भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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५७६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह भारतवर्ष के सभी भागों में, विशेषतया समुद्र के किनारे रेतीली भूमि में अधिक पाई जाती है । इसकी लता—बहुवर्षायु तथा विस्तृत फैलने वाली होती है। काण्ड—रेती पर फैले हुये, नये रहने पर मांसल एवं जामुनी रंग के तथा पुराने होने पर रस्सी की तरह हो जाते हैं पत्ते—मोटे १.५-२.५ इञ्च लम्बे तथा प्रायः उससे अधिक चौड़े एवं अग्र से द्विविभक्त होने के कारण कचनार की तरह दिखलाई देते हैं । पत्ते बकरे के खुर सदृश दिखलाई देने के कारण इसे छागलखुरी कहते हैं । आधार की तरफ पत्ते स्फानवत् होते हैं तथा वहाँ दो बड़ी रंगीन ग्रंथियाँ होती हैं । पुष्प—बड़े तथा रक्ताभ जामुनी रंग के होते हैं । फल—आधा इञ्च बड़े, अंडाकार तथा चिकने होते हैं । बीज—मृदुरोमश होते हैं । मूल—बड़ा लंबा, काष्ठमय, मजबूत, ऐंठा हुआ, करीब १/२ इञ्च मोटा तथा अनेक उपमूलों से युक्त रहता है । इसकी जड़ एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार करते हैं । रासायनिक संगठन—इसके पञ्चांग में राल ७.२७%, अल्प मात्रा में उड़नशील तैल, बहुत लुआबदार पदार्थ तथा समुद्र के अनेक क्षार एवं स्नेहन पदार्थ रहते हैं । जड़ में गाढ़ा पीले रंग का दूध, पिष्ट पदार्थ एवं क्षाराम्भ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—इसके पत्ते शोथहर, वेदनास्थापक, कासहर एवं मूत्रजनक हैं । मूल अनन्तमूल की तरह रसायन है तथा इसका सुखाया हुआ स्वरस रेचक होता है । (१) आमवात तथा संधिशोथ में इसकी जड़ देते हैं तथा पत्तों को पीसकर लेप करते हैं । (२) जलोदर, उदरशूल तथा कास में इसका पत्र-स्वरस पिलाते हैं । (३) शोथ, बद, जलशोथ, शिरःशूल एवं मोच आदि में पत्तों को पीस कर बाँधते हैं । मात्रा—पत्रस्वरस १/२-१ तो०, शुष्कमूल १/४-१/२ तो०, सुखाया हुआ मूल स्वरस ५-६ र० । ११०. वृद्धदारु ले०—Ipomoea petaloidea, Chois. (आइपोमिआ पेटलॉडिएआ कॉए.) । Fam. Convolvulaceae (कन्वोल्व्यूलेसी) । इसकी लता बहुत विस्तृत तथा झाड़दार होती है । काण्ड—चिकना तथा उस पर २-४ उभरी हुई रेखायें अथवा पंख सदृश धारायें होती हैं । पत्ते—नीचे के लट्वाकार, प्रायः ७ इञ्च × ५.५ इञ्च बड़े, २-३ इञ्च के वृन्त से युक्त और ऊपर में लट्वाकार-प्रासवत् से प्रासवत्-आयताकार, १.५-३ इञ्च एवं चिकने तथा रक्ताभ एवं दृढ़ मध्यपर्णिक वाले होते हैं । पत्राग्र-द्विविभक्त या कुण्ठित रोमश होता है । पुष्प—न्यूनाधिक पीत (कभी-कभी श्वेत भी) होते हैं । फल—आधा इञ्च अंडाकार होता है । बीज—छोटे तथा सूक्ष्म लहरदार होते हैं । इसके काण्ड एवं मूल के टुकड़े विधारा के नाम से प्रयोग में लाये जाते हैं । अथ यवासो दुरालभा च । (जवासा-धमासा) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह यासो यवासो दुःस्पर्शो धन्वयासः कुनाशकः । दुरालभा दुरालम्भा समुद्रान्ता च रोदिनी ।।२११।। गान्धारी कच्छुराऽनन्ता कषाया हरिविग्रहा । यासः स्वादुः सरस्तिक्तस्तुवरः शीतलो लघुः ।।२१२।। कफमेदोमदभ्रान्तिपित्तासृक्कुष्ठकासजित् । तृष्णाविसर्पवातास्रवमिज्वरहरः स्मृतः ।।२१३।। यवासस्य गुणैस्तुल्या बुधैरुक्ता दुरालभा ।।२१४।। 'जवासा' और 'धमासा' के नाम तथा गुण—यास, यवास, दुःस्पर्श, धन्वयास और कुनाशक ये नाम 'जवासा' के हैं । दुरालभा, दुरालम्भा, समुद्रान्ता, रोदिनी, गान्धारी, कच्छुरा, अनन्ता, कषाया और हरिविग्रहा इतने नाम 'धमासा' के हैं । जवासा—मधुर, तिक्त और कषाय रसयुक्त, सारक, शीतवीर्य, लघु एवं कफ, मेद, मदरोग, भ्रान्ति, रक्तपित्त,