भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 628, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५७७ कुष्ठ, कास, तृष्णा, विसर्प, वातरक्त, वमन और ज्वर को दूर करता है। धमासा—इसे पण्डितों ने 'जवासा' के समान गुणवाला बताया है। यवासा (जवासा) तथा दुरालभा (धमासा) ये दो भिन्न द्रव्य हैं। गुणों में समानता होने के कारण कहीं-कहीं एक दूसरे के स्थान में इनका प्रयोग हुआ है। धन्वयास (मरुभूमि में होने वाला यवास) यह दुरालभा का पर्याय अधिक उचित है। [२११-२१४]
१११. जवासा हिं०, म०—जवासा, यवासा। बं०—जवसा। गु०—जवासो। फा०—खारेशुतुर, शुतुरखार। अ०—अलगुल, हाज। अं०—Arabian or Persian Manna Plant (अरेबियन या एशियन मन्नाप्लांट)। ले०—Alhagi camelorum, Fisch. (अँल्हागी कॅमेलोरम् फिस्.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह दक्षिण महाराष्ट्र, गुजरात, सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा राजपूताना में होता है। यह शुष्क ऊसर भूमि में या नदियों के किनारे पाया जाता है। ग्रीष्म में जब अन्य वनस्पतियाँ सूख जाती हैं तब यह हरा भरा रहता है। इसके गुल्म—छोटे-छोटे १-१॥ हाथ ऊँचे, अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार होते हैं। पत्ते—छोटे-छोटे चिकने, आयताकार, रोमश कुंठिताग्र तथा नीचे की ओर झुके हुए होते हैं। पत्रकोणों में सामान्य शाखाओं के अतिरिक्त प्रायः १ १/२ इञ्च तक लम्बे कांटे होते हैं। फूल—वसन्त में लाल रंग के फूल १ १/२ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फली— एक इञ्च लम्बी, सीधी या टेढ़ी तथा मलाकार होती है। यास शर्करा^१—यवासा के क्षुप से एक प्रकार का निर्यास निकल कर कुछ रक्ताभ या भूरापन लिये सफेद रंग के दानों के रूप में जम जाता है उसे यूनानी में तुरंजवीन नाम से बहुत व्यवहार में लाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह फारस से संगृहीत होकर भारत में आती है। भारतीय पौधों से यह शर्करा प्राप्त होती है या नहीं इसकी जानकारी नहीं है। डल्हण ने 'यवासक्वाथघनीभावात्-शर्करा कृता यवासशर्करा' लिखा है अर्थात् इसके घनसत्त्व को वह यासशर्करा मानते हैं। रासायनिक संगठन—इसकी शर्करा में कई प्रकार की शर्करा जैसे इक्षुशर्करा २६.४%, इतर शर्करा (Invert sugar, 11.6%) एवं मेलिझिटोज (Melizitose 47.1%) पायी जाती हैं। गुण और प्रयोग—यवासा—शीतवीर्य, कफघ्न, स्वेदजनन, मूत्रजनन, आनलोमिक एवं पित्तहर है। इसका उपयोग प्रतिश्याय, कास, श्वास, ज्वर, रक्तपित्त, भ्रम, तृषा एवं अर्श में किया जाता है। ऊँट को यह खाने को देते हैं। (१) मुलेठी एवं जवासे का मिश्रित घन क्वाथ कफज विकारों की प्रारम्भिक अवस्थाओं में बहुत लाभदायक है। इनमें इसका क्वाथ पीने को देते हैं तथा इसे वाष्प से धूपन कराते हैं जिससे कफ ढीला हो कर निकलने लगता है। तमक श्वास में इसका धूम्रपान लाभदायक है। (२) अर्श में इसके आंतरिक प्रयोग के साथ इसके काथ से धोते हैं या पंचांग का लेप करते हैं। आमवात में इससे सिद्ध तैल का बाह्य प्रयोग किया जाता है। तुरंजबीन—यह कफहर, वृष्य, पित्तविरेचक एवं मृदु सारक है। बच्चों या मृदुकोष्ठ वालों के लिये सारक रूप में या अन्य सारक औषधियों की शक्ति बढ़ाने के लिये यह प्रयोग में आया जाता है। मात्रा—क्वाथ ४-८ तोला; घनसत्त्व ४-७, यासशकरा १-३ माशा।
१. कषायमधुरा शीता सत्तिक्ता यासशर्करा। (च. सू. अ. २७) यवासशर्करा मधुरकषाया तिक्तानुरसा श्लेष्महरा सरा च। (सु. सू. अ. ४५) ४० भावं. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA