-१ बूँद मक्खन के साथ ।

गुडूच्यादिवर्गः ५६९ १०२. नागदन्ती नागदन्ती कटुस्तिक्ता रूक्षा वातकफापहा। मेधाकृद्विषदोषघ्नी पाचनो शोथनाशिनी ।। गुल्मशूलोदरव्याधिकुष्ठदोषनिकृन्तनी । (रा० नि०) सं०-हस्तिदन्ती (च० सू० अ० १), नागदन्ती (च० वि० अ० ८) । हिं०-हकूम, पुतेर, पुथरी, चुक । म०- घणसर । बं०-बरागाच्छ । ने०-अच । ते०-भुतन् कुसुम । ले०-Croton oblongifolius, Roxb. (क्रोटन् ऑब्लॉगिफोलिअस्, राक्स.) । Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी) । यह प्रायः समस्त भारत में विशेषकर दक्षिण कोंकण, लंका, बंगाल, बिहार एवं वर्मा में होता है। इसका वृक्ष- छोटे आकार का तथा दूर से देखने पर आम की तरह दिखाई देता है। मूलस्तम्भ-सीधा एवं छाल चिकनी तथा राख के रंग की होती है। पत्ते-६-१२ इञ्च लम्बे, सवृन्त, चिमड़े, एकान्तर तथा शाखाओं पर समूहबद्ध, दन्तुर, आयताकार या अंडाकार तथा चिकने होते हैं। पुष्प-एकलिङ्ग, हलके हरे रंग के, ५-१२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल- गोल, मांसल, ४५ इञ्च बड़े एवं ६ धारियों से युक्त होते हैं। बीज-चिकने और भूरे रंग के होते हैं। मूल-ऐंठी हुई एवं कुछ चिपटी होती है। इसकी छाल मोटी, खुरदरी, भूरे रंग की एवं अन्दर से पीली एवं उस पर कुछ भूरे रंग के धब्बे होते हैं। मूलत्वक् का स्वाद कपूर की तरह तीता एवं सुगन्धयुक्त होता है। इसकी मूलत्वक् पत्र एवं बीजों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी मूलत्वक् शोथघ्न, ज्वरघ्न, रेचक, शिरोविरेचक एवं विषनाशक है। (१) तीव्र शोथयुक्त आभ्यन्तर विकार (Acute inflammatory conditions) जैसे-न्युमोनिया, फुफ्फुसावरण शोथ, अंडशोथ, यकृत् शोथ, फोड़ा तथा गलका आदि अवस्थाओं में इनको निर्गुण्डी तथा करञ्ज के साथ देने से लाभ होता है। इनमें इसका बाह्य लेप भी करते हैं। इसकी अधिक मात्रा से सिवाय विरेचन के कोई अन्य तीव्र परिणाम नहीं होता एवं विरेचन से लाभ ही रहता है। (२) ज्वर में नवसादर के साथ इसका उपयोग करते हैं। इससे यकृत् की क्रिया ठीक होकर पित्त की शुद्धि होती है एवं दूषित पित्त शौच द्वारा निकल जाता है तथा यकृतदाह कम होता है। यकृत के शोथ में यह बहुत ही उत्तम औषध है। (३) सर्पविष में इसको १ से २ तोला की मात्रा में हर दो घण्टे पर देते हैं। कोंकण में इसका बहुत प्रचार है। मात्रा-⅛-½ तोला सुगन्धि द्रव्यों के साथ। अथेन्द्रवारुणी महेन्द्रवारुणी च। (इन्द्रायण-बड़ी इन्द्रायण)। तयोर्नामगुणानाह ऐन्द्रीन्द्रवारुणी चित्रा गवाक्षी च गवादनी। वारुणी च पराऽप्युक्ता सा विशाला महाफला ।।२०३।। श्वेतपुष्पा मृगाक्षी च मृगैर्वारुर्मृगादनी। गवादनीद्वयं तिक्तं पाके कटु सरं लघु ।।२०४।। वीर्योष्णं कामलापित्तकफप्लीहोदरापहम् ।।२०५।। श्वासकासापहं कुष्ठगुल्मग्रन्थिव्रणप्रणुत् । प्रमेहमूढगर्भामगण्डामयविषापहम् ।।२०६।। 'इन्द्रायण' तथा 'बड़ी इन्द्रायण' के नाम और गुण-ऐन्द्री, इन्द्रवारुणी, चित्रा, गवाक्षी, गवादनी और वारुणी ये सब नाम 'इन्द्रायण' के हैं। दूसरी जो 'बड़ी इन्द्रायण' है, उसके नाम-विशाला, महाफला, श्वेतपुष्पा, मृगाक्षी, मृगैर्वारु और मृगादनी ये सब हैं। इन्द्रायण-बड़ी इन्द्रायण ये दोनों-स्वाद में तिक्त रस और विपाक में कटु रसयुक्त, सारक, लघु, उष्णवीर्य एवम् कामला, पित्त, कफ, प्लीहा, उदररोग, श्वास, कास, कुष्ठ, गुल्म, ग्रन्थि व्रण, प्रमेह, मूढगर्भ, आमदोष, गण्डरोग (गलगण्ड, गण्डमाला आदि) तथा विष को दूर करने वाली होती हैं। [२०३-२०६]

३. तृतीय खण्ड: वातरोग, आमवात, वातरक्त, उरुस्तम्भ, शूल एवं प्रमेह चिकित्सा

५७० भावप्रकाशनिघण्टुः नोट-उपर्युक्त इन्द्रवारुणी एवं विशाला के अतिरिक्त इन्द्रवारुणी का एक अन्य भी भेद पाया जाता है। ध० नि० ने भी ३ भेद लिखे हैं। १०३. इन्द्रायण हिं०-इनारुन, इन्द्रायण, इन्दायण, इन्द्रारुन। बं०-राखालशा। म०-इन्द्रावण, कडुजुंदावन, कडु इन्द्रायण। मा०-तूसणबेल, तूसतूंबा, तूस। गु०-इन्दरबरणा, इन्द्रावणा। क०-हामेक्के, हाबुमेक्के कायि। ते०-एतिपुच्छा, एटिपुच्छा, पुस्तकाय, पापर, एटि पुच्चकायि। ता०-पेयक्कूमुट्टी, पेदिकारि। कौड, तुम्बी, घोरूम्बा, तुम्बा। फा०- खुरबुज एतल्व, हिन्दबानहे तल्ख। अ०-इज्झल, अलकम। अं०-Colocynth (कोलोसिथ)। ले०-Citrullus colocynthis Schrad (सिट्रयुल्स् कोलोसिन्थ्िस् श्रँड)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। यह बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश, मध्य और दक्षिण भारत तथा राजपुताना आदि अनेक प्रान्तों में पाई जाती है। रेतीली भूमि में अधिक उत्पन्न होती है तथा गंगा, यमुना सोन, सरयू आदि नदियों के दियारे में बाहुल्य से देखने में आती है। जहाँ यह अधिक रहती है वहाँ दूसरे अन्न की उत्पत्ति अधिक परिमाण में नहीं होती। इस कारण किसान लोग इसको समूल नष्ट करने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। यह एशिया एवं अफ्रिका के उष्ण प्रदेशों में भी पाई जाती है। यह लता जाति की वनस्पति वर्षजीवी या बहुवर्षजीवी भी होती है। वर्षा ऋतु के सिवा सब ऋतुओं में मिलती है। वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ के कारण रेतीली भूमि के पानी में डूबने से इसकी लता नष्ट हो जाती है, किन्तु जड़ सजीव रहती है और वही वर्षान्त के बाद अंकुरित होकर लता रूप में बढ़ करके वसन्त ऋतु तथा गरमी के दिनों में फूल, फल देती है। जिस भूमि में वर्षा का पानी इकट्ठा नहीं होता अथवा जहाँ नदियों की बाढ़ नहीं आती, वहाँ ऊँची भूमि वाली लता नष्ट नहीं होती, बल्कि वर्षा ऋतु में भी फूल-फल देती रहती है। फलों का संग्रह करना गरमी में ही अच्छा होता है, क्योंकि इसके फल कड़ी धूप के कारण खूब सूख जाते हैं और बिगड़ने नहीं पाते तथा बरसात में संग्रह किये हुए फल प्रायः सड़-गल कर खराब हो जाते हैं। इसकी लता बहुधा भूमि पर फैली एवं स्पर्श में अत्यन्त कर्कश होती है। इसके सूत्र (Tendrills) निःशाख या द्विशाख होते हैं। पत्ते-विषमवर्त्ती, २-२॥ इञ्च के घेरे में लम्बे-चौड़े, ऊपर से हलके हरे एवं नीचे से धूसर रंग के, स्पर्श में कर्कश, अनियमित कटे किनारे वाले तथा तरबूज के पत्तों के आकार वाले त्रिकोणाकार होते हैं। खेतों में रोपण की हुई इन्द्रायण के पत्ते बड़े एवं तरबूज के पत्तों के बराबर दिखलाई पड़ते हैं। फूल-पाँच पंखड़ी वाले, हलके पीले रंग के तथा व्यास में .५-.७ इञ्च होते हैं। फल-२-२॥ इञ्च के घेरे में गोलाकार, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर सन्तरे के समान पीले रंग के सफेद छींटेदार एवं चिकने होते हैं। फलों के भीतर किंचित् पीलापनयुक्त सफेद रंग की, सूखी हुई सुषिर एवं अत्यन्त कड़वी गूदी होती है और गूदी के बीच छोटे-छोटे १/४-१/६ इञ्च बड़े, चिपटे, तरबूज के बीज के आकार वाले, हलके भूरे रंग के बीज होते हैं। फल का छिलका-कोमल होता है। मूल एवं बीज विरहित फल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा में केवल अपक्व फल की सुखाई हुई मज्जा का व्यवहार करते हैं। इसके सभी अंग कड़वे होते हैं तथा इसकी सूखी गर्द नाक एवं आँखों में जाने से अत्यन्त प्रक्षोभ करती है। रासायनिक संगठन-इसकी फलमज्जा में एक कडुवा विरेचक क्षाराभ, विरेचक रालें एवं अल्प मात्रा में ग्लाइकोसाइड् पाया जाता है। ये सभी अनियत रूप (Amorphous) होते हैं इनके अतिरिक्त ऑल्फा एलंटेरिन् (aelaterin) आदि अन्य द्रव्य जो होते हैं उनको कोई विशिष्ट प्रभाव नहीं होता। छिलका निकाले फल में बीजों की मात्रा ७५% होती हैं। बीजों में १५% तैल, अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ, एक किण्व (Enzyme) एवं फाइटोस्टैरॉल (Phytosterol) द्रव्य होते हैं।

गुडूच्यादिवर्गः ५७१ इसके मूल में ऑल्फा एलटेरिन् (aelaterin), सॅपोनिन् (Saponin) तथा कुछ राल पाई जाती है । गुण और प्रयोग—इसकी फलमज्जा अत्यन्त कड़वी एवं तीव्र विरेचक है। इसकी १-२ रत्ती की मात्रा से २, ३ घंटे में पानी जैसे पतले दस्त होते हैं। इससे यद्यपि मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है तथापि इस कार्य के लिये इसका प्रयोग नहीं करते क्योकि इससे बहुत मरोड़ होती है। इसका अल्पमात्रा में शोषण होकर मूत्र एवं दुग्ध द्वारा उत्सर्ग होता है। इसकी अधिक मात्रा से विषैला परिणाम होकर मृत्यु होती है। इसकी विषैली मात्रा ०.६-१ ग्राम (४-८ रत्ती) एवं घातक मात्रा ४ ग्राम (३० रत्ती) है। एक स्त्री ने गर्भपात के लिए ६० रत्ती की मात्रा खाई किन्तु ५० घंटे में उसकी मृत्यु हुई । इसकी जड़ विरेचक एवं शोथहर है। बीजों में विरेचक गुण नहीं है। (१) कफप्रधान रोगों से इसका प्रयोग करते हैं। इससे स्रोतोवरोध दूर होता है। आमवात, संधिशोथ, जलोदर, कामला, यकृद्दाल्युदर, प्लीहोदर, तथा तीव्र विबन्ध में इसकी जड़ का चूर्ण सोंठ एवं गुड़ के साथ देते हैं। पाश्चात्य चिकित्सा में प्रयुक्त एक्स्ट्रॅक्टम कोलोसिन्थिडिस् कम्पोजिटम् (Extractum Colocynthidis Compositum) का भी व्यवहार किया जा सकता है। अनार्तव में मूल का उपयोग करते हैं। (२) इसकी जड़ को नूतन शोथ पर लेप करते हैं। स्तनशोथ तथा बच्चों के उदर आदि पर इसको जल में घिस कर लगाते हैं। (३) इसके बीजों के तैल का उपयोग बाल काले रहने के लिये करते है। विष चिकित्सा—कषाय द्रव्य (Dil. Tannic acid solution) से आमाशय प्रक्षालन के पश्चात् दुग्ध पिलाना चाहिये । मात्रा—फलचूर्ण १-२ १/२ रत्ती; मूलचूर्ण १-३ माशा । १०४. इन्द्रायण भेद हिं०—भाकुरा । म०—विसलंबी । बं०—गोमुक्त । गु०—कोठिबन । पं०—कचरी । ले०—Cucumis trigonus, Roxb. (कुकुमिस्र ट्राइगोनस्, रॉक्स.) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी) । यह भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में खुली हुई शुष्क जगहों में कहीं-न-कहीं पायी जाती है। यह लता—लता जाति की वनौषधि प्रसरणशील एवं स्पर्श में कर्कश होती है। इसमें तंतु (Tendrils) निःशाख होते हैं। यद्यपि इसके लता पत्र नष्ट हो जाते हैं परन्तु इसकी जड़ भूमि के भीतर जीवित रहती है। समय आने पर उसी जड़ में से अंकुर निकल कर लता रूप में परिणत होता है। पत्ते—स्पर्श में कर्कश, १-२ इञ्च लम्बे तथा चौड़े (कभी- कभी और बड़े), गोलाकार किन्तु पाँच से सात भागों में विभक्त रहते हैं और प्रत्येक भाग किंचित् लम्बाई युक्त गोलाकार, अग्र पर गोल और कुछ दंतुर सा होता है। पुष्प—पीले रंग के और व्यास में १/२ इञ्च बड़े होते हैं। पुरुष जाति के फूल गुच्छों में और स्त्री जाति के फूल एक-एक करके आते हैं। फल—चिकने तरबूज के आकारवाले गोलाकार, किंचित् त्रिकोणाकार, १।। इञ्च लम्बे और १। इञ्च मोटे तथा १० हरी रेखाओं से युक्त होते हैं। पकने पर ये रेखाएँ हलके पीले रंग की हो जाती हैं। इसकी मज्जा कडुवी होती है। बीज—खेत एवं दीर्घ वृत्ताभ होते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में कोलोसिन्थिन (Colocynthin) या तत्सम पदार्थ पाया जाता है। बीजों से निकाला तेल जलाने के काम आता है। गुण और प्रयोग—इन्द्रायण के स्थान पर इसका उपयोग किया जाता है। इसके मूल का क्वाथ सौम्य विरेचक होता है। इसके बीज शीतल, ग्राही तथा पित्त विकार में उपयोगी होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

५७२ भावप्रकाशनिघण्टुः १०५. विशाला (महाकाल, इन्द्रायण भेद) सं०-विशाला, महाकाल। हिं०-लाल इन्द्रायण, महुरार, महर। म०-कौंडल, काकतौंडि, कवंड़ल। गु०- रातां इन्द्रायणां। बं०-माकाल। ता०-कुरट्टै। ते०-अव्वरगूद। क०-कालेमंदलि। अ०-हंजले-अहमर। फा०- हंजले सुर्स। ले०-Trichosanthes palmata, Roxb. (ट्राइकोसॅन्थिस् पामेटा, रॉक्स)। Fam. Cucurbitaceae (कुकु-बिटेसी)। इसकी विशाल आरोही लता झाड़ियों पर फैली हुई अथवा ऊँचे वृक्षों पर चढ़ी हुई पाई जाती है। शाखाएँ लम्बी तथा नीचे की ओर लटकी हुई रहती हैं। सूत्र (Tendrils) २-५ शाखाओं वाले होते हैं। पत्ते-२ १/२-५ इञ्च लम्बे तथा उतने ही चौड़े, दन्तुर, प्रायः पाणिवत् खण्डित, खण्ड ३-५ एवं प्रायः अधर तल पर फैली हुई गाढ़े रंग की गोल ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। पुष्प-श्वेत एवं व्यास में २ १/२-३ इञ्च होते हैं। फल-१ १/२-२ इञ्च व्यास के गोल या दीर्घ वृत्ताभ, पकने पर लाल रंग के एवं १० नारंगी रंग की पतली धारियों से युक्त होता है। फल का छिलका मोटा होता है एवं मज्जा कृष्णाभ हरित होती है। बीज-दीर्घ वृत्ताभ एवं चिकने होते हैं। इसकी जड़ एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक ट्राइकोसॅन्थिन् (Trichosanthin) नामक कड़वा द्रव्य पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी फलत्वक् वामक किन्तु अल्प मात्रा में कफनिःसारक हैं। मज्जा भेदन है। मूल श्वयथुहर एवं ज्वरहर है। यद्यपि जंगली जाति के फल तीव्र विरेचक होते हैं किन्तु रोपित विशाला के फल पकाकर खाने योग्य हो जाते हैं। तमक श्वास, डिफ्थीरिया एवं गले के शोथयुक्त विकार तथा श्वासनलिका-शोथ में कफ चिपचिपा होकर श्वासावरोध होता है तब इसके फलत्वक् या मूल की छाल को थोड़ा सा चिलम में रख कर धूम्रपान कराते हैं जिससे वमन होकर कफ निकलने लगता है। कभी-कभी रक्त भी गिरता है। इससे श्वासावरोध कम होता है एवं गले की सूजन भी कम होती हैं। फुफ्फुस-शोथ में मूलत्वक् का क्वाथ देने से ज्वर एवं श्वासावरोध कम होता है। व्रणशोथ पर इसकी जड़ घिस कर लगाते हैं। स्तनशोथ, गलका, कार्यंकल आदि फोड़े पर इन्द्रायण की जड़ के साथ इसकी जड़ को शीतल जल में घिस कर मोटा लेप करते हैं। इसके फल, से सिद्ध गरी का तेल कर्णस्राव में डालते हैं तथा शिरःशूल एवं प्रतिश्याय में प्रयोग करते हैं। मात्रा-फलत्वक् १/२-१ र० दिन में ३ बार। अथ नीली (नील) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह नीली तु नीलिनी तूणी काला दोला च नीलिका। रञ्जनी श्रीफली तुच्छा ग्रामीणा मधुपर्णिका ।।२०७।। क्लीतका कालकेशी च नीलपुष्पा च सा स्मृता। नीलिनी रेचनी तिक्ता केश्या मोहभ्रमापहा ।।२०८।। उष्णा हन्युदरप्लीहवातरक्तकफानिलान्। आमवातमुदावर्त्तं मदं च विषमुद्धतम् ।।२०९।। 'नील' के नाम तथा गुण-नीली, नीलिनी, तूणी, काला, दोला, नीलिका, रञ्जनी, श्रीफली, तुच्छा, ग्रामीणा, मधुपर्णिका, क्लीतका, कालकेशी और नीलपुष्पा ये सब नाम 'नील' के हैं। नील-तिक्त रसयुक्त, रेचक, बालों के लिये हितकर, उष्णवीर्य, एवम् मोह, भ्रम, उदररोग, प्लीहा, वातरक्त, कफ, वायु, आमवात, उदावर्त्त, मदरोग और उग्र विष को दूर करने वाली होती है। [२०७-२०८]

गुडूच्यादिवर्गः ५७३ १०६. नील हिं०-नीली, नीली वृक्ष, लील । म०-गुली, नील । बं०-नील । मा०-लील । गु०-गली । क०-गेली । ता०-अवरि । ते०-निली चेट्टु, अविरि । फा०-नील, नीलज, हिमामजजुन । अ०-नीलज, वस्मा । अं०- Indigo (इण्डिगो) । ले०-Indigofera tinctoria Linn. (इण्डिगोफेरा टिङ्क्टोरिआ, लिन.) । Fam. Legu- minosae (लेग्युमिनोसी) । पहले इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में नील रंग के लिये नीलहे साहेब लोग इसकी खेती करते थे । किन्तु इस समय कृत्रिम नील रंग के आने से इसकी खेती प्रायः नष्ट ही हो गयी है । इसका क्षुप-४ से ६ फीट तक ऊँचा होता है । शाखाएँ-पतली, दुर्बल, कोणदार, अल्परोमयुक्त एवं फैली हुई होती हैं । पत्ते-असम पक्षवत् संयुक्त पत्र होते हैं । पत्रक-३-६ जोड़े, शरपुंखा के समान, अंडाकार या अंडाकार लट्वाकार, ०.५-०.९ इञ्च लम्बे, पतले तथा कालापन लिये हुए हरे रंग के होते हैं । तोड़ने से इसके पत्ते सीधे टूटते हैं । पुष्प-पतली पत्रकोणज मंजरियों में हलके नीलाभ गुलाबी रंग के आते हैं । फलियाँ-पतली एक इञ्च तक लम्बी होती हैं, जिनमें ८ से १२ तक बीज होते हैं । इसकी कई अन्य जातियाँ होती हैं । इसकी जड़, पत्र, बीज तथा नील रंग का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन-इसके पौधों को सड़ा करके एक इण्डिकन् (Indican) नामक ग्लूकोसाईड् प्राप्त किया जाता है । इसके पौधे से ५०% तक नील प्राप्त किया जाता है । गुण और प्रयोग-नील रंग का बाह्यलेप दाहशामक, व्रणरोपण, त्वग्दोषहर, केशवर्धक एवं केशरंजक है । यह विषघ्न, यकृदुत्तेजक, शामक, विरेचन, अल्प मूत्रजनन, कासहर एवं कृमिघ्न है । अधिक मात्रा से पतले दस्त होते हैं । किन्तु अल्प मात्रा से इससे शौच साफ होता है । अन्य गुण गौण हैं । इसकी जड़ में भी यही गुण कम मात्रा में पाये जाते हैं । पक्षों में जड़ की अपेक्षा और कम गुण होता है । (१) यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि तथा जलोदर में मूल का घन देते हैं । अर्श में इसके साथ-साथ नील तथा पत्तों का लेप भी करते हैं । इसका उपयोग कुकास तथा न्युमोनिया में भी होता है । (२) अपस्मार तथा लघु वातविकारों में नील देते हैं । (३) पागल कुत्ता काटने पर इसका स्वरस २ औंस की मात्रा में पिलाते हैं तथा दंशस्थान पर पत्तों का लेप करते हैं । इतनी अधिक मात्रा से कुछ शिरःशूल तथा विरेचन होता है । यह संखिया के विष में भी उपयोगी है । (४) त्वचा के विकार में नील का बहुत अधिक प्रयोग करते हैं । दग्धव्रण एवं जीर्णव्रण आदि में इसका लेप करने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं । खिजाबों में पत्तों का उपयोग किया जाता है । विषैले जन्तुओं के काटने पर इसका लेप उपयोगी है । मात्रा-नील १/२-२ र०; मूल का घन १-२ र०; क्वाथ ५-१० तो० । अथ शरपुङ्खः (सरफोंका) । तस्य नामलक्षणगुणानाह शरपुङ्खः प्लीहाशत्रुर्नीलीवृक्षाकृतिश्च सः । शरपुङ्खो यकृत्प्लीहगुल्मव्रणविषापहः । तिक्तः कषायः कासास्रश्वासज्वरहरो लघुः ॥ २१०॥ सरफोंका के नाम तथा गुण-शरपुंख, प्लीहाशत्रु और नीलीवृक्षाकृति (नीलवृक्ष के समान आकारवाला) ये सब नाम 'सरफोंका' के हैं । सरफोंका-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, लघु एवम्-यकृत, प्लीहा, गुल्म, व्रण, विष, कास, रक्तविकार, श्वास और ज्वर को दूर करता है । [२१०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

, it has an aa-matra on द्धा! वृद्धादारुक! Wait, look at the mark before ‘विधारा’: It is a bullet:

Line 34: विधारा-कषाय, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, रसायन, वृष्य (वीर्यवर्धक), सारक, उष्णवीर्य तथा शुक्र आयु, बल,

Line 35 (Footnote): १. अयं कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कस्तथाऽप्युपयोगित्वादत्रोल्लिखितः।

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Header: ५७४ भावप्रकाशनिघण्टुः Wait, is it on one line? Yes: ५७४ at left, भावप्रकाशनिघण्टुः at center. Line: १०७. सरफोंका

Names in different languages: हिं०-सरफोंका, सरफोका। बं०-बननील। म०-उन्हाली। गु०-शरपंखो। ते०-तेल्ल वॆंपल्लि, मुलु Wait! Is it तेल्ल वॆंपल्लि or तेल्ल वॆपल्लि or तेल्ल वॆंपल्लि? Let's zoom in on तेल्ल: ते ल्ल (

मेधाशक्ति, जठराग्नि, स्वर और कान्ति को उत्पन्न करने वाला, एवम् वायु, आमवात, अर्श, शोथ, प्रमेह तथा कफ का नाशक है। [१-२] विधारा भी एक संदिग्ध द्रव्य है। कुछ विद्वान् घावपत्ता को विधारा मानते हैं। ठा० बलवन्तसिंहजी के मत से आइपोमिया पेटलॉएडिया (Ipomoea petaloidea, Chois.) या कम-से-कम इसी कुल की कोई लता विधारा हो सकती है। श्री डॉ. देसाई ने आइपोमिआ वाइलोबा (Ipomoea biloba, Forsk.) की जड़ को वृद्धदारक माना है। अष्टांगसंग्रह की टीका में इसका परिचय इस प्रकार है। त्रिकोणाकाण्डा सुबहुप्रताना फलेषु पीता कुसुमेषु रक्ता। पत्रैः सदुग्धैः मृदुरोमवद्भिस्ताम्बूलतुल्यैर्घनमूलकन्दैः ।। उपर्युक्त वर्णन से यह निश्चित ही मालम होता है कि विधारा अवश्य ही त्रिवृत् कुल की ही लता है। यहाँ पर उपयुक्त तीनों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। १०८. वृद्धदारक (घावपत्ता) सं०-वृद्धदारु। हिं०-समुद्रशोक, घावपत्ता, विधारा। म०-समुद्रशोक। गु०-समुदरशोष, वरधारो। बं०- विजताड़, विद्धताडक। ते०-समुद्रपाल। ता०-समुद्रपच्चै। अं०-Elephant Creeper) । ले०-Argyreia speciosa, Sweet. (आर्जीरिआ स्पेसिओजा, स्वीट.)। Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्युलेसी)। यह पश्चिमी शुष्क प्रदेशों को छोड़कर भारतवर्ष के सब भागों में १००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसकी लता-बड़ी एवं वृक्षों पर फैली हुई होती है। नवीन शाखाओं पर श्वेताभ या तूल रोमश सघन आवरण रहता है। पत्ते-लट्त्वाकार, हृदत्, व्यास में ६-१२ इञ्च, कुण्ठित या तीक्ष्णाग्र, ऊपरी पृष्ठ पर चिकने, अधः पृष्ठ पर मखमली श्वेताभ रोमावरण से युक्त एवं ३-९ इञ्च लम्बे पर्ण वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-घंटाकृति, २-३ इञ्च बड़े, बाहर से सफेद और तूल रोमश एवं भीतर से गहरे गुलाबी या जामुनी रंग के होते हैं। फल-अम्बगोल, १/२ इञ्च बड़े, कच्ची अवस्था में हलके हरिताभ तथा पकने पर पीताभ भूरे रंग के होते हैं। बीज-भूरापन लिये सफेद रंग के तथा ३ धार वाले होते हैं। इसके काण्ड के टुकड़े एवं जड़ का विधारा नाम से प्रयोग होता है। इसके पत्तों का एवं नई लता की जड़ का भी चिकित्सा में व्यवहार होता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ को ३-६ माशा देने से दस्त साफ होता है। बंगाल में पौष्टिक रूप में इसकी जड़ का प्रयोग करते हैं। आमवात तथा वात विकारों में इसकी जड़ से लाभ होता है। आमवात में इसके पत्तों को पीस कर गरम करके संधिशोथ पर बाँधते हैं। व्रणशोथ पर इसके पत्तों को बाँधते हैं। असगंध एवं विधारे का सम भाग चूर्ण ३ माशा दूध के साथ सेवन से श्वेत प्रदर में लाभ होता है। मात्रा-मूल चूर्ण १।।-३ माशा। १०९. वृद्धदारु (दोपातीलता) सं०-वृद्धदारु, मर्यादवल्ली¹। हिं०-दोपातीलता, विधारा। बं०-छागलखुरी। म०-मर्यादवेल, मर्दवेल। गु०-मरजादवेल। क०, ता०-अडुंबु। ले०-Ipomoea biloba, Forsk. (आइपोमिआ वाइलोबा फ़ॉर.)। Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्युलेसी)। १. मर्यादवल्लिका शीता ग्राहिणी सारिका गुरुः। पाककाले चोष्णा स्याद्वातला गर्भकारिणी ॥ विसूचिकां च शूलं च वान्ति चामं च नाशयेत् ।। (नि. र.)

५७६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह भारतवर्ष के सभी भागों में, विशेषतया समुद्र के किनारे रेतीली भूमि में अधिक पाई जाती है । इसकी लता—बहुवर्षायु तथा विस्तृत फैलने वाली होती है। काण्ड—रेती पर फैले हुये, नये रहने पर मांसल एवं जामुनी रंग के तथा पुराने होने पर रस्सी की तरह हो जाते हैं पत्ते—मोटे १.५-२.५ इञ्च लम्बे तथा प्रायः उससे अधिक चौड़े एवं अग्र से द्विविभक्त होने के कारण कचनार की तरह दिखलाई देते हैं । पत्ते बकरे के खुर सदृश दिखलाई देने के कारण इसे छागलखुरी कहते हैं । आधार की तरफ पत्ते स्फानवत् होते हैं तथा वहाँ दो बड़ी रंगीन ग्रंथियाँ होती हैं । पुष्प—बड़े तथा रक्ताभ जामुनी रंग के होते हैं । फल—आधा इञ्च बड़े, अंडाकार तथा चिकने होते हैं । बीज—मृदुरोमश होते हैं । मूल—बड़ा लंबा, काष्ठमय, मजबूत, ऐंठा हुआ, करीब १/२ इञ्च मोटा तथा अनेक उपमूलों से युक्त रहता है । इसकी जड़ एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार करते हैं । रासायनिक संगठन—इसके पञ्चांग में राल ७.२७%, अल्प मात्रा में उड़नशील तैल, बहुत लुआबदार पदार्थ तथा समुद्र के अनेक क्षार एवं स्नेहन पदार्थ रहते हैं । जड़ में गाढ़ा पीले रंग का दूध, पिष्ट पदार्थ एवं क्षाराम्भ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—इसके पत्ते शोथहर, वेदनास्थापक, कासहर एवं मूत्रजनक हैं । मूल अनन्तमूल की तरह रसायन है तथा इसका सुखाया हुआ स्वरस रेचक होता है । (१) आमवात तथा संधिशोथ में इसकी जड़ देते हैं तथा पत्तों को पीसकर लेप करते हैं । (२) जलोदर, उदरशूल तथा कास में इसका पत्र-स्वरस पिलाते हैं । (३) शोथ, बद, जलशोथ, शिरःशूल एवं मोच आदि में पत्तों को पीस कर बाँधते हैं । मात्रा—पत्रस्वरस १/२-१ तो०, शुष्कमूल १/४-१/२ तो०, सुखाया हुआ मूल स्वरस ५-६ र० । ११०. वृद्धदारु ले०—Ipomoea petaloidea, Chois. (आइपोमिआ पेटलॉडिएआ कॉए.) । Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्यूलेसी) । इसकी लता बहुत विस्तृत तथा झाड़दार होती है । काण्ड—चिकना तथा उस पर २-४ उभरी हुई रेखायें अथवा पंख सदृश धारायें होती हैं । पत्ते—नीचे के लट्वाकार, प्रायः ७ इञ्च × ५.५ इञ्च बड़े, २-३ इञ्च के वृन्त से युक्त और ऊपर में लट्वाकार-प्रासवत् से प्रासवत्-आयताकार, १.५-३ इञ्च एवं चिकने तथा रक्ताभ एवं दृढ़ मध्यपर्णिक वाले होते हैं । पत्राग्र-द्विविभक्त या कुण्ठित रोमश होता है । पुष्प—न्यूनाधिक पीत (कभी-कभी श्वेत भी) होते हैं । फल—आधा इञ्च अंडाकार होता है । बीज—छोटे तथा सूक्ष्म लहरदार होते हैं । इसके काण्ड एवं मूल के टुकड़े विधारा के नाम से प्रयोग में लाये जाते हैं । अथ यवासो दुरालभा च । (जवासा-धमासा) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह यासो यवासो दुःस्पर्शो धन्वयासः कुनाशकः । दुरालभा दुरालम्भा समुद्रान्ता च रोदिनी ।।२११।। गान्धारी कच्छुराऽनन्ता कषाया हरिविग्रहा । यासः स्वादुः सरस्तिक्तस्तुवरः शीतलो लघुः ।।२१२।। कफमेदोमदभ्रान्तिपित्तासृक्कुष्ठकासजित् । तृष्णाविसर्पवातास्रवमिज्वरहरः स्मृतः ।।२१३।। यवासस्य गुणैस्तुल्या बुधैरुक्ता दुरालभा ।।२१४।। 'जवासा' और 'धमासा' के नाम तथा गुण—यास, यवास, दुःस्पर्श, धन्वयास और कुनाशक ये नाम 'जवासा' के हैं । दुरालभा, दुरालम्भा, समुद्रान्ता, रोदिनी, गान्धारी, कच्छुरा, अनन्ता, कषाया और हरिविग्रहा इतने नाम 'धमासा' के हैं । जवासा—मधुर, तिक्त और कषाय रसयुक्त, सारक, शीतवीर्य, लघु एवं कफ, मेद, मदरोग, भ्रान्ति, रक्तपित्त,

गुडूच्यादिवर्गः ५७७ कुष्ठ, कास, तृष्णा, विसर्प, वातरक्त, वमन और ज्वर को दूर करता है। धमासा—इसे पण्डितों ने 'जवासा' के समान गुणवाला बताया है। यवासा (जवासा) तथा दुरालभा (धमासा) ये दो भिन्न द्रव्य हैं। गुणों में समानता होने के कारण कहीं-कहीं एक दूसरे के स्थान में इनका प्रयोग हुआ है। धन्वयास (मरुभूमि में होने वाला यवास) यह दुरालभा का पर्याय अधिक उचित है। [२११-२१४]

१११. जवासा हिं०, म०—जवासा, यवासा। बं०—जवसा। गु०—जवासो। फा०—खारेशुतुर, शुतुरखार। अ०—अलगुल, हाज। अं०—Arabian or Persian Manna Plant (अरेबियन या एशियन मन्नाप्लांट)। ले०—Alhagi camelorum, Fisch. (अँल्हागी कॅमेलोरम् फिस्.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह दक्षिण महाराष्ट्र, गुजरात, सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा राजपूताना में होता है। यह शुष्क ऊसर भूमि में या नदियों के किनारे पाया जाता है। ग्रीष्म में जब अन्य वनस्पतियाँ सूख जाती हैं तब यह हरा भरा रहता है। इसके गुल्म—छोटे-छोटे १-१॥ हाथ ऊँचे, अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार होते हैं। पत्ते—छोटे-छोटे चिकने, आयताकार, रोमश कुंठिताग्र तथा नीचे की ओर झुके हुए होते हैं। पत्रकोणों में सामान्य शाखाओं के अतिरिक्त प्रायः १ १/२ इञ्च तक लम्बे कांटे होते हैं। फूल—वसन्त में लाल रंग के फूल १ १/२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फली— एक इञ्च लम्बी, सीधी या टेढ़ी तथा मलाकार होती है। यास शर्करा^१—यवासा के क्षुप से एक प्रकार का निर्यास निकल कर कुछ रक्ताभ या भूरापन लिये सफेद रंग के दानों के रूप में जम जाता है उसे यूनानी में तुरंजवीन नाम से बहुत व्यवहार में लाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह फारस से संगृहीत होकर भारत में आती है। भारतीय पौधों से यह शर्करा प्राप्त होती है या नहीं इसकी जानकारी नहीं है। डल्हण ने 'यवासक्वाथघनीभावात्-शर्करा कृता यवासशर्करा' लिखा है अर्थात् इसके घनसत्त्व को वह यासशर्करा मानते हैं। रासायनिक संगठन—इसकी शर्करा में कई प्रकार की शर्करा जैसे इक्षुशर्करा २६.४%, इतर शर्करा (Invert sugar, 11.6%) एवं मेलिझिटोज (Melizitose 47.1%) पायी जाती हैं। गुण और प्रयोग—यवासा—शीतवीर्य, कफघ्न, स्वेदजनन, मूत्रजनन, आनलोमिक एवं पित्तहर है। इसका उपयोग प्रतिश्याय, कास, श्वास, ज्वर, रक्तपित्त, भ्रम, तृषा एवं अर्श में किया जाता है। ऊँट को यह खाने को देते हैं। (१) मुलेठी एवं जवासे का मिश्रित घन क्वाथ कफज विकारों की प्रारम्भिक अवस्थाओं में बहुत लाभदायक है। इनमें इसका क्वाथ पीने को देते हैं तथा इसे वाष्प से धूपन कराते हैं जिससे कफ ढीला हो कर निकलने लगता है। तमक श्वास में इसका धूम्रपान लाभदायक है। (२) अर्श में इसके आंतरिक प्रयोग के साथ इसके काथ से धोते हैं या पंचांग का लेप करते हैं। आमवात में इससे सिद्ध तैल का बाह्य प्रयोग किया जाता है। तुरंजबीन—यह कफहर, वृष्य, पित्तविरेचक एवं मृदु सारक है। बच्चों या मृदुकोष्ठ वालों के लिये सारक रूप में या अन्य सारक औषधियों की शक्ति बढ़ाने के लिये यह प्रयोग में आया जाता है। मात्रा—क्वाथ ४-८ तोला; घनसत्त्व ४-७, यासशकरा १-३ माशा।

१. कषायमधुरा शीता सत्तिक्ता यासशर्करा। (च. सू. अ. २७) यवासशर्करा मधुरकषाया तिक्तानुरसा श्लेष्महरा सरा च। (सु. सू. अ. ४५) ४० भावं. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA