भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१० भावप्रकाशनिघण्टुः सौम्या महिषवल्ली च प्रतिसोमाऽन्त्रवल्लिका। अपत्रवल्लिका प्रोक्ता काण्डशाखा षडाह्वया। रसवीर्यविपाके च सोमवल्लीसमा स्मृता।। रा. नि. गुण और प्रयोग-अर्क दुग्ध की तरह इसके दूध का भी उपयोग होता है जो बहुत गुणकारी माना जाता है और इसी लिये इसको बाघ दूध कहते हैं। राक्सवर्ग के मतानुसार इसका दूध खट्टा होता है तथा यात्री तृषा शमन के लिये इसका उपयोग करते हैं। शुष्क काण्ड वामक माना जाता है। अथाकाशवल्ली (अमरवेल)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह आकाशवल्ली तु बुधैः कथिताऽमरवल्लरी ।।२५८।। खवल्ली ग्राहिणी तिक्ता पिच्छिलाऽक्ष्यामयापहा। तुवराऽग्निकरी हृद्या पित्तश्लेष्मामनाशिनी ।।२५९।। अमरबेल के नाम तथा गुण-आकाशवल्ली का ही पर्यायवाचक शब्द अमरवल्लरी है, ऐसा पण्डित लोग कहते हैं, अर्थात्-आकाशवल्ली, खवल्ली, अमरवल्ली ये नाम अमरवेल के हैं। अमरवेल-तिक्त तथा कषाय रस युक्त, मलसंग्राहक, पिच्छिल, नेत्ररोगनाशक, जठराग्निवर्धक, हृदय के लिये हितकर एवं पित्त, कफ तथा आम को नष्ट करनेवाली होती है। [२५८-२५९] नोट-प्राचीन ग्रन्थों में अमरबेल का उल्लेख नहीं है। अमृतवल्ली शब्द आया है, जिसका अर्थ टीकाकारों ने गुडूची किया है। कुछ विद्वानों ने अमरबेल नाम (Cuscuta reflexa) (कस्कुटा रिफ्लेक्सा) को दिया है तथा आकाशबेल (Cassytha filiformis) कॅसिथा फिलिफॉर्मिस् को दिया है। दोनों ही पराश्रयी लताएँ (Parasitic climber) हैं। दोनों एक स्थान पर उगी हुई नहीं पाई जाती। दोनों का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। १४८. अमरवेल (१) हिं०-आकाश वेल, अमर वेल। बं०-आलोक लता। म०-आकाश वेल, अमर वेल। गु०-अमर वेल। अ०-मून, कसूस। पं०-निराधार। फा०-अफतीमून। अं०-Dordar (डॉर्डर)। ले०-Cuscuta reflexa Roxb. (कस्कुटा रिफ्लेक्सा राक्स.)। Fam. Convolvulaceae (कॉन्हॉलहूलेसी)। यह भारत के सभी मैदानी भागों में तथा ८००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसकी लता-परोपजीवी होती है तथा जिस किसी वृक्ष पर फैलती है उसे अपने बोझ से झुका तक देती है। कभी- कभी इतनी फैलती है कि सारे वृक्ष को ढक देती है। अधिकतर बेर, बबूल के वृक्षों पर फैली रहती है। इसमें पत्ते नहीं होते, काण्ड-पतले एवं प्रायः पीले रंग के आपस में गुथे हुये होते हैं। पुष्प-१/४-१/३ इञ्च लम्बे, श्वेताभ या गुलाबी, सुगंधित, नलिकाकार, एकाकी या गुच्छों में आते हैं। फल-१/४-१/३ इञ्च व्यास के, दबे हुये, गोल एवं मांसल होते हैं। इसके मूल आधारादि वृक्ष के कांडों से ससक्त रहते हैं, जहाँ से वे अपना आहार ग्रहण करते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें कुस्कुटिन (Cuscutin) नामक एक रवेदार रंजक पदार्थ ०.२% होता है। इसके अतिरिक्त लॅक्टोन (Lactone) के समान गुण वाला कस्कुर्टलिन् (Cuscutalin) १%, बादामी रंग का मोम ०.१% तथा अपचायक शर्करा (Reducing sugar) होती है। इसके बीजों में स्थिर तैल ३%, रंजक द्रव्य अमरबेलिन (Amarbelin), कड़वी राल तथा अपचायक शर्करा (Reducing sugar) पाई जाती हैं। गुण और प्रयोग-यह आनुलोमक, पित्तसारक तथा यकृतोत्तेजक है। आश्रयी वृक्ष के अनुसार इसके गुण धर्म में कुछ परिवर्तन हो सकता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA