भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०० भावप्रकाशनिघण्टुः
फलकमूल गहरा, हृद्वत् होता है। पुष्प—श्वेत तथा मलाई के रंग के, समस्थ काण्डज व्यूह में आते हैं। फली—कठोर, ६-१२ इञ्च लम्बी, १ १/२-२ इञ्च चौड़ी एवं रोमश होती है। इसके पत्तों के पत्तल आदि बनाये जाते हैं। छाल के रेशों से रस्सियाँ बनाई जाती हैं। इसकी फलियों को आग में चिटका कर बीज निकाले जाते हैं, जिन्हें खाते हैं। देहरादून के व्यापारियों द्वारा इसके मूल मूर्वा—नाम से बेचे जाते हैं। डल्हण ने इसका माल नाम से उल्लेख किया है एवं इसे कोविदार सदृश पर्ण वाला कहा है। डल्हण के समय से ही कुछ लोग इसे मूर्वा नाम से प्रयोग करते रहे हैं। किन्तु वह मत डल्हण को मान्य नहीं था क्योंकि अश्मंतक के परिचय में उसके लिये 'मालुया-सदृशपत्रः' लिखा है न कि 'मूर्वासदृशपत्रः'। इसमें एक गोंद होता है। बाह्यत्वक् में टैनिन की मात्रा १७% एवं काण्ड में ७% होती है। इसका मूल ज्वरघ्न, फल अतिसारघ्न एवं मूल-स्वरस क्षय में पिलाने के लिये लाभदायक माना जाता है। बीज बल्य माने जाते हैं। १३३. मूर्वा (४) हिं०—चरनहार। उ०—गोलरंग। देह०—बेलकंगु, बेलकम्। म०—रानजाई। गु०—मोरबेल। ले०—Clematis gouriana Roxb. (क्लेमॅटिस ग्योरियाना राक्स.)। Fam. Ranunculaceae (रेनन्क्युलेसी)। यह पश्चिम हिमालय में ५०००' फीट तक एवं भारत के सभी प्रान्तों में १ से ३ हजार फीट तक होती है। यह लता जाति का एक विस्तृत क्षुप है, जिसकी कई उपजातियाँ इस प्रान्त में पाई जाती हैं। नवीन भाग मृदु रोमश होता है। पत्ते—संयुक्त पक्षवत् होते हैं। पत्रनाल सूत्रसदृश होता है, जिससे ये लताएँ दूसरे वृक्षों पर चढ़ती हैं। पत्रक—अंडाकार, आयताकार, हृद्वत् तीक्ष्णाग्र एवं ऊपर से चमकीले होते हैं। पुष्प—प्रायः श्वेत वर्ण के एवं त्रिविभक्त मञ्जरियों में होते हैं। फल—रोमश एवं पंखवद् पुच्छदार होते हैं। महाराष्ट्र के कुछ लोगों ने इसे मूर्वा माना है, किन्तु इसके किसी भाग से रेशे नहीं निकलते; इसलिये इसे मूर्वा मानना उचित नहीं है। मूर्वा को 'धनुर्गुणोपयोग्या' होना आवश्यक है। रासायनिक संगठन—इसमें एक तिक्त विषैला तत्त्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह संसन, कुष्ठघ्न एवं स्वेदजनन है। इसके पत्ते तथा ताजे काण्ड को पीसकर चर्म पर लगाने से छाले पड़ते हैं। उपदंश, गण्डमाला, रक्तपित्त, कुष्ठ एवं खुजली में इसके पञ्चांग का फांट देते हैं। इससे त्वचा की विनिमय- क्रिया ठीक होती है। ज्वर एवं नये सन्धिवात में इससे लाभ होता है। १३४. मूर्वा (५) सं०—पीलुपर्णी, मधुरसा, तेजनी, मोरटा। चित्रकूट—मुरहरी। ता०—भूमि चक्करे। ते०—मोरिनिका। गु०— विका। ले०—Maerua arenaria Hook f. & Th. (मेरुआ एरेनेरिया हुक.)। Fam. Capparidaceae (कॅपेरिडेसी)। यह पंजाब, सिंधु, गुजरात, दक्षिण एवं मध्यभारत में होती है।