भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७८ भावप्रकाशनिघण्टुः ११२. धमासा हिं०-धमासा, हिंगुआ, धमहर । बं०-दुरालभा । मा०, गु०-धमासी । म०-धमासा । पं०-धमाह, धमाहा । फा०-बादा बर्द । अ०-शुकाई । ले०-Fagonia arabica Linn. (फँगोनिया अरेबिका लिन.) । Fam. Zygophyllaceae (झाइ-गोफाइलेसी) । यह पंजाब, प० राजपुताना, दक्षिण, प० खानदेश, कच्छ, सिंध, बलूचिस्तान, वजीरिस्तान तथा पश्चिम में अफगानिस्तान तक पाया जाता है । इसका क्षुप-फीके हरे रंग का अनेक शाखाओं वाला, छोटा फैला हुआ, १-३ फीट ऊँचा तथा तीक्ष्ण काँटेदार होता है । पत्र-विपरीत; पत्रक-१-३ इञ्च लम्बे, अखंड, रेखाकार दीर्घवृत्ताकार होते हैं । दो पत्र चार काँटे तथा एक पुष्प यह चक्राकार क्रम में एक साथ रहते हैं । पुष्प-पत्रकोण में फीके गुलाबी रंग के फूल आते हैं । फल-पाँच खंड वाला तथा शीर्ष पर एक काँटा रहता है । घास के रंग के इसके टुकड़े बाजार में बिकते हैं । इसका स्वाद लुआबदार तथा जल में डालने पर ये चिपचिपे हो जाते हैं । इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । गुण और प्रयोग-धमांसा शीतवीर्य, ज्वरहर, कफहर, दाहप्रशमन, तृष्णानिग्रहण, मूत्रजनन, कोष्ठप्रशमन एवं व्रणरोपण हैं । अर्श, दाह, वमन, भ्रम, प्रलाप, विषमज्वर एवं रक्तपित्त १ में इसके हिम का प्रयोग करते हैं । मसूरिका के प्रतिबंधन के लिये भी इसे देते हैं । (१) ज्वर में आधे से ४ तोला चूर्ण का हिम पिलाते हैं तथा इसी हिम से शरीर भी पोछते हैं जिससे प्यास कम होती है तथा शरीर का दाह एवं कंडू कम होती है । कफज ज्वर में तथा गले और श्वसनसंस्थान के विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है । इससे गले की खुश्की कम होकर कफ निकलने लगता है । श्वास में धूम्रपान लाभदायक है । इसको ईख के रस के साथ उबाल कर अवलेह बनाते हैं जिसका गले तथा फुप्फुसों के विकारों में अनुपान के रूप में प्रयोग करते हैं । इसकी गोली मुँह में रखकर चूसते हैं । (२) इसके क्वाथ से व्रण-प्रक्षालन करने से बिना पूय हुये व्रण जल्दी अच्छा होता है । मुखपाक में इसके क्वाथ से गण्डूष करने से लाभ होता है । मात्रा-१/२-१ तोला हिम बनाकर । अथ मुण्डी महामुण्डी च । तयोर्नामगुणानाह मुण्डी भिक्षुरपि प्रोक्ता श्रावणी च तपोधना । श्रवणाह्वा मुण्डरिका तथा श्रवणशीर्षका ॥२१५॥ महाश्रावणिकाऽन्या तु सा स्मृता भूकदम्बिका । कदम्बपुष्पिका च स्यादव्यथाऽतितपस्विनी ॥२१६॥ मुण्डतिका कटुः पाके वीर्योष्णा मधुरा लघुः । मेध्या गण्डापचीकृच्छ्रकृमियोन्यर्त्तिपाण्डुनुत् ॥२१७॥ श्लीपदारुच्यपस्मारप्लीहमेदोगुदार्तिहृत् । महामुण्डी च तत्तुल्या गुणैरुक्ता महर्षिभिः ॥२१८॥ मुण्डी तथा महामुण्डी के नाम व गुण-मुण्डी, भिक्षु, श्रावणी, तपोधना, श्रवणाह्वा, मुण्डतिका और श्रवणशीर्षका इतने नाम 'मुण्डा' के हैं । महामुण्डी के नाम-महाश्रावणिका, भूकदम्बिका, कदम्बपुष्पिका, अव्यथा और अतितपस्विनी ये सब हैं । मुण्डी-विपाक में कटु, स्वाद में मधुर रसयुक्त, उष्णवीर्य, लघु, मेधा के लिये हितकर एवं गलगण्ड, अपची, मूत्रकृच्छ्र, कृमिरोग, योनिरोग, पाण्डु, श्लीपद, अरुचि, अपस्मार (मिर्गी), प्लीहा, मेदरोग तथा गुदा सम्बन्धी पीड़ा (अर्श) को दूर करने वाली होती है । महामुण्डी-इसे महर्षियों ने गुणों में 'मुण्डी' के समान ही बतलाया है ॥२१५-२१८॥ १. अनन्ता संग्राहकरक्तपित्तप्रशमनानाम् । (च. सू. अ. २५)