भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९८ भावप्रकाशनिघण्टुः में इसका उल्लेख है। चरक में तृप्तिघ्न, स्तन्यशोधन, दशोमानि में एवं तिक्तस्कन्ध में इसका पाठ है। क्षीरशोधन एवं वमनोपग द्रव्य के रूप में भी इसका उल्लेख है। इसके स्वरूप-वर्णन से ऐसा मालूम होता है कि यह कोई मजबूत रेशेवाली लता विशेष होगी जिसका मौर्वी आदि बनाने में उपयोग किया जाता रहा है। विभिन्न निघण्टुओं ने इसके रूपपरिचयात्मक जो नाम दिये हैं वे सम्भवतः एक ही वनस्पति के लिये नहीं हैं। आज मूर्वा नाम से ली जानेवाली वनस्पतियों में से किसी में एक तो दूसरी में दूसरा नाम सार्थक मालूम पड़ता है। सम्भव है कि प्रत्यक्षतः न देखने के कारण विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रयुक्त सभी नामों को एक साथ पर्याय में लिख दिया गया है। इसी प्रकार मोरटा को कुछ निघण्टुकारों ने इसके पर्याय में लिखा है और कुछ ने मूर्वा-विशेष कहकर दूसरे द्रव्य के रूप में भी उल्लेख किया है। निम्नलिखित द्रव्यों का मूर्वा नाम से प्रयोग हो रहा है- (१) मरुआबेल, चिन्हार-सम्भवतः डल्हण ने इसे ही-धनुर्गुणोपयोग्या 'दुधऊ' इति लोके कहा है। अतिरसा, गोकर्णी, स्रुवा आदि पर्याय इसके लिये उचित मालूम पड़ते हैं। यह क्षीर बहुल लता होती है। रॉक्सवर्ग के मतानुसार वनस्पति सृष्टि में अत्यन्त मजबूत रेशों में इसके काण्डत्वक् के निकाले हुये रेशों की गणना की जानी चाहिये। इसके स्थानिक थारू नाम मारवो या मरुआबेल मूर्वा से मिलते-जुलते मालूम पड़ते हैं। इसमें मूर्वा के गुण भी मिलते हैं। इन्हीं आधारों से श्री ठा० बलवन्तसिंहजी ने इसे मूर्वा माना है। (२) वंगीय मूर्वा-यह डल्हणोक्त प्रथम द्रव्य चोरस्नायु या हगौड़ मालूम पड़ता है। इसे बंगाल के वैद्य मूर्वा मानते हैं। (३) मालझन, मालुआ बेल-सम्भवतः यही डल्हणोक्त कोविदारयुग्मपत्रा वा अन्योक्त पृथक्पर्णी है जिसकी बड़ी विस्तृत लतायें होती हैं तथा पत्ते कचनार जैसे द्विविभक्त होते हैं। (४) मोरबेल, रानजाई-बम्बई के तरफ इसको मूर्वा मानते हैं। इसके लिये त्रिपर्णी नाम सार्थक मालूम पड़ता है। (५) मुरहरी, मोरहरी-चित्रकूट में यह मुरहरी नाम से प्रसिद्ध है। मधुरस', पीलुपर्णी, तेजनी आदि पर्याय इसके लिये उपयुक्त प्रतीत होते हैं। सम्भवतः डल्हण-निर्णीत मोरटा यह हो। (६) मरोडफली-इसके ऐंठे हुये फलों को उत्तर प्रदेश में मूर्वा नाम से लिया जाता है जो वास्तव में 'आवर्तनी' है न कि मूर्वा। संक्षेप में प्रत्येक का स्वतन्त्र वर्णन यहाँ किया जा रहा है। इनमें से चिन्हार की मूर्वा होने की अधिक सम्भावना है। १३०. मूर्वा (१) मिर्जापुर-जरतोर, चिन्हार। थारू-मारवी, मरुआवेल। खर-सिटी, चिटी। संथा-कोंगा, सिटकी। ले०- Marsdenia tenacissima. W. & A. (मार्सडेनिया टेनॅसिस्सिमा)। Fam. Asclepiadaceae (एस्कलेपिएडेसी)। यह दून के खैर के जंगल, हिमालय के नीचे का भाग तथा बिहार में प्रायः शुष्क पर्वतमालाओं एवं झाड़ीदार जंगलों में पाई जाती है। इसकी लता-मोटी, मजबूत काण्ड की, दुग्धयुक्त एवं चक्रारोही होती है। इसका नवीन भाग रोमश एवं काण्डत्वक् धूसर, कार्कयुक्त एवं नालीदार होता है। पत्ते-४-६ इञ्च लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े-स्पर्श में मखमली तलवाले, चौड़ाई लिये हुये लट्वाकार, लम्बाग्र एवं आधार की तरफ फलकमूल यकायक बहुत फटा हुआ हृद्वत् होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA