भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६१४ भावप्रकाशनिघण्टुः हिङ्गुपत्री के नाम तथा गुण-हिङ्गुपत्री, कवरी, पृथ्विका, पृथुका और पृथु ये सब नाम हिङ्गुपत्री के हैं । हिङ्गुपत्री- कटुरसयुक्त, रुचिजनक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पाचक एवं हृद्रोग, बस्तिरोग, विबन्ध, अर्श, कफ, गुल्म और वायु को दूर करने वाली होती है । [२६३-२६४] १५४. हिङ्गुपत्री हिङ्गुपत्री तथा आगे वर्णन की हुई वंशपत्री के विषय में थोड़ा मतभेद है । चरक में अपस्मार एवं उन्माद की चिकित्सा में क्रमशः हिङ्गुपत्री एवं हिङ्गुशिवाटिका इनका प्रयोग आया है । इसकी टीका में चक्रपाणि ‘वंशपत्री’ लिखते हैं । ‘नाडीहिङ्गु’ या ‘डीकामाली’ जिसका वर्णन पहले हरीतक्यादि वर्ग में किया जा चुका है, उसे ‘हिङ्गुपत्री’ कह सकते हैं, क्योंकि उसकी पत्र-कलिकाओं के ऊपर किसी-किसी ऋतु में पीला गोंद बूँद के रूप में निकला रहता है । इसकी छाल कट जाने पर वहाँ से भी गोंद निकलता है । इसमें उग्र गन्ध होती है । इसे डीकामाली या नाडीहिङ्गु कहते हैं । इस आधार पर नाडीहिङ्गु को हिङ्गुपत्री माना जा सकता है । हरीतक्यादि वर्ग में पृष्ठ ५५ पर नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) का वर्णन देखें । वंशपत्री । तस्या नामानि गुणाँश्चाह वंशपत्री वेणुपत्री पिण्डा हिङ्गुशिवाटिका । हिङ्गुपत्रीगुणा विज्ञैर्वंशपत्री च कीर्त्तिता ।।२६५।। वंशपत्री के नाम तथा गुण-वंशपत्री, वेणुपत्री, पिण्डा और हिङ्गुशिवाटिका ये नाम वंशपत्री के हैं। वंशपत्री- इसे विद्वानों ने गुणों में हिङ्गुपत्री के संमान बताया है । [२६५] १५५. वंशपत्री वंशपत्री भी संदिग्ध है । भावप्रकाशकार इसके गुण हिङ्गुपत्री की तरह ही बतलाते हैं । चक्रपाणि हिङ्गुपत्री की टीका में वंशपत्री लिखते हैं । सम्भव है ये दोनों एक ही हों और डीकामाली या नाडीहिङ्गु के ही पर्याय हों । हींग का पेड़ जिस प्रजाति (Genus) का है उसी प्रजाति (Ferula-फेरूला) के एक अन्य पेड़ के पत्ते देखने में कुछ बाँस के पत्तों की तरह दिखलाई देते हैं । सम्भव है उसी में से किसी का वंशपत्री नाम हो । अथ मत्स्याक्षी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह मत्स्याक्षी बाह्लिका मत्स्यगन्धा मत्स्यादनीति च । मत्स्याक्षी ग्राहिणी शीतकुष्ठपित्तकफास्रजित् ।। लघुस्तिक्ता कषाया च स्वाद्वी कटुविपाकिनी ।।२६६।। मत्स्याक्षी के नाम तथा गुण-मत्स्याक्षी, वाह्लिका, मत्स्यगन्धा और मत्स्यादनी ये नाम मत्स्याक्षी के हैं । मत्स्याक्षी-मलसंग्राहक, शीतवीर्य, लघु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वादिष्ट, विपाक में कटुरस युक्त एवं कुष्ठ, पित्त, कफ और रक्तविकार को दूर करने वाली होती है । [२६६] नोट-यह भी संदिग्ध द्रव्य है । ब्राह्मी के पर्याय में अमरसिंह ने मत्स्याक्षी लिखा है । कुछ गुडरी साग को मत्स्याक्षी कहते हैं । संक्षेप में इसका यहाँ वर्णन किया है । १५६. मत्स्याक्षी ? गुडरी साग ले०-Alternanthera sessilis, (Linn.) R. Br. (आल्टरनेन्थेरा सेसिलिस्); Fam. Amaranthaceae (एमरेन्थेसी) । बं०-शलिञ्च । यह भारत के सभी उष्ण प्रदेशों में नम जगहों में पाया जाता है । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA