भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 634, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५८३ हड़संहारी के नाम व गुण—ग्रन्थिमान्, अस्थिसंहारी, वज्राङ्गी, अस्थिशृंखला, ये सब हड़संहारी के नाम हैं। हड़संहारी—वात-कफनाशक, टूटी हुई हड्डियों को जोड़नेवाली, उष्णवीर्य, सारक तथा कृमि, अर्श (बवासीर) और नेत्र रोग को दूर करने वाली, रूक्ष, स्वादिष्ट, लघु, वृष्य, पाचक और पित्तजनक होती है । [२२६-२२७] अथ तद्वटिकाया निर्माणविधिं गुणाँश्चाह काण्डं त्वग्विरहितमस्थिश्रृङ्खलाया—माषार्द्धार्द्विदलमकञ्चुकं तदर्द्धम्। संपिष्टं सुतनु ततस्तिलस्य तैले—संपक्वं वटकमतीव वातहारि ।।२२८।। इसकी वटिका बनाने की विधि तथा गुण—हड़संघारी के टुकड़ों के छिलके को दूर कर उसमें छिल्का अलग की हुई उरद के दाल को आधा परिमाण मिलाकर पीसने के बाद टिकिया बनाकर तिल के तेल में पका डाले, यह टिकिया वात को हरण करने वाली होती है। [२२८] .. ११७. हड़संघारी हिं०—हड़जोड़, हड़संघारी, हड़जोरवा। बं०—हाड़भांगा, हाड़जोड़ा। गु०—हाड़ साँकल। म०—कांडबेल। क०—मंगरवल्ली। ते०—नाल्लेरु, नुल्लेरोतिगे। ता०—पेरंडै। ले०—Vitis quadrangularis, Wall. (वाइटिस् क्वॉड्रेन्युलेरिस्, वाल.); Syn. Cissus quadrangularis, Linn. (सिसस् क्वॉड्रेन्युलेरिस्, लिन.)। Fam. Vitaceae (वाइटेसी)। हड़जोड़ी—लता जाति की वनौषधि प्रायः गरम प्रदेशों में अधिक होती है। यह वाटिकाओं आदि में लगाई हुई अधिक पायी जाती है। जिस प्रकार लतायें वृक्षों की डालियों से लिपटती हुई फैलती हैं उस प्रकार यह नहीं बढ़ती पर वृक्षों का सहारा ले उस पर चढ़ती और लटकती रहती हैं। काण्ड—चौपहल, हरा, बीच-बीच में सन्धियों से युक्त एवं मांसल होता है। संधियों पर सूत्र होते हैं और नवीन काण्ड संधियों पर तन्तुओं के विपरीत दिशा में पत्र होते हैं। पत्र—एकान्तर, छोटे वृन्तवाले, हृद्वत् चौड़े, १-२ १/२ इञ्च बड़े, मोटे दन्तुर, उपपत्रयुक्त एवं संख्या में अल्प रहते हैं। पुष्प—छोटे तथा हरित- श्वेतवर्ण के आते हैं। फल—गोल, करीब ६ मि० मि० बड़े, पकने पर लाल तथा एक बीजयुक्त होते हैं। बीज—हलके भूरे रंग के, ५ मि० मि० बड़े तथा चिकने होते हैं। दक्षिण की तरफ कोमल काण्ड एवं पत्तों का साग बना कर खाते हैं। काण्ड तोड़ने पर बहुत रस निकलता है। इसके काण्ड एवं पत्तों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें कॅल्शियम औक्जॅलेट् (Calcium oxalate) एवं १०० ग्राम ताजे पौधे में २६७ मि० ग्रा० कॅरोटीन (Carotene); १०० ग्रा० कोमल काण्ड में ३९८ मि० ग्रा०, नीचे के भाग में २३२ मि० ग्रा० तथा ताजे स्वरस में ४७९ मि० ग्रा० विटामिन सी (Vitamin C) की मात्रा पाई जाती है। गुण और प्रयोग—यह रूक्ष, वात-कफशामक, रक्तशोधक, दीपन, पाचन, अर्शोघ्न, वृष्य, सन्धानीय एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग अस्थिभंग, पाचनविकार, स्कर्ह्वी (Scurvy), आर्तवविकार, तमकश्वास एवं रक्तदोष में किया जाता है। (१) कुपचन में कोमल काण्ड एवं पत्तों का शाक खिलाते हैं या इनको बन्द पात्र में जलाकर उसकी राख खिलाते हैं। (२) आर्तव की अधिकता में इसका स्वरस, गोपीचन्दन, घृत एवं मधु खिलाते हैं। (३) तमकश्वास में काण्ड को पीसकर देते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA