भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५८१ (२) मूत्रेन्द्रिय विकारों में इसके साथ मुलेठी, गोखरू तथा पाठा का उपयोग करते हैं। वृक्कजन्य जलोदर में इससे लाभ होता है। इससे मूत्र की अम्लता कम होने से तथा इसका दाहशामक प्रभाव होने के कारण परमा, बस्तिशोथ, वृक्कशोथ तथा अश्मरी में इसको देते हैं। अश्मरी में इसका क्षार भेंड के मूत्र के साथ दिया जाता है। (३) जीर्ण कफ विकारों में इसका क्षार बहुत ही लाभदायक होता है। इससे गाढ़ा कफ पतला होकर निकलने लगता है। इसमें चतुःषष्टि पिप्पली, अतीस, कुपीलु, घृत एवं मधु के साथ अपामार्गक्षार दिया जाता है। (४) सर्पविष, वृश्चिकदंश, मूषिक विष तथा पागल कुत्ते के काटने पर इसका उपयोग करते हैं। इनमें मूल, पंचांग या बीज का लेप तथा मूल पीसकर पिलाते है। (५) आँख की फूली में इसकी जड़ को मधु के साथ पीसकर अंजन कराते हैं। दन्तशूल में पत्रस्वरस मसूड़ों पर मलते हैं तथा दाँतों के गढ़ों में क्षार भरते हैं। इससे दतुअन करने से लाभ होता है। बाधिर्य, कर्णशूल तथा कर्ण नाद में इससे सिद्ध तैल कान में डालते हैं। सन्धिशोथ में पत्ते को पीसपर गरमकर बाँधते हैं। इसके पंचांग के क्वाथ से स्नान कराने से कण्डू दूर होती है। सद्यः क्षत में खून रोकने के लिये इसका पत्रस्वरस लगाते हैं। मात्रा—मूल तथा बीज १/२-१ तोला; क्षार ४-८ रत्ती; मूल क्वाथ १ १/२-५ तोला। अथ रक्तापामार्गः (लाल चिरचिरा)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह रक्तोऽन्यो वशिरो वृत्तफलो धामागर्वोऽपि च। प्रत्यक्पर्णी केशपर्णी कथिता कपिपिप्पली।।२२१।। अपामार्गोऽरुणो वातविष्टम्भी कफहृद्धिमः। रूक्षः पूर्वगुणैन्यूनः कथितो गुणवेदिभिः।।२२२।। 'लाल चिरचिरा' के नाम तथा गुण—दूसरा जो 'लाल चिरचिरा' है उसके नाम—वशिर, वृत्तफल, धामागर्व, प्रत्यक्पर्णी, केशपर्णी, कपिपिप्पली ये सब हैं। लाल चिरचिरा-वायु को स्तब्ध करने वाला, कफनाशक, शीतवीर्य तथा रूक्ष होता है। इसे द्रव्यगुण के जानने वालों ने उपर्युक्त चिरचिरा के गुणों से न्यून गुणवाला बताया है। [२२१-२२२] ११५. लाल चिरचिरा हिं०-लाल ओंगा; लाल चिरचिरा। बं०-रक्तापांग। म०-तांवाडा आघाड़ा, लाल आगाड़ा। गु०-रातो अघेड़ो। लाल चिरचिरे का क्षुप उक्त (सफेद) चिरचिरे के समान ही होता है। पत्ते इत्यादि भी एक ही समान होते हैं। परन्तु पत्ते पर लाल धब्बे होते हैं और काण्ड पर भी कुछ ललाई होती है। इसके पत्ते सफेद की अपेक्षा कुछ मोटे और बड़े होते हैं और बीज कुछ पतले होते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी एक अन्य जाति (Species), ए. बाइडेण्टेटा ब्लूम (A. bidentata Blume) का उल्लेख मिलता है किन्तु वह रक्त भेद ही है ऐसा नहीं कहा जा सकता। कुछ विद्वानों ने एक भेद (Variety), ए. रुब्रो, फुस्का (A. rubro-fusca) का उल्लेख किया है। अथापामार्गफलगुणानाह अपामार्गफलं स्वादु रसे पाके च दुर्जरम्। विष्टम्भि वातलं रूक्षं रक्तपित्तप्रसादनम्।।२२३।। 'चिरचिरा' के फल का गुण—यह रस तथा विपाक में मधुर रस युक्त, दुर्जर (जल्दी हजम नहीं होने वाला), विष्टब्धताकारक, वातजनक, रूक्ष तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [२२३] अथ कोकिलाक्षः (तालमखाना)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह कोकिलाक्षस्तु काकेक्षुरिक्षुरः क्षुरकः क्षुरः। भिक्षुः काण्डेक्षुरप्युक्त इक्षुगन्धेक्षुबालिका।।२२४।। क्षुरकः शीतलो वृष्यः स्वाद्वम्लः पिच्छिलस्तथा। तिक्तो वातामशोथाश्मतृष्णादृष्ट्यनिलास्त्रजित् ।।२२५।।