भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८६ भावप्रकाशनिघण्टुः पुनर्नवा पुनर्नवा के दो भेद-रक्त एवं श्वेत, निघण्टुओं में मिलते हैं। रा० नि० में एक नील भेद भी लिखा है, जो दिखलाई नहीं देता। दो भिन्न वर्गों की दो वनस्पतियाँ Boerhaavia diffusa (बोएहॅविया डिफ्यूजा) एवं Trianthema portulacastrum (ट्राएन्थेमा पोर्चुलेकॅस्ट्रम्-पथरी) का उपयोग पुनर्नवा के नाम से हो रहा है। इनमें से प्रथम को अधिकांश विद्वानों ने रक्तपुनर्नवा माना है जो उचित नहीं है। वास्तव में प्रथम में ही रक्तपुष्प एवं श्वेतपुष्प के भेद से दो भेद पाये जाते हैं तथा द्वितीय में भी श्वेतपुष्प एवं रक्तपुष्प भेद देखे जाते हैं। ऐसी स्थिति में केवल बोएहॅविया को रक्त पुनर्नवा एवं ट्राएन्थिमा (पथरी) को श्वेतपुनर्नवा मानना उचित नहीं है। रा० नि० में पुनर्नवा के भेदों के अतिरिक्त वर्षाभू एवं वसुक¹ नामों से दो अलग वनस्पतियों का उल्लेख किया गया है। पुनर्नवा के पर्यायों में क्षुद्रवर्षाभू यह पर्याय आया हुआ है। श्री ठा० बलवन्त सिंह जी पुनर्नवा और वर्षाभू दो भिन्न वनस्पतियाँ मानते हैं न कि पर्याय। इस सम्बन्ध में 'बिहार की वनस्पतियाँ' नामक पुस्तक में वे लिखते हैं— 'मेरे मत से पुनर्नवा और वर्षाभू दो सर्वथा भिन्न वनस्पतियाँ हैं परन्तु दोनों के रूप और गुणों में बहुत कुछ साम्य होने से निघण्टुकारों ने दोनों में बहुत गड़बड़ कर दिया है। अनेक स्थान के वैद्य आज भी इसे ही (ट्राएन्थिमा) पुनर्नवा और कुछ इसे केवल श्वेतपुनर्नवा मानते हैं। स्मरण रखना चाहिये कि श्वेत और रक्त भेद पुनर्नवा और वर्षाभू दोनों में ही होते हैं। अतः रक्तपुनर्नवा और श्वेतपुनर्नवा (बोएहॅविया) जातियों को और रक्तवर्षाभू तथा श्वेतवर्षाभू (ट्राएन्थेमा- पथरी) की जातियों को कहना चाहिये। वर्षाभू की ही किसी जाति को वसुक-मानाना चाहिये।' उपर्युक्त स्पष्टीकरण के आधार पर The Wealth of India (Raw Materials) Vol I नामक पुस्तक में उल्लिखित श्री चक्रवर्ती का यह मत कि B. diffusa को रक्तपुनर्नवा एवं T. portulacastrum को श्वेत पुनर्नवा मानना चाहिये उचित नहीं मालूम पड़ता। दोनों वनस्पतियों में गुणों में कुछ समता पाई जाती है जिस कारण संभव है निघण्टुकारों ने दोनों नामों को पर्याय में दिया हो। निघण्टुकारों ने वर्ण के आधार पर श्वेत एवं रक्त के गुण अलग लिखे हैं या इन दो उपयुक्त भेदों के अलग-अलग गुण दिये हैं यह कहना कठिन है। वर्षाभू (पथरी) केवल बरसात में लगती है तथा शीतकाल तक सूख जाती है। इसी कारण इसे वर्षाभू कहा गया है। पुनर्नवा यद्यपि वर्षाकाल में अधिक होती है तथापि अन्य ऋतुओं में भी मिलती है। यहाँ पर दोनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। अथ श्वेतपुनर्नवा । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पुनर्नवा श्वेतमूला शोथघ्नी दीर्घपत्रिका। कटु कषायानुरसा पाण्डुघ्नी दीपनी परा। शोफानिलगरश्लेष्महरी ब्रध्नोदरप्रणुत् ।।२३१।। सफेद पुनर्नवा के नाम और गुण—पुनर्नवा, श्वेतमूला, शोथघ्नी और दीर्घपत्रिका इतने नाम सफेद पुनर्नवा के हैं। सफेद पुनर्नवा—कटु तथा कषाय रसयुक्त, पाण्डुरोगनाशक, अत्यन्त अग्निदीपक एवं शोथ, वायु, विष, कफ, ब्रध्न और उदररोग को दूर करने वाली होती है। [२३१] अथ रक्तपुष्पा पुनर्नवा । तस्या नामगुणानाह पुनर्नवाऽपरा रक्ता रक्तपुष्पा शिलाटिका। शोथघ्नी क्षुद्रवर्षाभूर्वर्षकेतुः कठिल्लकः ।।२३२।। पुनर्नवाऽरुणा तिक्ता कटुपाका हिमा लघुः। वातला ग्राहिणी श्लेष्मपित्तरक्तविनाशिनी ।।२३३।। लाल पुनर्नवा के नाम व गुण—रक्तपुनर्नवा, रक्तपुष्पा, शिलाटिका, शोथघ्नी, क्षुद्रवर्षाभू, वर्षकेतु और कठिल्लक ये सब हैं। लाल पुनर्नवा—तिक्त रसयुक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, शीतल, हलकी, वातकारक, मलसंग्राही एवं कफ, पित्त और रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [२३२-२३३] १. वर्षाभूवसुकौ वर्णकफमान्द्यानिलापहौ। शाके रूक्षतरौ गुल्मप्लीहशूलापहारकौ ।।