भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 674

गूडूच्यादिवर्गः ६२३ अथ ब्राह्मी मण्डूकपर्णी च । तयोर्नामानि गुणांश्चाह ब्राह्मी कपोतवङ्गा च सोमवल्ली सरस्वती । मण्डूकपर्णी माण्डूकी त्वाष्ट्री दिव्या महौषधी ।।२७९।। ब्राह्मी हिमासरा तिक्ता लघुर्मेध्या च शीतला । कषाया मधुरा स्वादुपाकाऽऽयुष्या रसायनी ।।२८०।। स्वर्या स्मृतिप्रदा कुष्ठपाण्डुमेहास्रकासजित् । विषशोथज्वरहरी तद्वन्मण्डूकपर्णिनी ।।२८१।। ब्राह्मी और मण्डूकपर्णी के नाम तथा गुण—ब्राह्मी, कपोतवङ्गा, सोमवल्ली और सरस्वती ये नाम ब्राह्मी के हैं । मण्डूकपर्णी, माण्डूकी, त्वाष्ट्री, दिव्या और महौषधी ये नाम मण्डूकपर्णी के हैं। ब्राह्मी—शतवीर्य, सारक (दस्तावर), तिक्त, कषाय और मधुर रसयुक्त, लघु, मेधा के लिए हितकर, शीतल, विपाक में मधुर रस युक्तं, आयु को बढ़ाने वाली, रसायन, स्वर को उत्तम करने वाली, स्मरण-शक्ति को बढ़ाने वाली एवं कुष्ठ, पाण्डु, प्रमेह, रक्तविकार, खाँसी, विष, शोथ तथा ज्वर को दूर करने वाली होती है । मण्डूकपर्णी—इसके भी समस्त गुण ब्राह्मी के समान ही हैं । [२७९-२८१] नोट—भावप्रकाशकार ब्राह्मी तथा मण्डूकपर्णी दोनों के समान गुण लिखते हैं । वास्तव में ये दो भिन्न वनस्पतियाँ हैं । सुश्रुत चि० २८-४ में ब्राह्मी तथा मण्डूकपर्णी दोनों के अलग-अलग प्रयोग दिये हुये हैं । उत्तर प्रदेश के अधिकांश वैद्य जिसको ब्राह्मी मानते हैं यह वास्तव में मण्डूकपर्णी है जिसका लेटिन नाम हाइड्रोकोटाइल् एशियाटिका है । इसकी २, ३ किस्में तथा एक अन्य जाति भी पाई जाती है । इनके अतिरिक्त बंगाल के वैद्य जलनीम (हर्पेस्टिस् मोनिएरा) को ब्राह्मी मानते हैं । हो सकता है कि दोनों के गुणों में कुछ समानता पाई जाती हो और इसी कारण भावप्रकाशकार ने इनके गुण एक समान लिखे हों । इनमें से हाइड्रोकोटाइल् एशियाटिका निश्चित रूप से मण्डूकपर्णी मालूम होती है क्योंकि इसका बिहार प्रान्त का स्थानिक नाम बेंगसाग है, जिसका अर्थ मेढक का शाक है । यहाँ दोनों का अलग-अलग वर्णन किया है । १७०. ब्राह्मी (वंगीय), जलनीम हिं०—ब्राह्मी, जलनीम, ब्रह्मी । बं०—ब्राह्मीशाक, ऊधाबर्नि । म०—ब्राह्मी । ते०—शम्ब्रनी चेट्टु । ता०—नीराब्रह्मि । अं०—Bacopa (बँकोपा) । ले०—Bacopa monnieri (Linn.) Pennell (बँकोपा मोनएिराई (लिन.) पेनेल); B. monniera Wetts. (बँ. मोनएिरा वेट); Herpestis monniera (Linn.) H. B. & K. (हर्पेस्टिस् मोनिएरा) । Fam. Scrophulariaceae (स्क़्रोफ्युलॅरिएसी) । पानी के समीप आर्द्र स्थानों में यह सर्वत्र पाई जाती है । इसका क्षुप—प्रसरी एवं किञ्चित् मांसल होता है । पत्ते—अभिलट्वाकार, आयताकार या स्रुवा के आकार के अखण्ड, अवृन्त, कुण्ठिताग्र, सूक्ष्म काले चिह्नों से युक्त एवं ६-२५ × २.५-१० मि० मि० बड़े होते हैं । पुष्प—जामुनी मिला हुआ श्वेत या गुलाबी रंग का होता है । फली—५ मि० मि० लम्बी, अंडाकार, चिकनी तथा नुकीली होती है, जिसमें सूक्ष्म बीज होते हैं । इसका स्वाद कड़वा होने से तथा जल के समीप होने से इसे जलनीम भी कहते हैं । इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है । रासायनिक संगठन—इसमें एक क्षाराभ ब्राह्मीन (Brahmine, 0.01-0.02% पाया जाता है । गुण और प्रयोग—इसमें का क्षाराभ मेढक, चूहे तथा गिनीपिग आदि के लिये बहुत ही विषैला है । इससे रक्त का दबाव कम होता है । अल्प मात्रा से रक्त का दबाव कुछ बढ़ता है तथा श्वसन क्रिया को भी बल मिलता है । अल्पत्व मात्रा से भी अनैच्छिक मांसपेशियाँ जैसे आन्त्र, गर्भाशय आदि उत्तेजित होती हैं । चिकित्सा की मात्रा में इसके क्षाराभ का प्रभाव स्ट्रिकनीन की तरह पड़ता है जिससे हृदय को बल मिलता है ।