भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ६१५ इसका क्षुप-परिप्रसरी अथवा ग्रन्थिमूल प्रसरी होता है। कभी-कभी शाखायें उत्थित प्रसरी होकर आस-पास की झाड़ियों पर फैली रहती हैं। पत्ते-लम्बे, अंडाकार, आयताकार या अन्य प्रकार के भी होते हैं। पुष्प-श्वेत या गुलाबी रंग के मुण्डकाकार गुच्छों में आते हैं। पुष्प खिलने पर आधार भाग में गुलाबी और ऊपर सफेद होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके नूतन भाग पौष्टिक (Nutritious) होते हैं तथा इसमें प्रोटीन (Protein) ५% तथा लौह १६.७ मि० ग्रा० प्रति १०० ग्रा० होता है। गुण और प्रयोग-यह ज्वरहर, पित्त-विरेचक तथा दुग्धवर्धक है। इसके पत्रशाक का उपयोग किया जाता है। अथ सर्पाक्षी ('सरहटी-गण्डिनी'ति च)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह सर्पाक्षी स्यात्तु गण्डाली तथा नाडीकलापकः ॥२६७॥ सर्पाक्षी कटुका तिक्ता सोष्णा कृमिक्रिकृन्तनी । वृश्चिकोन्दुरुसर्पाणां विषघ्नी व्रणरोपिणी ।।२६८।। सर्पाक्षी के नाम तथा गुण-सर्पाक्षी, गण्डाली और नाडीकलापक ये नाम सर्पाक्षी के हैं। सर्पाक्षी-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, व्रण का रोपण करने वाली, कृमिनाशक तथा बिच्छू, मूषक और सर्प के विषों को नष्ट करने वाली है। [२६७-२६८] नोट-सर्पाक्षी भी बिलकुल निःसंदिग्ध द्रव्य नहीं है। रास्ना के नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक ऑफिओराइज्झा मुन्गोस् को कुछ लोगों ने सर्पाक्षी माना है। कुछ ने पॉलिगोनम् प्लेवेजम् को सर्पाक्षी माना है। दूर्वा के पर्याय में सर्पाक्षी, मीनाक्षी ये शब्द आये हैं। डल्हण ने कल्पस्थान अ० ६ में इसे 'रक्तपुष्पा पूर्वदेशे प्रसिद्धा' एवं अ० ८-११७ में 'लोहितपुष्पा शंखपुष्पीभेदा' लिखा है। वंगीय ब्राह्मी के साथ कुछ विद्वानों ने इसका वर्णन किया है। यहाँ संक्षेप में दोनों का वर्णन किया गया है। १५७. सर्पाक्षी (१) ले०-Ophiorrhiza mungos Linn. (ऑफिओराइज्झा मुन्गोस् लिन.)। Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । सं०-सर्पाक्षी । हिं०-सरहटी । बं०-गन्धनाकुली । म०-मुंगसवेल, नागवेली । ता०-कीरिप्पुंडु । कोंक०-गर्डपातालि क०-पाताल गरुड । यह खासिया पहाड़ एवं आसाम में २००० फीट तक एवं पश्चिमीघाट, ट्रावनकोर एवं तिनेवेल्ली के पहाड़ों पर होता है। इसका क्षुप-करीब ४५-६० से० मी० बड़ा होता है। पत्ते-१०-२० से० मी० बड़े, भालाकार, आधार की तरफ संकुचित, लम्बाग्र एवं ऊपर से चमकीले हरे रंग के होते हैं। पुष्प-श्वेत; फली-छोटी एवं बीज-अनेक तथा भूरे रंग के होते हैं। मूल-बहुत मजबूत, टेढ़े-मेढ़े, ६ इञ्च लम्बे, स्वाद में कड़वे तथा उसकी छाल पतली एवं कपिशवर्ण की होती है। कहीं-कहीं मूल का रास्ना के नाम से उपयोग किया जाता है। चिकित्सा में मूल का उपयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें स्टार्च, राल, स्नेह तथा एक क्षाराम रहता है। गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक, दीपन एवं पाचन है। इसकी जड़ का क्वाथ कुपचन, अतिसार आदि में दिया जाता है। लंका में सर्पदंश, वृश्चिक दंश, कुत्ते का विष आदि के लिये इसकी बहुत प्रशंसा है। १५८. सर्पाक्षी ? (२) मुनियारा ले०-Polygonum plebejum R. Br. (पॉलिगोनम् प्लेबेजम्); Fam. Polygonaceae (पॉलिगोनेसी) । हिं०-रानी फूल। .CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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