भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 631, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 631

५८० भावप्रकाशनिघण्टुः अथापामार्गः (चिरचिरा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह अपामार्गस्तु शिखरी ह्यधःशल्यो मयूरकः । मर्कटी दुर्गृहा चापि किणिही खरमञ्जरी ।। २१९ ।। अपामार्गः सरस्तीक्ष्णो दीपनस्तिक्तकः कटुः । पाचनो रोचनश्छर्दिकफमेदोऽनिलापहः । निहन्ति हृद्रुजाध्मर्शःकण्डूशूलोदरापचीः ।। २२० ।। 'चिरचिरा' के नाम तथा गुण— अपामार्ग, शिखरी, अधःशल्य, मयूरक, मर्कटी, दुर्गृहा, किणिही, खरमञ्जरी इतने नाम 'चिरचिरा' के हैं । चिरचिरा— तिक्त तथा कटु रसयुक्त, सरक, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, पाचक, रोचक (भोजन में रुचि उत्पन्न करनेवाला) एवं वमन, कफ, मेद, वायु, हृद्रोग, आध्मान (अफरा), अर्श, कण्डू, शूल, उदररोग और अपची को दूर करता है । [२१९-२२०] ११४ चिरचिरा हिं०— लटजीरा, चिचिरी, चिरचिरा, चिचड़ा । म०— आघाड़ा । बं०— आपांग । गु०— अधेड़ो । क०— उत्तरणी । ते०— अपामार्गमु । भा०— आँधी झाड़ो, ओंगा । ता०— नायु रुवि । मला०— वलियकटलाट । फा०— खारबाझ गूनइ । अ०— अत्कुमह । अं०— The Prickly-Chaff Flower (दी प्रिक्ली-चैफ फ्लावर) । ले०— Achyranthes aspera, Linn. (एचिरिन्थिस् एस्पेरा लिन.) । Fam. Amaranthaceae (एमेरेन्थेसी) । यह शहर या गाँव के बाहर बागों या जंगलों में बिना बोए ही उत्पन्न होता है । यह प्रायः भारतवर्ष के सब प्रान्तों ३००० फीट तक पाया जाता है । इसका क्षुप— स्वावलंबी, १-३ फीट ऊँचा तथा शाखायें कुछ आरोहणशील एवं पर्वों के ऊपर मोटी होती हैं । पत्ते— चौलाई के पत्तों की तरह कुछ गोल, अंडाकार, नोकीले एवं १-५ इञ्च लम्बे होते हैं । इसके पत्तों और कांड पर बहुत सूक्ष्म सफेद-सफेद रोम होते हैं । पुष्पदंड लगभग डेढ़ फुट तक लम्बा होता है उस पर कुछ लाल गुलाबी पीलापन लिये हुए फूल निकलते हैं । उसी दंड पर काँटेदार छोटे-छोटे फल उल्टे लगते हैं । ये काँटेदार फल कपड़े पर चिपट जाते हैं । इसलिए कहीं-कहीं इसे 'कुत्ता' नाम से भी पुकारते हैं । जब फल पक जाते हैं तो इनके अन्दर से चावल निकलते हैं । इसके मूल, बीज, पत्र एवं पंचांगक्षार का चिकित्सा में प्रयोग करते हैं । रासायनिक संगठन— इसके पत्र में २४, शाखाओं में ८ तथा मूल में ८ १/२% राख रहती है । इसमें यवक्षार बहुत पाया जाता है जो पत्तों में २१ १/२, शाखाओं में ३८ तथा मूल में २८ १/२% रहता है । इसके अतिरिक्त चूना, सोराखार, नमक, लौह तथा गन्धक आदि अन्य द्रव्य इसमें पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग— अपामार्ग, उष्ण, तिक्त, कटु, तीक्ष्ण, दीपन, पाचन, पित्तविरेचक, वामक, मूत्रजनन, कफघ्न, विषघ्न, कृमिघ्न, अम्लतानाशक एवं शिरोविरेचन (बीज) है । इसका प्रयोग कफ, मेद, वात, अर्श, आनाह, शूल, जलोदर, शोफ, अपची, व्रण, त्वचा के विकार, कुष्ठ एवं सर्पादि के विष में करते हैं । (१) कुपचन, आमाशय की शिथिलता, पीड़ा एवं हल्लास में अपामार्ग, अन्य कडुवे पदार्थों के साथ भोजन के पूर्व देते हैं जिससे पाचक रस की वृद्धि होती है तथा शूल कम होता है । भोजनोपरांत देने से अम्लता कम होती है तथा श्लेष्मा का विलयन होता है । इसमें भोजन के २-३ घण्टे बाद गरम-गरम क्वाथ देते हैं । इसका यकृत् पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है । इससे पित्तवाहिनी नलिका का शोथ कम होकर पित्तस्राव उचित होता है । पित्ताश्मरी तथा अर्श में इससे अच्छा लाभ होता है । अर्श में इसकी जड़ को तण्डुलोदक के साथ पीसकर मधु मिलाकर देते हैं । रक्तार्श में बीज का लेप भी उपयोगी होता है ।