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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६०२ भावप्रकाशनिघण्टुः पर नीचे तक फैला रहता है। पुष्प-छोटे, सफेद और पत्रकोण से हट कर निकले हुए पुष्पदंड पर समस्थ मूर्धज क्रम में निकले रहते हैं। फल-गोल और पकने पर काले हो जाते हैं। कभी-कभी लाल या पीले भी होते हैं। इसके फल एवं पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। चरक में तिक्तस्कन्ध में इसका पाठ है। इसके शाक का प्रयोग चरक ने वातरक्त, अर्श, ऊरुस्तम्भ आदि में किया है। रासायनिक संगठन-इसमें सोलेनिन् (Solanin) नामक एक क्षाराभ पाया जाता है। इसके अतिरिक्त सॅपोनिन् भी इसमें होता है। इसमें का विषैला द्रव्य बहुत अल्प मात्रा में इसमें होता है। इसकी विषाक्तता की परीक्षा करने के लिए भेड़ को खिला कर देखा गया है। गुण और प्रयोग-यह त्रिदोषशामक, अनुष्णशीत, तिक्त, कटु, रसायन, कुष्ठघ्न, भेदन (सारक), मूत्रजनन, वृष्य, स्वेदजनन एवं वेदनाहर है। इसके ताजे पत्तों का स्वरस गरम करके दिया जाता है। इसके फल ज्वर, अतिसार, नेत्ररोग एवं हृद्रोग में लाभदायक हैं। इसका प्रयोग शोथ, कुष्ठ, नेत्र रोग, हृद्रोग, जीर्णयकृत्-वृद्धि, रक्तष्ठीवन, अर्श, ज्वर एवं कंडू में किया जाता है। (१) इसका प्रधान कार्य यकृत् पर होता है। जीर्ण यकृतवृद्धि, अर्श, उदर, रक्तष्ठीवन, चर्मरोग तथा आँव आदि यकृत् विकार के कारण होने वाले रोगों से इससे लाभ होता है। इससे शौच साफ होता है तथा मूत्र द्वारा भी दोष निकलते हैं। (२) जीर्ण चर्म रोग विशेषकर कंडू, सोराइसिस् (Psoriasis) तथा दाद में इसके कोमल कांड तथा पत्तों का शाक खिलाते हैं एवं पत्रलेप भी करते हैं। (३) किसी भी प्रकार के शोथ में इसका बाह्यान्तर प्रयोग लाभदायक है। इसका शाक शोथ में खिलाते हैं। जलशोथ में इसका स्वरस अधिक मात्रा में दिया जाता है। मात्रा-स्वरस १-२ तोला। अथ काकनासा । तस्या नामगुणानाह काकनासा तु काकाङ्गी काकतुण्डफला च सा ।। २४८ ।। काकनासा कषायोष्णा कटुका रसपाकयोः । कफघ्नी वामनी तिक्ता शोथार्शःश्वित्रकुष्ठहृत् ।। २४९ ।। काकनासा के नाम तथा गुण-काकनासा, काकाङ्गी और कांकतुण्डफला ये नाम काकनासा के हैं। काकनासा- कषाय, कटु तथा तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, विपाक में कटु रसयुक्त, कफनाशक, वमन कराने वाली एवं शोथ, अर्श, सफेद कुष्ठ को दूर करने वाली होती है। [२४८-२४९] काकनासा संदिग्ध द्रव्य है। कई वनस्पतियों के फलों को जो काक तुण्ड सदृश दिखलाई देते हैं, काकनासा नाम से ग्रहण किया जाता है। चरक में मधुर स्कन्ध में तथा च्यवनप्राश में इसका उल्लेख है। कासचिकित्सा के त्र्यूषणादि घृत में एवं अपस्मार, योनिरोग आदि की चिकित्सा में उल्लेख है। सुश्रुत में अनुवासनवस्ति-द्रव्यों में इसका उल्लेख है। चक्रपाणि एवं डल्हण की टीकाओं में इसे 'वायसफला' लिखा हुआ है। अन्य टीकाकारों ने इसका प्रादेशिक नाम कौवाटोटा, कौवाठोडी, कौवाडोडी आदि दिया है। कहीं-कहीं काकनासा एवं काकजंघा ये एक दूसरे के पर्याय दिये हैं, जो उचित नहीं मालूम होता। इस वनस्पति के निर्णय में काकतुण्डवत् फल का होना आवश्यक है। साथ ही इसमें उष्ण, कटु, कफनाशक, वामक एवं चर्मरोगनाशक गुण भी होना आवश्यक है। अर्वाचीन निघण्टुकारों एवं टीकाकारों ने जिन विभिन्न वनस्पतियों का उल्लेख कौवाटोडी या काकनासा नाम से किया है उनमें अधिकांश विदेशी वनस्पतियाँ हैं जो कुछ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA