भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ५९९ पत्रनाल- २.५ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-हरित-पीत प्रायः दुर्गन्धयुक्त एवं गुच्छों में आते हैं। फली-४.५-५ इञ्च लम्बी एवं व्यास में १.२-१.४ इञ्च, रोमश और आधार से एक तिहाई दूरी पर सबसे अधिक मोटी होती है। नवीन शाखाओं की त्वचा से सफेद रेशम जैसे रेशे निकलते हैं जिनसे मछली मारने की रस्सी एवं धनुष की डोरी (मौर्वी) बनाई जाती है। यह विषमज्वर में बहुत उपयोगी बतलायी जाती है। इसका मूल तथा काण्ड सफेद निसोध (श्वेत त्रिवृत) के नाम से बाजार में बिकता है। (ठा० बलवन्तसिंह) इसकी एक दूसरी उपजाति M. hamiltonii, Wight (मॉ० हमिल्टोनाई) भी मिलती है जिसे मोरन अडा भी कहीं-कहीं कहते हैं। इसमें पुष्प छोटे और आभ्यन्तर कोश बाहर से सफेद होते हैं। लाखन-नामक एक और इसी वर्ग की बड़ी लता होती है जिसे लकवा में बहुत लाभदायक समझा जाता है। इसका ले० नाम Dregia volubilis Benth. ex Hook. f. (ड्रेगिया हॉल्यूबिलिस्) है। १३१. मूर्वा (२) सं०-चोरस्नायु ? बं०, म०-घणरूप। बं०-गोराचक्र, मूर्वा। उ० प्र०-नागदमन। ले०-Sansevieria roxburghiana Schult. (सॅन्सेवेरिया रॉक्सबर्घियाना शु०); Fam. Haemodoraceae (हिमोडोरेॅसी)। यह कारोमंडल तट पर पाया जाता है। बगीचों में गमलों में यह लगाया हुआ मिलता है। इसमें जमीन के नीचे दिगन्तसम फैला हुआ अन्तर्भूमिशायी काण्ड होता है, जिससे जगह-जगह पत्रगुच्छ ऊपर निकले रहते हैं। पत्ते-खड़े, १२-१८" लम्बे, १-१.३" चौड़े, अधरतल पर उन्नतोदर, बीच में सबसे अधिक चौड़े, दोनों तटों पर श्वेताभ पट्टियों से युक्त होने के कारण चित्रित एवं इनका अग्र तीक्ष्ण, कठोर एवं १ इञ्च लम्बा होता है। पत्तों के बीच से पुष्पध्वज-निकलता है। व्यूह सवृन्त काण्डज, घना १२" × २" बड़ा एवं पुष्प २-३ एक साथ उन्नत स्थानों से निकलते हैं। इससे भी मजबूत रेशे निकलते हैं, जिनका मौर्वी बनाने में उपयोग होता है। पूर्वी भारत, बंगाल एवं उड़ीसा में इसका मूर्वा के नाम से प्रयोग कहीं-कहीं होता है। इसके पत्र एवं मूल का चिकित्सा में उपयोग होता है। गुण और प्रयोग-पुरानी खाँसी में इसकी जड़ का रस मधु के साथ देते हैं। इसके कोमल पत्तों का रस बच्चों को गले का कफ ढीला होकर निकालने के लिये देते हैं। १३२.-मूर्वा (३) सं०-कोविदार युग्मपत्रा, पृथक्पर्णी। हिं०-मालझनं, माहुल, मालो, महुलाइन। बं०-चेहुर। ते०-अड्डा। था०-महुलन। खर०-महुलान। संथा०-लमकलर, गोमलर। उ०-सियालपत्ता। ले०-Bauhinia vahlii W. & A. (बौहिनिया वाहली)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह हिमालय के निम्न भागों में ३००० फीट तक एवं आसाम, मध्य प्रदेश तथा बिहार में नम एवं छायादार स्थानों में वृक्षों पर फैली हुई पाई जाती है। इसकी लता-बहुत बड़ी तथा आरोहणशील होती है। शाखाओं के अग्र पर प्रायः दो-दो सूत्र रहते हैं। नवीन शाखाओं, पत्रनालों एवं पत्तों के अधः पृष्ठों पर रक्ताभ या मखमली रोमावरण होता है। पत्ते-१ से १ १/२ फीट तक चौड़े, चौड़ाई में कभी-कभी अधिक नहीं तो लम्बाई-चौड़ाई में बराबर, द्विखण्डित, खण्ड गहराई तक कटे हुये एवं CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA