भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६२० भावप्रकाशनिघण्टुः इसके क्षुप-छोटे तथा सुन्दर होते हैं। सदलपर्ण तथा पुष्पखण्ड जमीन के बराबर ३-४ इञ्च लम्बे, रोमश एवं कभी-कभी सशाख काण्ड के अग्र से एक साथ निकले रहते हैं। सदलपर्ण-१ १/२-५" लम्बे, इनके अग्रस्थित दल .३.५" लम्बे, नीचे की ओर के दल क्रमशः छोटे, अवृन्त, आयताकार या आयताकार-अभिलट्वाकार होते हैं। पुष्पखण्ड-प्रायः पत्तियों से लम्बे, घन रोमश, अनेक कोणपुष्पकों एवं सवृन्त और पीले पुष्पों से युक्त रहते हैं। निद्रागति (Sleep movement) के कारण दो-दो पत्रक रात्रि में परस्पर सट जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह शीतल, तिक्त, कषाय तथा कफहर है। रक्तपित्त, अतीसार तथा योनि रोगों में इसका प्रयोग किया जाता है। (१) मूत्राश्मरी एवं सोजाक में इसके मूल का क्वाथ देते हैं। (२) कुकास में जड़ को मधु के साथ देते हैं। (३) अर्श में इसे पीसकर लेप करते हैं। अंडवृद्धि में भी इसको बाँधते हैं। अथ दुग्धिका (दुद्धी) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह दुग्धिका स्वादुपर्णी स्यात्क्षीरा विक्षीरिणी तथा। दुग्धिकोष्णा गुरू रूक्षा वातला गर्भकारिणी ।।२७५।। स्वादुक्षीरा कटुस्तिक्ता सृष्टमूत्रा मलापहा। स्वादुविष्टम्भिनी वृष्या कफकुष्ठक्रिमिप्रणुत् ।। २७६।। नोट-दूधी के अतिरिक्त एक छोटी दूधी होती है जिसके २, ३ प्रकार पाये जाते हैं। इनका संक्षेप में स्वतंत्र वर्णन किया गया है। १६५. दुद्धी हि०-दुद्धी, दुधिया, दुद्धि, दूधी। बं०-बरा, खरूई। म०-मोठी नायटी। गु०-नागला, दुधेली, राती। ते०- ननवाल। ता०-अमूपच्छै अरिस्तिस। ले०-Euphorbia hirta, Linn. (युफोर्बिया हिर्टा, लिन.); Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह भारत के समस्त उष्ण भागों में होती है। इसके क्षुप-वर्षायु, रोमश तथा २ फीट तक ऊँचे होते हैं। काण्ड-प्रायः चतुष्कोणीय होते हैं। पत्र-अभिमुख, मध्यशिरा के दोनों ओर के खण्ड छोटे-बड़े, तीक्ष्ण दन्तुर, अंडा-कार आयताकार या आयताकार-प्रासवत, ३/४-१ १/२ इञ्च तक लम्बे एवं तीक्ष्ण या संकुचित अग्रवाले होते हैं। एकाभव्यूह सूक्ष्म एवं गुच्छीकृत होता है। फली-छोटी एवं रोमावृत होती है जिसमें रक्ताभ भूरे रंग के छोटे बीज होते हैं। इसको तोड़ने से दूध निकलता है। पुष्प एवं फल आने पर इसे सुखा कर रखते हैं। इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इससे जलविलेय पदार्थ जैसे गॉलिक एसिड (Gallic acid), क्वेर्सेंटिन (Quercetin), फिनॉलीय द्रव्य, एक ग्लाइकोसाइड तथा शर्करा पाई जाती है। इनके अतिरिक्त सुरासार विलेय द्रव्य, कुछ उड़नशील द्रव्य एवं मोम भी होता है। गुण और प्रयोग-हृदय एवं श्वसनक्रिया पर इसका अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा केन्द्रीय प्रभाव से श्वसनिकाओं का विस्फार होता है। आमाशय में इससे स्थानिक क्षोभ उत्पन्न होकर अधिक मात्रा से उत्क्लेश एवं वमन होता है। इसलिये इसका प्रयोग भोजनोपरान्त अधिक जल के साथ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में करना चाहिये। (१) जीर्ण कफविकारों एवं तमकश्वास में इसका क्वाथ देते हैं। इसके साथ अन्य कफनिःसारक द्रव्य देने चाहिये। (२) इसका स्वरस रक्तयुक्त आँव तथा शूल में दिया जाता है। (३) बच्चों के कृमि, पेट के विकार तथा कफविकारों में इसे देते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA