भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६११ (१) इसका फाण्ट खुजली तथा व्रण-प्रक्षालन के काम में आता है। (२) यकृत् वृद्धि तथा विबंध हो तो इसका रस देने से दूषित पित्त निकल जाता है तथा विबंध भी दूर होता है। (३) इसके बीजों को उबाल कर उससे पेट सेंकने से वायु का अनुलोमन होता है। (४) कुछ लोगों ने इसका घाघरवेल नाम से उल्लेख किया है तथा लिखा है कि पंजाब में दाइयाँ इसके क्वाथ को गर्भपात कराने के लिये प्रयोग में लाती हैं। १४९. अमर वेल (२) हिं० - अमर वेल। ले० - Cassytha filiformis Linn. (कॅसिथा फिलिफ़ॉर्मिस् लिन.)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी)। यह भारत में सभी स्थानों पर विशेषकर समुद्री किनारों पर अधिक होती है। इसकी लता—पराश्रयी, पत्रहीन, उपर्युक्त प्रथम अमरवेल की तरह होती है तथा शाल, करौंदा, कुटज तथा जामुन आदि वृक्षों पर फैली रहती है। इसका रंग पहली की अपेक्षा अधिक हरा होता है। पुष्प—अवृन्त, श्वेत, .५-१.५ इञ्च लम्बी मंजरियों में रहते हैं और उनके आधार पर तीन चौड़े तथा लम्बे और लट्वाकार कोणपुष्पक होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें एक क्षाराम होता है। गुण और प्रयोग—यह बल्य, केश्य, व्रणरोपण एवं वृष्य है। (१) इससे सर के बाल धोने से जूंयें आदि नष्ट होते हैं। इसे पीसकर तेल में मिलाकर केश वृद्धि के लिये काम में लाते हैं। मक्खन तथा सोंठ के साथ इसे व्रणरोपण के लिये काम में लाते हैं। (२) इसका क्वाथ यकृत प्लीहोदर, गण्डमाला, क्षय आदि लक्षणयुक्त व्याधि में प्रयोग करते हैं। अथ पातालगरुडी। तस्या नामगुणानाह छिलिहिण्टो महामूलः पातालगरुडाह्वयः। छिलिहिण्टः परं वृष्यः कफघ्नः पवनापहः॥२६०॥ 'पातालगरुडी' के नाम तथा गुण—छिलिहिण्ट, महामूल, पातालगरुड, ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। पातालगरुडी—अत्यन्त वृष्य (वीर्यवर्धक), कफ तथा वायु को शमन करने वाली होती है। [२६०] १५०. पाताल गरुडी हिं० - पातालगरुड़ी, छिरेटा, फरीदबूटी, चिरहिटा, छिरहटा, जलजमनी। बं० - हयेर। म० - वासनवेल, भुर्युपाडल, तान्हिचावेल। गु० - पातालगलोरी, वेवड़ी। ते० - दूसरैंतिगे। क० - दागुडी। ता० - कातुक कोदी। ले० - Cocculus hirsutus (Linn.) Diels (कॉक्सुलस् हिर्सुटस)। Fam. Menispermaceae (मेनिस्पर्मेसी)। यह इस देश के प्रायः सब गरम और साधारण प्रान्तों में हिमालय से दक्षिण तक पायी जाती है। इसकी आरोही लता—झाड़ियों आदि पर फैली हुई रहती है। शाखायें तथा पत्र मृदु श्वेताभ रोमावरण से ढँके रहते हैं। पत्ते—इनके आकार और कद में बड़ी विभिन्नता रहती है। नीचे के पत्ते प्रायः लट्वाकार, आयताकार, ३" × २" तक बड़े और ऊपर के क्रमशः छोटे और आयताकार होते हैं। पुष्प—एकलिंग, हरिताभ एवं सूक्ष्म होते हैं। फल—काले बैंगनी रंग के, चने के बराबर, एवं चिकने होते हैं तथा इनके भीतर काला रस रहता है। पुष्प वर्षा में एवं फल शीत में लगते हैं। मूल—काफी नीचे चला जाता है तथा मजबूत होता है। इसके पत्तों को जल में मसलने से जल जम जाता है। इसलिये इसे जलजमनी कहते हैं। इसकी जड़ को सर्पविष में बहुत उपयोगी बतलाया गया है इसलिये इसका पातालगरुड़ी नाम सार्थक मालूम पड़ता है। प्राचीन ग्रन्थों में इसका CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA