भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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पृष्ठ 636, कुल 1167 में से

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गुडूच्यादिवर्गः ५८५ (१) Curacao or Barbados aloes (क्यूराकाओ या बार्बाडोस् एलो)—यह चाकलेटी बादामी रंग का होता है जो इसके भेद Var. officinalis (ऑफिसिनॅलिस्) से बनाते हैं। (२) Socotrine aloes (सोकोट्राइन एलो)—यह A. perryi (ए. पेरी) से प्राप्त होता है तथा इसका रंग पीताभ या कृष्णाभ बादामी होता है। (३) Zangibar aloes (जंजिबार एलो)—यह भी ए. पेरी से प्राप्त किया जाता है किन्तु इसका वर्ण यकृताभ बादामी होता है। (४) Cape aloes (केप एलो)—यह A. ferox (ए. फेरॉक्स) से प्राप्त करते हैं तथा इसका वर्ण गहरा बादामी या हरिताभ बादामी रहता है। इन चार में से यही लाल स्वरूप का होता है। इनके अतिरिक्त केप एलो सदृश नेटाल एलो, अरबी कोका-एलो एवं जाफर बादी एलो आदि भेद भी पाये जाते हैं। परीक्षा एवं प्रमाण—इसमें काला कत्था, पत्थर या लोहा आदि की मिलावट करते हैं। मद्यसारीय घोल की नील लोहितातीत प्रकाश में परीक्षा करने पर इसके घोल का वर्ण गहरा बादामी एवं कत्थे सा काला दिखाई देता है। एलुआ में आर्द्रता ११% से कम, राख ४% से कम, मद्यसार में अविलेय भाग १०% से कम एवं जल में विलेय भाग ५०% से अधिक होता है। शोरे के तेजाब में इसका चूर्ण डालने से बादामी या रक्ताभ बादामी घोल बनता है तथा फेन निकलता है। रासायनिक संगठन—एलुआ में एलोइन (Aloin) नामक एक कार्यकारी तत्त्व रहता है जो कई ग्लूकोसाइड का मिश्रण है। एलोइन की मात्रा पहले में ३०%, दूसरे तथा तीसरे भेद में उससे कम एवं चौथे में १०% रहती है। एलोइन का मुख्य भाग Berbaloin (बार्बालोइन) नामक हलका पीला ग्लूकोसाइड है जो जल में विलेय होता है। इनके अतिरिक्त Isobarbaloin (आइसोबार्बालोइन) जो केवल क्यूराकाओ एलो में रहता है एवं B barbaloin (बिटा बार्बालोइन), Aloe-emodin (एलो एमोडिन), राल तथा जल में घुलनशील कुछ पदार्थ पाये जाते हैं। गुण एवं प्रयोग—घीकुआर तिक्त, मधुर, शीतवीर्य, भेदन, दीपन, पाचन, बल्य, शोथहर, व्रणरोपण, नेत्र्य एवं शोणितास्थापन है। एलुआ भेदन, उष्ण, तीक्ष्ण, आर्तवजनन एवं कृमिघ्न है। अल्पमात्रा में यह दीपन-पाचन, तिक्त एवं बल्य है। इससे यकृत् की क्रिया में सुधार होकर अन्न का सात्मीकरण ठीक होता है। अधिक मात्रा (१-२ रत्ती) से पेट में मरोड होकर १०-१२ घंटे में विरेचन होता है। इसका प्रभाव बड़ी आँत पर होता है, जिससे कटिस्थ अंगों जैसे गर्भाशय, गुदा तथा अन्य अवयवों में रक्ताधिक्य होता है। (१) विरेचक गुण के कारण विबन्ध में इसका प्रयोग अन्य वातानुलोमक एवं उद्वेष्टन निरोधी औषधियों के साथ करते हैं। गर्भिणी या स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में इसका प्रयोग नहीं करते। बाजार में बिकने वाली अनेक विरेचक औषधियों में यह रहता है। घीकुआर के रस का भी सैन्धव एवं हरिद्रा के साथ विबन्ध, गुल्म, पांडु, पाचनविकार तथा यकृत् प्लीहा रोगों में उपयोग करते हैं। (२) स्त्रियों के विकार जैसे अनार्तव, पांडु, विबंध में इसको देने से लाभ होता है। (३) इसके स्वरस का बाह्य लेप स्तनशोथ, नेत्राभिष्यन्द, चर्मविकार, अर्श एवं व्रण में हरिद्रा के साथ करने से शोथ एवं दाह कम होता है। सूत्रकृमि में एलुवा की बस्ति देते हैं। मात्रा—स्वरस १-२ तोला; एलुवा १-२ रत्ती। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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