भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 660

औषध के लिए इसके काण्ड का संग्रह वसन्त ऋतु में करते हैं। ए. जेरार्डिआना का क्षुप—छोटा, सर्पणशील, कडा तथा गुच्छे के रूप में होता है। शाखाएँ—प्रतिग्रंथि पर दो और अभिमुख या अनेक एक चक्र में निकली रहती हैं। ये सीधी, हरी एवं रेखा युक्त होती हैं। पर्व करीब १/२ इञ्च से १ १/२ इञ्च लम्बे होते हैं तथा दियासलाई की सीक की तरह दिखलाई देते हैं। पुराने काण्ड की त्वचा धूसर हो जाती है। पत्ते—वल्क सदृश होते हैं और प्रत्येक ग्रन्थि पर इन वल्कपत्रों के मिलने से एक पीताभ या भूरा करीब २ मि० मि० लम्बा द्विविभक्त कोष बना होता है। पुष्प—नरपुष्पों की अंडाकार विदण्डिक मंजरियाँ अकेली या २-३ के गुच्छे में रहतीं हैं जिनमें ४-८ नरपुष्प होते हैं। नारीपुष्पों की मंजरी प्रायः अकेली और १-२ पुष्पों से युक्त होती है। फल—७.५-१० मि० मि० लम्बा, लट्वाकार, लाल, मधुर तथा खाने लायक होता है। बीज—१-२ दोनों तरफ फूले हुये होते हैं। काण्ड में तीव्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा) · पृष्ठ 660, कुल 1167 में से · BharatKosha