भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 654

काल से यहाँ भी प्रचुर होने लग गई हैं। काकनासा तो चरक-सुश्रुत के समय से चली आ रही है ऐसी अवस्था में इन्हें काकनासा मानना कहाँ तक उचित होगा ? काकनासा के स्थान पर ली आने वाली कुछ वनस्पतियों का संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। पटोलभेद, कौआरोटी, ले०-Trichosanthes cucumerina Linn. (ट्राइकोसॅन्थिस् क्युकुमेरिना लिन.) के फल पकने पर कौवे खाते हैं इसलिये कुछ लोग इसके काकनासा होने का अनुमान करते हैं । इसका वर्णन पटोल के साथ किया गया है। कुछ लोगों ने Pentatropis microphylla W. & A. (पेण्टाट्रोपिस माइक्रोफाइला); Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) को तथा कुछ ने बृहती (Solanum indicum Linn. (सोलेनम् इण्डिकम्) को काकनासा माना है। १३७. काकनासा (१) ले०-Asclepias curassavica Linn. (एस्क्लेपिअस् कुरेसॅविका लिन.); Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) । सं०-काकतुण्डी, रक्तपुष्पा। बं०-कुरकी, कुर्की । पं०-काकतुण्डी । अं०-Bastard Ipecacuanha (बॅस्टर्ड इपेकॅक्यूआन्हा) । यह वेस्ट इण्डिज का विदेशी पौधा है किन्तु अब बागों में तथा गावों के आस-पास मिलता है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा २ फीट ऊँचा होता है। पत्र-आमने-सामने, २-३ इञ्च लम्बे, भालाकार या आयताकार-भालाकार होते हैं। पुष्प-नारङ्ग या (स्कारलेट) रक्त रंग के गुच्छों में आते हैं। फली-दो-दो एक साथ, ३ इञ्च लम्बी तथा काकतुण्ड सदृश होती है। जड़-बहुत, पतली, हल्के पीले रंग की तथा भीतर से श्वेत रहती है । स्वाद कडुवा तथा तीता होता है । इसमें दुग्ध होता है। इसकी जड़, पञ्चांग एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पञ्चांग में एस्क्लेपिऑडिन् (Asclepiadin) नामक एक ग्लूकोसाइड होता है। इसकी जड़ में विंसेटॉक्सिन (Vincetoxin) नामक द्रव्य होता है जिसकी क्रिया इमेटीन (Emetine) सदृश होती है। गुण और प्रयोग-इसके कार्यकारी तत्त्व की क्रिया इमेटीन सदृश होती है। अर्क से भी इसका सादृश्य है। इससे रक्तवाहिनियों का संकोच एवं बड़ी धमनियों का विस्फार होता है। हृदय के लिये यह अवसादक है। अल्प मात्रा में यह आमाशय उत्तेजक, यकृत के लिये उत्तेजक, पित्तस्त्रावक, स्वेदजनन एवं कफघ्न है। अधिक मात्रा में यह वामक एवं विरेचक है। इसका प्रयोग कृमि, रक्तस्राव, राजयक्ष्मा, सोजाक, आमातिसार तथा अर्श में किया जाता है। (१) इसके पत्तों या पुष्पों का लेप रक्तस्राव रोकने के लिये करते हैं। (२) कफविकारों में इसको देने से कफ पतला होकर निकलता है। (३) सोजाक में इसका क्वाथ ताजा बनाकर देते हैं। १३८. काकनासा (२) हिं०-बिछुआ । म०-विंचु । बं०-बाघनोकी । ले०-Martynia diandra Glox. (मार्टिनिआ डाइएण्ड्रा ग्लोक्स.) Fam. Pedaliaceae (पेडॅलिएसी) । यह मेक्सिको (Mexico) का आदिवासी होते हुये भी भारत में काफी फैल गया है तथा कूड़े आदि के स्थानों पर होता है। इसका क्षुप-३, ४ फीट ऊँचा, मोटा, स्पर्श में मृदुरोमश, चिपचिपा तथा भींगा हुआ सा होता है। पत्ते-६- ९ इञ्च लम्बे, विपरीत, तांबूलाकार, दूर-दूर पर दन्तुर एवं तट पर लहरदार होते हैं एवं इनका पृष्ठ प्रायः ओसकणों के CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA