भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०८ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-यह मधुर, शीत, कण्ठ्य, कुछ ग्राही, कफघ्न एवं कुछ मूत्रजनन है। अधि मात्रा से वमन होता है। इसका प्रयोग ज्वर, रक्तविकार, विसर्प, विषविकार एवं कण्ठ विकार में करते हैं। बच्चों के कास में इससे लाभ होता है। इसके पंचांग का शरबत बना कर १/२-१ तो० की मात्रा में प्रयोग करते हैं। मात्रा-१०-३० रत्ती। अथ सोमलता। तस्या नामगुणानाह सोमवल्ली सोमलता सोमक्षीरी द्विजप्रिया। सोमवल्ली त्रिदोषघ्नी कटुस्तिक्ता रसायनी ॥२५७॥ सोमलता के नाम तथा गुण-सोमवल्ली, सोमलता, सोमक्षीरी और द्विजप्रिया ये सब सोमलता के पर्यायवाची शब्द हैं। सोमलता-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, त्रिदोषनाशक एवं रसायन होती है। [२५७] सोमलता सोमलता नामक दिव्य औषधि क्या है ? इस सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने विचार किया है किन्तु अभी तक इसका निर्णय नहीं हो सका है। वास्तव में सुश्रुत में ही इसके संबंध में लिखा है कि अधर्मी, कृतघ्न, भेषजद्वेषी तथा ब्राह्मणद्वेषी लोगों को यह दिखलाई नहीं देती। आधुनिक युग में कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जो किसी न किसी अवगुण से युक्त न हो। उपर्युक्त वचन से ऐसा प्रतीत होता है कि यह वनस्पति उस काल में भी अप्राप्य या दुष्प्राप्य रही हो और उसके स्थान पर उसके प्रतिनिधि द्रव्यों का प्रयोग होता रहा हो। सोम का वर्णन ऋग्वेद तथा पौराणिक साहित्य में भी है। यज्ञ के पूर्व आनन्ददायक पेय के रूप में सोमरस-पान किया जाता रहा। सोम को ओषधिराज लिखा है। इसी प्रकार के एक द्रव्य का उल्लेख प्राचीन पारसी धर्म ग्रंथ 'जन्द अवस्ता' में है, जिसे होम कहते हैं। संभव है होम यह सोम का परिवर्तित रूप हो। इसी आधार पर होम नाम से प्रयुक्त द्रव्यों को कुछ विद्वानों ने सोम माना है। सुश्रुत में इसके संबंध में विशद वर्णन मिलता है। यह हिमालय, विन्ध्य, काश्मीर, मलय आदि स्थानों में होती है। इसके स्थान, नाम, आकृति, वीर्य भेद से २४ प्रकार होते हैं। इस लता में शुक्ल पक्ष में एक-एक पत्र प्रतिदिन बढ़ कर पूर्णिमा को १५ पत्ते हो जाते हैं तथा कृष्ण पक्ष में एक-एक पत्र घट कर अमावस्या को यह बिना पत्र के हो जाता है। इस लता में दुग्ध होता है तथा नीचे कन्द भी होता है। कायाकल्प के लिये कुटी प्रावेशिक विधि से इसके सेवन का वर्णन सुश्रुत में किया है। यह श्रेष्ठ मादक द्रव्य है। इससे बल, वाक्शक्ति, स्फूर्ति, सौमनस्य एवं अमरत्व की प्राप्ति होती है। प्रत्येक रोग को दूर कर यह मन को आनन्द देने वाली लता है। इसमें अन्य मादक द्रव्यों का कोई दोष नहीं होता। सोम के नाम से जिनका उल्लेख किया जाता है उनमें से कुछ का संक्षेप में यहाँ वर्णन दिया गया है, यद्यपि दिव्य गुण वाली सोम इनमें से कोई मालूम नहीं पड़ती। १४६. सोम (१) सं०-सोम। हिं०-टुटगंठा। पं०-अमसानिया, बुदशुर, चेवा। स०-फोत्र। ई०-होम, हुम्। क०-खम, खंड। अं०-Ephedrs; Ma-huang (एफेड्रा, मा-हाँग)। ले०-Ephedra gerardiana (Wall) Stapf; E. nebrodensis (Tineo) Stapf (एफेड्रा जेरार्डिआना; ए. नेब्रोडेन्सिस्)। Fam. Gnetaceae (ग्नेटेंसी)। इनमें से ए. जेरार्डिआना हिमालय के शुष्क एवं ऊँचे स्थानों में ७-१६ हजार फीट तक बहुत होता है। पंगी, लाहौल, कनवार, सिमला जिले के शाली स्थान, कश्मीर एवं लद्दाख में बहुत होता है। ए. नेब्रोडेन्सिस, लाहौल, पश्चिमी तिब्बत, बलूचिस्तान एवं वजीरिस्तान में होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA