भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 663, कुल 1167 में से

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६१२ भावप्रकाशनिघण्टुः वर्णन नहीं पाया जाता। इसकी जड़ एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। पाठामूल के स्थान पर इसकी जड़ ली जाती है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ उष्ण, स्वेदजनन, सौम्य, बलवर्धक, मूत्रजनन, मूत्रमार्ग के लिये शामक एवं ग्राही, ज्वरहर, वायुहर एवं शोधन है। यह सार्सापरिला की तरह उपयोगी है। पत्ते दाहप्रशमन, मूत्रजनन, शोथहर, स्तन्यजनन एवं त्वग्दोष नाशक हैं। (१) इसकी जड़ का बकरी के दूध में तैयार किया हुआ क्वाथ पीपल, सोंठ, आदि सुगन्धि द्रव्यों के साथ जीर्ण आमवात, विशेषकर यदि उपदंश के कारण उत्पन्न हो, सन्धिशोथ तथा त्वचा के रोगों में देते हैं। (२) जमाया हुआ स्वरस शीतवीर्य होने के कारण जीरक एवं मिश्री के साथ नूतन सोजाक में बहुत उपयोगी है। (३) पत्तों को पीसकर शोथ, चोट आदि पर बाँधने से लालिमा एवं पीड़ा कम होती है। शिरःशूल में भी बाँधते हैं। (४) इसकी जड़ का प्रयोग बस्तिशोथ तथा अन्य प्रमेहों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १-२ तोला; मूल-३-६ माशा। अथ वन्दा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह वन्दा वृक्षादनी वृक्षभक्ष्या वृक्षरुहाऽपि च। वन्दाकः स्याद्धिमस्तिक्तः कषायो मधुरो रसे। मङ्गल्यः कफवातास्ररक्षोव्रणविषापहः ।।२६१।। 'बन्दा' के नाम तथा गुण-बन्दा, वृक्षादनी, वृक्षभक्ष्या, वृक्षरुहा और बन्दाक्व ये नाम 'बान्दा' के हैं। बान्दा- तिक्त, कषाय तथा मधुर रसयुक्त, शीतवीर्य, मङ्गलमय एवं कफ, वातरक्त, राक्षसबाधा, व्रण और विष को दूर करता है। [२६१] १५१. बान्दा (१) हिं०-बन्दा, बांदा, बंदाक। बं०-बरमांदा, मान्दा। म०-बांडागुल। गु०-बांदो। ते०-बादनीका। अ०- खरकताना। ले०-Loranthus longiflorus Desr. (लोरेन्थस् लॉगिफ्लोरस् डेस.); Syn. Dendrophthoe falcata (Linn. f.) Etting. (डेण्ड्रोफ्थो. फॅलकेटा)। Fam. Loranthaceae (लोरेन्थेसी)। यह भारत में सर्वत्र पाया जाता है। इस कुल की वनस्पतियाँ अर्धपराश्रयी होती हैं। जिन वृक्षों के ऊपर यह उगती हैं, उनसे अपना भोजन ग्रहण करती है तथा स्वतः हरी होने के कारण स्वयं भी अपने लिये भोजन निर्माण करती है। उपर्युक्त बांदा अनेक प्रकार के वृक्षों पर उगा हुआ पाया जाता है। यह काष्ठीय होता है। शाखायें-चिकनी, चीमड़, कुछ लटकती हुई तथा कुछ सीधी एवं ३-४ फीट लम्बी होती हैं। पत्ते-३-६ इञ्च लम्बे, १-२ इञ्च चौड़े, चिकने, अनेक आकार के तथा मोटे होते हैं। फूल-रक्त, नारङ्ग या गुलाबी रंग के, १-२ इञ्च लम्बे और उनका सवर्ण कोश नालाकार होता है। फल-मांसल एवं बीज चिपचिपे होते हैं। इसके पुष्प एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, कषाय, कफघ्न, वातनाशक, मूत्रविरेचनीय, रक्तविकार नाशक एवं व्रणरोपक है। (१) शोथ पर इसके पत्तों एवं पुष्प को पीस-गरम कर लेप करने से सूजन दूर होती है। (२) इसके पुष्पों का प्रभाव हृदय एवं रक्तवाहिनियों पर होता है। हृदयोद्भूत श्वास, क्षयोद्भूत श्वास, फुप्फुसशोथ, रक्तपित्त, अपस्मार, उन्माद एवं ज्वर में प्रलाप होने पर इसे देते हैं। मात्रा-स्वरस १-२ तोला।

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