भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 664, कुल 1167 में से

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गुडूच्यादिवर्गः ६१३ नोट-उपर्युक्त बांदे की और दो-तीन जातियाँ होती हैं। इनके अतिरिक्त एक अन्य प्रजाति का बांदा होता है। जिसकी भी दो उपजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें किशमिश काबली प्रभावकर द्रव्य है जिसका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। १५२. बान्दा (२) ले०-Viscum album Linn. (विस्कम् ॲल्बम् लिन.); Fam. Loranthaceae (लोरेंन्थेसी)। जौ०- चुल्लू का बांदा। यू०-किशमिश काबली। अ०-दिब्क, मबीजजे असली। यह हिमालय में कश्मीर से नेपाल तक ३०००-७००० फीट तक होता है। ये प्रायः क्रम में निकली रहती हैं। पत्ते-२ इञ्च लम्बे, १/२ इञ्च चौड़े, विनाल, आयताकार या ऊपर से भालाकार होते हैं। आधार पर इनमें ३-५ शिराएँ होती हैं। पुष्प-प्रति गुच्छे में ३-५ पुष्प होते हैं। फल-१/४ इञ्च लम्बे, सफेद, चिकने तथा पारदर्शक होते हैं। बाजार में मटर जितने बड़े, नरम, झुर्रीदार और भूरे रंग के सूखे फल मिलते हैं। इनके भीतर एक छोटा बीज तथा चिपचिपा पदार्थ होता है। इन फलों का चिकित्सा में प्रयोग होता है। गुण और प्रयोग-इसकी क्रिया हृदय पर डिजिटॅलिस सदृश होती है, जिससे हृदय को बल मिलता है तथा मूत्र की वृद्धि होती है। गर्भाशय पर इसका प्रभाव अर्गट की तरह होता है, जिससे गर्भाशय का संकोच होता है। (१) हृद्रोग एवं जलोदर में इसे देने से लाभ होता है। (२) अत्यार्तव एवं प्रसवोत्तर रक्तस्राव में पिपरामूल के साथ इसका फाण्ट देने से लाभ होता है। (३) प्लीहावृद्धि, अपस्मार, कटीपीड़ा, गुल्म, अर्श, क्षत, व्रण, कर्णपूय आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-फल ५-१५ रत्ती। अथ वटपत्री । तस्या नामगुणानाह वटपत्री तु कथिता मोहिन्त्यैरावती बुधैः । वटपत्री कषायोष्णा योनिमूत्रगदपहा ॥२६१॥ 'वटपत्री' के नाम तथा गुण-वटपत्री की विद्वान् लोग मोहिनी और ऐरावती कहते हैं। वटपत्री-कषाय रसयुक्त, उष्णवीर्य एवम् योनि तथा मूत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है। [२६२] १५३. वटपत्री इसका निर्णय अभी तक नहीं हो सका है। निम्नलिखित वनस्पति को कुछ विद्वान् वटपत्री मानते हैं। ले०-Saxifraga ligulata Wall. (सॅक्सीफ्रेगा लीगुलेटा वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सोफ्रेगॅसी)। यह पाषाणभेद का ही भेद है तथा इसका वर्णन हरीतक्यादि वर्ग में पाषाणभेद के अंतर्गत पृष्ठ १०५ पर किया गया है। अथ हिङ्गुपत्री । तस्या नामानि गुणाँश्चाह हिङ्गुपत्री तु कवरी पृथ्वीका पृथुका पृथुः ॥२६३॥ हिङ्गुपत्री भवेद्धृद्या तीक्ष्णोष्णा पाचनी कटुः । हृद्रुस्तिरुग्विबन्ध्यार्शःश्लेष्मगुल्मानिलापहा ॥२६४॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

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