भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६२४ भावप्रकाशनिघण्टुः यह वातनाड़ी-संस्थान के लिये बल्य, मूत्रल एवं विरेचक है। इसका प्रयोग अपस्मार, उन्माद तथा स्वरभंग में किया जाता है। (१) आमवात में इसके स्वरस का बाह्य प्रयोग करते हैं। (२) बच्चों के सर्दी, खाँसी आदि में इसका स्वरस एक चम्मच देने से वमन तथा विरेचन होकर लाभ होता है। (३) अवसाद, मानसिक दौर्बल्य आदि अवस्थाओं में इसके पत्तों का चूर्ण उपयोगी है। (४) अपस्मार, हिस्टीरिया आदि में इससे बना ब्राह्मी घृत उपयोगी है। मात्रा—स्वरस ½-१ तोला; चूर्ण ४-८ रत्ती। १७१. मण्डूकपर्णी हिं०—ब्रह्माण्डूकी, ब्राह्मीभेद। बं०—थोलकुरी। गु०—खड़ब्राह्मी। क०—वंदेलग। ते०—मण्डूक ब्राह्मी। ता०—बल्लौ। म०—कारिवणा। अं०—India Pennywort (इंडियन पेनीवर्ट)। ले०—Centella asiatica (Linn.) Urban (सेण्टेला एशियाटिका (लिन.) अरबन); Hydrocotyle asiatica, Linn. (हाइड्रोकोटाइल् एशियाटिका, लिन.)। Fam. Umbelliferae (अम्बेलीफेरी)। यह भारत तथा लंका में आर्द्र स्थान पर ६००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह विदेशों में भी पाई जाती है। इसका क्षुप—रूप में कुछ भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। काण्ड—लम्बे, प्रसरी एवं ग्रन्थियों पर मूलों से युक्त होते हैं। पत्ते—गोल वृक्काकार, अखण्ड परन्तु धार पर प्रायः गोल दन्तुर, १.३-६.३ से० मी० व्यास में एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प—ग्रन्थियों से कई पुष्पदण्ड एक साथ निकलते हैं, जिनमें लाल रंग के पुष्प संख्या में ३-५, सवृन्त मूर्धज होते हैं। फल—८ मि० मी० लम्बे तथा चिपटे होते हैं, जिनमें चिपटे बीज होते हैं। इसकी अन्य किस्में होती हैं, जिनमें एक में पत्ती बड़ी एवं फल सफेद तथा दूसरी में पत्ती छोटी तथा लाल फल होते हैं। एक अन्य जाति हा. रोटण्डिफोलिया (H. rotundifolia Roxb.) भी होती है जिसका क्षुप—बहुत कोमल, पत्ते—पतली झिल्ली के समान, स्पष्टतः ५-७ खण्डित एवं व्यास में १८ मि० मी० तक होते हैं। इसमें प्रत्येक पुष्पदंड में पुष्प १०-१५ तक एवं अवृन्त होते हैं। इसमें कोणपुष्पक सूक्ष्म होते हैं। पहला में वे स्पष्ट, प्रत्येक पुष्पदण्ड के साथ दो-दो तथा चौड़े लट्वाकार होते हैं। इसके पत्तों एवं काण्ड का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसकी छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर बन्द बोतलों में रखना चाहिये। रासायनिक संगठन—इसमें एक क्षाराभ हाइड्रोकोटिलिन (Hydrococotylin, C₂₂ H₃₃ N O₈), एक ग्लाइकोसाइड, एशियाटिकोसाइड (Asiaticoside), अल्प उड़नशील तैल, स्थिरतैल तथा रालीय द्रव्य पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त वेलेराइन (Vellarine), पेक्टिक एसिड (Pectic acid) तथा विटामिन सी. (Ascorbic acid) पाये जाते हैं। शुष्क पौधे में सेण्टोइक् एसिड (Centoic acid—C₃₀ H₄₈ O₆) तथा सेण्टेलिक् एसिड (Centellic acid, C₃₀ H₄ C₆) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह रसायन, बल्य, मूत्रजनन, वयःस्थापन, मेध्य, रक्तशोधक, कुष्ठघ्न, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा में यह मादक है। इससे शिरःशूल, चक्कर आना तथा कभी-कभी सन्यास (Coma) की अवस्था भी हो जाती है। इससे त्वचा की रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। इसका प्रयोग वातिक विकार, चर्मरोग एवं रक्तविकार में किया जाता है।