भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०६ भावप्रकाशनिघण्टुः नागपुष्पी के नाम तथा गुण-नागपुष्पी, श्वेतपुष्पा, नागिनी और रामदूतिका ये नाम नागपुष्पी के हैं। नागपुष्पी-तिक्त, रसयुक्त, रोचक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य एवं कफ, पित्त, विष, शूल, योनिसम्बन्धी दोष, वमन तथा क्रिमि को नष्ट करने वाली होती है। [२५२] १४३. नागपुष्पी हिं०-नागपुष्पी। म०-नागाली। नागपुष्पी लता जाति की वनौषधि जङ्गल में वृक्षों पर फैली हुई रहती है। एक-एक शाखा में एक-एक पत्ता होता है। फूल-सफेद और काले रंग के होते हैं। बेल के नीचे कन्द बैठता है। उपर्युक्त वर्णन सुना जाता है। किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से इसका निर्णय अभी नहीं हो सका है। नागपुष्पों का उल्लेख रा० नि०, ध० नि० में नहीं मिलता। चिकित्सा में भी इसका विशेष प्रयोग नहीं होता। अथ मेषशृंगी (मेढाशिङ्गी) । तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह मेषशृङ्गी विषाणी स्यान्मेषवल्ल्यजशृङ्गिका। मेषशृङ्गी रसे तिक्ता वातला श्वासकासहृत् ।। २५३ ।। रूक्षा पाके कटुः पित्तव्रणश्लेष्माक्षिशूलनुत् ।। २५४ ।। मेषशृङ्गीफलं तिक्तं कुष्ठमेहकफप्रणुत्। दीपनं संसनं कासक्रिमिव्रणविषापहम् ।। २५५ ।। मेढ़ाशिंगी के नाम तथा गुण-मेषशृङ्गी, विषाणी, मेषवल्ली और अजशृङ्गिका ये सब संस्कृत नाम हैं। मेढ़ाशिंगी-तिक्त रसयुक्त, वातकारक, रूक्ष, विपाक में कटु रसयुक्त एवं श्वास, कास, पित्त, व्रण, कफ और नेत्रशूल को दूर करने वाली होती है। मेढ़ाशिंगी का फल-तिक्त रसयुक्त, अग्निदीपक, संस्रनं एवं कुष्ठ, प्रमेह, कफ, कास, कृमि, व्रण और विष को नष्ट करने वाला होता है। [२५३-२५५] नोट-मेषशृङ्गी भी सन्दिग्ध द्रव्य है। अधिकांश विद्वानों ने 'गुडमार' को मेषशृङ्गी माना है। कुछ ने 'मरोडफली' को मेषशृङ्गी माना है। मरोडफली को कुछ मूर्वा के स्थान पर ग्रहण करते हैं जिसका पहले मूर्वा के अन्तर्गत वर्णन किया जा चुका है। मेषशृङ्गी दोनों का एक जगह पाठ किया है इससे ये दो अलग द्रव्य मालूम पड़ते हैं किन्तु भावप्रकाश एवं ध० नि० दोनों का पर्याय के रूप में उल्लेख करते हैं। चरक में तिल्वक कल्प एवं शीतज्वरोक्त अगुर्वादि तैल में उल्लेख है। सुश्रुत ने विष एवं अक्षिविकार में इसका प्रयोग किया है। यहाँ गुडमार का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। १४४. मेढ़ाशिंगी सं०-मधुनाशिनी। हिं०-मेढासिंगी, गुडमार। बं०-मेषसिंगी। म०-मेढ़ाशिंगी, कावकी। ता०-शिरुकुरंज। ते०-पोडापत्री। ले०-Gymnema sylvestre R. Br. (जिमनेमा सिल्वेस्ट्रे)। Fam. Asclepiadaceae (एस्क्लेपिएडेसी)। यह कोंकण, त्रावणकोर, गोवा, दक्षिण भारत में विशेष रूप से होती है। बिहार एवं उ० प्र० में भी कहीं-कहीं मिलती है तथा बाग़ों में लगाई हुई पाई जाती है। इसकी लता-चक्रारोही, पतले काण्ड की, काष्ठमय, रोमश तथा बहुत फैली हुई होती है। पत्ते-अभिमुख, अंडाकार- आयताकार या लट्वाकार, कभी-कभी हृद्गत, १-२ इञ्च लम्बे, कभी-कभी ३ इञ्च लम्बे, नोकदार एवं मृदुरोमश होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीले, समस्थ मूर्धजक्रम में निकले हुए एवं आभ्यन्तर कोश घण्टिकाकार-चक्राकार होते हैं। फली- २-३ इञ्च लम्बी, .२-.३ इञ्च मोटी, कठोर, भालाकार क्रमशः नोकीली होती है। दो में से प्रायः एक फली का विकास