भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४) अस्थिभंग में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। (५) कर्णस्राव एवं नासा से रक्तस्राव होने पर इसका स्वरस डालते हैं। मात्रा-स्वरस १ से २ तोला। अथ कुमारी (घीकुआँर)। तस्या नामगुणानाह कुमारी गृहकन्या च कन्या घृतकुमारिका । कुमारी भेदनी शीता तिक्ता नेत्र्या रसायनी ।।२२९।। मधुरा बृंहणी बल्या वृष्या वातविषप्रणुत् । गुल्मप्लीहयकृद्वृद्धिकफज्वरहरी हरेत् ।। ग्रन्थ्यग्निदग्धविस्फोटपित्तरक्तत्वगामयान् ।।२३०।। 'घीकुआँर' के नाम तथा गुण-कुमारी, गृहकन्या, कन्या और घृतकुमारिका ये नाम 'घीकुआर' के हैं। घीकुआँर-मल को भेदन करने वाली, शीतल, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, रसायन, बृंहण, बलकारक, वृष्य एवं वात, विष, गुल्म, प्लीहा, यकृत् की वृद्धि, कफज्वर, ग्रन्थि, अग्निदग्ध (आग से जलजाना), विस्फोटक, पित्त, रक्तविकार और चर्मरोग को नाश करने वाली होती है। [२२९-२३०] ११८. घीकुआँर हिं०-घीकुआँर, ग्वार पाठा, घीग्वार, क्वारपाठी। बं०-घृतकुमारी। म०-कोरफड, कोरकांड। गु०-कुँवार। क०-लोलिसर। ते०-कलबन्द। ता०-कत्तालै। फा०-दरखते सिब्र। अ०-तसब्बार अलसी। ले०-Aloe barbadensis, Mill. (एलो बार्बाडेन्सिस मिल.)। Syn. A. vera Tourn. ex Linn. (एलो वेरा)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी)। कुमारीसार-ऐलेयक, कृष्ण बोल। हिं०-एलुआ, मुसब्बर। म०-कालाबोल, एलिया। बं०-मोषब्बर। गु०-एलियो। फा०-शबयार। अ०-सिब्र। अं०-Common Indian Aloe (कॉम्न् इण्डियन् एलो); Curacao Aloe (क्युराकाओ एलो); Barbados Aloe (बार्बाडोस् एलो)। Musabbar (मुसब्बर)। यह भारतवर्ष में प्रायः सर्वत्र होती है। इसका क्षुप-छोटा, बहुवर्षायु, मांसल एवं १ से २ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-मांसल, मोटे, हरे, भालाकार, सीधे फैले हुये, कुछ नतोदर, १ से २ फीट लम्बे ४ इञ्च तक चौड़े एवं दन्तुर होते हैं। इनके भीतर घी के समान पीताभ गूदा रहता है। पुष्प-पत्तों के बीच से लम्बा पुष्पदण्ड निकलता हैं जिसमें रक्ताभ पीत पुष्प आते हैं। भारतवर्ष में इसके २-३ भेद (Varieties) पाये जाते हैं। दक्षिण एवं मध्य प्रदेश में होने वाले के पत्ते आधार की तरफ नीलारुण रंग के एवं उनके काँटे कम दृढ़ होते हैं। मद्रास से रामेश्वरम् तक समुद्री किनारे पर होने वाले क्षुप छोटे तथा उनके दाँत सामान्य दन्तुर (Dentate) होते हैं। काठियावाड़ के किनारे होने वाले क्षुप से जाफराबादी मुसब्बर प्राप्त किया जाता है। इसे गलती से कुछ लोगों ने ए. अबीसीनिया कहा है। इसके पत्तों को काटने से एक पीले रंग का पिच्छिल रस निकलता है जिसे संग्रह करके गाढ़ा कर लेते हैं। शीत होने पर यह जम जाता है जिसे एलुआ कहते हैं। विभिन्न स्थानों से प्राप्त घीकुवार तथा गाढ़ा बनाने की भिन्न विधि के परिणामस्वरूप यह कई प्रकार का मिलता है। यदि सूर्यताप से या हलकी आंच पर रस गरम करके बनाया जाता है तो यह कुछ चिकना तथा अपारदर्शक बनता है जिसे यकृताभ (Hepatic) एलुवा कहते हैं। किन्तु यदि रस को तीव्र अग्नि पर जल्दी से गाढ़ा करते हैं तो यह कुछ पारदर्शक बनता है जिसे ग्लासी या विट्रिअस (Glassy or vitreous) एलो कहते हैं। इसमें एक प्रकार की विशिष्ट गंध आती है तथा इसका स्वाद कड़ुआ एवं हल्लासकारक होता है। एलुआ के भेद-ब्रिटिशफार्माकोपिया में चार प्रकार का एलुआ राजमान्य है।