भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह भारत के सभी उष्ण स्थानों में तथा कभी-कभी ७००० फीट की ऊँचाई पर काश्मीर से भूटान तक होती है। इसके क्षुप-प्रसरी होते हैं। मूल के पास से अनेक शाखायें निकल कर इतस्ततः फैली रहती हैं। पुष्पित अवस्था में शाखायें २-८ इञ्च तक लम्बी होती हैं। पत्ते-रेखाकार, आयताकार एवं छोटे पौधों में अभिलट्वाकार तथा ४-१७ मि० मि० लम्बे होते हैं। उपपत्र छोटे एवं झालरदार होते हैं। पुष्प-छोटे, गुलाबी एवं फल-चिकने, चमकीले एवं त्रिकोणाकृति होते हैं। इसके कई भेदोपभेद होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका शाक की तरह उपयोग किया जाता है। इसकी जड़ का आन्त्र विकारों में एवं पंचांग का चूर्ण न्युमोनिया में दिया जाता है। अथ शङ्खपुष्पी । तस्या नामानि गुणांश्चाह शङ्खपुष्पी तु शङ्खाह्वा मङ्गल्यकुसुमाऽपि च। शङ्खपुष्पी सरा मेध्या वृष्या मानसरोगहृत् ।। २६९ ।। रसायनी कषायोष्णा स्मृतिकान्तिबलाग्निदा। दोषापस्मारभूताश्रीकुष्ठकृमिविषप्रणुत् ।।२७०।। शङ्खपुष्पी के नाम तथा गुण-शङ्खपुष्पी, शङ्खाह्वा (शङ्ख के पर्यायवाची सब शब्द), मङ्गल्यकुसुमा ये सब नाम 'शङ्खपुष्पा' के हैं। शङ्खपुष्पी-कषाय रस युक्त, उष्णवीर्य, सारक, मेधा के लिये हितकर, वृष्य, मानसरोग को दूर करने वाली, रसायन, स्मृतिशक्ति, कान्ति, बल, जठराग्नि इन सबों को बढ़ाने वाली एवं दोष, अपस्मार, भूतबाधा, दरिद्रता, कुष्ठ, कृमि और विष को नष्ट करने वाली होती है। [२६९-२७०] नोट-शङ्खपुष्पी का 'विष्णुक्रान्ता' यह भेद अन्य निघण्टुकारों ने दिया है। भावप्रकाशकार ने 'विष्णुक्रान्ता' यह अपराजिता का पर्याय दिया है। वास्तव में विष्णुक्रान्ता यह अपराजिता या नीलापराजिता नहीं है। यह नीले फूल वाली शंखपुष्पी-भेद ही होना चाहिये। अन्य निघण्टुकारों ने विष्णुक्रान्ता के नील, श्वेत एवं रक्त ये तीन भेद दिये हैं, जिनमें रक्त पुष्प वाले भेद को सर्पाक्षी नाम दिया है। अधिकांश विद्वानों ने एह्वोलूहूलस् ऑल्सेनाइड्डीस् को शङ्खपुष्पी माना है। वास्तव में इसके पुष्प नीले होते हैं। इस दृष्टि से इसे विष्णुक्रान्ता मानना अधिक उपयुक्त है। उसी वर्ग की तथा उससे मिलती-जुलती अन्य वनस्पति कन्हॉल्व्ह्युलस् प्लुरिकालिस् को, जिसके पुष्प श्वेत होते हैं, शङ्खपुष्पी मानना अधिक उपयुक्त है (ठा० बलवन्तसिंह)। कुछ विद्वानों ने 'दानकुनी' को शङ्खपुष्पी मान है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। विष्णुक्रान्ता एवं शङ्खपुष्पी के गुण एक साथ ही दिये गये हैं तथा दानकुनी का अलग वर्णन किया गया है। शङ्खपुष्पी विशेष रूप से मेध्य होती है। (च० चि० अ० १) १५९. शङ्खपुष्पी हिं०-शङ्खाहूली, शङ्खपुष्पी। ले०-Convolvulus pluricaulis, Chois. (कन्हॉल्व्ह्युलस् प्लुरिकॉलिस् को.); Fam. Convolvulaceae (कन्हॉल्व्ह्युलेसी)। इसके क्षुप-प्रायः प्रसरणशील होते हैं। मूलस्तम्भ-काष्ठीय होता है। शाखाएँ ४-१२ इञ्च लम्बी, रोमश, कुछ उठी हुई या फैली हुई रहती हैं। पत्ते-रेखाकार या नीचे की ओर के न्यूनाधिक अभिप्रासवत् एवं .५-१.५ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-हलके गुलाबी रंग के या श्वेत होते हैं। बाह्यदल रोमश, रेखाकार प्रासवत् एवं आभ्यन्तर अंश कुप्पी के आकार का और बाहर से रोमयुक्त होता है। विष्णुक्रान्ता तथा शंखपुष्पी में अन्तर यह है कि विष्णुक्रान्ता में कुक्षिवृन्त दो और प्रायः पुनः द्विविभक्त होते हैं और शङ्खपुष्पी में केवल दो कुक्षियाँ होती हैं। १६०. विष्णुक्रान्ता (नील शङ्खपुष्पी) हिं०-शङ्खावलो, शङ्खपुष्पी। म०-सांखवेल। गु०-शङ्खावली। ले०-Evolvulus alsinoides-Linn. (एहॉल्व्ह्युलस् अल्सेनाइडीस् लिन्.)। Fam. Convolvulaceae (कन्हॉल्व्ह्युलेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA