भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०४ भावप्रकाशनिघण्टुः
समान एक चिपचिपे पदार्थ के सूक्ष्म बिन्दुओं से ढँका रहता है। फूल-३-४ इञ्च लम्बी और अग्र्य मंजरियों में नीचे की ओर लटके हुये, गुलाबी या गहरे बैंगनी रंग के एवं आकार में तिलपुष्प के समान होते हैं। फल-काले रंग का, बहुत कठोर, अग्र पर दो तीक्ष्ण एवं टेढ़े काँटों से युक्त होता है। इन फलों का भ्रमवश काकनासा या वृश्चिकाली नाम से प्रयोग चल रहा है, जो गलत है। फल का स्वरूप कुछ-कुछ बिच्छू के समान होने से तथा बिच्छू के काटने पर इसका लेप उपयोग में आने से इसे बिछुआ कहते हैं। गुण और प्रयोग-बिच्छू के काटने पर इसके फल को घिस कर लेप करते हैं। भपके से फल का निकाला हुआ तैल पामा आदि चर्म रोगों में उपयोगी बतलाया गया है। इसके पत्तों को अपस्मार में प्रयोग करते हैं तथा अपची में लेप करते हैं। १३९. काकनासा (३) ले०-Thunbergia alata Boj. (थन्बर्जिया एलेटा); Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। यह लता संभवतः अफ्रीका की आदिवासी है। अपने यहाँ उद्यानों में लगाई हुई पाई जाती है। इसकी लता पतली तथा आरोही होती है। पत्ते-मृदुरोमश, लट्वाकार, हृदयाकार एवं वृन्त प्रायः सपक्ष रहता है। पुष्प-पीत या श्वेताभ एवं भूरे या बैंगनी रंग की आँख से युक्त होते हैं। फल-काकतुण्ड सदृश होते हैं। कुछ लोग इसे काकनासा मानते हैं। अथ काकजङ्घा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह काकजङ्घा नदीकान्ता काकतिक्ता सुलोमशा। पारावतपदी दासी काका चापि प्रकीर्त्तिता ।।२५०।। काकजङ्घा हिमा तिक्ता कषाया कफपित्तजित्। निहन्ति ज्वरपित्तास्रव्रणकण्डूविषक्रिमीन् ।। २५१ ।। काकजङ्घा के नाम तथा गुण-काकजङ्घा, नदीकान्ता, काकतिक्ता, सुलोमशा, पारावतपदी, दासी और काका ये सब नाम काकजङ्घा के हैं। काकजङ्घा-शीतवीर्य, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त एवं कफ, पित्त, ज्वर, रक्तपित्त, व्रण (घाव), कण्डू (खुजली), विष और क्रिमि को दूर करनेवाली होती हैं। [२५०-२५१] नोट-काकजङ्घा के स्थान पर उत्तर प्रदेश में मसी का ग्रहण किया जाता है किन्तु यह निःसंदिग्ध रूप से काकजङ्घा नहीं माना जा सकता। डॉ० देसाई ने Leea hirta (लीआ हिर्टा) को काकजङ्घा माना है। श्री डॉ० बलवन्तसिंह जी ने 'सिमजंगा' नामक वृक्ष की तरफ ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि उसके स्थानिक नाम तथा गुण काकजङ्घा से मिलते- जुलते हैं। शास्त्रीय गुणों की दृष्टि से काकंजङ्घा विषमज्वरनाशक, कफ-पित्तशामक, तिक्त, चर्मरोगनाशक एवं रक्तपित्त, बाधिर्य, क्षत, विष एवं कृमि में लाभदायक होनी चाहिये। रा० नि० एवं ध० नि० इसे उष्ण मानते हैं। काकनासा, काकजङ्घा, काकमाची आदि काकसम्बन्धी वनस्पतियों का उल्लेख ग्रन्थों में आया है और टीकाकारों ने कहीं-कहीं एक को दूसरे का पर्याय बतलाया है। १४०. काकजङ्घा (१) हिं०-काकजङ्घा, मसी। बं०-नासकागा। म०-रान किरायता। ले०-Peristrophe bicalyculata Nees (पेरिस्ट्रोफ बाइकेलीक्युलेटा नीस्)। Fam. Acanthaceae (एकेन्थेसी)। यह सर्वत्र पाया जाता है। इसका क्षुप-३-६ फीट ऊँचा एवं शाखायें-प्रसरणशील होती हैं। काण्ड-षट्कोण एवं सन्धियाँ फूली हुई रहती हैं। पत्ते-रोमश, नोक वाले तथा नीचे बड़े एवं ऊपर छोटे होते हैं। नीचे के पत्ते ४.२५" x २.७५" होते हैं। पुष्पवाहक शाखाएँ अत्यन्त शाखाओं से युक्त और अन्तिम छोटी-छोटी शाखाएँ केवल दो- दो पुष्पों वाली होती हैं जिनमें प्रायः एक पुष्प अर्ध विकसित रहता है। पुष्प-छोटे, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं।