भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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गुडूच्यादिवर्गः ६०५ गुण और प्रयोग-काकजङ्घा के स्थान पर उत्तर प्रदेश में इसी का व्यवहार किया जा रहा है। किन्तु इसके काकजङ्घा होने में सन्देह है। इसको सर्पविष में उपयोगी बतलाया जाता है। १४१. काकजङ्घा (२) सं०-काकजङ्घा। हिं०-चिरईगोड़ा, मिजुरगोरवा। असा०-ओसाई। बं०-बोरूना गोडा। ले०-Vitex peduncularis Wall. (वाइटेक्स पेडन्क्युलेरिस् वाल.)। Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)। यह बिहार, मध्य प्रदेश, आसाम तथा पूर्वी बंगाल से तेनासरिम् तक होता है। इसके वृक्ष-छोटे २०, २५ फीट ऊँचे एवं शाखाएँ मृदुरोमश होती हैं। पत्ते-संयुक्त एवं त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-लम्बे, भालाकार, ४.५" × १" बड़े, नोकीले, अधरतल पर सूक्ष्म पीतवर्ण की ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। वृन्त प्रायः सपक्ष होते हैं। पुष्प-६-११ इञ्च लम्बी मञ्जरियों में श्वेतवर्ण के तथा कण्ठ में पीले पुष्प आते हैं। फल-मांसल, गुठलीदार एवं .३५-.४ इञ्च बड़ा होता है। इसके पत्तों का व्यवहार किया जाता है। इसका एक अन्य जाति V. lencoxylon Linn. (वा. ल्यूकोक्साइलोन् लिन.) पायी जाती है। इनके स्थानिक नाम सिमजङ्घा, मुरगी-गोडा, चिरई गोडा आदि काकजङ्घा के समानार्थक मालूम पड़ते हैं तथा इसका जंगली लोग विशिष्ट विषमज्वर Blackwater Fever (ब्लॅक वाटर फीवर) में प्रयोग भी करते हैं। काकजङ्घा को शास्त्रकारों ने विषमज्वर में उपयोगी बतलाया है। वरुण वृक्ष के पत्तों की तरह इसकी त्रिपत्रक पत्तियाँ होने के कारण इसे कहीं-कहीं वरुना भी कहते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक उड़नशील तैल, अधिक मात्रा में टॅनिन, गोंददार पदार्थ एवं कुछ ग्लूकोसाइड सदृश पदार्थ होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्तों का फांट मलेरिया जैसे ज्वरों में विशेषकर Blackwater fever (ब्लॅक वाटर फीवर) में प्रयोग किया जाता है। दो औंस ताजे या छाया में सुखाये पत्तों को ४० औंस जल में ५।१० मिनट उबाल कर १ घंटा सीझने देते हैं। चाय की तरह बना यह फांट कुछ चीनी मिला कर दिन भर में ८ से १० औंस की मात्रा में दिया जाता है। १४२. काकजङ्घा (३) सं०, हिं०, बं०, म०-काकजङ्घा। ले०-Leea hirta Roxb. (लीआ हिर्टा राक्स.)। Fam. Vitaceae (वेटेसी)। यह सिक्किम हिमालय, आसाम, पूर्व बंगाल, सिलहट एवं अण्डमान में होती है। इसकी १.२-३ मी० ऊँची झाड़ी होती है। नये काण्ड मृदुरोमश; पत्ते-संयुक्त; पत्रक-७.५-१८ × २.५-४.५ से० मी०, आयताकार या अण्डाकार-आयताकार, लम्बाग्र, असम दन्तुर, रोमश, अधोपृष्ठ गोल, चिपटे, चकत्तों से युक्त एवं पत्रदण्ड कोणदार; पुष्प-श्वेत मंजरियों में; फल-६ मि० मि० व्यास के, दबे हुये गोल एवं पकने पर काले होते हैं। इसकी जड़ का चिकित्सा में व्यवहार करते हैं। गुण और प्रयोग-यह स्नेहन तथा संग्राहक है। इसके पंचांग में क्षयनाशक गुण भी पाया गया है। अथ नागपुष्पी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह नागपुष्पी श्वेत पुष्पा नागिनी रामदूतिका। नागिनी रोचनी तिक्ता तीक्ष्णोष्णा कफपित्तनुत् । विनिहन्ति विषं शूलं योनिदोषवमिक्रिमीन् ।।२५२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA