भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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गुडूच्यादिवर्गः ६११ ने अलम्बुषा का अर्थ मुण्डितिका (गोरखमुण्डी) किया है, जो उचित नहीं मालूम पड़ता। लज्जालु, माइमोसा प्युडिका होनी चाहिये। चरक में सन्धानीय एवं पुरीषसंग्रहणीय महाकषाय में तथा सुश्रुत में प्रियङ्गवादिगण एवं अम्बष्ठादिगण में समङ्गा नाम से इसका उल्लेख है। इनमें लज्जालु एवं 'नमस्कारी' नाम का उल्लेख नहीं है। अभिधानमञ्जरी में काञ्चनपुष्पी पर्याय जो दिया है वह बायोफाइटम् की दृष्टि से ठीक है, जिसे लज्जालु-भेद (अलम्बुषा) कह सकते हैं। कुछ विद्वानों ने नेप्ट्यूनिआ ओलेरॅसिआ लोर. (Neptunia oleracea Lour.; Fam. Leguminosae) को लज्जालु माना है। यह तालाबों में होता है तथा यह शीतल एवं संग्राही होता है। १६३. लज्जालु हिं०-लज्जावन्ती, छुई-मुई, लजारू, लाजवती, लजउनी। बं०-लज्जावती, लाजक। म०-लाजालू, लाजरी। गु०-रीसामणी। ता०-तोड्डा च्चुरंगी। ते०-मुणुगु दामरगु। ले०-Mimosa pudica, Linn. (माइमोसा प्युडिका लिन.)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। यह सम्भवतः उष्ण कटिबन्धज अमेरिका का आदिवासी है। अब यह समस्त भारत में पाया जाता है। इसको बागों में भी लगाते हैं। इसका गुल्म-काँटेदार तथा फैला हुआ होता है। पत्रवृन्त-लम्बे होते हैं जिनसे चार पत्रक दण्ड पाणिवत् निकले रहते हैं। पत्रक-रेखाकार एवं अधिक-से-अधिक १/२ इञ्च लम्बे, बबूल की तरह होते हैं। मुण्डक (पुष्प गुच्छ)-गुलाबी रंग के पुष्पों के मुण्डक, पत्र कोणीय पुष्पदण्डों के अग्र पर होते हैं। पुंकेशर ४ और बहुत बड़े होते हैं। फली- १/२-३/४ इञ्च लम्बी होती हैं जिस पर बीजों के बीच की सन्धियों पर सूक्ष्म काँटे होते हैं। बीज-प्रत्येक में ३-४ होते हैं। शीतकाल में पुष्प आते हैं। जड़-चीमड़, खट्टी एवं कुछ तीती होती है। इसको स्पर्श करने से इसके पत्रक संकुचित हो जाते हैं। इसकी जड़ का विशेष प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें माइमोसीन (Mismosine) नामक एक क्षाराभ पाया जाता है। इसकी जड़ में कषाय द्रव्य रहता है तथा इसकी राख ५ १/२% निकलती है। गुण और प्रयोग-यह संग्राहक है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकुचन होता है। रक्त तथा पित्तप्रधान रोगों में इसे देते हैं। (१) इसकी जड़ का क्वाथ रक्तयुक्त आँव तथा सिकतामेह में देते हैं। (२) अर्श में इसके पत्तों का चूर्ण दुग्ध के साथ पिलाते हैं। मात्रा-स्वरस १-२ तोला। अथालम्बुषा (लज्जालुभेदः) । तस्या नामगुणानाह अलम्बुषा खरत्वक् च तथा मेदोगला स्मृता । अलम्बुषा लघुः स्वादुः क्रिमिपित्तकफापहा ।।२७४।। अलम्बुषा के नाम तथा गुण-अलम्बुषा, खरत्वक् और मेदोगला ये नाम अलम्बुषा के हैं। यह लज्जावन्ती का भेद है। अलम्बुषा-लघु (हलकी), स्वादिष्ट एवं क्रिमि, पित्त तथा कफ को दूर करने वाली होती है। [२७४] १६४. अलम्बुषा ? (लकजन) हिं०-लज्जालू, लकजन। म०-लाजरी। गु०-रीसामणी, झरेर। मल०-मुकुट्टी, तीणरानाझी। ले०- Biophytum sensitivum (Linn.) DC. (बायोफाइटम् सेन्सिटिवम्, लिन. डीसी.)। Fam. Geraniaceae (जिर्रैनिएसी)। यह भारत के सभी उष्ण प्रदेशों में पाया जाता है।