भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६०१ इसकी आरोही झाड़ीदार लता होती है। पत्र-१ से २ इञ्च लम्बे, १/२-१ इञ्च चौड़े, अंडाकार-आयताकार, कुण्ठिताग्र एवं चिकने होते हैं। पुष्प-हरिताभ श्वेत, समशिख (कोरिम्ब) गुच्छों में आते हैं। फल-हलके भूरे रंग के तथा प्रत्येक बीजों के बीच में संकुचित होते हैं। बीज-भूरे, गोल तथा काँटेदार होते हैं। इसको जड़ रसायन, बल्य एवं उत्तेजक मानी जाती है। १३५. मूर्वा (६) सं०-मूर्वा, आवर्तनी, आवर्तमाला। हिं०-मरोडफली, मरोरफली, ऐंठनी, गोमठी। म०-केवण, मुरडशेंग। बं०-आरमोरा। गु०-मरडासिंग, मरडासिंगी। ता०-बलंबुरी। ते०-आडामति। ले०-Helicteres isora Linn. (हेलिक्टेरीज आइसोरा लिन.); Fam. Sterculiaceae (स्टर्क्यूलिएसी)। यह पश्चिम एवं मध भारत के शुष्क जंगलों में, बिहार से लेकर जम्मू तक तथा पश्चिमी पेनिनसुला में पाई जाती है। इसका गुल्म या छोटा वृक्ष होता है। पत्ते-फालसे की तरह तथा ऊपर से खुरदरे होते हैं, मध्यनाड़ी के भाग असमान होते हैं। शिराएँ-५-७ होती हैं। पुष्प-टेढ़े, अनियताकार तथा लालरंग के होते हैं। फल-१-२ इञ्च लम्बे ऐंठे हुये तथा पाँच खण्ड युक्त होते हैं। यह पाँच स्त्री-केशरों से बने हुए होते हैं। इनका मूर्वा नाम गलती से प्रयोग किया जा रहा है। इसकी, छाल से सफेद दृढ़ रेशे भी निकाले जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, कषाय, त्रिदोषघ्न एवं कृमिनाशक है। इसके फल स्नेहन एवं ग्राही होते हैं तथा बच्चों के मरोड़ एवं आनाह में लाभदायक हैं। इसकी छाल या फल अतिसार तथा प्रवाहिका में लाभदायक है। शूल में मूल, छाल या फल दिया जाता है। पेट की बीमारियों में इसका चूर्ण भूनकर २ १/२-३ माशे की मात्रा में घृत एवं शर्करा के साथ दिया जाता है। इसके मूल की छाल का क्वाथ मधुमेह में दिया जाता है। खुजली में इसके फल को घिस कर लेप करने से लाभ होता है। मात्रा-१ १/२-३ माशा। अथ काकमाची (मकोय)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह काकमाची ध्वाङ्क्षमाची काकाह्वा चैव वायसी। काकमाची त्रिदोषघ्नी स्निग्धोष्णा स्वरशुक्रदा ।। २४६।। तिक्ता रसायनी शोथकुष्ठार्शोज्वरमेहजित्। कटुर्नेत्रहिता हिक्काच्छर्दिहद्रोगनाशिनी ।। २४७।। १३६. मकोय हिं०-मकोय, छोटी मकोय। बं०-काकमाची, गुडकामाई। म०-कानोणी। गु०-पीलुडी। फा०-रूबाहतुर्बुक। अ०-इनबुस्सालव। अं०-Garden Nightshade (गार्डेन नाइटशेड)। ले०-Solanum nigrum Linn. (सोलैनम् नाइग्रम् लिन.)। Fam. Solanaceae (सोलेर्नेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में एवं ८००० फीट तक पश्चिम हिमालय में उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-१-१॥ हाथ तक ऊँचा होता है और शाखायें-सघन होती हैं। यह गर्मी में नष्ट हो जाता है और वर्षा के अन्त में उत्पन्न हो जाड़े में खूब हरा-भरा दिखलाई पड़ता है। इसके पत्ते-अखण्ड, लहरदार या कभी-कभी दन्तुर या खण्डित, लट्वाकार, प्रासवत् लट्वाकार या आयताकार, ४ x १.७ इञ्च तक बड़े और उनका फलक-प्रायः वृन्त CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA