भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५७९ ११३. मुण्डी हिं०-मुण्डी, गोरखमुण्डी । बं०-मुरमुरिया, छागल नादी । म०-मुण्डी, बरस बोडी । गु०-गोरखमुण्डी, बोडीयोकलहार । ते०-बोडे सोंर, बोडा तरपु । ता०-कोट्टक, कोट्टक करण्डई । मला०-मिरनगनी, अट्टकामन्री । अ०-कमदर्युस् । फा०-रानदरूम्मी-तल्ख । ले०-Sphaeranthus indicus Linn. (स्फिर्रन्थस् इण्डिकस् लिन.) । Fam. Compositae (कॉम्पोज़िटी) । यह प्रसरजाति की वनौषधि भारतवर्ष के प्रायः सब गरम प्रान्तों में हिमालय में कुमाऊँ से सिक्किम ५००० फीट की ऊँचाई तक तथा आसाम, सिलहट एवं दक्षिण की ओर सिलोन तक पाई जाती है । जलाशयों के समीप जहाँ वर्षा का पानी इकट्ठा होकर शरद ऋतु में सूख गया हो, धान, जव, गेहूँ, चने आदि के खेतों में, चैत्र, वैशाख के महीने में बहुलता से देखने में आती है । यह प्रतिवर्ष वर्षा के बाद जाड़े के दिनों में उत्पन्न होती है और बरसात का पानी पड़ने पर सड़-गल कर नष्ट हो जाती है । इसका क्षुप-सुगन्धित, अनेक शाखाओं से युक्त एक फुट तक ऊँचा होता है किन्तु डण्डियों के कोमल होने से प्रायः भूमि की ओर नत होकर प्रसररूप में १-२ फीट के घेरे में फैल जाता है । शाखायें-कोमल, किञ्चित रोमयुक्त तथा सपक्ष होती है । पत्ते-अवृन्त, आगे लटवाकार या आगे प्रासवत, दन्तुर, आधार की तरफ संकुचित होकर काण्ड सम्पृक्त, मृदुरोमश तथा १-२ इञ्च लम्बे होते हैं । मुण्डक-पत्राभिमुख, किरमिजीरंग के, विषमलिंग, संयुक्त, .५-.७५ इञ्च लम्बे, व्यूहाक्ष दीर्घित और अधःपत्रावलि के पत्र रेखाकार तथा तीक्ष्णाग्र होते हैं । इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । भेद-बंगाल तथा सिलहट की तरफ दलदल वाले स्थानों में स्फिर्रन्थस् अफ्रिकैनस लिन. (S. africanus Linn.) नामक एक भेद पाया जाता है जिसमें काण्ड के ऊपर के पक्षों पर रोम नहीं होते, पत्र १-३ इञ्च लम्बे, मुण्डक १/४-१/३ इञ्च तथा अधःपत्रावलि के पत्र बहुत छोटे तथा तीक्ष्ण नहीं होते । दक्षिण में मैसूर, त्रावनकोर की तरफ धान के खेतों में एक भेद स्फिर्रन्थस् ॲमेरन्थॉइडिस् (S. amaranthoides) पाया जाता है जिसमें काण्ड कभी-कभी छोटी उँगली बराबर मोटा किन्तु छोटा, शाखायें-८-१२ इञ्च, पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे तथा मुण्डक १/२-१ इञ्च बड़े होते हैं । संभवतः यह दूसरा भेद, महामुण्डी हो सकता है । रासायनिक संगठन-इसमें स्फेरेन्थाईन (Sphaeranthine) नामक एक कडुवा क्षाराभ तथा ताजे पुष्पित पौधे में .०२२% एक उड़नशील तैल पाया जाता है । गुण और प्रयोग-मुंडी दीपन, मूत्रजनन, आनुलोमिक, रक्तशोधक, रसायन, बल्य एवं कृमिघ्न है । इसकी जड़ एवं बीज कृमिघ्न हैं । पुष्प-रसायन, शीतल तथा बल्य हैं । फल या पंचांग मछलियों के लिये विषैला है । इसमें का तैल त्वचा एवं मूत्र द्वारा उत्सर्गित होता है । .(१) मूत्रेन्द्रिय विकार में इससे लाभ होता है । सम्पूर्ण मूत्र मार्ग का शोधन होकर बारबार पेशाब होना कम होता है । परमा तथा जीर्ण अष्ठीला शोथ (Chronic Prostatitis) में इससे लाभ होता है । इसमें इसका अर्क भी देते हैं । (२) त्वचा के रोगों में इसका लेप करते हैं तथा इसके क्वाथ को पिलाते हैं । वात-रक्त में इसका चूर्ण मधु एवं घृत के साथ देते हैं तथा अनुपान में गुडूची क्वाथ पिलाते हैं । गात्र दौर्गन्ध्य में मुण्डीचूर्ण कांजी के साथ देते हैं । बार- बार फोड़े फुन्सी होने में इससे लाभ होता है । (३) ग्रंथि, गण्डमाला, अपची, दौर्बल्य, श्लीपद, अर्श आदि जीर्ण रोगों में इसको अधिक देने से लाभ होता है । इनमें इसका स्वरस पिलाते हैं । मात्रा-पुष्प चूर्ण १-२ माशा; स्वरस १-२ तोला । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA