भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेधाशक्ति, जठराग्नि, स्वर और कान्ति को उत्पन्न करने वाला, एवम् वायु, आमवात, अर्श, शोथ, प्रमेह तथा कफ का नाशक है। [१-२] विधारा भी एक संदिग्ध द्रव्य है। कुछ विद्वान् घावपत्ता को विधारा मानते हैं। ठा० बलवन्तसिंहजी के मत से आइपोमिया पेटलॉएडिया (Ipomoea petaloidea, Chois.) या कम-से-कम इसी कुल की कोई लता विधारा हो सकती है। श्री डॉ. देसाई ने आइपोमिआ वाइलोबा (Ipomoea biloba, Forsk.) की जड़ को वृद्धदारक माना है। अष्टांगसंग्रह की टीका में इसका परिचय इस प्रकार है। त्रिकोणाकाण्डा सुबहुप्रताना फलेषु पीता कुसुमेषु रक्ता। पत्रैः सदुग्धैः मृदुरोमवद्भिस्ताम्बूलतुल्यैर्घनमूलकन्दैः ।। उपर्युक्त वर्णन से यह निश्चित ही मालम होता है कि विधारा अवश्य ही त्रिवृत् कुल की ही लता है। यहाँ पर उपयुक्त तीनों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। १०८. वृद्धदारक (घावपत्ता) सं०-वृद्धदारु। हिं०-समुद्रशोक, घावपत्ता, विधारा। म०-समुद्रशोक। गु०-समुदरशोष, वरधारो। बं०- विजताड़, विद्धताडक। ते०-समुद्रपाल। ता०-समुद्रपच्चै। अं०-Elephant Creeper) । ले०-Argyreia speciosa, Sweet. (आर्जीरिआ स्पेसिओजा, स्वीट.)। Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्युलेसी)। यह पश्चिमी शुष्क प्रदेशों को छोड़कर भारतवर्ष के सब भागों में १००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसकी लता-बड़ी एवं वृक्षों पर फैली हुई होती है। नवीन शाखाओं पर श्वेताभ या तूल रोमश सघन आवरण रहता है। पत्ते-लट्त्वाकार, हृदत्, व्यास में ६-१२ इञ्च, कुण्ठित या तीक्ष्णाग्र, ऊपरी पृष्ठ पर चिकने, अधः पृष्ठ पर मखमली श्वेताभ रोमावरण से युक्त एवं ३-९ इञ्च लम्बे पर्ण वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-घंटाकृति, २-३ इञ्च बड़े, बाहर से सफेद और तूल रोमश एवं भीतर से गहरे गुलाबी या जामुनी रंग के होते हैं। फल-अम्बगोल, १/२ इञ्च बड़े, कच्ची अवस्था में हलके हरिताभ तथा पकने पर पीताभ भूरे रंग के होते हैं। बीज-भूरापन लिये सफेद रंग के तथा ३ धार वाले होते हैं। इसके काण्ड के टुकड़े एवं जड़ का विधारा नाम से प्रयोग होता है। इसके पत्तों का एवं नई लता की जड़ का भी चिकित्सा में व्यवहार होता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ को ३-६ माशा देने से दस्त साफ होता है। बंगाल में पौष्टिक रूप में इसकी जड़ का प्रयोग करते हैं। आमवात तथा वात विकारों में इसकी जड़ से लाभ होता है। आमवात में इसके पत्तों को पीस कर गरम करके संधिशोथ पर बाँधते हैं। व्रणशोथ पर इसके पत्तों को बाँधते हैं। असगंध एवं विधारे का सम भाग चूर्ण ३ माशा दूध के साथ सेवन से श्वेत प्रदर में लाभ होता है। मात्रा-मूल चूर्ण १।।-३ माशा। १०९. वृद्धदारु (दोपातीलता) सं०-वृद्धदारु, मर्यादवल्ली¹। हिं०-दोपातीलता, विधारा। बं०-छागलखुरी। म०-मर्यादवेल, मर्दवेल। गु०-मरजादवेल। क०, ता०-अडुंबु। ले०-Ipomoea biloba, Forsk. (आइपोमिआ वाइलोबा फ़ॉर.)। Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्युलेसी)। १. मर्यादवल्लिका शीता ग्राहिणी सारिका गुरुः। पाककाले चोष्णा स्याद्वातला गर्भकारिणी ॥ विसूचिकां च शूलं च वान्ति चामं च नाशयेत् ।। (नि. र.)