भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६१७ यह भारत के सभी प्रदेशों में तथा हिमालय पर ६००० फीट तक होती है। इसके क्षुप-प्रसरणशील तथा सुन्दर होते हैं। शाखाएँ-मूल के ऊपर से ४-१५ इञ्च लम्बी अनेक शाखाएँ निकल कर चारों ओर फैली रहती हैं। पत्ते-अखण्ड, रेखाकार से लेकर अंडाकार तक .२५-.५ इञ्च तक लम्बे, (कभी-कभी १ इञ्च) एवं पृष्ठलग्न तथा रेशम तुल्य मुलायम रोमों से युक्त होते हैं। पुष्प-भड़कीले नीले रंग के होते हैं और दो या तीन की संख्या में पतले पुष्पदण्डों के अग्र पर रहते हैं। बाह्यदल रोमश और प्रासवत् होते हैं। आभ्यंतर कोश कभी- कभी श्वेत और कुछ-कुछ चन्द्राकार होते हैं। फल में २-४ फाँक होते हैं। गुण और प्रयोग-शङ्खपुष्पी सारक, मेध्य, वृष्य, बल्य, कषाय, कटु, तिक्त एवं दीपन हैं। इसका उपयोग मानसरोग, उन्माद, अपस्मार, अनिद्रा, भ्रम एवं विष में किया जाता है। (१) उन्माद में २-४ तोला ताजी शङ्खपुष्पी का स्वरस देने से दस्त साफ होता है और मद उतरता है। ज्वर में भी निद्रा के लिये एवं प्रलाप कम करने के लिये इसका फांट या इसे जीरक के साथ दूध में पीसकर देते हैं। (२) बद्धकोष्ठ, गुल्म, आनाह आदि में इसकी जड़ देने से दस्त साफ होता है तथा शारीरिक विष निकल जाता है। (३) इसके पत्तों का धूम्रपान जीर्णकास तथा श्वास में लाभदायक है। (४) रक्तस्राव विशेषकर रक्तवमन में इसके स्वरस से लाभ होता है। (५) पूयमेह, मूत्रकृच्छ्र तथा शुक्रदौर्बल्य में भी यह लाभदायक है। गर्भाशय-दौर्बल्य के कारण जिनमें गर्भधारणा नहीं होती उन्हें इससे लाभ होता है। मात्रा-स्वरस २-४ तोला, चूर्ण ३-६ माशा। फांट ४-८ तोला। १६१. दानकुनी (शङ्खपुष्पी ?) सं०-शङ्खपुष्पी। हिं०-संखाहुली ? बं०-दानकुनी। म०-ययोची, दण्डोत्पल। ले०-Canscora decussata Schult (कन्स्कोरा डिकसेटा शुल्ट)। Fam. Gentia-naceae (जेन्शिआनेसी)। यह आर्द्र स्थानों में तथा ४००० फीट की ऊँचाई तक सब प्रदेशों में पायी जाती है। यह वास्तव में शंखपुष्पी नहीं है। बंगाल के वैद्यों के द्वारा इसे शङ्खपुष्पी मानकर ग्रहण करने के कारण इसको कहीं-कहीं संखाहुली कह दिया जाता है। इसके क्षुप-६-१५ इञ्च ऊँचे तथा चौकोर, सीधे, चिकने एवं सपक्ष काण्ड के होते हैं। पत्ते-अवृन्त, विपरीत, प्रासवत् या आयताकार-प्रासवत् ३, ३ शिराओं वाले, नीचे १ इञ्च तक लंबे किन्तु ऊपर क्रमशः छोटे होते हैं। पुष्प- श्वेत, अनियताकार और कुछ-कुछ द्व्योष्ठ होते हैं। बाह्यदल सपक्ष और चार पुंकेसरों में एक बहुत बड़ा होता है। फली में बहुत बीज होते हैं। दानकुनी का स्वाद कड़वा होता है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, अनुलोमक तथा मज्जातंतु के लिये बलकारक है। उन्माद में इसका स्वरस २- ४ तोले की मात्रा में देने से शौच होता है एवं मद उतरता है। बद्धकोष्ठ, गुल्म एवं आनाह आदि में इसकी जड़ देने से शौच साफ होकर शारीरिक विष निकल जाता है। मात्रा-स्वरस १-२ तोला। अथार्कपुष्पी। तस्या नामगुणानाह अर्कपुष्पी क्रूरकर्मा पयस्या जलकामुका। अर्कपुष्पी कृमिश्लेष्ममेहपित्तविकारजित् ।।२७१।।