भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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६२२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ भूम्यामलकी (भुँइआमला) । तस्या नामगुणानाह भूम्यामलकिका प्रोक्ता शिवा तामलकीति च। बहुपत्रा बहुफला बहुवीर्याऽजटाऽपि च ।।२७७।। भूधात्री वातकृत्तिक्ता कषाया मधुरा हिमा। पिपासाकासपित्तास्रकफकण्डूक्षतापहा ।।२७८।। भुँइ आमला के नाम तथा गुण-भूम्यामलकिका, शिवा, तामलकी, बहुपत्रा, बहुफला, बहुवीर्या, अजटा और भूधात्री ये सब नाम भुँइ आमला के हैं। भुँइ आमला-तिक्त, कषाय एवं मधुर रस युक्त, वातकारक, शीतवीर्य एवं तृषा, खाँसी, पित्त, रक्त, कफ, खुजली और क्षत को दूर करने वाली है। [२७७-२७८] १६९. भूआमला हिं०-भुँई आमला, भूमि आँवरा। बं०-भुँई आम्ला। क०-किरूननेल्ल। ते०-नेल वुसरि। गु०-भोंयआवली। म०-भुई आँवली। ले०-Phyllanthus niruri, Linn. (फाइलैन्थस् निरूरी, लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में वर्षा ऋतु में अधिक मिलती है। पहाड़ों पर यह ३००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसका क्षुप-६ से १२ इञ्च तक ऊँचा होता है। शाखाएँ-सीधी, पतली तथा देखने में पक्षवत् पत्र सदृश मालूम होती हैं। पत्ते-दीर्घवृत्ताकार, आयताकार एवं ०.१५-०.७५ इञ्च लम्बे होते हैं। फूल-छोटे, हरे या श्वेताभ, प्रायः २-३ पुपुष्प एवं १ स्त्रीपुष्प पत्रकोण में रहते हैं। फल-गोल, आँवला की तरह, ०.०८-०.१२ इञ्च व्यास के ०.२- ०.३ इञ्च लम्बे दण्ड पर आते हैं। बीज-भूरे रंग के, खड़ेबल में सूक्ष्म दानेदार रेखाओं से युक्त एवं आड़ेबल में महीन धारीदार होते हैं। इसकी एक अन्य जाति होती है जिसे Phyllanthus urinaria Linn. (फॉइलन्थस् युर्निरिआ लिन.) कहते हैं। इसमें पत्ते-०.१२-०.४ इञ्च लम्बे, किसी-किसी में ०.६ इञ्च तक लम्बे, आयताकार या रेखाकार-आयताकार; फूल-रक्ताभ; फल-दबे हुये, गोल, ऊपर से शल्क (कीलक) युक्त; बीज-सूक्ष्म एवं आडेबल में महीन नालीदार होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पत्तों में एक कडुवा द्रव्य फाइलेन्थिन (Phyllanthin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह कासहर, श्वासहर, शीत, मूत्रजनन, संस्रन, दाहशामक, शोथहर, व्रणरोपण तथा नियतकालिक ज्वर प्रतिबन्धक है। यह कामला, मलेरिया, यकृत्-प्लीहावृद्धि, दाह, मूत्ररोग, रक्तविकार तथा व्रण में उपयोगी है। (१) इसके पंचांग का क्वाथ मलेरिया में दिया जाता है। (२) मूत्रमार्ग के विकारों तथा जलशोथ में इससे लाभ होता है। इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा जलन कम होती है। (३) कामला में इसकी १ तोला जड़ दूध में पीस कर दोनों समय देते हैं। (४) इसके कोमल काण्ड का फाण्ट आँव में देते हैं। (५) व्रणशोथ तथा व्रण पर इसके पंचांग का चावल की पेया के साथ बना पोल्टिस बाँधा जाता है। (६) त्वचा के रोगों में पत्तों को नमक के साथ पीस कर बाँधते हैं। मात्रा-स्वरस १ से २ तोला; चूर्ण ३-६ माशा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA