भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
५८२ भावप्रकाशनिघण्टुः 'तालमखाना' के नाम और गुण-कोकिलाक्ष, काकेक्षु, इक्षुर, क्षुरक, क्षुर, भिक्षु, काण्डेक्षु, इक्षुगन्धा और इक्षुबालिका ये सब नाम तालमखाना के हैं। तालमखाना-शीतवीर्य, वृष्य, मधुर, अम्ल तथा तिक्त रसयुक्त, पिच्छिल एवं वात, आम, शोथ, अश्मरी (पथरी), तृषा, दृष्टि रोग और वातरक्त को दूर करने वाला होता है। [२२४-२२५] ११६. तालमखाना हिं०-तालमखाना। बं०-कुलियाखारा, कुलेखाड़ा। गु०-एखरो। म०-तालीखाना, कोल सुन्दा। ते०- गोलिमिडि केट्टु, निर्गुविवेरू। क०-कुलुगोलिके, बलिकेल। ता०-निरमुल्ली। ले०-Hygrophila spinosa, T. And. (हाइग्रोफिला स्पाइनोसा)। Syn. Astera cantha longifolia Nees (एस्टेराकेन्था लाँगिफोलिआ नीज)। Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। तालमखाना-क्षुपजाति की वनस्पति प्रायः समस्त भारत में ताल, तलैया में जल के निकट उत्पन्न होती है। इसके छोटे-छोटे क्षुप-गूमा के समान पर गूमा से बड़े, गठीले और कहीं-कहीं २-२ १/२ हाथ तक ऊँचे देखे जाते हैं। गाँठों के चारों ओर प्रायः १ इञ्च पीले रंग के तीक्ष्ण काँटे होते हैं, जो प्रायः ६-६ की संख्या में चक्रिक क्रम से निकले रहते हैं। पत्ते-अवृन्त, गाँठों पर चक्रिक क्रम में ६ की संख्या में जिनमें से बाहरी दो पत्ते अधिक लम्बे (७" × ०.७"), आयताकार-भालाकार या अभिभालाकार तथा भीतरी ४ पत्ते १ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-गाँठों पर समूहबद्ध होकर ४ जोड़े में नीले बैंगनी रंग के करीब १ १/२ इञ्च लम्बे तथा द्वयोष्ठ होते हैं। फल-पतला, चिपटा ८ मि० मि० लम्बा, रेखाकार, आयताकार नुकीला तथा ४-८ बीजों से युक्त होता है। बीज-छोटे रक्ताभ और रोमश होते हैं। बीजों को जल में भिगाने से लुआब बनता है। इसके बीज, मूल, पत्र एवं पंचांग के क्षार का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में २३% एक पीले रंग का स्थिर तैल पाया जाता है। इसके अतिरिक्त डायास्टेस (Diastase), लाइपेस (Lipase) एवं प्रोटिएस Protease) ये द्रव्य भी इसमें होते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, मूत्रजनन, मधुर, स्निग्ध, शुक्रशोधन, स्तन्यजनन, संतर्पण, बल्य एवं वृष्य हैं। इसकी जड़ तथा बीजों में विशेष रूप से मूत्रल गुण है। बीजों में रहने वाले पोटाशियम् के लवण एवं पिच्छिल द्रव्य के कारण इसका मूत्रल प्रभाव पड़ता है। इसका उपयोग जलोदर, यकृतोदर, शोथ, मूत्रकृच्छ्र, परमा, बस्तिशोथ, कामला, वातरक्त एवं जननेन्द्रिय-विकारों में किया जाता है। यकृत में अवरोध उत्पन्न होने के कारण उत्पन्न शोथ में इससे लाभ होता है। (१) परमा तथा बस्तिशोथ में इसके मूल का क्वाथ देते हैं जिससे मूत्र की वृद्धि होती है तथा जननेन्द्रिय-विकारों में किया जाता है। यकृत में अवरोध उत्पन्न होने के कारण उत्पन्न शोथ में इससे लाभ होता है। (२) यकृतोदर में मूल का क्वाथ या पञ्चांग की राख देते हैं। (३) शोथ में भी इसकी राख गोमूत्र या जल के साथ देते हैं। (४) वाजीकरण के लिये केवाँच एवं इसके बीजों का शर्करायुक्त चूर्ण धारोष्ण दुग्ध के साथ देते हैं। (५) कास में पत्ते उपयोगी होते हैं तथा सन्धि-पीड़ा एवं परमा में इसका लेप किया जाता है। मात्रा-मूलक्वाथ ४ तो०; बीजचूर्ण २-४ माशा; क्षार २-५ र०; भस्म १-२ माशा। अथास्थिसंहारः (हड़संहारी) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह ग्रन्थिमानस्थिसंहारीवज्राङ्गीवाऽस्थिशृङ्खला । अस्थिसंहारकः प्रोक्तोवातश्लेष्महरोऽस्थियुक् ।। २२६ ।। उष्णः सरः कृमिघ्नश्चदुर्नामघ्नोऽक्षिरोगजित् । रूक्षः स्वादुलघुर्वृष्यः पाचनः पित्तलः स्मृतः ।।२२७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५८३ हड़संहारी के नाम व गुण—ग्रन्थिमान्, अस्थिसंहारी, वज्राङ्गी, अस्थिशृंखला, ये सब हड़संहारी के नाम हैं। हड़संहारी—वात-कफनाशक, टूटी हुई हड्डियों को जोड़नेवाली, उष्णवीर्य, सारक तथा कृमि, अर्श (बवासीर) और नेत्र रोग को दूर करने वाली, रूक्ष, स्वादिष्ट, लघु, वृष्य, पाचक और पित्तजनक होती है । [२२६-२२७] अथ तद्वटिकाया निर्माणविधिं गुणाँश्चाह काण्डं त्वग्विरहितमस्थिश्रृङ्खलाया—माषार्द्धार्द्विदलमकञ्चुकं तदर्द्धम्। संपिष्टं सुतनु ततस्तिलस्य तैले—संपक्वं वटकमतीव वातहारि ।।२२८।। इसकी वटिका बनाने की विधि तथा गुण—हड़संघारी के टुकड़ों के छिलके को दूर कर उसमें छिल्का अलग की हुई उरद के दाल को आधा परिमाण मिलाकर पीसने के बाद टिकिया बनाकर तिल के तेल में पका डाले, यह टिकिया वात को हरण करने वाली होती है। [२२८] .. ११७. हड़संघारी हिं०—हड़जोड़, हड़संघारी, हड़जोरवा। बं०—हाड़भांगा, हाड़जोड़ा। गु०—हाड़ साँकल। म०—कांडबेल। क०—मंगरवल्ली। ते०—नाल्लेरु, नुल्लेरोतिगे। ता०—पेरंडै। ले०—Vitis quadrangularis, Wall. (वाइटिस् क्वॉड्रेन्युलेरिस्, वाल.); Syn. Cissus quadrangularis, Linn. (सिसस् क्वॉड्रेन्युलेरिस्, लिन.)। Fam. Vitaceae (वाइटेसी)। हड़जोड़ी—लता जाति की वनौषधि प्रायः गरम प्रदेशों में अधिक होती है। यह वाटिकाओं आदि में लगाई हुई अधिक पायी जाती है। जिस प्रकार लतायें वृक्षों की डालियों से लिपटती हुई फैलती हैं उस प्रकार यह नहीं बढ़ती पर वृक्षों का सहारा ले उस पर चढ़ती और लटकती रहती हैं। काण्ड—चौपहल, हरा, बीच-बीच में सन्धियों से युक्त एवं मांसल होता है। संधियों पर सूत्र होते हैं और नवीन काण्ड संधियों पर तन्तुओं के विपरीत दिशा में पत्र होते हैं। पत्र—एकान्तर, छोटे वृन्तवाले, हृद्वत् चौड़े, १-२ १/२ इञ्च बड़े, मोटे दन्तुर, उपपत्रयुक्त एवं संख्या में अल्प रहते हैं। पुष्प—छोटे तथा हरित- श्वेतवर्ण के आते हैं। फल—गोल, करीब ६ मि० मि० बड़े, पकने पर लाल तथा एक बीजयुक्त होते हैं। बीज—हलके भूरे रंग के, ५ मि० मि० बड़े तथा चिकने होते हैं। दक्षिण की तरफ कोमल काण्ड एवं पत्तों का साग बना कर खाते हैं। काण्ड तोड़ने पर बहुत रस निकलता है। इसके काण्ड एवं पत्तों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें कॅल्शियम औक्जॅलेट् (Calcium oxalate) एवं १०० ग्राम ताजे पौधे में २६७ मि० ग्रा० कॅरोटीन (Carotene); १०० ग्रा० कोमल काण्ड में ३९८ मि० ग्रा०, नीचे के भाग में २३२ मि० ग्रा० तथा ताजे स्वरस में ४७९ मि० ग्रा० विटामिन सी (Vitamin C) की मात्रा पाई जाती है। गुण और प्रयोग—यह रूक्ष, वात-कफशामक, रक्तशोधक, दीपन, पाचन, अर्शोघ्न, वृष्य, सन्धानीय एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग अस्थिभंग, पाचनविकार, स्कर्ह्वी (Scurvy), आर्तवविकार, तमकश्वास एवं रक्तदोष में किया जाता है। (१) कुपचन में कोमल काण्ड एवं पत्तों का शाक खिलाते हैं या इनको बन्द पात्र में जलाकर उसकी राख खिलाते हैं। (२) आर्तव की अधिकता में इसका स्वरस, गोपीचन्दन, घृत एवं मधु खिलाते हैं। (३) तमकश्वास में काण्ड को पीसकर देते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
(४) अस्थिभंग में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। (५) कर्णस्राव एवं नासा से रक्तस्राव होने पर इसका स्वरस डालते हैं। मात्रा-स्वरस १ से २ तोला। अथ कुमारी (घीकुआँर)। तस्या नामगुणानाह कुमारी गृहकन्या च कन्या घृतकुमारिका । कुमारी भेदनी शीता तिक्ता नेत्र्या रसायनी ।।२२९।। मधुरा बृंहणी बल्या वृष्या वातविषप्रणुत् । गुल्मप्लीहयकृद्वृद्धिकफज्वरहरी हरेत् ।। ग्रन्थ्यग्निदग्धविस्फोटपित्तरक्तत्वगामयान् ।।२३०।। 'घीकुआँर' के नाम तथा गुण-कुमारी, गृहकन्या, कन्या और घृतकुमारिका ये नाम 'घीकुआर' के हैं। घीकुआँर-मल को भेदन करने वाली, शीतल, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, रसायन, बृंहण, बलकारक, वृष्य एवं वात, विष, गुल्म, प्लीहा, यकृत् की वृद्धि, कफज्वर, ग्रन्थि, अग्निदग्ध (आग से जलजाना), विस्फोटक, पित्त, रक्तविकार और चर्मरोग को नाश करने वाली होती है। [२२९-२३०] ११८. घीकुआँर हिं०-घीकुआँर, ग्वार पाठा, घीग्वार, क्वारपाठी। बं०-घृतकुमारी। म०-कोरफड, कोरकांड। गु०-कुँवार। क०-लोलिसर। ते०-कलबन्द। ता०-कत्तालै। फा०-दरखते सिब्र। अ०-तसब्बार अलसी। ले०-Aloe barbadensis, Mill. (एलो बार्बाडेन्सिस मिल.)। Syn. A. vera Tourn. ex Linn. (एलो वेरा)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। कुमारीसार-ऐलेयक, कृष्ण बोल। हिं०-एलुआ, मुसब्बर। म०-कालाबोल, एलिया। बं०-मोषब्बर। गु०-एलियो। फा०-शबयार। अ०-सिब्र। अं०-Common Indian Aloe (कॉम्न् इण्डियन् एलो); Curacao Aloe (क्युराकाओ एलो); Barbados Aloe (बार्बाडोस् एलो)। Musabbar (मुसब्बर)। यह भारतवर्ष में प्रायः सर्वत्र होती है। इसका क्षुप-छोटा, बहुवर्षायु, मांसल एवं १ से २ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-मांसल, मोटे, हरे, भालाकार, सीधे फैले हुये, कुछ नतोदर, १ से २ फीट लम्बे ४ इञ्च तक चौड़े एवं दन्तुर होते हैं। इनके भीतर घी के समान पीताभ गूदा रहता है। पुष्प-पत्तों के बीच से लम्बा पुष्पदण्ड निकलता हैं जिसमें रक्ताभ पीत पुष्प आते हैं। भारतवर्ष में इसके २-३ भेद (Varieties) पाये जाते हैं। दक्षिण एवं मध्य प्रदेश में होने वाले के पत्ते आधार की तरफ नीलारुण रंग के एवं उनके काँटे कम दृढ़ होते हैं। मद्रास से रामेश्वरम् तक समुद्री किनारे पर होने वाले क्षुप छोटे तथा उनके दाँत सामान्य दन्तुर (Dentate) होते हैं। काठियावाड़ के किनारे होने वाले क्षुप से जाफराबादी मुसब्बर प्राप्त किया जाता है। इसे गलती से कुछ लोगों ने ए. अबीसीनिया कहा है। इसके पत्तों को काटने से एक पीले रंग का पिच्छिल रस निकलता है जिसे संग्रह करके गाढ़ा कर लेते हैं। शीत होने पर यह जम जाता है जिसे एलुआ कहते हैं। विभिन्न स्थानों से प्राप्त घीकुवार तथा गाढ़ा बनाने की भिन्न विधि के परिणामस्वरूप यह कई प्रकार का मिलता है। यदि सूर्यताप से या हलकी आंच पर रस गरम करके बनाया जाता है तो यह कुछ चिकना तथा अपारदर्शक बनता है जिसे यकृताभ (Hepatic) एलुवा कहते हैं। किन्तु यदि रस को तीव्र अग्नि पर जल्दी से गाढ़ा करते हैं तो यह कुछ पारदर्शक बनता है जिसे ग्लासी या विट्रिअस (Glassy or vitreous) एलो कहते हैं। इसमें एक प्रकार की विशिष्ट गंध आती है तथा इसका स्वाद कड़ुआ एवं हल्लासकारक होता है। एलुआ के भेद-ब्रिटिशफार्माकोपिया में चार प्रकार का एलुआ राजमान्य है।
गुडूच्यादिवर्गः ५८५ (१) Curacao or Barbados aloes (क्यूराकाओ या बार्बाडोस् एलो)—यह चाकलेटी बादामी रंग का होता है जो इसके भेद Var. officinalis (ऑफिसिनॅलिस्) से बनाते हैं। (२) Socotrine aloes (सोकोट्राइन एलो)—यह A. perryi (ए. पेरी) से प्राप्त होता है तथा इसका रंग पीताभ या कृष्णाभ बादामी होता है। (३) Zangibar aloes (जंजिबार एलो)—यह भी ए. पेरी से प्राप्त किया जाता है किन्तु इसका वर्ण यकृताभ बादामी होता है। (४) Cape aloes (केप एलो)—यह A. ferox (ए. फेरॉक्स) से प्राप्त करते हैं तथा इसका वर्ण गहरा बादामी या हरिताभ बादामी रहता है। इन चार में से यही लाल स्वरूप का होता है। इनके अतिरिक्त केप एलो सदृश नेटाल एलो, अरबी कोका-एलो एवं जाफर बादी एलो आदि भेद भी पाये जाते हैं। परीक्षा एवं प्रमाण—इसमें काला कत्था, पत्थर या लोहा आदि की मिलावट करते हैं। मद्यसारीय घोल की नील लोहितातीत प्रकाश में परीक्षा करने पर इसके घोल का वर्ण गहरा बादामी एवं कत्थे सा काला दिखाई देता है। एलुआ में आर्द्रता ११% से कम, राख ४% से कम, मद्यसार में अविलेय भाग १०% से कम एवं जल में विलेय भाग ५०% से अधिक होता है। शोरे के तेजाब में इसका चूर्ण डालने से बादामी या रक्ताभ बादामी घोल बनता है तथा फेन निकलता है। रासायनिक संगठन—एलुआ में एलोइन (Aloin) नामक एक कार्यकारी तत्त्व रहता है जो कई ग्लूकोसाइड का मिश्रण है। एलोइन की मात्रा पहले में ३०%, दूसरे तथा तीसरे भेद में उससे कम एवं चौथे में १०% रहती है। एलोइन का मुख्य भाग Berbaloin (बार्बालोइन) नामक हलका पीला ग्लूकोसाइड है जो जल में विलेय होता है। इनके अतिरिक्त Isobarbaloin (आइसोबार्बालोइन) जो केवल क्यूराकाओ एलो में रहता है एवं B barbaloin (बिटा बार्बालोइन), Aloe-emodin (एलो एमोडिन), राल तथा जल में घुलनशील कुछ पदार्थ पाये जाते हैं। गुण एवं प्रयोग—घीकुआर तिक्त, मधुर, शीतवीर्य, भेदन, दीपन, पाचन, बल्य, शोथहर, व्रणरोपण, नेत्र्य एवं शोणितास्थापन है। एलुआ भेदन, उष्ण, तीक्ष्ण, आर्तवजनन एवं कृमिघ्न है। अल्पमात्रा में यह दीपन-पाचन, तिक्त एवं बल्य है। इससे यकृत् की क्रिया में सुधार होकर अन्न का सात्मीकरण ठीक होता है। अधिक मात्रा (१-२ रत्ती) से पेट में मरोड होकर १०-१२ घंटे में विरेचन होता है। इसका प्रभाव बड़ी आँत पर होता है, जिससे कटिस्थ अंगों जैसे गर्भाशय, गुदा तथा अन्य अवयवों में रक्ताधिक्य होता है। (१) विरेचक गुण के कारण विबन्ध में इसका प्रयोग अन्य वातानुलोमक एवं उद्वेष्टन निरोधी औषधियों के साथ करते हैं। गर्भिणी या स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में इसका प्रयोग नहीं करते। बाजार में बिकने वाली अनेक विरेचक औषधियों में यह रहता है। घीकुआर के रस का भी सैन्धव एवं हरिद्रा के साथ विबन्ध, गुल्म, पांडु, पाचनविकार तथा यकृत् प्लीहा रोगों में उपयोग करते हैं। (२) स्त्रियों के विकार जैसे अनार्तव, पांडु, विबंध में इसको देने से लाभ होता है। (३) इसके स्वरस का बाह्य लेप स्तनशोथ, नेत्राभिष्यन्द, चर्मविकार, अर्श एवं व्रण में हरिद्रा के साथ करने से शोथ एवं दाह कम होता है। सूत्रकृमि में एलुवा की बस्ति देते हैं। मात्रा—स्वरस १-२ तोला; एलुवा १-२ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
५८६ भावप्रकाशनिघण्टुः पुनर्नवा पुनर्नवा के दो भेद-रक्त एवं श्वेत, निघण्टुओं में मिलते हैं। रा० नि० में एक नील भेद भी लिखा है, जो दिखलाई नहीं देता। दो भिन्न वर्गों की दो वनस्पतियाँ Boerhaavia diffusa (बोएहॅविया डिफ्यूजा) एवं Trianthema portulacastrum (ट्राएन्थेमा पोर्चुलेकॅस्ट्रम्-पथरी) का उपयोग पुनर्नवा के नाम से हो रहा है। इनमें से प्रथम को अधिकांश विद्वानों ने रक्तपुनर्नवा माना है जो उचित नहीं है। वास्तव में प्रथम में ही रक्तपुष्प एवं श्वेतपुष्प के भेद से दो भेद पाये जाते हैं तथा द्वितीय में भी श्वेतपुष्प एवं रक्तपुष्प भेद देखे जाते हैं। ऐसी स्थिति में केवल बोएहॅविया को रक्त पुनर्नवा एवं ट्राएन्थिमा (पथरी) को श्वेतपुनर्नवा मानना उचित नहीं है। रा० नि० में पुनर्नवा के भेदों के अतिरिक्त वर्षाभू एवं वसुक¹ नामों से दो अलग वनस्पतियों का उल्लेख किया गया है। पुनर्नवा के पर्यायों में क्षुद्रवर्षाभू यह पर्याय आया हुआ है। श्री ठा० बलवन्त सिंह जी पुनर्नवा और वर्षाभू दो भिन्न वनस्पतियाँ मानते हैं न कि पर्याय। इस सम्बन्ध में 'बिहार की वनस्पतियाँ' नामक पुस्तक में वे लिखते हैं— 'मेरे मत से पुनर्नवा और वर्षाभू दो सर्वथा भिन्न वनस्पतियाँ हैं परन्तु दोनों के रूप और गुणों में बहुत कुछ साम्य होने से निघण्टुकारों ने दोनों में बहुत गड़बड़ कर दिया है। अनेक स्थान के वैद्य आज भी इसे ही (ट्राएन्थिमा) पुनर्नवा और कुछ इसे केवल श्वेतपुनर्नवा मानते हैं। स्मरण रखना चाहिये कि श्वेत और रक्त भेद पुनर्नवा और वर्षाभू दोनों में ही होते हैं। अतः रक्तपुनर्नवा और श्वेतपुनर्नवा (बोएहॅविया) जातियों को और रक्तवर्षाभू तथा श्वेतवर्षाभू (ट्राएन्थेमा- पथरी) की जातियों को कहना चाहिये। वर्षाभू की ही किसी जाति को वसुक-मानाना चाहिये।' उपर्युक्त स्पष्टीकरण के आधार पर The Wealth of India (Raw Materials) Vol I नामक पुस्तक में उल्लिखित श्री चक्रवर्ती का यह मत कि B. diffusa को रक्तपुनर्नवा एवं T. portulacastrum को श्वेत पुनर्नवा मानना चाहिये उचित नहीं मालूम पड़ता। दोनों वनस्पतियों में गुणों में कुछ समता पाई जाती है जिस कारण संभव है निघण्टुकारों ने दोनों नामों को पर्याय में दिया हो। निघण्टुकारों ने वर्ण के आधार पर श्वेत एवं रक्त के गुण अलग लिखे हैं या इन दो उपयुक्त भेदों के अलग-अलग गुण दिये हैं यह कहना कठिन है। वर्षाभू (पथरी) केवल बरसात में लगती है तथा शीतकाल तक सूख जाती है। इसी कारण इसे वर्षाभू कहा गया है। पुनर्नवा यद्यपि वर्षाकाल में अधिक होती है तथापि अन्य ऋतुओं में भी मिलती है। यहाँ पर दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। अथ श्वेतपुनर्नवा । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पुनर्नवा श्वेतमूला शोथघ्नी दीर्घपत्रिका। कटु कषायानुरसा पाण्डुघ्नी दीपनी परा। शोफानिलगरश्लेष्महरी ब्रध्नोदरप्रणुत् ।।२३१।। सफेद पुनर्नवा के नाम और गुण—पुनर्नवा, श्वेतमूला, शोथघ्नी और दीर्घपत्रिका इतने नाम सफेद पुनर्नवा के हैं। सफेद पुनर्नवा—कटु तथा कषाय रसयुक्त, पाण्डुरोगनाशक, अत्यन्त अग्निदीपक एवं शोथ, वायु, विष, कफ, ब्रध्न और उदररोग को दूर करने वाली होती है। [२३१] अथ रक्तपुष्पा पुनर्नवा । तस्या नामगुणानाह पुनर्नवाऽपरा रक्ता रक्तपुष्पा शिलाटिका। शोथघ्नी क्षुद्रवर्षाभूर्वर्षकेतुः कठिल्लकः ।।२३२।। पुनर्नवाऽरुणा तिक्ता कटुपाका हिमा लघुः। वातला ग्राहिणी श्लेष्मपित्तरक्तविनाशिनी ।।२३३।। लाल पुनर्नवा के नाम व गुण—रक्तपुनर्नवा, रक्तपुष्पा, शिलाटिका, शोथघ्नी, क्षुद्रवर्षाभू, वर्षकेतु और कठिल्लक ये सब हैं। लाल पुनर्नवा—तिक्त रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, शीतल, हलकी, वातकारक, मलसंग्राही एवं कफ, पित्त और रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [२३२-२३३] १. वर्षाभूवसुकौ वर्णकफमान्द्यानिलापहौ। शाके रूक्षतरौ गुल्मप्लीहशूलापहारकौ ।।
गुडूच्यादिवर्गः ५८७ १११. वर्षाभू (पथरी) हिं०-सफेद पुनर्नवा, पथरी, विषखपरा, सुफेद गदपुरना । बं०-साबुनी, म०-वसु । गु०-साटोडी । क०- बिलेगणजलि, मुच्चुकोनि । ते०-गलिजेरू । ता०-शरूर्नै । पं०-विशाकाप्रा । ले०-Trianthema portulacastrum Linn. (ट्राएन्थेमा पोर्टु-लेकॅस्ट्रम्, लिन.) । Fam. Ficoidaceae (फिकाॅइडेसी) । यह भारतवर्ष के सभी भागों में एवं बलूचिस्तान, लंका तथा अन्य उष्ण प्रदेशों में पाई जाती है । इसका क्षुप- प्रसरणशील, मांसल तथा अनेक द्विविभक्त शाखाओं वाला होता है । यह बरसात में उगता है और शीत काल तक सूख जाता है । कोमल अवस्था में पुनर्नवा जैसा दिखलाई देने के कारण कुछ लोग इसे श्वेत पुनर्नवा मानते हैं । पत्तियाँ- मांसल लगभग अभिमुख, किन्तु प्रत्येक जोड़े में एक छोटी तथा दूसरी बड़ी, ऊपर वाली बड़ी १८ से २७ मि० मि० लम्बी, १८-३१ मि० मि० चौड़ी तथा नीचे की ९-१८ मि० मि० लम्बी एवं ६-१८ मि० मि० चौड़ी, चिकनी, अभिलट्वाकार, आयताकार या अंडाकार, प्रायः लाल एवं लहरदार धार वाली होती है । पर्णवृन्त ६-१८ मि० मि० लम्बा, आधार की तरफ फैला हुआ एवं पतला रहता है । पुष्प-एकाकी, विनाल, श्वेत या गुलाबी रंग के फूल द्विविभक्त शाखाओं के बीच से निकलते हैं । नरकेसर संख्या में १०-२० होते हैं । बीजकोश छोटा एवं १-५ काले रंग के वृक्काकार छोटे बीजों से युक्त होता है । जड़-ताजी अवस्था में कुछ मधुराम किन्तु सूखने पर कडुवी एवं हल्लास कारक होती है । इसकी जड़ एवं पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है । रासायनिक संगठन-पुनर्नवा में पाया जाने वाला क्षाराभ पुनर्नवीन (Punarnavine) इसमें भी पाया जाता है जो शुष्क द्रव्य में ०.०१% तक होता है । इसके अतिरिक्त सेपोनिन् (Saponin) एवं एक अन्य क्षाराभ जिसका रासायनिक सूत्र C₃₂ H₄₆ O₆ N₂ है, पाया जाता है । गुण और प्रयोग-इसके पत्र मूत्रल होते हैं तथा इनका उपयोग पुनर्नवा जैसा होता है किन्तु जड़-तीव्ररेचन होती है । गर्भिणी को देने पर आंत्र-प्रक्षोभ के साथ-साथ गर्भाशय पर भी प्रभाव होने से कभी-कभी गर्भपात भी होता है । इसके पत्तों का शाक दीपन वातहर एवं कफघ्न है । (१) जिनमें तीव्र विरेचन की आवश्यकता रहती है उन रोगों में इसके मूल का चूर्ण सोंठ के साथ मिला कर २, ३ बार में थोड़ा-थोड़ा करके देते हैं । यकृतोदर, जीर्ण मलावष्टम्भ एवं तज्जन्य कंडु आदि त्वचा के रोग तथा पांडु में इसे देते हैं । इससे रेचन होकर शोथ कम हो जाता है । इससे श्वास में भी लाभ होता है । (२) गर्भाशय विकार के कारण उत्पन्न आनार्तव में भी इसका प्रयोग करते हैं । मात्रा-१५-६० गुंजा । १२०. पुनर्नवा हिं०-लाल पुनर्नवा, सांठ, गदहपुर्ना । बं०-पुनर्नवा । म०-पुनर्नवा, घेंटुली । गु०-राती साटोडी, वसेडो । क०-सनाडिका । ते०-अटाट मामिडि । पं०-खट्टन । ता०-मुकत्तै । अ०-हन्दकूकी । अं०-Hogweed; Horse purslene (हागवीड, हॉर्स पर्सलेन) । ले०-Boerhaavia diffusa Linn. (बोएहॅविया डिफ़्यूझा लिन.) । Fam. Nyctaginaceae (निक्टॅजिनेसी) । यह भी भारतवर्ष, बलूचिस्तान, लंका तथा अन्य उष्ण प्रदेशों में पाया जाता है । यह रेतीली तथा परती जमीन में अधिक होता है । इसका क्षुप-फैलने वाला, बहुवर्षायु, मृदुरोमश या चिकना होता है । इसके काण्ड ०.६-०.९ मी० लम्बे, प्रायः ललाई लिये हुये कड़े, पतले, गोल एवं पर्वसन्धि पर मोटे होते हैं । क्वचित् केवल हरे काण्ड के क्षुप भी
५८८ भावप्रकाशनिघण्टुः देखने में आते हैं। शाखाएँ कई गज तक फैल जाती है। पत्ते-सनाल, चौड़े, लट्वाकार, प्रत्येक पर्वसन्धि पर छोटे बड़े जोड़े में। बड़े २.५-३.७ से० मी० लम्बे एवं छोटे १२-१७ मि० मि० लम्बे तथा अधर तल पर श्वेताभ चिकने होते हैं। पुष्प-छोटे, गुलाबी या श्वेत लगभग अवृन्त, ४-१० की संख्या में एक लम्बे दण्ड पर आते हैं। पुंकेशर २-३ होते हैं। फल-६ मि० मि० लम्बा, ५ धारीदार, चिपचिपा तथा एक बीज से युक्त होता है। जड़-बड़ी तथा मूलकाकार होती है। भेद-इसके दो भेद और पाये जाते हैं। एक में मूल कन्दसदृश तथा पत्रादि छोटे होते हैं। यह शुष्क भूमि में अधिक होती है। दूसरी लता जाति की होती है। इसे B. repanda, Willd (बो. रिपॅण्डा, वाइल्ड) कहते हैं। यह आरोहणशील या प्रसरणशील होती है। इसमें आमने-सामने के दोनों पत्ते प्रायः कद में समान होते हैं। इसकी जड़ कन्द सदृश मोटी किन्तु भंगुर होती है। चिकित्सा में इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में पुनर्नवीन (Punarnavine) नामक कार्यकारी क्षाराभ की मात्रा शुष्क द्रव्य में ०.०१% तक होती है। मूल में संपूर्ण क्षाराभ की मात्रा ०.०४% होती है। इसके अतिरिक्त इसमें पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate), सल्फेट (Sulphates), क्लोराइड ६.५% एवं स्थिर तैल होता है। बिल्ली में क्षाराभ के शिरान्तर्गत सूचिकाभरण से रक्त का दबाव बढ़ता है तथा मूत्रत्याग अधिक होता है। गुण और प्रयोग-पुनर्नवा मधुर, तिक्त, उष्ण, रूक्ष, स्वेदोपग, वयःस्थापन, विरेचन, दीपन, मूत्रविरेचन एवं नेत्रविकारों में किया जाता है। इसका प्रयोग शोथ, सर्वांगशोथ, उदर, कामला, मूत्राल्पता, पाण्डु, हृद्रोग, श्वास, उरःक्षत, सोजाक, विषविकार एवं नेत्रविकारों में किया जाता है। (१) पुनर्नवा के मूत्रल गुण के कारण अनेक शोथयुक्त विकारों में इसका प्रयोग किया जाता है। नूतन यकृत विकार तथा जीर्ण उदरावरणशोथ के कारण उत्पन्न जलोदर में अन्य मूत्रल औषधियों की अपेक्षा इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। जब वृक्क का कार्य ठीक होता रहता है उस अवस्था में यह अच्छा कार्य करती है। इसमें उपस्थित पोटैशियम् के लवण इसमें के कार्यकारी क्षाराभ के कार्य को बढ़ाते हैं। उन रोगियों में जिनके मूत्र में अल्ब्यूमिन अधिक रहता है उतना अच्छा मूत्रल प्रभाव नहीं पड़ता। यकृत, वृक्क, उदरावरण आदि अवयवों में जब बहुत अधिक अवयवीव विकार हो जाता है तब इससे केवल अस्थायी लाभ होता है। शोथ में इसको पीस कर गरम कर लेप भी करते हैं। (२) हृद्रोग में कास, श्वास, जलोदर एवं पैर की सूजन कम करने के लिये कुटकी, चिरायता एवं सोंठ के साथ इसका प्रयोग करते हैं। हृदय पर इसकी क्रिया कुछ डिजिटैलिस सदृश होती है। (३) कामला में पित्त के निर्हरण के लिये इसका प्रयोग करते हैं। (४) कफयुक्त श्वास में तथा श्वसनिकाशोथ में सोंठ तथा वच के साथ इसको देने से कफ निकलता है। अधिक मात्रा से वमन होकर भी कफ निकल जाता है। (५) इसके शाक का उपयोग शोथ में तथा कुपचन में करते हैं। (६) अभिष्यन्द आदि नेत्र रोगों में इसकी ताजी जड़ मधु में पीस कर आँख में लगाते हैं तथा आंतरिक प्रयोग भी करते हैं। (७) वृश्चिकदंश, सर्पदंश, मूषिकविष आदि में इसका बाह्य एवं आंतरिक प्रयोग लाभदायक माना जाता है। (८) रसायन के लिये इसके मूल के उपयोग का विधान है। मात्रा-मूल-स्वरस ६ मा०-१ तो०; पत्रस्वरस १-२ तो०। वामक-मूल चूर्ण, ५-१० माशा।
गुडूच्यादिवर्गः ५८९ अथ गन्धप्रसारणी (पसरन) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह प्रसारणी राजबला भद्रपर्णी प्रताननी । सरणी सारणी भद्रा बला चापि कटम्भरा ।। २३४ ।। प्रसारणी गुरुर्वृष्या बलसन्धानकृत्सरा । वीर्योष्णा वातहृत्तिक्ता वातरक्तकफापहा ।। २३५ ।। प्रसारणी के नाम तथा गुण-प्रसारणी, राजबला, भद्रपर्णी, प्रताननी, सरणी, सारणी, भद्रा, बला और कटम्भरा इतने नाम 'पसरन' के हैं। प्रसारणी-तिक्तरसयुक्त, गुरु, वृष्य, बलकारी, सन्धानकारक, सारक, उष्णवीर्य एवं वात, वातरक्त और कफ को दूर करने वाली होती है। [२३४-२३५] नोट-गंधप्रसारणी नाम से उत्तर भारत में पंडेरिया फिटोडा (Paederia foetida) का व्यवहार किया जा रहा है। दक्षिण में केरल में प्रसारणी नाम से मेरेमिया ट्राइडेन्टेटा (Mervemia tridentata Hall) का व्यवहार किया जाता है ऐसा 'आयुर्वेदिक फ्लोरामेडिका, कोट्टयम्' नामक पुस्तक में दिया हुआ है। कहीं-कहीं कन्वॉल्व्यूलस् आर्वेन्सिस् (Con volvulus arvensis Linn.) का प्रसारणी नाम से व्यवहार किया जाता है। राजस्थान में (हि०) खींप, (ले०) लेप्टाडेनिया स्पारशियम् वा० (Leptadenia spartium Wt.–Asclepiadaceae) का व्यवहार किया जाता है। इस दृष्टि से शास्त्रीय प्रसारणी का निर्णय अभी नहीं हो सका है। १२१ गन्धप्रसारिणी हिं०-प्रसारणी, प्रसरनी, पसरन, गन्धाली। बं०-गन्ध भादुलिया। म०-प्रसारण, हिरनवेल। गु०-प्रसारणि। ते०-सविरेला। आसाम०-वेडोली सुट्टा। ले०-Paederia foetida Linn. (पैडेरिया फिटीडा लिन.)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी)। मध्य और पूर्व हिमालय में ५००० फीट तक तथा कलकत्ता की तरफ एवं मलाया में उत्पन्न होती है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलने वाली होती है। इसकी डंडियाँ-पतली चिकनी, लम्बी एवं मजबूत होती हैं। नवीन शाखाएँ-कोमल होती हैं। पुरानी लताओं की जड़-१-१।। इञ्च मोटी होती है। पत्ते-अभिमुख (आमने-सामने), आकार में छोटे-बड़े २ से ६ इञ्च तक लम्बे, १-२।। इञ्च चौड़े, अंडाकार-लट्वाकार, आयताकार- लट्वाकार या लम्बे लट्वाकार, नोकीले एवं लम्बे पत्रदण्ड से युक्त होते हैं। दोनों पत्तों के बीच में प्रतिग्रन्थि पर दो- दो संयुक्त पुंखपत्र होते हैं। पुष्प-जामुनी गुलाबी रंग के, नलिकाकार पुष्प-मंजरियों में आते हैं। फल-चिपटा, चिकना, पाँच रेखाओं से युक्त तथा १ बीजयुक्त होता है। बीज-चिकना, चिपटा एवं पतले आवरण से युक्त होता है। इसकी लताओं में एक प्रकार की बुरी गन्ध होती है। जहाँ यह फैली हुई होती है वहाँ इसके निकट जाने पर इसकी बुरी गन्ध जान पड़ती है किन्तु जब इसको मसलते हैं तब बड़ी बुरी गन्ध पैदा होती है। पत्तों को उबाल कर क्वाथ बनाने पर दुर्गन्ध नष्ट हो जाती है। इसकी जड़ एवं पत्रादि का उपयोग किया जाता है। इसको मूल के साथ शरदकाल में उखाड़ कर संग्रह करना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल एवं एक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, तिक्त, सर, गुरु, वृष्य, बल्य एवं वातकफशामक है। मूल की अधिक मात्रा से वमन होता है। (१) आमवात, वातरक्त तथा संधिविकार में इसका बाह्य एवं आभ्यन्तर प्रयोग बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको खिलाते हैं तथा लेप करते हैं। इसके साथ चित्रकमूल एवं त्रिकटु का भी उपयोग लाभदायक है। साथ में पत्तों का शाक भी खिलाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
५९० भावप्रकाशनिघण्टुः (२) वातविकारों में इसके तैल का अभ्यङ्ग एवं आन्तरिक प्रयोग बहुत लाभदायक है। (३) उदरशूल, आनाह एवं विबन्ध में पत्तों का कल्क उष्ण करके खिलाते हैं। मात्रा-स्वरस १-२ तोला; चूर्ण २-४ माशा। अथ कृष्णशारिवा (करिआबांसा) । तस्या नामान्याह कृष्णा तु शारिवा श्यामा गोपी गोपवधूश्च सा ।।२३६।। कृष्णशारिवा (काली अनन्तमूल) के नाम-शारिवा, श्यामा, गोपी और गोपवधू ये नाम कृष्णशारिवा के हैं।[२३६] इयं जम्बूवत्पत्रा सुगन्धा 'कलघण्टिके'ति प्रसिद्धा। गोपी-गोपस्य स्त्री, पुंयोगान् ङीष् ।।२३६।। इसके पत्ते जामुन के पत्तों के समान होते हैं और इसमें सुगन्धि होती है। एवं यह 'कल घण्टिका' के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर 'गोपी' इस पद में 'गोप की स्त्री' इस अर्थ में 'पुंयोगादाख्यायाम्' (४-१-४८) इस सूत्र से पुंयोग होने से 'गोप' शब्द से 'ङीप्' प्रत्यय हुआ है, ऐसा समझना चाहिये।[२३६] अथ श्वेतशारिवा। तस्या नामान्याह धवला शारिवा गोपा गोपकन्या कृशोदरी। स्फोटा श्यामा गोपवल्ली लताऽऽस्फोटा च चन्दना।।२३७।। श्वेतशारिवा के नाम-धवलशारिवा, शारिवा, गोपा, गोपकन्या, कृशोदरी, स्फोटा, श्यामा, गोपवल्ली, लता, आस्फोटा और चन्दना ये नाम श्वेत शारिवा के हैं। [२३७] ❖ इयमपि जम्बूवत्पत्रा दुग्धगर्भा व्रतति । गोपा-गां पातीति गोपा, गोपकन्या। श्यामापदेन कृष्णा श्वेताऽपि शारिवा कथ्यते, शाश्वतेन शारिवामात्रे शारिवापदस्य प्रयुक्तत्वात्। तद्यथा- 'शारिवायां निशि श्यामाश्यामौ च हरितासितौ' इति ।।२३७।। यह भी जामुन के समान पत्तोंवाली तथा दुग्धगर्भा (भीतर जिसके दूध हो ऐसी) लता होती है। यहाँ पर 'गोपा' का 'गायों को पालन करने वाली' अर्थ है। 'आतोऽनुपसर्गे कः (३-२-३) इस सूत्र से कप्रत्यय हुआ बाद को टाप् प्रत्यय होने से 'गोपा' पद सिद्ध हुआ ऐसा समझना चाहिये। और 'श्यामा' पद से काली तथा श्वेत दोनों शारिवा को समझना चाहिये। क्योंकि 'शाश्वत' कोशकार ने 'शारिवा' पद को शारिवा मात्र में (दोनों शारिवा में) प्रयोग किया है 'शारिवायाम्०' इत्यादि से। [२३७] अथ सारिवाद्वयस्य गुणानाह सारिवायुगलं स्वादु स्निग्धं शुक्रकरं गुरु। अग्निमान्द्यारुचिश्वासकासामविषनाशनम् । दोषत्रयातस्रप्रदरज्वरातिसारनाशनम् ।।२३८।। दोनों शारिवा (अनन्तमूल) के गुण-दोनों शारिवा-स्वादिष्ट, स्निग्ध, शुक्र को उत्पन्न करने वाली, गुरु एवं अग्निमान्द्यता, अरुचि, श्वास (दमा), खाँसी, आम, विष, त्रिदोष, रक्तप्रदर, ज्वर और अतिसार को नष्ट करती है। [२३८] नोट-सारिवा के दो भेद श्वेत एवं कृष्ण ये हैं। इसमें से श्वेत सारिवा, अनन्तमूल (कपूरी) है। कृष्णसारिवा के स्थान पर करण्टा एवं दुधलत दो चीजों का व्यवहार किया जाता है। अनन्तमूल (श्वेत सारिवा) कम मिलने के कारण उत्तर प्रदेश के बाजारों में अधिकतर सारिवा के नाम से करण्टा के काण्ड बिकते हैं। जब केवल सारिवा लेने को लिखा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
हो तब अनन्तमूल लेना चाहिये एवं सारिवाद्वय लिखा हो तब अनन्तमूल एवं दुधलत या करण्टा का ग्रहण उचित है । करण्टा की पत्तियाँ कुछ-कुछ जामुन की पत्ती से मिलती-जुलती होने के कारण इसे 'जम्बुपत्रा सारिवा' भी कहते हैं । यहाँ सबका वानस्पतिक वर्णन अलग-अलग किया गया है एवं गुण प्रयोगादि अनन्तमूल के दिये हैं । १२२. कृष्णसारिवा, दुधलत सं०-कृष्णसारिवा । हिं०-कालीसर, काली अनन्तमूल, दुधलत । बं०-कृष्ण, अनन्तमूल, श्यामालता । म०-श्यामलता । क०-करीउंबु । ते०-नलतिग । ले०-Ichnocarpus fruitescens R. Br. (इक्नोकार्पस् फ्रूटेसेन्स) । Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी) । यह हिमालय प्रान्त के नेपाल, गंगा नदी के आस-पास, बंगाल, आसाम, सिलहट, चटगाँव और दक्षिण आदि प्रायः सभी प्रान्तों में उत्पन्न होती है । यह लता जाति की वनौषधि छोटे वृक्षों या गुल्मों पर चढ़ जाती है और सदा हरी- भरी रहती है । शाखाएँ-प्रायः मुरचई रंग की होती हैं । पत्ते-अंडाकार या चौड़ाई लिए हुए आयताकार, तीक्ष्णाग्र या कुछ-कुछ लम्बाग्र, चिकने, २-३ इञ्च लम्बे तथा ३/८ से १ १/२ इञ्च चौड़े एवं १/४ इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । पुष्प-१-३ इञ्च लम्बी पुष्पमञ्जरियाँ पत्रकोण या शाखाग्र से निकलती रहती हैं जिनमें छोटे-छोटे श्वेत सुगन्धित पुष्प रहते हैं । आभ्यन्तर दलों के खण्ड रोमश एवं मरोड़े हुए रहते हैं । फलियाँ-लम्बी एवं दो-दो एक साथ रहती हैं । बीज- नालीदार एवं रोमगुच्छ से युक्त होते हैं । इसकी जड़ अनन्तमूल जैसी ही दिखलाई देती है । इस पर की छाल कृष्णाभ भूरे रंग की एवं काष्ठ से चिपकी रहती है । काष्ठ भाग अनन्तमूल की अपेक्षा अधिक कड़ा रहता है । क्वचित् यह फटी हुई रहती है । इसमें अनन्तमूल जैसी गन्ध नहीं रहती । गुण और प्रयोग-इसमें गुणधर्म अनन्तमूल जैसे ही हैं । सारिवाद्वय कहने पर इसका (कृष्ण) एवं अनन्तमूल (श्वेत) का ग्रहण करते हैं । ज्वर में पत्रयुक्त काण्ड का क्वाथ देते हैं । कृष्ण सारिवा नाम से या अनन्तमूल के स्थान पर कहीं-कहीं निम्नलिखित लता का व्यवहार किया जाता है- १२३. कृष्णसारिवा, जम्बुपत्राकारिका, करण्टा ले०-Cryptolepis buchanani Roem. & Schult. (क्रिप्टोलेपिस् बुचनेनी रो. शु.) । Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) । इसकी लता भारतवर्ष के सभी भागों में होती है । यह बहुत फैलने वाली एवं काष्ठीय होती है । पत्ते-चिकने, आयताकार, अंडाकार, जामुन के पत्र-सदृश क्षोम लिप्त रहते हैं । पत्रसिराएँ पत्रतट के पहले ही परस्पर मिली हुई रहती हैं । पुष्प-पाण्डुरपीत और फलियाँ-दो-दो एक साथ रहती हैं । काण्डत्वक्-रक्ताभ कृष्ण एवं पतले परतों में छूटने वाली होती है । इस लता से अत्यधिक दूध निकलता है । इसके मूल में कोई गन्ध नहीं होती । १२४. श्वेतसारिवा, अनन्तमूल, कपूरी हिं०-अनन्तमूल, कपूरी, सालसा । बं०-अनन्तमूल । म०-उपलसर, उपलसरी । गु०-उपलससरी, कागड़ियों कुंडेर, कपूरी मधुरी । ते०-पालसुगन्धी । ता०-नन्नारी । क०-नमडबेरू । अं०-Indian Sarsaparilla (इण्डियन् सारसापरिला) । ले०-Hemidesmus indicus R. Br. (हेमीडेस्मस् इण्डिकस्) । Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) । यह इस देश के सब प्रान्तों में विशेषतः बिहार, बंगाल, सुन्दरबन, पिश्चमी घाट, मध्य प्रदेश, दक्षिण एवं लंका में पाई जाती है । इसकी लता-बहुवर्षायु, पतली, फैलने वाली या लपेट कर चढ़ने वाली गुल्मजातीय होती है ।
५९२ भावप्रकाशनिघण्टुः मूलस्तम्भ-काष्ठमय होता है। काण्ड-पतला, गोल, चिकना या सूक्ष्म रोमयुक्त, लम्बाई में सूक्ष्म धारियों से युक्त एवं पर्व पर मोटा होता है। पत्र-विपरीत परन्तु प्रायः दूर-दूर, विभिन्न आकार के दीर्घवृत्त आयताकार से लेकर रेखाकार भालाकार, २-४ इञ्च लम्बे तथा विभिन्न चौड़ाई के (.३-१.५ इञ्च), ऊपर से चिकने, गहरे हरे रंग के एवं सफेद चिह्नों से युक्त, नीचे से हलके रंग के या कभी-कभी श्वेत मृदुरोमश, नोकीले किन्तु चौड़े, पत्र के अग्र कुण्ठित, जालिका विन्यास युक्त एवं ३-४ मि० मि० लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-छोटे, बाहर से हरिताभ किन्तु भीतर बैंगनी रंग के पत्र कोणीय गुच्छों में आते हैं। फली-४-६ इञ्च लम्बी, पतली, गोल, दो-दो एक साथ परन्तु अपसारी, अग्र की ओर क्रमशः संकुचित, सीधी या कुछ टेढ़ी-मेढ़ी, सूक्ष्म धारीदार तथा चिकनी होती है। बीज-६-८ मि० मि० लम्बे, अंडाकार, आयताकार, चिपटे, काले रंग के एवं श्वेत रोमगुच्छ से युक्त होते हैं। मूल-इसके मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। यह करीब १२ इञ्च लम्बा, ३-६ मि० मि० मोटा, गोल, कठोर, मुड़ा हुआ कुछ पतले उपमूलों से युक्त, बाहर से गहरे बादामी रंग का तथा कभी-कभी कुछ भूरे रंग का होता है। मध्य भाग पीत एवं काष्ठमय रहता है जिसके चारों ओर का भाग श्वेत रहता है। इसकी छाल भूरे रंग की, कार्क युक्त, चौड़ाई में फटी हुई एवं लम्बाई में धारीदार एवं आसानी से मध्य भाग से अलग की जा सकती है। इसमें कुछ कपूर जैसी मधुर गन्ध आती है तथा इसका स्वाद कुछ कडुवा, तिक्त किन्तु रोचक होता है। इसके स्थान पर करण्टा के काण्ड भी बिकते हैं जिसमें गन्ध नहीं होती। पुरानी गन्धहीन हो जाने पर इसका व्यवहार नहीं करना चाहिये। इसमें उड़नशील गन्धयुक्त कार्यकारी तत्त्व होने के कारण इसका क्वाथ न बनाकर फांट बना व्यवहार करना चाहिये। यह तत्त्व विशेषतया इसकी छाल में रहता है इसलिये पतली-पतली जड़ या जड़ की छाल का उपयोग करना चाहिये। रासायनिक संगठन-इसकी ताजी जड़ में ०.२२५% एक उड़नशील तैल होता है जिसका ८०% भाग एक काउमॅरिन (Coumarin) सदृश गन्धयुक्त रवेदार पदार्थ (2-Hydroxy-4-Methoxy benzaldehyde) से युक्त होता है। इसके अतिरिक्त दो स्टेराल् (Sterol-Hemidesterol, Hemidesmol), राल, कषाय द्रव्य, शर्करा, कुछ ठोस पदार्थ एवं कुछ ग्लाइकोसाइड (Glycoside) ये पदार्थ इसमें पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-अनन्तमूल, मूत्रविरेचन, मूत्रविरजन, स्वेदजनन, अग्निवर्धक, त्वग्दोषहर, रक्तशोधक, वर्ण्य, जीवनविनिमय क्रिया के लिए उत्तेजक, रसायन, बल्य, दाहप्रशमन, पुरीषसंग्रहणीय एवं स्तन्यशोधन है। इसका प्रयोग ज्वर, कुष्ठ, कण्डू आदि चर्म रोग, फिरंग, जीर्ण आमवात, प्रदर, अग्निमांद्य, अरुचि, अतिसार, प्रमेह एवं श्वास-कासादि में किया जाता है। इसके फांट से मूत्र की मात्रा दुगनी या चौगुनी बढ़ती है तथापि इससे वृक्क की कोई हानि नहीं होती। इसका स्वेदजनन कार्य साधारण है इसलिये साथ में अन्य ज्वरघ्न ओषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसमें जीवन- विनिमय क्रिया को उत्तेजित करने वाला धर्म बहुत महत्त्व का है। इसके साथ गुडूची एवं सुगन्धित द्रव्य मिलाकर प्रयोग करने से अधिक लाभ होता है। (१) वृक्कशोथ जिसमें मूत्र की मात्रा कम हो, मूत्र गाढ़ा एवं लाल रंग का हो तब इसका फांट गुडुच एवं जीरे के साथ देने से मूत्रमार्ग का शोथ तथा दाह कम होता है। (२) फिरंग की द्वितीयावस्था तथा अन्य चर्म रोगों में इसको गुडुच के साथ देने से अच्छा लाभ होता है। (३) बच्चों की दुर्बलता तथा पाण्डु आदि में वायविडंग के साथ इसको देने से बहुत लाभ होता है। (४) प्रदर में इससे अच्छा लाभ होता है। उपदंश या सोजाक से गर्भस्राव होता हो तो इसका प्रारम्भ से ही उपयोग करते हैं। इससे बच्चा गौर वर्ण का होता है। (५) व्रण पर इसकी मूल का लेप करते हैं। नेत्राभिष्यंद में इसका दुग्ध डालते हैं। मात्रा-फांट ५-१० तोला; कल्क ३-६ माशा।
गुडूच्यादिवर्गः ५९३ अथ भृङ्गराज (भाँगरा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह भृङ्गराजो भृङ्गरजो मार्कवो भृङ्ग एव च । अङ्गारकः केशराजो भृङ्गारः केशरञ्जनः ।।२३९।। भृङ्गारः कटुकस्तीक्ष्णो रूक्षोष्णः कफवातनुत् ।।२४०।। कश्यस्त्वच्यः कृमिश्वसकासशोथामपाण्डुनुत् । दन्त्यो रसायनो बल्यः कुष्ठनेत्रशिरोऽर्त्तिनुत् ।।२४१।। भाङ्गरा के नाम तथा गुण-भाङ्गरा के संस्कृत नाम-भृङ्गराज, भृङ्गरज, मार्कव, भृङ्ग, अङ्गारक, केशराज, भृङ्गार और केशरञ्जन ये सब हैं। भांगरा-कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण, रूक्ष, गरम, कफ-वातनाशक, केशों के लिये हितकर, त्वचा को साफ करने वाला, दाँतों के लिये हितकर, रसायन, बलकारक एवं कृमि, श्वास, कास, शोथ, आम, पाण्डुरोग, कुष्ठ, नेत्ररोग तथा शिरोरोग को दूर करता है। [२३९-२४१] नोट-अन्य निघंटुओं में इसके श्वेत, पीत एवं कृष्ण (नील) इन तीन भेदों का वर्णन है। कृष्ण भृङ्गराज क्या है, इसका निर्णय नहीं हुआ है। श्वेत पुष्प का भृङ्गराज सर्वत्र पाया जाता है जिसे Eclipta alba (एक्लिप्टा एल्बा) कहते हैं। पीत पुष्प का भृङ्गराज बंगाल, आसाम, कोंकण तथा मद्रास के समतल भागों में होता है जिसे Wedelia calendulacea (वेडेलिआ कैलेण्डुलेसिया) कहते हैं। दोनों एक ही वर्ग के हैं तथा गुणों की दृष्टि से दोनों में विशेष अन्तर नहीं है इसलिये दोनों के गुण तथा प्रयोग एक साथ ही दिये हैं। १२५. भाङ्गरा हिं०-भाङ्गरा, भङ्गरा, भंगरैया । बं०-भीमराज, केसुरिया, केसरी । म०-माका । गु०-भांगरो । क०-गर्ग । ते०-गुंटकल, लगरा । ता०-करीशलकन्त्री । फा०-जमर्दिर । अ०-कर्दामुलबिंत । ले०-Eclipta alba Hassk. (एक्लिप्टा एल्वा हास्क.)। Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । श्वेत भांगरा-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में आर्द्र स्थानों में उत्पन्न होता है। पहाड़ों पर यह ६००० फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसका क्षुप-प्रसर की तरह भूमि पर फैला हुआ रहता है। शाखायें अनेक, भूमि से उठी हुई, खुरखुरी और ग्रन्थियों पर प्रायः मूलयुक्त रहती हैं। पत्ते-छोटे-बड़े विविध आकार वाले दो इञ्च तक लम्बे, चौथाई इञ्च चौड़े, अंडाकार या आयताकार, नोकीले और विपरीत रहते हैं। पुष्प-छोटे वृन्त से युक्त एवं छोटे-छोटे मुण्डकों में आते हैं जिनमें प्रान्तीय पुष्प स्त्रीलिंग और जिह्वाकार एवं केन्द्रीय पुष्प घंटिकाकार होते हैं। पीले फूल का भाङ्गरा-आसाम, बंगाल, कोंकण तथा मद्रास आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसको लेटिन् में Wedelia calendulacea Less. (वेडेलिआ कॅलेण्डुलेसिया लेस्) कहते हैं। इसका प्रसर १८ इञ्च तक बड़ा होता है। इसके काण्ड जमीन के नीचे प्रायः १-२ फीट लम्बाई में फैले रहते हैं जिनसे स्वावलम्बी शाखायें ऊपर की ओर निकली रहती हैं। पत्ते-आयताकार प्रासवत्, २-३ इञ्च लम्बे, लगभग अखण्ड या दन्तुर होते हैं। अधः पत्रावली के पत्र लगभग दो चक्रों में और बाहर के ३-५ पत्र बड़े एवं पर्णाकार होते हैं। पुष्पों के मुण्डक पीले होते हैं जिसमें प्रान्तीय जिह्वाकार पुष्प संख्या में लगभग आठ होते हैं। भृङ्गराज के स्वरस एवं पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। इसको उबालने से इसका गुण नष्ट होता है इसलिये इसके स्वरस का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-श्वेत भृङ्गराज में अधिक मात्रा में राल तथा एक्लिप्टाइन (Ecliptine) एवं निकोटीन (Nicotine) नामक क्षाराभ पाये जाते हैं। ४१ भाव.I
५९४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-भृङ्गराज तिक्त, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, रसायन, कफ वातहर, चक्षुष्य, त्वग्दोषहर, केश्य एवं वर्ण्य है । इसका प्रयोग कुपचन, यकृत्विकार, पाण्डु, कास, श्वास, कुष्ठ, चर्म रोग एवं पलित में करते हैं। इसकी अधिक मात्रा से वमन होता है । (१) यकृत पर इसकी विशेष क्रिया होती है जिससे पाचन सुधर कर शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होती हैं। यकृत दोष के कारण उत्पन्न यकृत् वृद्धि, प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श, उदर, शिरःशूल, त्वचा के रोग, चक्कर आदि में इससे लाभ होता है। (२) जीर्ण चर्मरोग जैसे कुष्ठ, कण्डू, व्रण, पलित, इन्द्रलुप्त तथा वृश्चिक-दंशपर इसका लेप करते हैं तथा पिलाते हैं। बाल काला करने के लिये तथा बढ़ाने के लिये इसका रस काशीश के साथ लेप करते हैं। अग्निदग्ध व्रण पर मरवा, मेंहदी तथा इसकी पत्ती का लेप करने से जलन दूर होती है तथा व्रण का दाग भी नहीं रहता । इससे सिद्ध तैल का नस्य, केश्य रूप में प्रयोग किया जाता है जिससे शिरःशूल दृष्टिमान्द्य एवं पालित्य आदि में लाभ होता है। (३) रसायन के लिये विशेष कर नील भृङ्गराज के सेवन का विधान है। एक महीने तक इसके स्वरस-पान के साथ दुग्धाहार पर रहने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा शतायु होता है। (४) छोटे बच्चों की खाँसी में इसका १-२ बूँद स्वरस मधु के साथ देते हैं, जिससे गले की घरघराहट भी कम होती है। (५) इसके बीज वाजीकर होते हैं । मात्रा-स्वरस ½-१ तोला; बीज १-३ माशा । अथ शणपुष्पी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह शणपुष्पी स्मृता घण्टा शणपुष्पसमाकृतिः । शणपुष्पी कटुस्तिक्ता वामिनी कफपित्तजित् ।। २४२ ।। शणपुष्पी के नाम तथा गुण-शणपुष्पी, घण्टा तथा शणपुष्पसमाकृति (शणपुष्प के समान आकृति वाली) ये नाम 'शणपुष्पी' के हैं। शणपुष्पी—यह कटु तथा तिक्तरसयुक्त, वमन कराने वाली एवं कफ-पित्तनाशक होती है। [२४२] १२६. शणपुष्पी हिं०-शनपुष्पी, सुनक, सनई, ब्रनसन, पटसन, झुनझुनिया । बं०-वनशण । म०-घागरी, तिरत, खुलखुल । गु०-घुघणे । क०-गिजि गिल । ते०-घेलेपेरिंटा । ता०-वेल्लैनिकलुकिलुप्यै । ले०-Crotalaria verrucosa Linn. (क्रोटेलिरिया वेरुँकोसा लिन.) । Fam. Leguminoceae (लेगुमिनोसी) । शणपुष्पी—प्रायः भारत के गरम प्रान्तों में उत्पन्न होती है और सिलोन में भी पाई जाती है। इसका क्षुप-सीधा, अनेक शाखाओं से युक्त एवं ३-४ फीट ऊँचा होता है। शाखाएँ चार धारीयुक्त होती हैं। पत्ते-चौड़ाई लिये तिर्यगायताकार, १-२ इञ्च बड़े क्वचित् इससे भी बड़े, गोलदन्तुर या कभी-कभी अल्प खण्डित लहरदार, मृदुरोमश एवं छोटे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-पर्ण विपरीत या अग्र्य, ३-७ पुष्प युक्त मंजरियों में, १.५- ३" बड़े नील या पीताभ आते हैं। फली-अल्पवृन्त युक्त, १ इञ्च लम्बी एवं १२ या अधिक बीजों से युक्त होती है। इसके पत्तों का चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त, पित्तनाशक, कफघ्न एवं स्नेहन है। पत्तों का लेप शीतल एवं त्वग्दोषहर है। त्वचा के विकारों में इनका बाह्याभ्यंतर प्रयोग करते हैं। पत्तों के स्वरस से लालास्राव कम होता है।
गुडूच्यादिवर्गः ५९५ अथ त्रायमाणा । तस्या नामानि गुणांश्चाह बलभद्रा त्रायमाणा त्रायन्ती गिरिजाऽनुजा । त्रायन्ती तुवरा तिक्ता सरा पित्तकफापहा । ज्वरहृद्रोगगुल्मार्शोभ्रमशूलविषप्रणुत् ।।२४३।। त्रायमाणा के नाम तथा गुण-बलभद्रा, त्रायमाणा, त्रायन्ती, गिरिजा तथा अनुजा ये नाम 'त्रायमाण' के हैं । त्रायमाणा-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, सारक, पित्त कफनाशक एवम् ज्वर, हृद्रोग, गुल्म, अर्श, भ्रम, शूल और विष को दूर करने वाली होती है । [२४३] नोट-त्रायमाण एक संदिग्ध द्रव्य हो गया है । विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न द्रव्यों का त्रायमाण नाम से उल्लेख किया है किन्तु आजकल अधिकांश विद्वान् जेन्शियाना कुर्रों (Gentiana kurroo Royle) को त्रायमाण मानते हैं । इसका वर्णन पहले कुटकी के वर्णन के पश्चात् किया जा चुका है (पृष्ठ-७१) क्योंकि कुटकी में प्रायः इसकी मिलावट रहती है । जिन गुणों के लिये आचार्यों ने त्रायमाण का प्रयोग किया है वे इसमें मिलते हैं तथा इसका प्रादेशिक पर्वतीय नाम त्रायमाण भी कहीं-कहीं मिलता है । तिक्त, सारक आदि गुण तथा ज्वर, गुल्म आदि में लाभ करने के कारण एवं पर्वतीय स्थानों में होने वाले (गिरिजा) इस अत्यन्त उपयोगी द्रव्य की त्रायमाणा होने की अधिक संभावना है । चरक में तिक्त स्कंध में (वि० अ० ८), रक्तपित्त के लिये (चि० अ० ४), ज्वर में (चि० अ० ३), गुल्म की चिकित्सा में (चि० अ० ५), पैत्तिक अतिसार में (चि० अ० १०) एवं विसर्प में (चि० अ० ११) तथा सुश्रुत में लाक्षादिगण (सू० अ० ३८) में इसका उल्लेख है । इसके संबंध में अन्य मतों का संक्षेप में उल्लेख अप्रासंगिक न होगा । (१) श्री डा० वा० ग० देसाई ने ओषधि-संग्रह नामक ग्रन्थ में त्रायमाण नाम से डेल्फिनिअम् झलिल् (Delphinium zalil) का वर्णन किया है जिसका पंचांग ईरान से आता है । इसका पंजाबी नाम उन्होंने 'गाफिज़', ईरानी नाम झलिल् अद्फ्रक् (अस्परग) दिया है । मुहीते आजम नामक ग्रंथ में गाफिस का संस्कृत नाम त्रायमाण दिया है । इसी पुस्तक में डॉ० देसाई ने 'घाफिथ्', गाफिस् नाम से ईरान में होने वाला जेन्शियाना का भेद जेन्शियाना डेहुरिका (Gentiana dehurica) का उल्लेख किया है । इससे मालूम होता है कि ईरान से आनेवाले इन दोनों द्रव्यों को गाफिस् के नाम से प्रयोग करते हैं । (२) श्री यादवजी ने 'द्रव्यगुणविज्ञान' में श्री वैद्यराज विद्याधर जी विद्यालंकार, पो० सोलन, जि० शिमला के मत का उल्लेख करते हुए एक वनस्पति का वर्णन किया है, किन्तु उसके लेटिन नाम को नहीं लिखा है । श्री प्रियव्रतजी शर्मा ने 'द्रव्यगुणविज्ञान' में त्रायमाणानाम से जेन्शियाना कुर्रों का वर्णन किया है जो उपर्युक्त श्री यादवजी की पुस्तक में वर्णित वनस्पति से मिलता है । इससे ऐसा मालूम होता है कि श्री यादव जी की पुस्तक में की वनस्पति जेन्शियाना कुर्रों ही है किन्तु इन्होंने इसमें श्री देसाई के जिस नव्यमत का उल्लेख किया है वह श्री देसाई ने अपनी पुस्तक में डेल्फिनिअम् के अन्तर्गत किया है न कि जेन्शियाना के वर्णन में । (३) श्री ठाकुर दलजीत सिंहजी 'यूनानी द्रव्यगुणविज्ञान' में गाफिस नाम से जे० डेहुरिका का वर्णन करते हैं जिसका भारतीय भेद जे० कुर्रों मानते हैं । इसका स्थानीय नाम त्रायमाण होने का उल्लेख है । (४) कुछ वंगीय वैद्य, त्रायमाण नाम से शुष्क उदुम्बर जातीय अन्यफल 'बलाडूमूर', 'भुईडूमूर' Ficus heterophylla (फिकस् हेटेरोफाइला) या उसके भेद का प्रयोग करते हैं जिसमें सारक गुण न होकर कुछ स्तंभन गुण ही होता है । (५) कुछ लोग बनफसा को, कुछ पियारांगा या कहीं-कहीं ममीरी नाम से भी बिकने वाली थैलिक्ट्रम् फोलियोलोसम् (Thalictrum foliolosum) की जड़ को त्रायमाणा मानते हैं । ममीरी का नेत्र रोगों में अधिक उपयोग होता है किन्तु त्रायमाणा के गुणों में उसके नेत्र्य होने के संबंध में कुछ भी उल्लेख नहीं है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu, Digitized by S3 Foundation USA
५९६ भावप्रकाशनिघण्टुः पहले कुटकी के साथ जेन्शियाना कुर्रों का वर्णन (पृष्ठ-७१) किया जा चुका है। यहाँ अन्य द्रव्यों का वर्णन किया जा रहा है। १२७. त्रायमाण (१) ले०-Delphinium Zalil Aitch. & Hemsl (डेल्फिनिअम् जलील ऐ., हे.) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी) । हिं०-असव्र् । बं०-गुड़जलील । पं०-असवर्ग, गाफिस् । इरा०-झलिल् असफ्रक् । अ०- झरिर । अफगानिस्तान, फारस आदि देशों में यह होता है। इसका क्षुप-बहुवर्षायु होता है। पत्र-छोटे तथा पीताभ होते हैं। पुष्प-चमकीले, पीले रंग के मृदुरोमश तथा उनके नीचे कोमल काँटे रहते हैं। फल-छोटे, शिराओं से युक्त, नोकदार, डंठलदार एवं तीन कोष्ठयुक्त होता है। बीज-कोणयुक्त, हल्के भूरे या कपिल रंग के होते हैं। जड़-लम्बी होती है। इसके पुष्पयुक्त पंचांग का आयात होता है जो वस्त्र रँगने के काम आता है। यह हल्के हरिताभ पीले रंग का एवं ताजी अवस्था में मधु जैसा सुगंधित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें आइसोहॅम्नेटिन् (Isorhamnetin, C₁₆ H₁₂ O₇), क्वेर्सेंटिन् (Quercetin) तथा संभवतः केम्फेरोल (Kaempferol) नामक तत्त्व पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह तिक्त, पौष्टिक, मूत्रजनन, कोष्ठवातप्रशमन, आनुलोमिक, दीपन, वेदनाहर एवं अपक्षालक (Detergent) है। इससे पित्तस्राव होता है, जिससे पाचन उत्तेजित होता है। भूख लगती है तथा शौच साफ होता है। इसका क्वाथ बनाकर दिया जाता है। अधिक मात्रा से हानि होती है। इसका प्रयोग कुपचन, आध्मान, अग्निमांद्य, उदरशूल, अर्श, कामला, प्लीहावृद्धि, शोथ, सभी प्रकार के उदर, जीर्णज्वर एवं पित्तज्वर में किया जाता है। पित्तज्वर में इसका अधिक उपयोग करते हैं। इसकी राख नींबू के रस के साथ मिलाकर या घृत के साथ खुजली आदि त्वचा के रोगों में लगाई जाती है। जव के आटे के साथ इसके पञ्चांग का चूर्ण पकाकर उसकी लुगदी सूजन या फोड़े पर बाँधते हैं। मात्रा-१/८-१/४ तो० क्वाथ बनाकर। १२८. त्रायमाण (२) ले०-Thalictrum foliolosum DC. (थॅलिक्ट्रम् फोलिओलोसम् डीसी.) । Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी) । हिं०-ममीरा, पीली जड़ी, शुद्रक, चवन्नीगाछ । बं०-गुरवियानि । वंब०-ममीरी, पीआरंग । अ०- ममीरा चीनी । त्रायमाण सदृश कुछ गुण इसमें मिलने के कारण इसको कुछ लोग त्रायमाण मानते हैं। यह नेत्र्य होने के कारण वास्तविक ममीरी Coptis teeta Wall (कॉप्टिस् टीटा वाल) का प्रतिनिधि भी इसे मानते हैं। पिआरंग नाम से बजार में बिकनेवाला द्रव्य इसी की जड़ है, ऐसा मानते हैं, किन्तु इसमें सन्देह है। यह हिमालय में सर्वत्र ५००० से ८००० फीट तक एवं खासिआ पहाड़ों पर ४००० से ६००० फीट की ऊँचाई तक होता है। इसका क्षुप-३-४ फीट ऊँचा, बहुवर्षायु तथा दृढ़ होता है। पत्ते-पक्षाकार संयुक्त एवं पत्राधार कोषमय होता है। पत्रक-४-६ मि० मि०, बड़ी चवन्नी की तरह गोलाई लिये हुए तथा धार पर प्रायः गोल दन्तुर होते हैं। पुष्प- श्वेत या हलके हरे रंग के गुच्छे में आते हैं। फल-छोटे, आयताकार, दोनों तरफ नोकीले तथा धारीदार होते हैं। मूलस्तम्भ-गाँठदार, पतले उपमूलों से युक्त एवं तोड़ने पर पीला होता है। इसका स्वाद कडुवा होता है। इसके मूल का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५९७ रासायनिक संगठन—इसमें ८ १/२% बर्बेरीन (Berberine) एवं थॉलिक्ट्राइन् (Thalictrine) नामक तत्त्व होते हैं। मूल में का यह भाग जल में आसानी से घुल जाता है किन्तु मद्यसार में कम घुलता है। गुण और प्रयोग—यह तिक्त-पौष्टिक, विषमज्वरनाशक, सारक एवं मूत्रल है। इसका प्रयोग विषमज्वर, अग्निमांद्य, कुपचन एवं रोगनिवृत्ति के पश्चात् की दुर्बलता में करते हैं। नेत्ररोग में इसको घिसकर पलकों पर लेप करते हैं। मात्रा—२-५ रत्ती। १२९. त्रायमाण (३) ले०—Ficus heterophylla Linn. f. (फिकस् हेटेरोफाइला लिन.); Fam. Moraceae (मोरेंसी)। बं०—भुइझमूर, बालाडुमूर। इसे वंगीय वैद्य त्रायमाण नाम से प्रयोग में लाते हैं। यह भारत के सभी उष्ण स्थानों में होता है। इसका गुल्म— झाड़दार या कभी-कभी जमीन या चट्टानों पर फैला हुआ होता है। शाखाएँ—मृदुरोमश होती हैं। पत्ते—सनाल, आकार में छोटे-बड़े, अंडाकार या कुछ मालाकार खुरदरे एवं कटे किनारेवाले होते हैं। फल—का अग्र भाग मोटा तथा गोलाकार होता है। बीज—गोलाकार होते हैं। गुण और प्रयोग—इसके मूल का रस शूल में देते हैं। इसके पत्तों का रस दूध के साथ अतिसार में दिया जाता है। कास, श्वास में इसके मूल की छाल धनिया के साथ चूर्ण रूप में दी जाती है। अथ मूर्वा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह मूर्वा मधुरसा देवी मोरटा तेजनी स्रुवा। मधुलिका मधुश्रेणी गोकर्णी पीलुपर्ण्यपि ।। २४४ ।। मूर्वा सरा गुरुः स्वादुस्तिक्ता पित्तास्रमेहनुत्। त्रिदोषतृष्णाहृद्रोगकण्डुकुष्ठज्वरापहा ।। २४५ ।। मूर्वा के नाम तथा गुण—मूर्वा, मधुरसा, देवी, मोरटा, तेजनी, स्रुवा, मधुलिका, मधुश्रेणी, गोकर्णी और पीलुपर्णी ये सब नाम मूर्वा के हैं। मूर्वा स्वादिष्ट, तिक्त रसयुक्त, सारक, गुरु एवं तित्तरक्त, प्रमेह, त्रिदोष, तृषा, हृद्रोग, कण्डू (खुजली), कुष्ठ तथा ज्वर को दूर करने वाली होती है। [२४४-२४५] मूर्वा एक संदिग्ध द्रव्य है। अनेक स्थानों पर विभिन्न प्रयोगों में मूर्वा का उल्लेख मिलता है। सुश्रुत के टीकाकार डल्हण के समय ही यह द्रव्य संदिग्ध रहा है ऐसा उनकी टीका से मालूम होता है। क्योंकि उन्होंने उसके परिचय में निम्नलिखित तीन प्रकार के मतों का विभिन्न स्थानों पर वर्णन किया है। (१) मूर्वा चोरस्नायुः, यया पूर्वदेशे गुणान् कुर्वन्ति धनुषाम् (सु० सू० अ० २२); मूर्वा कन्दलीसद्दशः स्वल्पविटपः 'हगौड़' इति लोके। (सु० सू० अ० २९)। (२) मूर्वा धनुर्गुणोपयोग्या 'दुधऊ' इति लोके। (३) अन्ये कोविदारयुग्मपत्रां लताविशेषां मूर्वामाचक्षते। इन वचनों से ऐसा मालूम पड़ता है कि प्रथम एवं द्वितीय मत उन्हें कुछ मान्य थे और तृतीय मत स्वीकार्य नहीं था। इसी प्रकार श्रीकण्ठ (सन् १२००-१२५०) ने 'मूर्वा स्वनामख्याता तदभावे जिललमूलम्' लिखा है जिससे यह अनुभव होता है कि उनके समय में भी यह द्रव्य सन्दिग्ध रहा है। विभिन्न निघण्टुओं के अनुसार मूर्वा मधुर, तिक्त, सर, गुरु, त्रिदोषशामक एवं ज्वर, प्रमेह, हृद्रोग, कुष्ठ, वमन एवं पाण्डु रोग में लाभदायक है। सुश्रुत में आरग्वधादिगण, पटोलादिगण। पित्तसंशमन वर्ग एवं विरेचन विकल्प अध्याय
५९८ भावप्रकाशनिघण्टुः में इसका उल्लेख है। चरक में तृप्तिघ्न, स्तन्यशोधन, दशोमानि में एवं तिक्तस्कन्ध में इसका पाठ है। क्षीरशोधन एवं वमनोपग द्रव्य के रूप में भी इसका उल्लेख है। इसके स्वरूप-वर्णन से ऐसा मालूम होता है कि यह कोई मजबूत रेशेवाली लता विशेष होगी जिसका मौर्वी आदि बनाने में उपयोग किया जाता रहा है। विभिन्न निघण्टुओं ने इसके रूपपरिचयात्मक जो नाम दिये हैं वे सम्भवतः एक ही वनस्पति के लिये नहीं हैं। आज मूर्वा नाम से ली जानेवाली वनस्पतियों में से किसी में एक तो दूसरी में दूसरा नाम सार्थक मालूम पड़ता है। सम्भव है कि प्रत्यक्षतः न देखने के कारण विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रयुक्त सभी नामों को एक साथ पर्याय में लिख दिया गया है। इसी प्रकार मोरटा को कुछ निघण्टुकारों ने इसके पर्याय में लिखा है और कुछ ने मूर्वा-विशेष कहकर दूसरे द्रव्य के रूप में भी उल्लेख किया है। निम्नलिखित द्रव्यों का मूर्वा नाम से प्रयोग हो रहा है- (१) मरुआबेल, चिन्हार-सम्भवतः डल्हण ने इसे ही-धनुर्गुणोपयोग्या 'दुधऊ' इति लोके कहा है। अतिरसा, गोकर्णी, स्रुवा आदि पर्याय इसके लिये उचित मालूम पड़ते हैं। यह क्षीर बहुल लता होती है। रॉक्सवर्ग के मतानुसार वनस्पति सृष्टि में अत्यन्त मजबूत रेशों में इसके काण्डत्वक् के निकाले हुये रेशों की गणना की जानी चाहिये। इसके स्थानिक थारू नाम मारवो या मरुआबेल मूर्वा से मिलते-जुलते मालूम पड़ते हैं। इसमें मूर्वा के गुण भी मिलते हैं। इन्हीं आधारों से श्री ठा० बलवन्तसिंहजी ने इसे मूर्वा माना है। (२) वंगीय मूर्वा-यह डल्हणोक्त प्रथम द्रव्य चोरस्नायु या हगौड़ मालूम पड़ता है। इसे बंगाल के वैद्य मूर्वा मानते हैं। (३) मालझन, मालुआ बेल-सम्भवतः यही डल्हणोक्त कोविदारयुग्मपत्रा वा अन्योक्त पृथक्पर्णी है जिसकी बड़ी विस्तृत लतायें होती हैं तथा पत्ते कचनार जैसे द्विविभक्त होते हैं। (४) मोरबेल, रानजाई-बम्बई के तरफ इसको मूर्वा मानते हैं। इसके लिये त्रिपर्णी नाम सार्थक मालूम पड़ता है। (५) मुरहरी, मोरहरी-चित्रकूट में यह मुरहरी नाम से प्रसिद्ध है। मधुरस', पीलुपर्णी, तेजनी आदि पर्याय इसके लिये उपयुक्त प्रतीत होते हैं। सम्भवतः डल्हण-निर्णीत मोरटा यह हो। (६) मरोडफली-इसके ऐंठे हुये फलों को उत्तर प्रदेश में मूर्वा नाम से लिया जाता है जो वास्तव में 'आवर्तनी' है न कि मूर्वा। संक्षेप में प्रत्येक का स्वतन्त्र वर्णन यहाँ किया जा रहा है। इनमें से चिन्हार की मूर्वा होने की अधिक सम्भावना है। १३०. मूर्वा (१) मिर्जापुर-जरतोर, चिन्हार। थारू-मारवी, मरुआवेल। खर-सिटी, चिटी। संथा-कोंगा, सिटकी। ले०- Marsdenia tenacissima. W. & A. (मार्सडेनिया टेनॅसिस्सिमा)। Fam. Asclepiadaceae (एस्कलेपिएडेसी)। यह दून के खैर के जंगल, हिमालय के नीचे का भाग तथा बिहार में प्रायः शुष्क पर्वतमालाओं एवं झाड़ीदार जंगलों में पाई जाती है। इसकी लता-मोटी, मजबूत काण्ड की, दुग्धयुक्त एवं चक्रारोही होती है। इसका नवीन भाग रोमश एवं काण्डत्वक् धूसर, कार्कयुक्त एवं नालीदार होता है। पत्ते-४-६ इञ्च लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े-स्पर्श में मखमली तलवाले, चौड़ाई लिये हुये लट्वाकार, लम्बाग्र एवं आधार की तरफ फलकमूल यकायक बहुत फटा हुआ हृद्वत् होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ५९९ पत्रनाल- २.५ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-हरित-पीत प्रायः दुर्गन्धयुक्त एवं गुच्छों में आते हैं। फली-४.५-५ इञ्च लम्बी एवं व्यास में १.२-१.४ इञ्च, रोमश और आधार से एक तिहाई दूरी पर सबसे अधिक मोटी होती है। नवीन शाखाओं की त्वचा से सफेद रेशम जैसे रेशे निकलते हैं जिनसे मछली मारने की रस्सी एवं धनुष की डोरी (मौर्वी) बनाई जाती है। यह विषमज्वर में बहुत उपयोगी बतलायी जाती है। इसका मूल तथा काण्ड सफेद निसोध (श्वेत त्रिवृत) के नाम से बाजार में बिकता है। (ठा० बलवन्तसिंह) इसकी एक दूसरी उपजाति M. hamiltonii, Wight (मॉ० हमिल्टोनाई) भी मिलती है जिसे मोरन अडा भी कहीं-कहीं कहते हैं। इसमें पुष्प छोटे और आभ्यन्तर कोश बाहर से सफेद होते हैं। लाखन-नामक एक और इसी वर्ग की बड़ी लता होती है जिसे लकवा में बहुत लाभदायक समझा जाता है। इसका ले० नाम Dregia volubilis Benth. ex Hook. f. (ड्रेगिया हॉल्यूबिलिस्) है। १३१. मूर्वा (२) सं०-चोरस्नायु ? बं०, म०-घणरूप। बं०-गोराचक्र, मूर्वा। उ० प्र०-नागदमन। ले०-Sansevieria roxburghiana Schult. (सॅन्सेवेरिया रॉक्सबर्घियाना शु०); Fam. Haemodoraceae (हिमोडोरेॅसी)। यह कारोमंडल तट पर पाया जाता है। बगीचों में गमलों में यह लगाया हुआ मिलता है। इसमें जमीन के नीचे दिगन्तसम फैला हुआ अन्तर्भूमिशायी काण्ड होता है, जिससे जगह-जगह पत्रगुच्छ ऊपर निकले रहते हैं। पत्ते-खड़े, १२-१८" लम्बे, १-१.३" चौड़े, अधरतल पर उन्नतोदर, बीच में सबसे अधिक चौड़े, दोनों तटों पर श्वेताभ पट्टियों से युक्त होने के कारण चित्रित एवं इनका अग्र तीक्ष्ण, कठोर एवं १ इञ्च लम्बा होता है। पत्तों के बीच से पुष्पध्वज-निकलता है। व्यूह सवृन्त काण्डज, घना १२" × २" बड़ा एवं पुष्प २-३ एक साथ उन्नत स्थानों से निकलते हैं। इससे भी मजबूत रेशे निकलते हैं, जिनका मौर्वी बनाने में उपयोग होता है। पूर्वी भारत, बंगाल एवं उड़ीसा में इसका मूर्वा के नाम से प्रयोग कहीं-कहीं होता है। इसके पत्र एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग होता है। गुण और प्रयोग-पुरानी खाँसी में इसकी जड़ का रस मधु के साथ देते हैं। इसके कोमल पत्तों का रस बच्चों को गले का कफ ढीला होकर निकालने के लिये देते हैं। १३२.-मूर्वा (३) सं०-कोविदार युग्मपत्रा, पृथक्पर्णी। हिं०-मालझनं, माहुल, मालो, महुलाइन। बं०-चेहुर। ते०-अड्डा। था०-महुलन। खर०-महुलान। संथा०-लमकलर, गोमलर। उ०-सियालपत्ता। ले०-Bauhinia vahlii W. & A. (बौहिनिया वाहली)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह हिमालय के निम्न भागों में ३००० फीट तक एवं आसाम, मध्य प्रदेश तथा बिहार में नम एवं छायादार स्थानों में वृक्षों पर फैली हुई पाई जाती है। इसकी लता-बहुत बड़ी तथा आरोहणशील होती है। शाखाओं के अग्र पर प्रायः दो-दो सूत्र रहते हैं। नवीन शाखाओं, पत्रनालों एवं पत्तों के अधः पृष्ठों पर रक्ताभ या मखमली रोमावरण होता है। पत्ते-१ से १ १/२ फीट तक चौड़े, चौड़ाई में कभी-कभी अधिक नहीं तो लम्बाई-चौड़ाई में बराबर, द्विखण्डित, खण्ड गहराई तक कटे हुये एवं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
६०० भावप्रकाशनिघण्टुः
फलकमूल गहरा, हृद्वत् होता है। पुष्प—श्वेत तथा मलाई के रंग के, समस्थ काण्डज व्यूह में आते हैं। फली—कठोर, ६-१२ इञ्च लम्बी, १ १/२-२ इञ्च चौड़ी एवं रोमश होती है। इसके पत्तों के पत्तल आदि बनाये जाते हैं। छाल के रेशों से रस्सियाँ बनाई जाती हैं। इसकी फलियों को आग में चिटका कर बीज निकाले जाते हैं, जिन्हें खाते हैं। देहरादून के व्यापारियों द्वारा इसके मूल मूर्वा—नाम से बेचे जाते हैं। डल्हण ने इसका माल नाम से उल्लेख किया है एवं इसे कोविदार सदृश पर्ण वाला कहा है। डल्हण के समय से ही कुछ लोग इसे मूर्वा नाम से प्रयोग करते रहे हैं। किन्तु वह मत डल्हण को मान्य नहीं था क्योंकि अश्मंतक के परिचय में उसके लिये 'मालुया-सदृशपत्रः' लिखा है न कि 'मूर्वासदृशपत्रः'। इसमें एक गोंद होता है। बाह्यत्वक् में टैनिन की मात्रा १७% एवं काण्ड में ७% होती है। इसका मूल ज्वरघ्न, फल अतिसारघ्न एवं मूल-स्वरस क्षय में पिलाने के लिये लाभदायक माना जाता है। बीज बल्य माने जाते हैं। १३३. मूर्वा (४) हिं०—चरनहार। उ०—गोलरंग। देह०—बेलकंगु, बेलकम्। म०—रानजाई। गु०—मोरबेल। ले०—Clematis gouriana Roxb. (क्लेमॅटिस ग्योरियाना राक्स.)। Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी)। यह पश्चिम हिमालय में ५०००' फीट तक एवं भारत के सभी प्रान्तों में १ से ३ हजार फीट तक होती है। यह लता जाति का एक विस्तृत क्षुप है, जिसकी कई उपजातियाँ इस प्रान्त में पाई जाती हैं। नवीन भाग मृदु रोमश होता है। पत्ते—संयुक्त पक्षवत् होते हैं। पत्रनाल सूत्रसदृश होता है, जिससे ये लताएँ दूसरे वृक्षों पर चढ़ती हैं। पत्रक—अंडाकार, आयताकार, हृद्वत् तीक्ष्णाग्र एवं ऊपर से चमकीले होते हैं। पुष्प—प्रायः श्वेत वर्ण के एवं त्रिविभक्त मञ्जरियों में होते हैं। फल—रोमश एवं पंखवद् पुच्छदार होते हैं। महाराष्ट्र के कुछ लोगों ने इसे मूर्वा माना है, किन्तु इसके किसी भाग से रेशे नहीं निकलते; इसलिये इसे मूर्वा मानना उचित नहीं है। मूर्वा को 'धनुर्गुणोपयोग्या' होना आवश्यक है। रासायनिक संगठन—इसमें एक तिक्त विषैला तत्त्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह संसन, कुष्ठघ्न एवं स्वेदजनन है। इसके पत्ते तथा ताजे काण्ड को पीसकर चर्म पर लगाने से छाले पड़ते हैं। उपदंश, गण्डमाला, रक्तपित्त, कुष्ठ एवं खुजली में इसके पञ्चांग का फांट देते हैं। इससे त्वचा की विनिमय- क्रिया ठीक होती है। ज्वर एवं नये सन्धिवात में इससे लाभ होता है। १३४. मूर्वा (५) सं०—पीलुपर्णी, मधुरसा, तेजनी, मोरटा। चित्रकूट—मुरहरी। ता०—भूमि चक्करे। ते०—मोरिनिका। गु०— विका। ले०—Maerua arenaria Hook f. & Th. (मेरुआ एरेनेरिया हुक.)। Fam. Capparidaceae (कॅपेरिडेसी)। यह पंजाब, सिंधु, गुजरात, दक्षिण एवं मध्यभारत में होती है।
गुडूच्यादिवर्गः ६०१ इसकी आरोही झाड़ीदार लता होती है। पत्र-१ से २ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, अंडाकार-आयताकार, कुण्ठिताग्र एवं चिकने होते हैं। पुष्प-हरिताभ श्वेत, समशिख (कोरिम्ब) गुच्छों में आते हैं। फल-हलके भूरे रंग के तथा प्रत्येक बीजों के बीच में संकुचित होते हैं। बीज-भूरे, गोल तथा काँटेदार होते हैं। इसको जड़ रसायन, बल्य एवं उत्तेजक मानी जाती है। १३५. मूर्वा (६) सं०-मूर्वा, आवर्तनी, आवर्तमाला। हिं०-मरोडफली, मरोरफली, ऐंठनी, गोमठी। म०-केवण, मुरडशेंग। बं०-आरमोरा। गु०-मरडासिंग, मरडासिंगी। ता०-बलंबुरी। ते०-आडामति। ले०-Helicteres isora Linn. (हेलिक्टेरीज आइसोरा लिन.); Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्यूलिएसी)। यह पश्चिम एवं मध भारत के शुष्क जंगलों में, बिहार से लेकर जम्मू तक तथा पश्चिमी पेनिनसुला में पाई जाती है। इसका गुल्म या छोटा वृक्ष होता है। पत्ते-फालसे की तरह तथा ऊपर से खुरदरे होते हैं, मध्यनाड़ी के भाग असमान होते हैं। शिराएँ-५-७ होती हैं। पुष्प-टेढ़े, अनियताकार तथा लालरंग के होते हैं। फल-१-२ इञ्च लम्बे ऐंठे हुये तथा पाँच खण्ड युक्त होते हैं। यह पाँच स्त्री-केशरों से बने हुए होते हैं। इनका मूर्वा नाम गलती से प्रयोग किया जा रहा है। इसकी, छाल से सफेद दृढ़ रेशे भी निकाले जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, कषाय, त्रिदोषघ्न एवं कृमिनाशक है। इसके फल स्नेहन एवं ग्राही होते हैं तथा बच्चों के मरोड़ एवं आनाह में लाभदायक हैं। इसकी छाल या फल अतिसार तथा प्रवाहिका में लाभदायक है। शूल में मूल, छाल या फल दिया जाता है। पेट की बीमारियों में इसका चूर्ण भूनकर २ १/२-३ माशे की मात्रा में घृत एवं शर्करा के साथ दिया जाता है। इसके मूल की छाल का क्वाथ मधुमेह में दिया जाता है। खुजली में इसके फल को घिस कर लेप करने से लाभ होता है। मात्रा-१ १/२-३ माशा। अथ काकमाची (मकोय)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह काकमाची ध्वाङ्क्षमाची काकाह्वा चैव वायसी। काकमाची त्रिदोषघ्नी स्निग्धोष्णा स्वरशुक्रदा ।। २४६।। तिक्ता रसायनी शोथकुष्ठार्शोज्वरमेहजित्। कटुर्नेत्रहिता हिक्काच्छर्दिहद्रोगनाशिनी ।। २४७।। १३६. मकोय हिं०-मकोय, छोटी मकोय। बं०-काकमाची, गुडकामाई। म०-कानोणी। गु०-पीलुडी। फा०-रूबाहतुर्बुक। अ०-इनबुस्सालव। अं०-Garden Nightshade (गार्डेन नाइटशेड)। ले०-Solanum nigrum Linn. (सोलैनम् नाइग्रम् लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेर्नेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में एवं ८००० फीट तक पश्चिम हिमालय में उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-१-१॥ हाथ तक ऊँचा होता है और शाखायें-सघन होती हैं। यह गर्मी में नष्ट हो जाता है और वर्षा के अन्त में उत्पन्न हो जाड़े में खूब हरा-भरा दिखलाई पड़ता है। इसके पत्ते-अखण्ड, लहरदार या कभी-कभी दन्तुर या खण्डित, लट्वाकार, प्रासवत् लट्वाकार या आयताकार, ४ x १.७ इञ्च तक बड़े और उनका फलक-प्रायः वृन्त CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA