भारतकोश
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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

काल से यहाँ भी प्रचुर होने लग गई हैं। काकनासा तो चरक-सुश्रुत के समय से चली आ रही है ऐसी अवस्था में इन्हें काकनासा मानना कहाँ तक उचित होगा ? काकनासा के स्थान पर ली आने वाली कुछ वनस्पतियों का संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। पटोलभेद, कौआरोटी, ले०-Trichosanthes cucumerina Linn. (ट्राइकोसॅन्थिस् क्युकुमेरिना लिन.) के फल पकने पर कौवे खाते हैं इसलिये कुछ लोग इसके काकनासा होने का अनुमान करते हैं । इसका वर्णन पटोल के साथ किया गया है। कुछ लोगों ने Pentatropis microphylla W. & A. (पेण्टाट्रोपिस माइक्रोफाइला); Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) को तथा कुछ ने बृहती (Solanum indicum Linn. (सोलेनम् इण्डिकम्) को काकनासा माना है। १३७. काकनासा (१) ले०-Asclepias curassavica Linn. (एस्क्लेपिअस् कुरेसॅविका लिन.); Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी) । सं०-काकतुण्डी, रक्तपुष्पा। बं०-कुरकी, कुर्की । पं०-काकतुण्डी । अं०-Bastard Ipecacuanha (बॅस्टर्ड इपेकॅक्यूआन्हा) । यह वेस्ट इण्डिज का विदेशी पौधा है किन्तु अब बागों में तथा गावों के आस-पास मिलता है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा २ फीट ऊँचा होता है। पत्र-आमने-सामने, २-३ इञ्च लम्बे, भालाकार या आयताकार-भालाकार होते हैं। पुष्प-नारङ्ग या (स्कारलेट) रक्त रंग के गुच्छों में आते हैं। फली-दो-दो एक साथ, ३ इञ्च लम्बी तथा काकतुण्ड सदृश होती है। जड़-बहुत, पतली, हल्के पीले रंग की तथा भीतर से श्वेत रहती है । स्वाद कडुवा तथा तीता होता है । इसमें दुग्ध होता है। इसकी जड़, पञ्चांग एवं पत्र का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके पञ्चांग में एस्क्लेपिऑडिन् (Asclepiadin) नामक एक ग्लूकोसाइड होता है। इसकी जड़ में विंसेटॉक्सिन (Vincetoxin) नामक द्रव्य होता है जिसकी क्रिया इमेटीन (Emetine) सदृश होती है। गुण और प्रयोग-इसके कार्यकारी तत्त्व की क्रिया इमेटीन सदृश होती है। अर्क से भी इसका सादृश्य है। इससे रक्तवाहिनियों का संकोच एवं बड़ी धमनियों का विस्फार होता है। हृदय के लिये यह अवसादक है। अल्प मात्रा में यह आमाशय उत्तेजक, यकृत के लिये उत्तेजक, पित्तस्त्रावक, स्वेदजनन एवं कफघ्न है। अधिक मात्रा में यह वामक एवं विरेचक है। इसका प्रयोग कृमि, रक्तस्राव, राजयक्ष्मा, सोजाक, आमातिसार तथा अर्श में किया जाता है। (१) इसके पत्तों या पुष्पों का लेप रक्तस्राव रोकने के लिये करते हैं। (२) कफविकारों में इसको देने से कफ पतला होकर निकलता है। (३) सोजाक में इसका क्वाथ ताजा बनाकर देते हैं। १३८. काकनासा (२) हिं०-बिछुआ । म०-विंचु । बं०-बाघनोकी । ले०-Martynia diandra Glox. (मार्टिनिआ डाइएण्ड्रा ग्लोक्स.) Fam. Pedaliaceae (पेडॅलिएसी) । यह मेक्सिको (Mexico) का आदिवासी होते हुये भी भारत में काफी फैल गया है तथा कूड़े आदि के स्थानों पर होता है। इसका क्षुप-३, ४ फीट ऊँचा, मोटा, स्पर्श में मृदुरोमश, चिपचिपा तथा भींगा हुआ सा होता है। पत्ते-६- ९ इञ्च लम्बे, विपरीत, तांबूलाकार, दूर-दूर पर दन्तुर एवं तट पर लहरदार होते हैं एवं इनका पृष्ठ प्रायः ओसकणों के CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६०४ भावप्रकाशनिघण्टुः

समान एक चिपचिपे पदार्थ के सूक्ष्म बिन्दुओं से ढँका रहता है। फूल-३-४ इञ्च लम्बी और अग्र्य मंजरियों में नीचे की ओर लटके हुये, गुलाबी या गहरे बैंगनी रंग के एवं आकार में तिलपुष्प के समान होते हैं। फल-काले रंग का, बहुत कठोर, अग्र पर दो तीक्ष्ण एवं टेढ़े काँटों से युक्त होता है। इन फलों का भ्रमवश काकनासा या वृश्चिकाली नाम से प्रयोग चल रहा है, जो गलत है। फल का स्वरूप कुछ-कुछ बिच्छू के समान होने से तथा बिच्छू के काटने पर इसका लेप उपयोग में आने से इसे बिछुआ कहते हैं। गुण और प्रयोग-बिच्छू के काटने पर इसके फल को घिस कर लेप करते हैं। भपके से फल का निकाला हुआ तैल पामा आदि चर्म रोगों में उपयोगी बतलाया गया है। इसके पत्तों को अपस्मार में प्रयोग करते हैं तथा अपची में लेप करते हैं। १३९. काकनासा (३) ले०-Thunbergia alata Boj. (थन्बर्जिया एलेटा); Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। यह लता संभवतः अफ्रीका की आदिवासी है। अपने यहाँ उद्यानों में लगाई हुई पाई जाती है। इसकी लता पतली तथा आरोही होती है। पत्ते-मृदुरोमश, लट्वाकार, हृदयाकार एवं वृन्त प्रायः सपक्ष रहता है। पुष्प-पीत या श्वेताभ एवं भूरे या बैंगनी रंग की आँख से युक्त होते हैं। फल-काकतुण्ड सदृश होते हैं। कुछ लोग इसे काकनासा मानते हैं। अथ काकजङ्घा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह काकजङ्घा नदीकान्ता काकतिक्ता सुलोमशा। पारावतपदी दासी काका चापि प्रकीर्त्तिता ।।२५०।। काकजङ्घा हिमा तिक्ता कषाया कफपित्तजित्। निहन्ति ज्वरपित्तास्रव्रणकण्डूविषक्रिमीन् ।। २५१ ।। काकजङ्घा के नाम तथा गुण-काकजङ्घा, नदीकान्ता, काकतिक्ता, सुलोमशा, पारावतपदी, दासी और काका ये सब नाम काकजङ्घा के हैं। काकजङ्घा-शीतवीर्य, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त एवं कफ, पित्त, ज्वर, रक्तपित्त, व्रण (घाव), कण्डू (खुजली), विष और क्रिमि को दूर करनेवाली होती हैं। [२५०-२५१] नोट-काकजङ्घा के स्थान पर उत्तर प्रदेश में मसी का ग्रहण किया जाता है किन्तु यह निःसंदिग्ध रूप से काकजङ्घा नहीं माना जा सकता। डॉ० देसाई ने Leea hirta (लीआ हिर्टा) को काकजङ्घा माना है। श्री डॉ० बलवन्तसिंह जी ने 'सिमजंगा' नामक वृक्ष की तरफ ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि उसके स्थानिक नाम तथा गुण काकजङ्घा से मिलते- जुलते हैं। शास्त्रीय गुणों की दृष्टि से काकंजङ्घा विषमज्वरनाशक, कफ-पित्तशामक, तिक्त, चर्मरोगनाशक एवं रक्तपित्त, बाधिर्य, क्षत, विष एवं कृमि में लाभदायक होनी चाहिये। रा० नि० एवं ध० नि० इसे उष्ण मानते हैं। काकनासा, काकजङ्घा, काकमाची आदि काकसम्बन्धी वनस्पतियों का उल्लेख ग्रन्थों में आया है और टीकाकारों ने कहीं-कहीं एक को दूसरे का पर्याय बतलाया है। १४०. काकजङ्घा (१) हिं०-काकजङ्घा, मसी। बं०-नासकागा। म०-रान किरायता। ले०-Peristrophe bicalyculata Nees (पेरिस्ट्रोफ बाइकेलीक्युलेटा नीस्)। Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। यह सर्वत्र पाया जाता है। इसका क्षुप-३-६ फीट ऊँचा एवं शाखायें-प्रसरणशील होती हैं। काण्ड-षट्कोण एवं सन्धियाँ फूली हुई रहती हैं। पत्ते-रोमश, नोक वाले तथा नीचे बड़े एवं ऊपर छोटे होते हैं। नीचे के पत्ते ४.२५" x २.७५" होते हैं। पुष्पवाहक शाखाएँ अत्यन्त शाखाओं से युक्त और अन्तिम छोटी-छोटी शाखाएँ केवल दो- दो पुष्पों वाली होती हैं जिनमें प्रायः एक पुष्प अर्ध विकसित रहता है। पुष्प-छोटे, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं।

गुडूच्यादिवर्गः ६०५ गुण और प्रयोग-काकजङ्घा के स्थान पर उत्तर प्रदेश में इसी का व्यवहार किया जा रहा है। किन्तु इसके काकजङ्घा होने में सन्देह है। इसको सर्पविष में उपयोगी बतलाया जाता है। १४१. काकजङ्घा (२) सं०-काकजङ्घा। हिं०-चिरईगोड़ा, मिजुरगोरवा। असा०-ओसाई। बं०-बोरूना गोडा। ले०-Vitex peduncularis Wall. (वाइटेक्स पेडन्क्युलेरिस् वाल.)। Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)। यह बिहार, मध्य प्रदेश, आसाम तथा पूर्वी बंगाल से तेनासरिम् तक होता है। इसके वृक्ष-छोटे २०, २५ फीट ऊँचे एवं शाखाएँ मृदुरोमश होती हैं। पत्ते-संयुक्त एवं त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-लम्बे, भालाकार, ४.५" × १" बड़े, नोकीले, अधरतल पर सूक्ष्म पीतवर्ण की ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। वृन्त प्रायः सपक्ष होते हैं। पुष्प-६-११ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में श्वेतवर्ण के तथा कण्ठ में पीले पुष्प आते हैं। फल-मांसल, गुठलीदार एवं .३५-.४ इञ्च बड़ा होता है। इसके पत्तों का व्यवहार किया जाता है। इसका एक अन्य जाति V. lencoxylon Linn. (वा. ल्यूकोक्साइलोन् लिन.) पायी जाती है। इनके स्थानिक नाम सिमजङ्घा, मुरगी-गोडा, चिरई गोडा आदि काकजङ्घा के समानार्थक मालूम पड़ते हैं तथा इसका जंगली लोग विशिष्ट विषमज्वर Blackwater Fever (ब्लॅक वाटर फीवर) में प्रयोग भी करते हैं। काकजङ्घा को शास्त्रकारों ने विषमज्वर में उपयोगी बतलाया है। वरुण वृक्ष के पत्तों की तरह इसकी त्रिपत्रक पत्तियाँ होने के कारण इसे कहीं-कहीं वरुना भी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक उड़नशील तैल, अधिक मात्रा में टॅनिन, गोंददार पदार्थ एवं कुछ ग्लूकोसाइड सदृश पदार्थ होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का फांट मलेरिया जैसे ज्वरों में विशेषकर Blackwater fever (ब्लॅक वाटर फीवर) में प्रयोग किया जाता है। दो औंस ताजे या छाया में सुखाये पत्तों को ४० औंस जल में ५।१० मिनट उबाल कर १ घंटा सीझने देते हैं। चाय की तरह बना यह फांट कुछ चीनी मिला कर दिन भर में ८ से १० औंस की मात्रा में दिया जाता है। १४२. काकजङ्घा (३) सं०, हिं०, बं०, म०-काकजङ्घा। ले०-Leea hirta Roxb. (लीआ हिर्टा राक्स.)। Fam. Vitaceae (वेटेसी)। यह सिक्किम हिमालय, आसाम, पूर्व बंगाल, सिलहट एवं अण्डमान में होती है। इसकी १.२-३ मी० ऊँची झाड़ी होती है। नये काण्ड मृदुरोमश; पत्ते-संयुक्त; पत्रक-७.५-१८ × २.५-४.५ से० मी०, आयताकार या अण्डाकार-आयताकार, लम्बाग्र, असम दन्तुर, रोमश, अधोपृष्ठ गोल, चिपटे, चकत्तों से युक्त एवं पत्रदण्ड कोणदार; पुष्प-श्वेत मंजरियों में; फल-६ मि० मि० व्यास के, दबे हुये गोल एवं पकने पर काले होते हैं। इसकी जड़ का चिकित्सा में व्यवहार करते हैं। गुण और प्रयोग-यह स्नेहन तथा संग्राहक है। इसके पंचांग में क्षयनाशक गुण भी पाया गया है। अथ नागपुष्पी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह नागपुष्पी श्वेत पुष्पा नागिनी रामदूतिका। नागिनी रोचनी तिक्ता तीक्ष्णोष्णा कफपित्तनुत् । विनिहन्ति विषं शूलं योनिदोषवमिक्रिमीन् ।।२५२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

६०६ भावप्रकाशनिघण्टुः नागपुष्पी के नाम तथा गुण-नागपुष्पी, श्वेतपुष्पा, नागिनी और रामदूतिका ये नाम नागपुष्पी के हैं। नागपुष्पी-तिक्त, रसयुक्त, रोचक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य एवं कफ, पित्त, विष, शूल, योनिसम्बन्धी दोष, वमन तथा क्रिमि को नष्ट करने वाली होती है। [२५२] १४३. नागपुष्पी हिं०-नागपुष्पी। म०-नागाली। नागपुष्पी लता जाति की वनौषधि जङ्गल में वृक्षों पर फैली हुई रहती है। एक-एक शाखा में एक-एक पत्ता होता है। फूल-सफेद और काले रंग के होते हैं। बेल के नीचे कन्द बैठता है। उपर्युक्त वर्णन सुना जाता है। किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से इसका निर्णय अभी नहीं हो सका है। नागपुष्पों का उल्लेख रा० नि०, ध० नि० में नहीं मिलता। चिकित्सा में भी इसका विशेष प्रयोग नहीं होता। अथ मेषशृंगी (मेढाशिङ्गी) । तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह मेषशृङ्गी विषाणी स्यान्मेषवल्ल्यजशृङ्गिका। मेषशृङ्गी रसे तिक्ता वातला श्वासकासहृत् ।। २५३ ।। रूक्षा पाके कटुः पित्तव्रणश्लेष्माक्षिशूलनुत् ।। २५४ ।। मेषशृङ्गीफलं तिक्तं कुष्ठमेहकफप्रणुत्। दीपनं संसनं कासक्रिमिव्रणविषापहम् ।। २५५ ।। मेढ़ाशिंगी के नाम तथा गुण-मेषशृङ्गी, विषाणी, मेषवल्ली और अजशृङ्गिका ये सब संस्कृत नाम हैं। मेढ़ाशिंगी-तिक्त रसयुक्त, वातकारक, रूक्ष, विपाक में कटु रसयुक्त एवं श्वास, कास, पित्त, व्रण, कफ और नेत्रशूल को दूर करने वाली होती है। मेढ़ाशिंगी का फल-तिक्त रसयुक्त, अग्निदीपक, संस्रनं एवं कुष्ठ, प्रमेह, कफ, कास, कृमि, व्रण और विष को नष्ट करने वाला होता है। [२५३-२५५] नोट-मेषशृङ्गी भी सन्दिग्ध द्रव्य है। अधिकांश विद्वानों ने 'गुडमार' को मेषशृङ्गी माना है। कुछ ने 'मरोडफली' को मेषशृङ्गी माना है। मरोडफली को कुछ मूर्वा के स्थान पर ग्रहण करते हैं जिसका पहले मूर्वा के अन्तर्गत वर्णन किया जा चुका है। मेषशृङ्गी दोनों का एक जगह पाठ किया है इससे ये दो अलग द्रव्य मालूम पड़ते हैं किन्तु भावप्रकाश एवं ध० नि० दोनों का पर्याय के रूप में उल्लेख करते हैं। चरक में तिल्वक कल्प एवं शीतज्वरोक्त अगुर्वादि तैल में उल्लेख है। सुश्रुत ने विष एवं अक्षिविकार में इसका प्रयोग किया है। यहाँ गुडमार का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। १४४. मेढ़ाशिंगी सं०-मधुनाशिनी। हिं०-मेढासिंगी, गुडमार। बं०-मेषसिंगी। म०-मेढ़ाशिंगी, कावकी। ता०-शिरुकुरंज। ते०-पोडापत्री। ले०-Gymnema sylvestre R. Br. (जिमनेमा सिल्वेस्ट्रे)। Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी)। यह कोंकण, त्रावणकोर, गोवा, दक्षिण भारत में विशेष रूप से होती है। बिहार एवं उ० प्र० में भी कहीं-कहीं मिलती है तथा बाग़ों में लगाई हुई पाई जाती है। इसकी लता-चक्रारोही, पतले काण्ड की, काष्ठमय, रोमश तथा बहुत फैली हुई होती है। पत्ते-अभिमुख, अंडाकार- आयताकार या लट्वाकार, कभी-कभी हृद्गत, १-२ इञ्च लम्बे, कभी-कभी ३ इञ्च लम्बे, नोकदार एवं मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीले, समस्थ मूर्धजक्रम में निकले हुए एवं आभ्यन्तर कोश घण्टिकाकार-चक्राकार होते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, .२-.३ इञ्च मोटी, कठोर, भालाकार क्रमशः नोकीली होती है। दो में से प्रायः एक फली का विकास

नहीं होता। इसके सर्वांग में दूध होता है। मूल-१-१/४ इञ्च मोटा तथा बाहर से मुलायम एवं उस पर बीच-बीच में सीधी, लम्बाई में गढ़ेदार नालियाँ होती हैं। मूल सूखने पर छाल पतली होकर आड़े बल में फट जाती है। इसका स्वाद साधारण कड़वा होता है। इसकी पत्तियों को चबाने से जीभ की स्वाद ग्रहणशक्ति नष्ट हो जाती है जिससे १-२ घण्टे तक मधुर तथा तिक्तरस का स्वाद नहीं मालूम पड़ता। इसी से इसे गुड़मार या मधुनाशिनी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें Gymnemic acid (जिम्नेमिक एसिड) नामक एक पदार्थ होता है। पत्तों में ॲन्थ्राक्विनोन कम्पाउण्ड (Anthraquinone compound) होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण इपिकाक तथा उतरण जैसे हैं। यह कफघ्न तथा वामक है। इसके पत्तों के सेवन से मधुमेह में लाभ होता है। (१) मधुमेह में इसके पत्तों को चबाने से या इसके पत्र चूर्ण को १-२ माशे की मात्रा में गोदुग्ध वा मधु के साथ सेवन से लाभ होता है। (२) जड़ की छाल से हल्लास, स्वेदोत्पत्ति एवं अधिक मात्रा (१५-३० र०) से वमन होता है। इससे कफ निकलता है एवं शरीर पीड़ा कम होती है। (३) सर्पदंश में मूल का क्वाथ पिलाते हैं तथा लेप करते हैं जिससे वमन, विरेचन होकर विष कम होता है। बाद में उत्तेजक औषधियाँ देते हैं। (४) पत्तों को पीसकर सूजन तथा व्रण पर लेप करते हैं। मात्रा-पत्रचूर्ण १-२ माशा, मूलत्वक् १-२ र० कफघ्न, १५-३० र० वामक।

अथ हंसपदी (हंसराज) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह हंसपादी हंसपदी कीटमाता त्रिपादिका। हंसपादी गुरुः शीता हन्ति रक्तविषव्रणान्। विसर्पदाहातीसारलूताभूताग्निरोहिणीः ॥२५६॥

हंसराज के नाम तथा गुण-हंसपादी, हंसपदी, कीटमाता और त्रिपादिका ये संस्कृत नाम हंसराज के हैं। हंसराज-गुरु, शीतवीर्य एवं रक्तविकार, विष, व्रण, विसर्प, दाह, अतीसार, लूताविष, भूतग्रह और अग्निरोहिणी (कक्षास्फोट) को दूर करती है। [२५६]

१४५. हंसराज हिं०-हंसपदी, समलपत्ती, हंसराज, गोधपदी। बं०-गोयलिया लता, कालीसाह। गु०-हंसराजा। म०- हंसपदी, हंसराजा। फा०-परसा उशां, परस्यां वशां। अ०-शारूजीनां, शारूल अर्ज। अं०-Maiden hair (मैडेन हेयर)। ले०-Adiantum lunulatum Burm. (एडीएण्टम् लुनुलेटम् वर्म.)। Fam. Polypodiaceae (पॉलिपोडिएसी)। यह उत्तरी भारत के आर्द्र स्थानों में एवं दक्षिण के पश्चिमी मैदानों तथा पहाड़ियों के निचले भागों में होती है। यह वनस्पति सुन्दर तथा छोटी होती है। इसमें अन्तर्भूमिशायी कांड होता है। इससे केवल पत्ते बाहर निकले रहते हैं। पत्रदण्ड काला, चमकीला होता है। पत्रक-कुछ-कुछ वृत्ताकार या अंडाकार, आयताकार, .५-१.३ इञ्च लम्बे, अग्र की ओर का किनारा सरल और आधार की ओर का किनारा घुमावदार होता है। इसमें पुष्प नहीं होते। अधर तल के किनारे पर बीजाणु कोष (Sporagia) होते हैं। इसका चरक में कण्ठ्य महाकषाय, मधुर स्कन्ध तथा सुश्रुत में विदारिगन्ध्यादि गण में पाठ है। चिकित्सा में पंचांग का व्यवहार किया जाता है।

६०८ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-यह मधुर, शीत, कण्ठ्य, कुछ ग्राही, कफघ्न एवं कुछ मूत्रजनन है। अधि मात्रा से वमन होता है। इसका प्रयोग ज्वर, रक्तविकार, विसर्प, विषविकार एवं कण्ठ विकार में करते हैं। बच्चों के कास में इससे लाभ होता है। इसके पंचांग का शरबत बना कर १/२-१ तो० की मात्रा में प्रयोग करते हैं। मात्रा-१०-३० रत्ती। अथ सोमलता। तस्या नामगुणानाह सोमवल्ली सोमलता सोमक्षीरी द्विजप्रिया। सोमवल्ली त्रिदोषघ्नी कटुस्तिक्ता रसायनी ॥२५७॥ सोमलता के नाम तथा गुण-सोमवल्ली, सोमलता, सोमक्षीरी और द्विजप्रिया ये सब सोमलता के पर्यायवाची शब्द हैं। सोमलता-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, त्रिदोषनाशक एवं रसायन होती है। [२५७] सोमलता सोमलता नामक दिव्य औषधि क्या है ? इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने विचार किया है किन्तु अभी तक इसका निर्णय नहीं हो सका है। वास्तव में सुश्रुत में ही इसके संबंध में लिखा है कि अधर्मी, कृतघ्न, भेषजद्वेषी तथा ब्राह्मणद्वेषी लोगों को यह दिखलाई नहीं देती। आधुनिक युग में कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जो किसी न किसी अवगुण से युक्त न हो। उपर्युक्त वचन से ऐसा प्रतीत होता है कि यह वनस्पति उस काल में भी अप्राप्य या दुष्प्राप्य रही हो और उसके स्थान पर उसके प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग होता रहा हो। सोम का वर्णन ऋग्वेद तथा पौराणिक साहित्य में भी है। यज्ञ के पूर्व आनन्ददायक पेय के रूप में सोमरस-पान किया जाता रहा। सोम को ओषधिराज लिखा है। इसी प्रकार के एक द्रव्य का उल्लेख प्राचीन पारसी धर्म ग्रंथ 'जन्द अवस्ता' में है, जिसे होम कहते हैं। संभव है होम यह सोम का परिवर्तित रूप हो। इसी आधार पर होम नाम से प्रयुक्त द्रव्यों को कुछ विद्वानों ने सोम माना है। सुश्रुत में इसके संबंध में विशद वर्णन मिलता है। यह हिमालय, विन्ध्य, काश्मीर, मलय आदि स्थानों में होती है। इसके स्थान, नाम, आकृति, वीर्य भेद से २४ प्रकार होते हैं। इस लता में शुक्ल पक्ष में एक-एक पत्र प्रतिदिन बढ़ कर पूर्णिमा को १५ पत्ते हो जाते हैं तथा कृष्ण पक्ष में एक-एक पत्र घट कर अमावस्या को यह बिना पत्र के हो जाता है। इस लता में दुग्ध होता है तथा नीचे कन्द भी होता है। कायाकल्प के लिये कुटी प्रावेशिक विधि से इसके सेवन का वर्णन सुश्रुत में किया है। यह श्रेष्ठ मादक द्रव्य है। इससे बल, वाक्शक्ति, स्फूर्ति, सौमनस्य एवं अमरत्व की प्राप्ति होती है। प्रत्येक रोग को दूर कर यह मन को आनन्द देने वाली लता है। इसमें अन्य मादक द्रव्यों का कोई दोष नहीं होता। सोम के नाम से जिनका उल्लेख किया जाता है उनमें से कुछ का संक्षेप में यहाँ वर्णन दिया गया है, यद्यपि दिव्य गुण वाली सोम इनमें से कोई मालूम नहीं पड़ती। १४६. सोम (१) सं०-सोम। हिं०-टुटगंठा। पं०-अमसानिया, बुदशुर, चेवा। स०-फोत्र। ई०-होम, हुम्। क०-खम, खंड। अं०-Ephedrs; Ma-huang (एफेड्रा, मा-हाँग)। ले०-Ephedra gerardiana (Wall) Stapf; E. nebrodensis (Tineo) Stapf (एफेड्रा जेरार्डिआना; ए. नेब्रोडेन्सिस्)। Fam. Gnetaceae (ग्नेटेंसी)। इनमें से ए. जेरार्डिआना हिमालय के शुष्क एवं ऊँचे स्थानों में ७-१६ हजार फीट तक बहुत होता है। पंगी, लाहौल, कनवार, सिमला जिले के शाली स्थान, कश्मीर एवं लद्दाख में बहुत होता है। ए. नेब्रोडेन्सिस, लाहौल, पश्चिमी तिब्बत, बलूचिस्तान एवं वजीरिस्तान में होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

औषध के लिए इसके काण्ड का संग्रह वसन्त ऋतु में करते हैं। ए. जेरार्डिआना का क्षुप—छोटा, सर्पणशील, कडा तथा गुच्छे के रूप में होता है। शाखाएँ—प्रतिग्रंथि पर दो और अभिमुख या अनेक एक चक्र में निकली रहती हैं। ये सीधी, हरी एवं रेखा युक्त होती हैं। पर्व करीब १/२ इञ्च से १ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं तथा दियासलाई की सीक की तरह दिखलाई देते हैं। पुराने काण्ड की त्वचा धूसर हो जाती है। पत्ते—वल्क सदृश होते हैं और प्रत्येक ग्रन्थि पर इन वल्कपत्रों के मिलने से एक पीताभ या भूरा करीब २ मि० मि० लम्बा द्विविभक्त कोष बना होता है। पुष्प—नरपुष्पों की अंडाकार विदण्डिक मंजरियाँ अकेली या २-३ के गुच्छे में रहतीं हैं जिनमें ४-८ नरपुष्प होते हैं। नारीपुष्पों की मंजरी प्रायः अकेली और १-२ पुष्पों से युक्त होती है। फल—७.५-१० मि० मि० लम्बा, लट्वाकार, लाल, मधुर तथा खाने लायक होता है। बीज—१-२ दोनों तरफ फूले हुये होते हैं। काण्ड में तीव्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद

६१० भावप्रकाशनिघण्टुः सौम्या महिषवल्ली च प्रतिसोमाऽन्त्रवल्लिका। अपत्रवल्लिका प्रोक्ता काण्डशाखा षडाह्वया। रसवीर्यविपाके च सोमवल्लीसमा स्मृता।। रा. नि. गुण और प्रयोग-अर्क दुग्ध की तरह इसके दूध का भी उपयोग होता है जो बहुत गुणकारी माना जाता है और इसी लिये इसको बाघ दूध कहते हैं। राक्सवर्ग के मतानुसार इसका दूध खट्टा होता है तथा यात्री तृषा शमन के लिये इसका उपयोग करते हैं। शुष्क काण्ड वामक माना जाता है। अथाकाशवल्ली (अमरवेल)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह आकाशवल्ली तु बुधैः कथिताऽमरवल्लरी ।।२५८।। खवल्ली ग्राहिणी तिक्ता पिच्छिलाऽक्ष्यामयापहा। तुवराऽग्निकरी हृद्या पित्तश्लेष्मामनाशिनी ।।२५९।। अमरबेल के नाम तथा गुण-आकाशवल्ली का ही पर्यायवाचक शब्द अमरवल्लरी है, ऐसा पण्डित लोग कहते हैं, अर्थात्-आकाशवल्ली, खवल्ली, अमरवल्ली ये नाम अमरवेल के हैं। अमरवेल-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, मलसंग्राहक, पिच्छिल, नेत्ररोगनाशक, जठराग्निवर्धक, हृदय के लिये हितकर एवं पित्त, कफ तथा आम को नष्ट करनेवाली होती है। [२५८-२५९] नोट-प्राचीन ग्रन्थों में अमरबेल का उल्लेख नहीं है। अमृतवल्ली शब्द आया है, जिसका अर्थ टीकाकारों ने गुडूची किया है। कुछ विद्वानों ने अमरबेल नाम (Cuscuta reflexa) (कस्कुटा रिफ्लेक्सा) को दिया है तथा आकाशबेल (Cassytha filiformis) कॅसिथा फिलिफॉर्मिस् को दिया है। दोनों ही पराश्रयी लताएँ (Parasitic climber) हैं। दोनों एक स्थान पर उगी हुई नहीं पाई जाती। दोनों का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। १४८. अमरवेल (१) हिं०-आकाश वेल, अमर वेल। बं०-आलोक लता। म०-आकाश वेल, अमर वेल। गु०-अमर वेल। अ०-मून, कसूस। पं०-निराधार। फा०-अफतीमून। अं०-Dordar (डॉर्डर)। ले०-Cuscuta reflexa Roxb. (कस्कुटा रिफ्लेक्सा राक्स.)। Fam. Convolvulaceae (कॉन्हॉलहूलेसी)। यह भारत के सभी मैदानी भागों में तथा ८००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसकी लता-परोपजीवी होती है तथा जिस किसी वृक्ष पर फैलती है उसे अपने बोझ से झुका तक देती है। कभी- कभी इतनी फैलती है कि सारे वृक्ष को ढक देती है। अधिकतर बेर, बबूल के वृक्षों पर फैली रहती है। इसमें पत्ते नहीं होते, काण्ड-पतले एवं प्रायः पीले रंग के आपस में गुथे हुये होते हैं। पुष्प-१/४-१/३ इञ्च लम्बे, श्वेताभ या गुलाबी, सुगंधित, नलिकाकार, एकाकी या गुच्छों में आते हैं। फल-१/४-१/३ इञ्च व्यास के, दबे हुये, गोल एवं मांसल होते हैं। इसके मूल आधारादि वृक्ष के कांडों से ससक्त रहते हैं, जहाँ से वे अपना आहार ग्रहण करते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें कुस्कुटिन (Cuscutin) नामक एक रवेदार रंजक पदार्थ ०.२% होता है। इसके अतिरिक्त लॅक्टोन (Lactone) के समान गुण वाला कस्कुर्टलिन् (Cuscutalin) १%, बादामी रंग का मोम ०.१% तथा अपचायक शर्करा (Reducing sugar) होती है। इसके बीजों में स्थिर तैल ३%, रंजक द्रव्य अमरबेलिन (Amarbelin), कड़वी राल तथा अपचायक शर्करा (Reducing sugar) पाई जाती हैं। गुण और प्रयोग-यह आनुलोमक, पित्तसारक तथा यकृतोत्तेजक है। आश्रयी वृक्ष के अनुसार इसके गुण धर्म में कुछ परिवर्तन हो सकता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ६११ (१) इसका फाण्ट खुजली तथा व्रण-प्रक्षालन के काम में आता है। (२) यकृत् वृद्धि तथा विबंध हो तो इसका रस देने से दूषित पित्त निकल जाता है तथा विबंध भी दूर होता है। (३) इसके बीजों को उबाल कर उससे पेट सेंकने से वायु का अनुलोमन होता है। (४) कुछ लोगों ने इसका घाघरवेल नाम से उल्लेख किया है तथा लिखा है कि पंजाब में दाइयाँ इसके क्वाथ को गर्भपात कराने के लिये प्रयोग में लाती हैं। १४९. अमर वेल (२) हिं० - अमर वेल। ले० - Cassytha filiformis Linn. (कॅसिथा फिलिफ़ॉर्मिस् लिन.)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)। यह भारत में सभी स्थानों पर विशेषकर समुद्री किनारों पर अधिक होती है। इसकी लता—पराश्रयी, पत्रहीन, उपर्युक्त प्रथम अमरवेल की तरह होती है तथा शाल, करौंदा, कुटज तथा जामुन आदि वृक्षों पर फैली रहती है। इसका रंग पहली की अपेक्षा अधिक हरा होता है। पुष्प—अवृन्त, श्वेत, .५-१.५ इञ्च लम्बी मंजरियों में रहते हैं और उनके आधार पर तीन चौड़े तथा लम्बे और लट्वाकार कोणपुष्पक होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें एक क्षाराम होता है। गुण और प्रयोग—यह बल्य, केश्य, व्रणरोपण एवं वृष्य है। (१) इससे सर के बाल धोने से जूंयें आदि नष्ट होते हैं। इसे पीसकर तेल में मिलाकर केश वृद्धि के लिये काम में लाते हैं। मक्खन तथा सोंठ के साथ इसे व्रणरोपण के लिये काम में लाते हैं। (२) इसका क्वाथ यकृत प्लीहोदर, गण्डमाला, क्षय आदि लक्षणयुक्त व्याधि में प्रयोग करते हैं। अथ पातालगरुडी। तस्या नामगुणानाह छिलिहिण्टो महामूलः पातालगरुडाह्वयः। छिलिहिण्टः परं वृष्यः कफघ्नः पवनापहः॥२६०॥ 'पातालगरुडी' के नाम तथा गुण—छिलिहिण्ट, महामूल, पातालगरुड, ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। पातालगरुडी—अत्यन्त वृष्य (वीर्यवर्धक), कफ तथा वायु को शमन करने वाली होती है। [२६०] १५०. पाताल गरुडी हिं० - पातालगरुड़ी, छिरेटा, फरीदबूटी, चिरहिटा, छिरहटा, जलजमनी। बं० - हयेर। म० - वासनवेल, भुर्युपाडल, तान्हिचावेल। गु० - पातालगलोरी, वेवड़ी। ते० - दूसरैंतिगे। क० - दागुडी। ता० - कातुक कोदी। ले० - Cocculus hirsutus (Linn.) Diels (कॉक्सुलस् हिर्सुटस)। Fam. Menispermaceae (मेनिस्पर्मेसी)। यह इस देश के प्रायः सब गरम और साधारण प्रान्तों में हिमालय से दक्षिण तक पायी जाती है। इसकी आरोही लता—झाड़ियों आदि पर फैली हुई रहती है। शाखायें तथा पत्र मृदु श्वेताभ रोमावरण से ढँके रहते हैं। पत्ते—इनके आकार और कद में बड़ी विभिन्नता रहती है। नीचे के पत्ते प्रायः लट्वाकार, आयताकार, ३" × २" तक बड़े और ऊपर के क्रमशः छोटे और आयताकार होते हैं। पुष्प—एकलिंग, हरिताभ एवं सूक्ष्म होते हैं। फल—काले बैंगनी रंग के, चने के बराबर, एवं चिकने होते हैं तथा इनके भीतर काला रस रहता है। पुष्प वर्षा में एवं फल शीत में लगते हैं। मूल—काफी नीचे चला जाता है तथा मजबूत होता है। इसके पत्तों को जल में मसलने से जल जम जाता है। इसलिये इसे जलजमनी कहते हैं। इसकी जड़ को सर्पविष में बहुत उपयोगी बतलाया गया है इसलिये इसका पातालगरुड़ी नाम सार्थक मालूम पड़ता है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६१२ भावप्रकाशनिघण्टुः वर्णन नहीं पाया जाता। इसकी जड़ एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाठामूल के स्थान पर इसकी जड़ ली जाती है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ उष्ण, स्वेदजनन, सौम्य, बलवर्धक, मूत्रजनन, मूत्रमार्ग के लिये शामक एवं ग्राही, ज्वरहर, वायुहर एवं शोधन है। यह सार्सापरिला की तरह उपयोगी है। पत्ते दाहप्रशमन, मूत्रजनन, शोथहर, स्तन्यजनन एवं त्वग्दोष नाशक हैं। (१) इसकी जड़ का बकरी के दूध में तैयार किया हुआ क्वाथ पीपल, सोंठ, आदि सुगन्धि द्रव्यों के साथ जीर्ण आमवात, विशेषकर यदि उपदंश के कारण उत्पन्न हो, सन्धिशोथ तथा त्वचा के रोगों में देते हैं। (२) जमाया हुआ स्वरस शीतवीर्य होने के कारण जीरक एवं मिश्री के साथ नूतन सोजाक में बहुत उपयोगी है। (३) पत्तों को पीसकर शोथ, चोट आदि पर बाँधने से लालिमा एवं पीड़ा कम होती है। शिरःशूल में भी बाँधते हैं। (४) इसकी जड़ का प्रयोग बस्तिशोथ तथा अन्य प्रमेहों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १-२ तोला; मूल-३-६ माशा। अथ वन्दा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह वन्दा वृक्षादनी वृक्षभक्ष्या वृक्षरुहाऽपि च। वन्दाकः स्याद्धिमस्तिक्तः कषायो मधुरो रसे। मङ्गल्यः कफवातास्ररक्षोव्रणविषापहः ।।२६१।। 'बन्दा' के नाम तथा गुण-बन्दा, वृक्षादनी, वृक्षभक्ष्या, वृक्षरुहा और बन्दाक्व ये नाम 'बान्दा' के हैं। बान्दा- तिक्त, कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, मङ्गलमय एवं कफ, वातरक्त, राक्षसबाधा, व्रण और विष को दूर करता है। [२६१] १५१. बान्दा (१) हिं०-बन्दा, बांदा, बंदाक। बं०-बरमांदा, मान्दा। म०-बांडागुल। गु०-बांदो। ते०-बादनीका। अ०- खरकताना। ले०-Loranthus longiflorus Desr. (लोरेन्थस् लॉगिफ्लोरस् डेस.); Syn. Dendrophthoe falcata (Linn. f.) Etting. (डेण्ड्रोफ्थो. फॅलकेटा)। Fam. Loranthaceae (लोरेन्थेसी)। यह भारत में सर्वत्र पाया जाता है। इस कुल की वनस्पतियाँ अर्धपराश्रयी होती हैं। जिन वृक्षों के ऊपर यह उगती हैं, उनसे अपना भोजन ग्रहण करती है तथा स्वतः हरी होने के कारण स्वयं भी अपने लिये भोजन निर्माण करती है। उपर्युक्त बांदा अनेक प्रकार के वृक्षों पर उगा हुआ पाया जाता है। यह काष्ठीय होता है। शाखायें-चिकनी, चीमड़, कुछ लटकती हुई तथा कुछ सीधी एवं ३-४ फीट लम्बी होती हैं। पत्ते-३-६ इञ्च लम्बे, १-२ इञ्च चौड़े, चिकने, अनेक आकार के तथा मोटे होते हैं। फूल-रक्त, नारङ्ग या गुलाबी रंग के, १-२ इञ्च लम्बे और उनका सवर्ण कोश नालाकार होता है। फल-मांसल एवं बीज चिपचिपे होते हैं। इसके पुष्प एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, कषाय, कफघ्न, वातनाशक, मूत्रविरेचनीय, रक्तविकार नाशक एवं व्रणरोपक है। (१) शोथ पर इसके पत्तों एवं पुष्प को पीस-गरम कर लेप करने से सूजन दूर होती है। (२) इसके पुष्पों का प्रभाव हृदय एवं रक्तवाहिनियों पर होता है। हृदयोद्भूत श्वास, क्षयोद्भूत श्वास, फुप्फुसशोथ, रक्तपित्त, अपस्मार, उन्माद एवं ज्वर में प्रलाप होने पर इसे देते हैं। मात्रा-स्वरस १-२ तोला।

गुडूच्यादिवर्गः ६१३ नोट-उपर्युक्त बांदे की और दो-तीन जातियाँ होती हैं। इनके अतिरिक्त एक अन्य प्रजाति का बांदा होता है। जिसकी भी दो उपजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें किशमिश काबली प्रभावकर द्रव्य है जिसका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। १५२. बान्दा (२) ले०-Viscum album Linn. (विस्कम् ॲल्बम् लिन.); Fam. Loranthaceae (लोरेंन्थेसी)। जौ०- चुल्लू का बांदा। यू०-किशमिश काबली। अ०-दिब्क, मबीजजे असली। यह हिमालय में कश्मीर से नेपाल तक ३०००-७००० फीट तक होता है। ये प्रायः क्रम में निकली रहती हैं। पत्ते-२ इञ्च लम्बे, १/२ इञ्च चौड़े, विनाल, आयताकार या ऊपर से भालाकार होते हैं। आधार पर इनमें ३-५ शिराएँ होती हैं। पुष्प-प्रति गुच्छे में ३-५ पुष्प होते हैं। फल-१/४ इञ्च लम्बे, सफेद, चिकने तथा पारदर्शक होते हैं। बाजार में मटर जितने बड़े, नरम, झुर्रीदार और भूरे रंग के सूखे फल मिलते हैं। इनके भीतर एक छोटा बीज तथा चिपचिपा पदार्थ होता है। इन फलों का चिकित्सा में प्रयोग होता है। गुण और प्रयोग-इसकी क्रिया हृदय पर डिजिटॅलिस सदृश होती है, जिससे हृदय को बल मिलता है तथा मूत्र की वृद्धि होती है। गर्भाशय पर इसका प्रभाव अर्गट की तरह होता है, जिससे गर्भाशय का संकोच होता है। (१) हृद्रोग एवं जलोदर में इसे देने से लाभ होता है। (२) अत्यार्तव एवं प्रसवोत्तर रक्तस्राव में पिपरामूल के साथ इसका फाण्ट देने से लाभ होता है। (३) प्लीहावृद्धि, अपस्मार, कटीपीड़ा, गुल्म, अर्श, क्षत, व्रण, कर्णपूय आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-फल ५-१५ रत्ती। अथ वटपत्री । तस्या नामगुणानाह वटपत्री तु कथिता मोहिन्त्यैरावती बुधैः । वटपत्री कषायोष्णा योनिमूत्रगदपहा ॥२६१॥ 'वटपत्री' के नाम तथा गुण-वटपत्री की विद्वान् लोग मोहिनी और ऐरावती कहते हैं। वटपत्री-कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य एवम् योनि तथा मूत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है। [२६२] १५३. वटपत्री इसका निर्णय अभी तक नहीं हो सका है। निम्नलिखित वनस्पति को कुछ विद्वान् वटपत्री मानते हैं। ले०-Saxifraga ligulata Wall. (सॅक्सीफ्रेगा लीगुलेटा वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सोफ्रेगॅसी)। यह पाषाणभेद का ही भेद है तथा इसका वर्णन हरीतक्यादि वर्ग में पाषाणभेद के अंतर्गत पृष्ठ १०५ पर किया गया है। अथ हिङ्गुपत्री । तस्या नामानि गुणाँश्चाह हिङ्गुपत्री तु कवरी पृथ्वीका पृथुका पृथुः ॥२६३॥ हिङ्गुपत्री भवेद्धृद्या तीक्ष्णोष्णा पाचनी कटुः । हृद्रुस्तिरुग्विबन्ध्यार्शःश्लेष्मगुल्मानिलापहा ॥२६४॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

६१४ भावप्रकाशनिघण्टुः हिङ्गुपत्री के नाम तथा गुण-हिङ्गुपत्री, कवरी, पृथ्विका, पृथुका और पृथु ये सब नाम हिङ्गुपत्री के हैं । हिङ्गुपत्री- कटुरसयुक्त, रुचिजनक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पाचक एवं हृद्रोग, बस्तिरोग, विबन्ध, अर्श, कफ, गुल्म और वायु को दूर करने वाली होती है । [२६३-२६४] १५४. हिङ्गुपत्री हिङ्गुपत्री तथा आगे वर्णन की हुई वंशपत्री के विषय में थोड़ा मतभेद है । चरक में अपस्मार एवं उन्माद की चिकित्सा में क्रमशः हिङ्गुपत्री एवं हिङ्गुशिवाटिका इनका प्रयोग आया है । इसकी टीका में चक्रपाणि ‘वंशपत्री’ लिखते हैं । ‘नाडीहिङ्गु’ या ‘डीकामाली’ जिसका वर्णन पहले हरीतक्यादि वर्ग में किया जा चुका है, उसे ‘हिङ्गुपत्री’ कह सकते हैं, क्योंकि उसकी पत्र-कलिकाओं के ऊपर किसी-किसी ऋतु में पीला गोंद बूँद के रूप में निकला रहता है । इसकी छाल कट जाने पर वहाँ से भी गोंद निकलता है । इसमें उग्र गन्ध होती है । इसे डीकामाली या नाडीहिङ्गु कहते हैं । इस आधार पर नाडीहिङ्गु को हिङ्गुपत्री माना जा सकता है । हरीतक्यादि वर्ग में पृष्ठ ५५ पर नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) का वर्णन देखें । वंशपत्री । तस्या नामानि गुणाँश्चाह वंशपत्री वेणुपत्री पिण्डा हिङ्गुशिवाटिका । हिङ्गुपत्रीगुणा विज्ञैर्वंशपत्री च कीर्त्तिता ।।२६५।। वंशपत्री के नाम तथा गुण-वंशपत्री, वेणुपत्री, पिण्डा और हिङ्गुशिवाटिका ये नाम वंशपत्री के हैं। वंशपत्री- इसे विद्वानों ने गुणों में हिङ्गुपत्री के संमान बताया है । [२६५] १५५. वंशपत्री वंशपत्री भी संदिग्ध है । भावप्रकाशकार इसके गुण हिङ्गुपत्री की तरह ही बतलाते हैं । चक्रपाणि हिङ्गुपत्री की टीका में वंशपत्री लिखते हैं । सम्भव है ये दोनों एक ही हों और डीकामाली या नाडीहिङ्गु के ही पर्याय हों । हींग का पेड़ जिस प्रजाति (Genus) का है उसी प्रजाति (Ferula-फेरूला) के एक अन्य पेड़ के पत्ते देखने में कुछ बाँस के पत्तों की तरह दिखलाई देते हैं । सम्भव है उसी में से किसी का वंशपत्री नाम हो । अथ मत्स्याक्षी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह मत्स्याक्षी बाह्लिका मत्स्यगन्धा मत्स्यादनीति च । मत्स्याक्षी ग्राहिणी शीतकुष्ठपित्तकफास्रजित् ।। लघुस्तिक्ता कषाया च स्वाद्वी कटुविपाकिनी ।।२६६।। मत्स्याक्षी के नाम तथा गुण-मत्स्याक्षी, वाह्लिका, मत्स्यगन्धा और मत्स्यादनी ये नाम मत्स्याक्षी के हैं । मत्स्याक्षी-मलसंग्राहक, शीतवीर्य, लघु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वादिष्ट, विपाक में कटुरस युक्त एवं कुष्ठ, पित्त, कफ और रक्तविकार को दूर करने वाली होती है । [२६६] नोट-यह भी संदिग्ध द्रव्य है । ब्राह्मी के पर्याय में अमरसिंह ने मत्स्याक्षी लिखा है । कुछ गुडरी साग को मत्स्याक्षी कहते हैं । संक्षेप में इसका यहाँ वर्णन किया है । १५६. मत्स्याक्षी ? गुडरी साग ले०-Alternanthera sessilis, (Linn.) R. Br. (आल्टरनेन्थेरा सेसिलिस्); Fam. Amaranthaceae (एमरेन्थेसी) । बं०-शलिञ्च । यह भारत के सभी उष्ण प्रदेशों में नम जगहों में पाया जाता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ६१५ इसका क्षुप-परिप्रसरी अथवा ग्रन्थिमूल प्रसरी होता है। कभी-कभी शाखायें उत्थित प्रसरी होकर आस-पास की झाड़ियों पर फैली रहती हैं। पत्ते-लम्बे, अंडाकार, आयताकार या अन्य प्रकार के भी होते हैं। पुष्प-श्वेत या गुलाबी रंग के मुण्डकाकार गुच्छों में आते हैं। पुष्प खिलने पर आधार भाग में गुलाबी और ऊपर सफेद होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके नूतन भाग पौष्टिक (Nutritious) होते हैं तथा इसमें प्रोटीन (Protein) ५% तथा लौह १६.७ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्रा० होता है। गुण और प्रयोग-यह ज्वरहर, पित्त-विरेचक तथा दुग्धवर्धक है। इसके पत्रशाक का उपयोग किया जाता है। अथ सर्पाक्षी ('सरहटी-गण्डिनी'ति च)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह सर्पाक्षी स्यात्तु गण्डाली तथा नाडीकलापकः ॥२६७॥ सर्पाक्षी कटुका तिक्ता सोष्णा कृमिक्रिकृन्तनी । वृश्चिकोन्दुरुसर्पाणां विषघ्नी व्रणरोपिणी ।।२६८।। सर्पाक्षी के नाम तथा गुण-सर्पाक्षी, गण्डाली और नाडीकलापक ये नाम सर्पाक्षी के हैं। सर्पाक्षी-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, व्रण का रोपण करने वाली, कृमिनाशक तथा बिच्छू, मूषक और सर्प के विषों को नष्ट करने वाली है। [२६७-२६८] नोट-सर्पाक्षी भी बिलकुल निःसंदिग्ध द्रव्य नहीं है। रास्ना के नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक ऑफिओराइज्झा मुन्गोस् को कुछ लोगों ने सर्पाक्षी माना है। कुछ ने पॉलिगोनम् प्लेवेजम् को सर्पाक्षी माना है। दूर्वा के पर्याय में सर्पाक्षी, मीनाक्षी ये शब्द आये हैं। डल्हण ने कल्पस्थान अ० ६ में इसे 'रक्तपुष्पा पूर्वदेशे प्रसिद्धा' एवं अ० ८-११७ में 'लोहितपुष्पा शंखपुष्पीभेदा' लिखा है। वंगीय ब्राह्मी के साथ कुछ विद्वानों ने इसका वर्णन किया है। यहाँ संक्षेप में दोनों का वर्णन किया गया है। १५७. सर्पाक्षी (१) ले०-Ophiorrhiza mungos Linn. (ऑफिओराइज्झा मुन्गोस् लिन.)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । सं०-सर्पाक्षी । हिं०-सरहटी । बं०-गन्धनाकुली । म०-मुंगसवेल, नागवेली । ता०-कीरिप्पुंडु । कोंक०-गर्डपातालि क०-पाताल गरुड । यह खासिया पहाड़ एवं आसाम में २००० फीट तक एवं पश्चिमीघाट, ट्रावनकोर एवं तिनेवेल्ली के पहाड़ों पर होता है। इसका क्षुप-करीब ४५-६० से० मी० बड़ा होता है। पत्ते-१०-२० से० मी० बड़े, भालाकार, आधार की तरफ संकुचित, लम्बाग्र एवं ऊपर से चमकीले हरे रंग के होते हैं। पुष्प-श्वेत; फली-छोटी एवं बीज-अनेक तथा भूरे रंग के होते हैं। मूल-बहुत मजबूत, टेढ़े-मेढ़े, ६ इञ्च लम्बे, स्वाद में कड़वे तथा उसकी छाल पतली एवं कपिशवर्ण की होती है। कहीं-कहीं मूल का रास्ना के नाम से उपयोग किया जाता है। चिकित्सा में मूल का उपयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च, राल, स्नेह तथा एक क्षाराम रहता है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, दीपन एवं पाचन है। इसकी जड़ का क्वाथ कुपचन, अतिसार आदि में दिया जाता है। लंका में सर्पदंश, वृश्चिक दंश, कुत्ते का विष आदि के लिये इसकी बहुत प्रशंसा है। १५८. सर्पाक्षी ? (२) मुनियारा ले०-Polygonum plebejum R. Br. (पॉलिगोनम् प्लेबेजम्); Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी) । हिं०-रानी फूल। .CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

६१६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह भारत के सभी उष्ण स्थानों में तथा कभी-कभी ७००० फीट की ऊँचाई पर काश्मीर से भूटान तक होती है। इसके क्षुप-प्रसरी होते हैं। मूल के पास से अनेक शाखायें निकल कर इतस्ततः फैली रहती हैं। पुष्पित अवस्था में शाखायें २-८ इञ्च तक लम्बी होती हैं। पत्ते-रेखाकार, आयताकार एवं छोटे पौधों में अभिलट्वाकार तथा ४-१७ मि० मि० लम्बे होते हैं। उपपत्र छोटे एवं झालरदार होते हैं। पुष्प-छोटे, गुलाबी एवं फल-चिकने, चमकीले एवं त्रिकोणाकृति होते हैं। इसके कई भेदोपभेद होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका शाक की तरह उपयोग किया जाता है। इसकी जड़ का आन्त्र विकारों में एवं पंचांग का चूर्ण न्युमोनिया में दिया जाता है। अथ शङ्खपुष्पी । तस्या नामानि गुणांश्चाह शङ्खपुष्पी तु शङ्खाह्वा मङ्गल्यकुसुमाऽपि च। शङ्खपुष्पी सरा मेध्या वृष्या मानसरोगहृत् ।। २६९ ।। रसायनी कषायोष्णा स्मृतिकान्तिबलाग्निदा। दोषापस्मारभूताश्रीकुष्ठकृमिविषप्रणुत् ।।२७०।। शङ्खपुष्पी के नाम तथा गुण-शङ्खपुष्पी, शङ्खाह्वा (शङ्ख के पर्यायवाची सब शब्द), मङ्गल्यकुसुमा ये सब नाम 'शङ्खपुष्पा' के हैं। शङ्खपुष्पी-कषाय रस युक्त, उष्णवीर्य, सारक, मेधा के लिये हितकर, वृष्य, मानसरोग को दूर करने वाली, रसायन, स्मृतिशक्ति, कान्ति, बल, जठराग्नि इन सबों को बढ़ाने वाली एवं दोष, अपस्मार, भूतबाधा, दरिद्रता, कुष्ठ, कृमि और विष को नष्ट करने वाली होती है। [२६९-२७०] नोट-शङ्खपुष्पी का 'विष्णुक्रान्ता' यह भेद अन्य निघण्टुकारों ने दिया है। भावप्रकाशकार ने 'विष्णुक्रान्ता' यह अपराजिता का पर्याय दिया है। वास्तव में विष्णुक्रान्ता यह अपराजिता या नीलापराजिता नहीं है। यह नीले फूल वाली शंखपुष्पी-भेद ही होना चाहिये। अन्य निघण्टुकारों ने विष्णुक्रान्ता के नील, श्वेत एवं रक्त ये तीन भेद दिये हैं, जिनमें रक्त पुष्प वाले भेद को सर्पाक्षी नाम दिया है। अधिकांश विद्वानों ने एह्वोलूहूलस् ऑल्सेनाइड्डीस् को शङ्खपुष्पी माना है। वास्तव में इसके पुष्प नीले होते हैं। इस दृष्टि से इसे विष्णुक्रान्ता मानना अधिक उपयुक्त है। उसी वर्ग की तथा उससे मिलती-जुलती अन्य वनस्पति कन्हॉल्व्ह्युलस् प्लुरिकालिस् को, जिसके पुष्प श्वेत होते हैं, शङ्खपुष्पी मानना अधिक उपयुक्त है (ठा० बलवन्तसिंह)। कुछ विद्वानों ने 'दानकुनी' को शङ्खपुष्पी मान है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। विष्णुक्रान्ता एवं शङ्खपुष्पी के गुण एक साथ ही दिये गये हैं तथा दानकुनी का अलग वर्णन किया गया है। शङ्खपुष्पी विशेष रूप से मेध्य होती है। (च० चि० अ० १) १५९. शङ्खपुष्पी हिं०-शङ्खाहूली, शङ्खपुष्पी। ले०-Convolvulus pluricaulis, Chois. (कन्हॉल्व्ह्युलस् प्लुरिकॉलिस् को.); Fam. Convolvulaceae (कन्हॉल्व्ह्युलेसी)। इसके क्षुप-प्रायः प्रसरणशील होते हैं। मूलस्तम्भ-काष्ठीय होता है। शाखाएँ ४-१२ इञ्च लम्बी, रोमश, कुछ उठी हुई या फैली हुई रहती हैं। पत्ते-रेखाकार या नीचे की ओर के न्यूनाधिक अभिप्रासवत् एवं .५-१.५ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-हलके गुलाबी रंग के या श्वेत होते हैं। बाह्यदल रोमश, रेखाकार प्रासवत् एवं आभ्यन्तर अंश कुप्पी के आकार का और बाहर से रोमयुक्त होता है। विष्णुक्रान्ता तथा शंखपुष्पी में अन्तर यह है कि विष्णुक्रान्ता में कुक्षिवृन्त दो और प्रायः पुनः द्विविभक्त होते हैं और शङ्खपुष्पी में केवल दो कुक्षियाँ होती हैं। १६०. विष्णुक्रान्ता (नील शङ्खपुष्पी) हिं०-शङ्खावलो, शङ्खपुष्पी। म०-सांखवेल। गु०-शङ्खावली। ले०-Evolvulus alsinoides-Linn. (एहॉल्व्ह्युलस् अल्सेनाइडीस् लिन्.)। Fam. Convolvulaceae (कन्हॉल्व्ह्युलेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ६१७ यह भारत के सभी प्रदेशों में तथा हिमालय पर ६००० फीट तक होती है। इसके क्षुप-प्रसरणशील तथा सुन्दर होते हैं। शाखाएँ-मूल के ऊपर से ४-१५ इञ्च लम्बी अनेक शाखाएँ निकल कर चारों ओर फैली रहती हैं। पत्ते-अखण्ड, रेखाकार से लेकर अंडाकार तक .२५-.५ इञ्च तक लम्बे, (कभी-कभी १ इञ्च) एवं पृष्ठलग्न तथा रेशम तुल्य मुलायम रोमों से युक्त होते हैं। पुष्प-भड़कीले नीले रंग के होते हैं और दो या तीन की संख्या में पतले पुष्पदण्डों के अग्र पर रहते हैं। बाह्यदल रोमश और प्रासवत् होते हैं। आभ्यंतर कोश कभी- कभी श्वेत और कुछ-कुछ चन्द्राकार होते हैं। फल में २-४ फाँक होते हैं। गुण और प्रयोग-शङ्खपुष्पी सारक, मेध्य, वृष्य, बल्य, कषाय, कटु, तिक्त एवं दीपन हैं। इसका उपयोग मानसरोग, उन्माद, अपस्मार, अनिद्रा, भ्रम एवं विष में किया जाता है। (१) उन्माद में २-४ तोला ताजी शङ्खपुष्पी का स्वरस देने से दस्त साफ होता है और मद उतरता है। ज्वर में भी निद्रा के लिये एवं प्रलाप कम करने के लिये इसका फांट या इसे जीरक के साथ दूध में पीसकर देते हैं। (२) बद्धकोष्ठ, गुल्म, आनाह आदि में इसकी जड़ देने से दस्त साफ होता है तथा शारीरिक विष निकल जाता है। (३) इसके पत्तों का धूम्रपान जीर्णकास तथा श्वास में लाभदायक है। (४) रक्तस्राव विशेषकर रक्तवमन में इसके स्वरस से लाभ होता है। (५) पूयमेह, मूत्रकृच्छ्र तथा शुक्रदौर्बल्य में भी यह लाभदायक है। गर्भाशय-दौर्बल्य के कारण जिनमें गर्भधारणा नहीं होती उन्हें इससे लाभ होता है। मात्रा-स्वरस २-४ तोला, चूर्ण ३-६ माशा। फांट ४-८ तोला। १६१. दानकुनी (शङ्खपुष्पी ?) सं०-शङ्खपुष्पी। हिं०-संखाहुली ? बं०-दानकुनी। म०-ययोची, दण्डोत्पल। ले०-Canscora decussata Schult (कन्स्कोरा डिकसेटा शुल्ट)। Fam. Gentia-naceae (जेन्शिआनेसी)। यह आर्द्र स्थानों में तथा ४००० फीट की ऊँचाई तक सब प्रदेशों में पायी जाती है। यह वास्तव में शंखपुष्पी नहीं है। बंगाल के वैद्यों के द्वारा इसे शङ्खपुष्पी मानकर ग्रहण करने के कारण इसको कहीं-कहीं संखाहुली कह दिया जाता है। इसके क्षुप-६-१५ इञ्च ऊँचे तथा चौकोर, सीधे, चिकने एवं सपक्ष काण्ड के होते हैं। पत्ते-अवृन्त, विपरीत, प्रासवत् या आयताकार-प्रासवत् ३, ३ शिराओं वाले, नीचे १ इञ्च तक लंबे किन्तु ऊपर क्रमशः छोटे होते हैं। पुष्प- श्वेत, अनियताकार और कुछ-कुछ द्व्योष्ठ होते हैं। बाह्यदल सपक्ष और चार पुंकेसरों में एक बहुत बड़ा होता है। फली में बहुत बीज होते हैं। दानकुनी का स्वाद कड़वा होता है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, अनुलोमक तथा मज्जातंतु के लिये बलकारक है। उन्माद में इसका स्वरस २- ४ तोले की मात्रा में देने से शौच होता है एवं मद उतरता है। बद्धकोष्ठ, गुल्म एवं आनाह आदि में इसकी जड़ देने से शौच साफ होकर शारीरिक विष निकल जाता है। मात्रा-स्वरस १-२ तोला। अथार्कपुष्पी। तस्या नामगुणानाह अर्कपुष्पी क्रूरकर्मा पयस्या जलकामुका। अर्कपुष्पी कृमिश्लेष्ममेहपित्तविकारजित् ।।२७१।।

६१८ भावप्रकाशनिघण्टुः अर्कपुष्पी के नाम तथा गुण-अर्कपुष्पी, क्रूरकर्मा, पयस्या और जलकामुका ये नाम अर्कपुष्पी के हैं। अर्कपुष्पी-क्रिमि, कफ, प्रमेह और पित्तविकार को दूर करने वाली होती है। [२७१] नोट-अर्कपुष्पी को कुछ लोगों ने जीवन्ती-भेद माना है। रा० नि० में इसके परिचय में 'खण्णेरिति च कथ्यते' लिखा है। गुजराती में निम्नलिखित लता को खरणेर कहा जाता है। जिसके कारण इसे श्री बापालालजी ने अर्कपुष्पी माना है। डल्हण के समय में भी यह संदिग्ध ही रही है। सु० शा० अ० १० में अर्कपुष्पी की टीका में—'अर्कपुष्पी पयस्या अर्कसदृशपयःपुष्पा, श्वेतदूर्वाविशेषां केचिदाहुः, वृक्षजातिमन्थे' लिखा है। दूसरे स्थान पर इसे 'अर्कपुष्पी अर्कपत्रसदृशी लता' लिखा है। १६२. अर्कपुष्पी हिं०-अर्कपुष्पी, मोरन अड़ा, रानी मारपी, छरिव

गुडूच्यादिवर्गः ६११ ने अलम्बुषा का अर्थ मुण्डितिका (गोरखमुण्डी) किया है, जो उचित नहीं मालूम पड़ता। लज्जालु, माइमोसा प्युडिका होनी चाहिये। चरक में सन्धानीय एवं पुरीषसंग्रहणीय महाकषाय में तथा सुश्रुत में प्रियङ्गवादिगण एवं अम्बष्ठादिगण में समङ्गा नाम से इसका उल्लेख है। इनमें लज्जालु एवं 'नमस्कारी' नाम का उल्लेख नहीं है। अभिधानमञ्जरी में काञ्चनपुष्पी पर्याय जो दिया है वह बायोफाइटम् की दृष्टि से ठीक है, जिसे लज्जालु-भेद (अलम्बुषा) कह सकते हैं। कुछ विद्वानों ने नेप्ट्यूनिआ ओलेरॅसिआ लोर. (Neptunia oleracea Lour.; Fam. Leguminosae) को लज्जालु माना है। यह तालाबों में होता है तथा यह शीतल एवं संग्राही होता है। १६३. लज्जालु हिं०-लज्जावन्ती, छुई-मुई, लजारू, लाजवती, लजउनी। बं०-लज्जावती, लाजक। म०-लाजालू, लाजरी। गु०-रीसामणी। ता०-तोड्डा च्चुरंगी। ते०-मुणुगु दामरगु। ले०-Mimosa pudica, Linn. (माइमोसा प्युडिका लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह सम्भवतः उष्ण कटिबन्धज अमेरिका का आदिवासी है। अब यह समस्त भारत में पाया जाता है। इसको बागों में भी लगाते हैं। इसका गुल्म-काँटेदार तथा फैला हुआ होता है। पत्रवृन्त-लम्बे होते हैं जिनसे चार पत्रक दण्ड पाणिवत् निकले रहते हैं। पत्रक-रेखाकार एवं अधिक-से-अधिक १/२ इञ्च लम्बे, बबूल की तरह होते हैं। मुण्डक (पुष्प गुच्छ)-गुलाबी रंग के पुष्पों के मुण्डक, पत्र कोणीय पुष्पदण्डों के अग्र पर होते हैं। पुंकेशर ४ और बहुत बड़े होते हैं। फली- १/२-३/४ इञ्च लम्बी होती हैं जिस पर बीजों के बीच की सन्धियों पर सूक्ष्म काँटे होते हैं। बीज-प्रत्येक में ३-४ होते हैं। शीतकाल में पुष्प आते हैं। जड़-चीमड़, खट्टी एवं कुछ तीती होती है। इसको स्पर्श करने से इसके पत्रक संकुचित हो जाते हैं। इसकी जड़ का विशेष प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें माइमोसीन (Mismosine) नामक एक क्षाराभ पाया जाता है। इसकी जड़ में कषाय द्रव्य रहता है तथा इसकी राख ५ १/२% निकलती है। गुण और प्रयोग-यह संग्राहक है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकुचन होता है। रक्त तथा पित्तप्रधान रोगों में इसे देते हैं। (१) इसकी जड़ का क्वाथ रक्तयुक्त आँव तथा सिकतामेह में देते हैं। (२) अर्श में इसके पत्तों का चूर्ण दुग्ध के साथ पिलाते हैं। मात्रा-स्वरस १-२ तोला। अथालम्बुषा (लज्जालुभेदः) । तस्या नामगुणानाह अलम्बुषा खरत्वक् च तथा मेदोगला स्मृता । अलम्बुषा लघुः स्वादुः क्रिमिपित्तकफापहा ।।२७४।। अलम्बुषा के नाम तथा गुण-अलम्बुषा, खरत्वक् और मेदोगला ये नाम अलम्बुषा के हैं। यह लज्जावन्ती का भेद है। अलम्बुषा-लघु (हलकी), स्वादिष्ट एवं क्रिमि, पित्त तथा कफ को दूर करने वाली होती है। [२७४] १६४. अलम्बुषा ? (लकजन) हिं०-लज्जालू, लकजन। म०-लाजरी। गु०-रीसामणी, झरेर। मल०-मुकुट्टी, तीणरानाझी। ले०- Biophytum sensitivum (Linn.) DC. (बायोफाइटम् सेन्सिटिवम्, लिन. डीसी.)। Fam. Geraniaceae (जिर्रैनिएसी)। यह भारत के सभी उष्ण प्रदेशों में पाया जाता है।

६२० भावप्रकाशनिघण्टुः इसके क्षुप-छोटे तथा सुन्दर होते हैं। सदलपर्ण तथा पुष्पखण्ड जमीन के बराबर ३-४ इञ्च लम्बे, रोमश एवं कभी-कभी सशाख काण्ड के अग्र से एक साथ निकले रहते हैं। सदलपर्ण-१ १/२-५" लम्बे, इनके अग्रस्थित दल .३.५" लम्बे, नीचे की ओर के दल क्रमशः छोटे, अवृन्त, आयताकार या आयताकार-अभिलट्वाकार होते हैं। पुष्पखण्ड-प्रायः पत्तियों से लम्बे, घन रोमश, अनेक कोणपुष्पकों एवं सवृन्त और पीले पुष्पों से युक्त रहते हैं। निद्रागति (Sleep movement) के कारण दो-दो पत्रक रात्रि में परस्पर सट जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, तिक्त, कषाय तथा कफहर है। रक्तपित्त, अतीसार तथा योनि रोगों में इसका प्रयोग किया जाता है। (१) मूत्राश्मरी एवं सोजाक में इसके मूल का क्वाथ देते हैं। (२) कुकास में जड़ को मधु के साथ देते हैं। (३) अर्श में इसे पीसकर लेप करते हैं। अंडवृद्धि में भी इसको बाँधते हैं। अथ दुग्धिका (दुद्धी) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह दुग्धिका स्वादुपर्णी स्यात्क्षीरा विक्षीरिणी तथा। दुग्धिकोष्णा गुरू रूक्षा वातला गर्भकारिणी ।।२७५।। स्वादुक्षीरा कटुस्तिक्ता सृष्टमूत्रा मलापहा। स्वादुविष्टम्भिनी वृष्या कफकुष्ठक्रिमिप्रणुत् ।। २७६।। नोट-दूधी के अतिरिक्त एक छोटी दूधी होती है जिसके २, ३ प्रकार पाये जाते हैं। इनका संक्षेप में स्वतंत्र वर्णन किया गया है। १६५. दुद्धी हि०-दुद्धी, दुधिया, दुद्धि, दूधी। बं०-बरा, खरूई। म०-मोठी नायटी। गु०-नागला, दुधेली, राती। ते०- ननवाल। ता०-अमूपच्छै अरिस्तिस। ले०-Euphorbia hirta, Linn. (युफोर्बिया हिर्टा, लिन.); Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह भारत के समस्त उष्ण भागों में होती है। इसके क्षुप-वर्षायु, रोमश तथा २ फीट तक ऊँचे होते हैं। काण्ड-प्रायः चतुष्कोणीय होते हैं। पत्र-अभिमुख, मध्यशिरा के दोनों ओर के खण्ड छोटे-बड़े, तीक्ष्ण दन्तुर, अंडा-कार आयताकार या आयताकार-प्रासवत, ३/४-१ १/२ इञ्च तक लम्बे एवं तीक्ष्ण या संकुचित अग्रवाले होते हैं। एकाभव्यूह सूक्ष्म एवं गुच्छीकृत होता है। फली-छोटी एवं रोमावृत होती है जिसमें रक्ताभ भूरे रंग के छोटे बीज होते हैं। इसको तोड़ने से दूध निकलता है। पुष्प एवं फल आने पर इसे सुखा कर रखते हैं। इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इससे जलविलेय पदार्थ जैसे गॉलिक एसिड (Gallic acid), क्वेर्सेंटिन (Quercetin), फिनॉलीय द्रव्य, एक ग्लाइकोसाइड तथा शर्करा पाई जाती है। इनके अतिरिक्त सुरासार विलेय द्रव्य, कुछ उड़नशील द्रव्य एवं मोम भी होता है। गुण और प्रयोग-हृदय एवं श्वसनक्रिया पर इसका अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा केन्द्रीय प्रभाव से श्वसनिकाओं का विस्फार होता है। आमाशय में इससे स्थानिक क्षोभ उत्पन्न होकर अधिक मात्रा से उत्क्लेश एवं वमन होता है। इसलिये इसका प्रयोग भोजनोपरान्त अधिक जल के साथ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में करना चाहिये। (१) जीर्ण कफविकारों एवं तमकश्वास में इसका क्वाथ देते हैं। इसके साथ अन्य कफनिःसारक द्रव्य देने चाहिये। (२) इसका स्वरस रक्तयुक्त आँव तथा शूल में दिया जाता है। (३) बच्चों के कृमि, पेट के विकार तथा कफविकारों में इसे देते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

गुडूच्यादिवर्गः ६२१ (४) स्तन्यवर्धक रूप में इसका स्वरस पिलाया जाता है। (५) वमन रोकने के लिए इसकी जड़ का प्रयोग किया जाता है। (६) चर्मकील तथा दद्रु पर इसका दूध लगाते हैं। मात्रा—स्वरस १०-२० बूँद; शुष्क चूर्ण २-५ रत्ती। १६६. छोटी दूधी (१) ले०—Euphorbia thymifolia, Linn. (युफोर्बिआ थाइमीफोलिया, लिन.) । Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह भी भारत के सभी मैदानी एवं छोटे पहाड़ी स्थानों पर एवं काश्मीर में ५५०० फीट तक होती है। इसके पौधे बहुत छोटे ताम्रवर्ण के तथा फैली हुई शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्ते—सूक्ष्म, अभिमुख, द्विपंक्ति, तिर्यक् आयताकार या गोल एवं गोलदन्तुर होते हैं। गुच्छीकृत एकाभव्यूह हरित या गुलाबी तथा मृदुरोमश होते हैं। गुण और प्रयोग—यह विशेष रेचक तथा उत्तेजक है। इसका रस दाद तथा अन्य चर्मरोगों में लगाते हैं। कफ एवं पित्त को निकालने के लिये इसका स्वरस दूध के साथ देते हैं। इसकी जड़ अनार्तव में दी जाती है। १६७. छोटी दूधी (२) ले०—Euphorbia microphylla, Heyne (युफोर्बिआ माइक्रोफाइला, हेन); Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह बंगाल, बुन्देलखण्ड, बिहार तथा प० प्रायद्वीप में होती है। इसका क्षुप भी पहले की तरह होता है। यह श्वेतवर्ण का होता है। पत्ते—कुछ छोटे और कभी-कभी केवल अग्र पर दन्तुर होते हैं। इसमें एकाभव्यूह चिकने होते हैं। गुण और प्रयोग—स्तन्यवर्धक रूप में इसका प्रयोग करते हैं। १६८. छोटी दूधी (३) ले०—Euphorbia hypericifolia, Linn. (युफोर्बिआ हाइपेरिसी फोलिया, लिन.) । Fam. Euphor- biaceae (युफोर्बिएसी) । पं०—हजारदाना । यह भारत के समस्त उष्ण भागों में तथा ४५०० फीट की ऊँचाई तक हिमालय पर होती है। इसका क्षुप—करीब ६-२४ इञ्च बड़ा होता है। पत्ते—आयताकार या कुछ अभिअंडाकार, सूक्ष्म दन्तुर एवं १.७" से छोटे होते हैं। एकाभव्यूह, छोटे, ०.०७ इञ्च बड़े होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें फेनॉलीय द्रव्य, सुगन्धि तैल एवं क्षाराभ होता है। गुण और प्रयोग—यह संग्राही एवं मादक है। (१) बच्चों के उदरशूल में पत्र-स्वरस दूध के साथ देते हैं। (२) शुष्क पत्र का फांट आँव, अतिसार, अत्यार्तव तथा श्वेतप्रदर में देते हैं। (३) इसका दूध चर्मकील पर लगाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

६२२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ भूम्यामलकी (भुँइआमला) । तस्या नामगुणानाह भूम्यामलकिका प्रोक्ता शिवा तामलकीति च। बहुपत्रा बहुफला बहुवीर्याऽजटाऽपि च ।।२७७।। भूधात्री वातकृत्तिक्ता कषाया मधुरा हिमा। पिपासाकासपित्तास्रकफकण्डूक्षतापहा ।।२७८।। भुँइ आमला के नाम तथा गुण-भूम्यामलकिका, शिवा, तामलकी, बहुपत्रा, बहुफला, बहुवीर्या, अजटा और भूधात्री ये सब नाम भुँइ आमला के हैं। भुँइ आमला-तिक्त, कषाय एवं मधुर रस युक्त, वातकारक, शीतवीर्य एवं तृषा, खाँसी, पित्त, रक्त, कफ, खुजली और क्षत को दूर करने वाली है। [२७७-२७८] १६९. भूआमला हिं०-भुँई आमला, भूमि आँवरा। बं०-भुँई आम्ला। क०-किरूननेल्ल। ते०-नेल वुसरि। गु०-भोंयआवली। म०-भुई आँवली। ले०-Phyllanthus niruri, Linn. (फाइलैन्थस् निरूरी, लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में वर्षा ऋतु में अधिक मिलती है। पहाड़ों पर यह ३००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसका क्षुप-६ से १२ इञ्च तक ऊँचा होता है। शाखाएँ-सीधी, पतली तथा देखने में पक्षवत् पत्र सदृश मालूम होती हैं। पत्ते-दीर्घवृत्ताकार, आयताकार एवं ०.१५-०.७५ इञ्च लम्बे होते हैं। फूल-छोटे, हरे या श्वेताभ, प्रायः २-३ पुपुष्प एवं १ स्त्रीपुष्प पत्रकोण में रहते हैं। फल-गोल, आँवला की तरह, ०.०८-०.१२ इञ्च व्यास के ०.२- ०.३ इञ्च लम्बे दण्ड पर आते हैं। बीज-भूरे रंग के, खड़ेबल में सूक्ष्म दानेदार रेखाओं से युक्त एवं आड़ेबल में महीन धारीदार होते हैं। इसकी एक अन्य जाति होती है जिसे Phyllanthus urinaria Linn. (फॉइलन्थस् युर्निरिआ लिन.) कहते हैं। इसमें पत्ते-०.१२-०.४ इञ्च लम्बे, किसी-किसी में ०.६ इञ्च तक लम्बे, आयताकार या रेखाकार-आयताकार; फूल-रक्ताभ; फल-दबे हुये, गोल, ऊपर से शल्क (कीलक) युक्त; बीज-सूक्ष्म एवं आडेबल में महीन नालीदार होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक कडुवा द्रव्य फाइलेन्थिन (Phyllanthin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह कासहर, श्वासहर, शीत, मूत्रजनन, संस्रन, दाहशामक, शोथहर, व्रणरोपण तथा नियतकालिक ज्वर प्रतिबन्धक है। यह कामला, मलेरिया, यकृत्-प्लीहावृद्धि, दाह, मूत्ररोग, रक्तविकार तथा व्रण में उपयोगी है। (१) इसके पंचांग का क्वाथ मलेरिया में दिया जाता है। (२) मूत्रमार्ग के विकारों तथा जलशोथ में इससे लाभ होता है। इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा जलन कम होती है। (३) कामला में इसकी १ तोला जड़ दूध में पीस कर दोनों समय देते हैं। (४) इसके कोमल काण्ड का फाण्ट आँव में देते हैं। (५) व्रणशोथ तथा व्रण पर इसके पंचांग का चावल की पेया के साथ बना पोल्टिस बाँधा जाता है। (६) त्वचा के रोगों में पत्तों को नमक के साथ पीस कर बाँधते हैं। मात्रा-स्वरस १ से २ तोला; चूर्ण ३-६ माशा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA