भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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५८२ भावप्रकाशनिघण्टुः 'तालमखाना' के नाम और गुण-कोकिलाक्ष, काकेक्षु, इक्षुर, क्षुरक, क्षुर, भिक्षु, काण्डेक्षु, इक्षुगन्धा और इक्षुबालिका ये सब नाम तालमखाना के हैं। तालमखाना-शीतवीर्य, वृष्य, मधुर, अम्ल तथा तिक्त रसयुक्त, पिच्छिल एवं वात, आम, शोथ, अश्मरी (पथरी), तृषा, दृष्टि रोग और वातरक्त को दूर करने वाला होता है। [२२४-२२५] ११६. तालमखाना हिं०-तालमखाना। बं०-कुलियाखारा, कुलेखाड़ा। गु०-एखरो। म०-तालीखाना, कोल सुन्दा। ते०- गोलिमिडि केट्टु, निर्गुविवेरू। क०-कुलुगोलिके, बलिकेल। ता०-निरमुल्ली। ले०-Hygrophila spinosa, T. And. (हाइग्रोफिला स्पाइनोसा)। Syn. Astera cantha longifolia Nees (एस्टेराकेन्था लाँगिफोलिआ नीज)। Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। तालमखाना-क्षुपजाति की वनस्पति प्रायः समस्त भारत में ताल, तलैया में जल के निकट उत्पन्न होती है। इसके छोटे-छोटे क्षुप-गूमा के समान पर गूमा से बड़े, गठीले और कहीं-कहीं २-२ १/२ हाथ तक ऊँचे देखे जाते हैं। गाँठों के चारों ओर प्रायः १ इञ्च पीले रंग के तीक्ष्ण काँटे होते हैं, जो प्रायः ६-६ की संख्या में चक्रिक क्रम से निकले रहते हैं। पत्ते-अवृन्त, गाँठों पर चक्रिक क्रम में ६ की संख्या में जिनमें से बाहरी दो पत्ते अधिक लम्बे (७" × ०.७"), आयताकार-भालाकार या अभिभालाकार तथा भीतरी ४ पत्ते १ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-गाँठों पर समूहबद्ध होकर ४ जोड़े में नीले बैंगनी रंग के करीब १ १/२ इञ्च लम्बे तथा द्वयोष्ठ होते हैं। फल-पतला, चिपटा ८ मि० मि० लम्बा, रेखाकार, आयताकार नुकीला तथा ४-८ बीजों से युक्त होता है। बीज-छोटे रक्ताभ और रोमश होते हैं। बीजों को जल में भिगाने से लुआब बनता है। इसके बीज, मूल, पत्र एवं पंचांग के क्षार का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में २३% एक पीले रंग का स्थिर तैल पाया जाता है। इसके अतिरिक्त डायास्टेस (Diastase), लाइपेस (Lipase) एवं प्रोटिएस Protease) ये द्रव्य भी इसमें होते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, मूत्रजनन, मधुर, स्निग्ध, शुक्रशोधन, स्तन्यजनन, संतर्पण, बल्य एवं वृष्य हैं। इसकी जड़ तथा बीजों में विशेष रूप से मूत्रल गुण है। बीजों में रहने वाले पोटाशियम् के लवण एवं पिच्छिल द्रव्य के कारण इसका मूत्रल प्रभाव पड़ता है। इसका उपयोग जलोदर, यकृतोदर, शोथ, मूत्रकृच्छ्र, परमा, बस्तिशोथ, कामला, वातरक्त एवं जननेन्द्रिय-विकारों में किया जाता है। यकृत में अवरोध उत्पन्न होने के कारण उत्पन्न शोथ में इससे लाभ होता है। (१) परमा तथा बस्तिशोथ में इसके मूल का क्वाथ देते हैं जिससे मूत्र की वृद्धि होती है तथा जननेन्द्रिय-विकारों में किया जाता है। यकृत में अवरोध उत्पन्न होने के कारण उत्पन्न शोथ में इससे लाभ होता है। (२) यकृतोदर में मूल का क्वाथ या पञ्चांग की राख देते हैं। (३) शोथ में भी इसकी राख गोमूत्र या जल के साथ देते हैं। (४) वाजीकरण के लिये केवाँच एवं इसके बीजों का शर्करायुक्त चूर्ण धारोष्ण दुग्ध के साथ देते हैं। (५) कास में पत्ते उपयोगी होते हैं तथा सन्धि-पीड़ा एवं परमा में इसका लेप किया जाता है। मात्रा-मूलक्वाथ ४ तो०; बीजचूर्ण २-४ माशा; क्षार २-५ र०; भस्म १-२ माशा। अथास्थिसंहारः (हड़संहारी) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह ग्रन्थिमानस्थिसंहारीवज्राङ्गीवाऽस्थिशृङ्खला । अस्थिसंहारकः प्रोक्तोवातश्लेष्महरोऽस्थियुक् ।। २२६ ।। उष्णः सरः कृमिघ्नश्चदुर्नामघ्नोऽक्षिरोगजित् । रूक्षः स्वादुलघुर्वृष्यः पाचनः पित्तलः स्मृतः ।।२२७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA