भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
६२४ भावप्रकाशनिघण्टुः यह वातनाड़ी-संस्थान के लिये बल्य, मूत्रल एवं विरेचक है। इसका प्रयोग अपस्मार, उन्माद तथा स्वरभंग में किया जाता है। (१) आमवात में इसके स्वरस का बाह्य प्रयोग करते हैं। (२) बच्चों के सर्दी, खाँसी आदि में इसका स्वरस एक चम्मच देने से वमन तथा विरेचन होकर लाभ होता है। (३) अवसाद, मानसिक दौर्बल्य आदि अवस्थाओं में इसके पत्तों का चूर्ण उपयोगी है। (४) अपस्मार, हिस्टीरिया आदि में इससे बना ब्राह्मी घृत उपयोगी है। मात्रा—स्वरस ½-१ तोला; चूर्ण ४-८ रत्ती। १७१. मण्डूकपर्णी हिं०—ब्रह्माण्डूकी, ब्राह्मीभेद। बं०—थोलकुरी। गु०—खड़ब्राह्मी। क०—वंदेलग। ते०—मण्डूक ब्राह्मी। ता०—बल्लौ। म०—कारिवणा। अं०—India Pennywort (इंडियन पेनीवर्ट)। ले०—Centella asiatica (Linn.) Urban (सेण्टेला एशियाटिका (लिन.) अरबन); Hydrocotyle asiatica, Linn. (हाइड्रोकोटाइल् एशियाटिका, लिन.)। Fam. Umbelliferae (अम्बेलीफेरी)। यह भारत तथा लंका में आर्द्र स्थान पर ६००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह विदेशों में भी पाई जाती है। इसका क्षुप—रूप में कुछ भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। काण्ड—लम्बे, प्रसरी एवं ग्रन्थियों पर मूलों से युक्त होते हैं। पत्ते—गोल वृक्काकार, अखण्ड परन्तु धार पर प्रायः गोल दन्तुर, १.३-६.३ से० मी० व्यास में एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प—ग्रन्थियों से कई पुष्पदण्ड एक साथ निकलते हैं, जिनमें लाल रंग के पुष्प संख्या में ३-५, सवृन्त मूर्धज होते हैं। फल—८ मि० मी० लम्बे तथा चिपटे होते हैं, जिनमें चिपटे बीज होते हैं। इसकी अन्य किस्में होती हैं, जिनमें एक में पत्ती बड़ी एवं फल सफेद तथा दूसरी में पत्ती छोटी तथा लाल फल होते हैं। एक अन्य जाति हा. रोटण्डिफोलिया (H. rotundifolia Roxb.) भी होती है जिसका क्षुप—बहुत कोमल, पत्ते—पतली झिल्ली के समान, स्पष्टतः ५-७ खण्डित एवं व्यास में १८ मि० मी० तक होते हैं। इसमें प्रत्येक पुष्पदंड में पुष्प १०-१५ तक एवं अवृन्त होते हैं। इसमें कोणपुष्पक सूक्ष्म होते हैं। पहला में वे स्पष्ट, प्रत्येक पुष्पदण्ड के साथ दो-दो तथा चौड़े लट्वाकार होते हैं। इसके पत्तों एवं काण्ड का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसकी छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर बन्द बोतलों में रखना चाहिये। रासायनिक संगठन—इसमें एक क्षाराभ हाइड्रोकोटिलिन (Hydrococotylin, C₂₂ H₃₃ N O₈), एक ग्लाइकोसाइड, एशियाटिकोसाइड (Asiaticoside), अल्प उड़नशील तैल, स्थिरतैल तथा रालीय द्रव्य पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त वेलेराइन (Vellarine), पेक्टिक एसिड (Pectic acid) तथा विटामिन सी. (Ascorbic acid) पाये जाते हैं। शुष्क पौधे में सेण्टोइक् एसिड (Centoic acid—C₃₀ H₄₈ O₆) तथा सेण्टेलिक् एसिड (Centellic acid, C₃₀ H₄ C₆) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह रसायन, बल्य, मूत्रजनन, वयःस्थापन, मेध्य, रक्तशोधक, कुष्ठघ्न, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा में यह मादक है। इससे शिरःशूल, चक्कर आना तथा कभी-कभी सन्यास (Coma) की अवस्था भी हो जाती है। इससे त्वचा की रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। इसका प्रयोग वातिक विकार, चर्मरोग एवं रक्तविकार में किया जाता है।
गुडूच्यादिवर्गः ६२५ (१) त्वचा के विकारों में यह अच्छी लाभदायक है। कुष्ठ में इससे कुछ लाक्षणिक लाभ एवं साधारण स्वास्थ्य ठीक होता है। फिरंग की द्वितीयावस्था एवं तृतीयावस्था तथा जीर्ण आमवात में इसको देते हैं। फिरंग में इसके देने से एक सप्ताह में त्वचा मुलायम पड़कर छूटने लगती है। अन्य त्वचा रोगों में भी इससे लाभ होता है। इसका चूर्ण व्रण पर लगाते हैं तथा इसे खिलाते हैं। इसके प्रयोग से यदि कण्डू हो तो कुछ दिन इसे रोकना चाहिये तथा रेचक औषध देनी चाहिये। (२) बच्चों के खूनी आँव में २ से ४ पत्तों का स्वरस, जीरक एवं मिश्री के साथ पिलाते हैं तथा नाभि के नीचे लेप करते हैं। (३) बच्चों को शब्दोच्चारण ठीक करने के लिये इसे चबाने को देते हैं। (४) स्मरणशक्ति बढ़ाने के लिये इसका चूर्ण दुग्ध के साथ दिया जाता हैं। मात्रा-चूर्ण २-४ रत्ती; ताजे पत्ते ८-१२ प्रौढ़ के लिये; २-४ बालकों के लिये। अथ द्रोणा (गूमा)। तस्या नामगुणानाह द्रोणा च द्रोणपुष्पी च फलेपुष्पा च कीर्त्तिता। द्रोणपुष्पी गुरुः स्वादू रूक्षोष्णा वातपित्तकृत् ।।२८२।। सतीक्ष्णलवणा स्वादुपाका कट्वी च भेदिनी। कफामकामलाशोथतमकश्वासजन्तुजित् ।।२८३।। गूमा के नाम तथा गुण-द्रोणा, द्रोणपुष्पी और फलेपुष्पा ये नाम गूमा के हैं। गूमा-गुड़, स्वादिष्ट, रूक्ष, उष्ण, वात-पित्त कारक, तीक्ष्ण, लवणरसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, कटु, मल को भेदन करने वाली एवे कफ, आम, कामला, शोथ, तमकश्वास और क्रिमि को दूर करती है। [२८२-२८३] १७२. गूमा हिं०-गूमा। बं०-घलघसे, हलकषा, दण्ड कलस। गु०-कुबो। म०-तुंब्रा। ले०-Leucas cephalotes Spreng. (ल्यूकस् सिफैलोटिस् स्प्रेंग.); Fam. Labiatae (लेबिएटी)। यह प्रायः सब स्थानों में वर्षा में अधिक दिखाई पड़ती है। इसका क्षुप-आधे से २-३ फीट तक ऊँचा होता है। शाखायें चौपहल एवं रोमश होती हैं। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे तथा आधा इञ्च चौड़े अथवा न्यूनाधिक होते हैं। ये अंडाकार- प्रासवत् या लट्त्वाकार, गोल एवं आरावत् दन्तुर एवं रोमश दन्तुर होते हैं। पुष्पगुच्छ-श्वेत, प्रायः अग्र्य, गोल, व्यास में १-२ इञ्च एवं प्रायः लम्बाग्र कोणपुष्पकों से घिरे हुये रहते हैं और पुष्पगुच्छ के शीर्ष पर प्रायः दो पत्तियाँ रहती हैं। पुष्प आकृति में द्रोण के सदृश होते हैं, इसलिये इसे द्रोणपुष्पी कहते हैं। पुष्प शरद् में आते हैं तथा ग्रीष्म में यह सूख जाता है। इस प्रजाति में अनेक जातियाँ हैं जिनमें से कई एक गूमा कहा जाता है। इसके पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक सुगन्धित तैल तथा क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कटु, स्वेदजनन, वातप्रशमन, सं्रसन एवं कफघ्न है। इसका प्रयोग प्रतिश्याय, कास, अग्निमांद्य, विषमज्वर एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है। (१) जुकाम में इसका फांट या स्वरस देते हैं। कफज्वर में टंकणक्षार तथा मधु के साथ इसका स्वरस देते हैं। इसके फूलों का शर्बत भी जुकाम आदि में लाभदायक है। (२) आध्मान तथा उदरशूल में इसका स्वरस दिया जाता है। ४३ भाव. I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६२६ भावप्रकाशनिघण्टुः (३) खुजली में इसका रस शरीर पर मलते हैं। (४) सरदी से उत्पन्न शिरःशूल में इसके स्वरस का नस्य उपयोगी है। (५) कामला में इसके पत्तों का रस नेत्रों में डालते हैं। मात्रा-स्वरस १/२-१ तोला। अथ सुवर्चला (हुरहुर-श्वेत, पीत) । तयोर्नामगुणानाह सुवर्चलार सूर्यभक्ता वरदा बदराऽपि । सूर्यावर्त्ता रविप्रीताऽपरा ब्रह्मसुदुर्लभा ।। २८४ ।। सुवर्चला हिमा रूक्षा स्वादुपाका सरा गुरुः । अपित्तला कटुः क्षारा विष्टम्भकफवातजित् ।। २८५ ।। अन्या तिक्ता कषायोष्णा सरा रूक्षा लघुः कटुः । निहन्ति कफपित्तास्रश्वासकासारुचिज्वरान् ।। विस्फोटकुष्ठमेहास्त्रयोनिरुक्कृमिपाण्डुताः ।। २८६ ।। हुरहुर तथा ब्रह्मसुवर्चला१ के नाम और गुण-सुवर्चला, सूर्यभक्ता, वरदा, बदरा, सूर्यावर्त्ता और रविप्रोता ये नाम हुरहुर के हैं। एक दूसरे प्रकार की भी 'हुरहुर' होती है, जिसका ब्रह्मसुदुर्लभा नाम है। हुरहुर-शीतवीर्य, रूक्ष, विपाक में मधुररसयुक्त, सारक, गुरु, किञ्चित् पित्तजनक, कटुरसयुक्त, क्षारीय एवं विष्टम्भ, कफ और वात को दूर करने वाली होती है। और द्वितीय हुरहुर (ब्रह्मसुदुर्लभा)-तिक्त-कषाय और कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, सारक, रूक्ष, लघु एवं कफ, पित्त-रक्त, श्वास, कास, अरुचि, ज्वर, विस्फोटक, कुष्ठ, प्रमेह, रक्तविकार, योनिरोग, कृमि तथा पाण्डुरोग को दूर करने वाली होती है। [२८४-२८६] नोट-उपर्युक्त वनस्पति को अधिकांश विद्वानों ने आजकल मिलने वाली हुरहुर माना है। हुरहुर के दो भेद पाये जाते हैं। गाइनेण्ड्रोप्सिस् पेण्टाफाइला (Gynandropsis pentaphylla) नामक श्वेत हुरहुर तथा क्लिओम् बिस्कोसा (Cleome viscosa) नामक पीत हुरहुर। एक अन्य क्लि. मोनोफाइला (C. monophylla Linn.) नामक बैंगनी हुरहुर भी होता है। श्वेत हुरहुर के पत्र पर्णनाल पर सूर्य के साथ घूमते हैं, जिससे उपर्युक्त सूर्यभक्ता, सूर्यावर्ता, रविप्रीता आदि नाम इस (श्वेत हुरहुर) के लिये सार्थक मालूम पड़ते हैं। कुछ विद्वान् इसमें उग्रगन्ध होने से इसे उग्रगन्धा, अजगन्धा मानते हैं। इसका मराठी नाम तिलवण इसके तिलपर्णी होने का सन्देह पैदा करता है। कुछ ने इसे कर्णस्फोटा माना है। बंगाली वैद्य सुवर्चला नाम से इसे लेते हैं। यहाँ दोनों हुरहुर का वर्णन किया गया है। हुरहुर को शास्त्रीय सुवर्चला, अजगन्धा तिलपर्णी, आदित्यभक्ता, सूर्यमुखी या कर्णस्फोटा इनमें से क्या माना जाय यह सन्देहास्पद है। मालवा, राटंडीफोलिया (Malva rotundifolia Lill.; Fam. Malvaceae) का स्थानिक नाम सोंचल होने के कारण कुछ विद्वान् उसे सुवर्चला मानते हैं। १७३. हुरहुर (श्वेत) हिं०-हुरहुर सफेद, करेला, चमनी। को०-सेत काटाझड़ा। म०-तिलवण, माटवण, माब्ली। बं०- हुरहुरिया। गु०-धोली तलवर्णा। ते०-वामिंटम्। मल०-तैवेल। ता०-कुडुगु, वेलै। ले०-Gynandropsis pentaphylla, DC. (गाइनेण्ड्राप्सिस् पेण्टाफाइला डीसी.)। Fam. Capparidaceae (कैपेरिडेसी)। यह भारत के सभी उष्ण स्थानों में होता है। इसका क्षुप-१-३ फीट ऊँचा एवं दुर्गन्धयुक्त होता है। पत्ते-सपत्रक, पाणिवत, पत्रक प्रायः पाँच, अभिलट्वाकार, ग्रन्थिक रोमश एवं चिपचिपे होते हैं। पुष्प-श्वेत या बैंगनी होते हैं, जिसमें ६ नरकेसर होते हैं। फली-गोल, चिकनी, १. ब्रह्मसुवर्चला इति पाठ०
गुडूच्यादिवर्गः ६२७ लम्बी एवं लम्बे वृन्त से युक्त होती है। बीज-राई के समान किन्तु छोटे होते हैं। इसके बीज एवं मूल का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल होता है। बीजों में क्लिओमिन नामक तत्त्व होता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज राई की तरह दाहजनक, दीपन, पाचन, उत्तेजक एवं कृमिघ्न है। जड़ उत्तेजक तथा स्वेदजनन है। पत्तों को पीस कर त्वचा पर लेप करने से यह पीत हुरहुर की अपेक्षा कम रक्तोत्पादक है। (१) ज्वर में कमजोरी आने पर उत्तेजना लाने के लिये समूल क्षुप का स्वरस ½-१ तो० पिलाते हैं। (२) पूतिकर्ण एवं कर्णशूल में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं, किन्तु इससे जलन होकर तकलीफ होती है। (३) ग्रन्थि बैठाने के लिये इसके पत्तों का लेप किया जाता है। १७४. हुरहुर (पीत) हिं०-चमनी, हुरहुरपीला, केदार शनावर (सं०)। म०-पिवली तिलवण। गु०-पीली तलवर्णा। बं०- हुरहुरिया। ले०-Cleome viscosa, Linn. (क्लिओम् विस्कोसा, लिन.); C. isocandra Linn. (आइसोकैण्ड्रा लिन.)। Fam. Capparidaceae (कैपेरिडेसी)। यह भारत के सभी भागों में होती है। इसका क्षुप-भी पहले की तरह होता है किन्तु इसमें सपत्रक पर्ण में पत्रकों की संख्या ३-५ तक होती है एवं फूल-पीले होते हैं। इसमें नरकेशर छोटे होते हैं। फली-चिपटी, रेशेदार एवं छोटे वृन्त से युक्त होती है। इसके बीज एवं पत्तों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। इसी की एक अन्य जाति क्लि. मोनोफाइला, लिन. (C. monophylla, Linn.) होती है जिसमें पर्ण अपत्रक एवं पुष्प बैंगनी होते हैं। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में ०.१% विस्कोसिक अम्ल (Viscosic acid), ०.०४% विस्कोसिन (Viscosin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह स्वेदजनन, उत्तेजक, कोष्ठवात-प्रशमन एवं कृमिघ्न है। पत्तों का रस कोथप्रशमन एवं मूल कृमिघ्न है। इसके बीज एवं पत्तों का प्रभाव राई की तरह होता है। श्वेत की अपेक्षा इसके पत्ते अधिक दाहजनक हैं, क्योंकि इसके लेप से त्वचा त्वरित लाल हो जाती है एवं फोड़े भी हो जाते हैं। (१) इसके बीज केचुओं की बीमारी में देते हैं। (२) आन्तरिक शोथ कम करने के लिये राई की अपेक्षा इसके पत्तों का लेप अधिक प्रभावशाली होता है। स्फोटोत्पादन के लिये या त्वक्-रागोत्पादन के लिये इसके पत्तों का पञ्चांग का लेप करते हैं। (३) पूतिव्रण एवं बाधिर्य में इसके पत्तों का स्वरस तेल मिलाकर कान में डालते हैं। मात्रा-बीज १-३ माशा। अथ वन्ध्याकर्कोटकी (वनककोडा) । तस्या नामानि गुणांश्चाह वन्ध्याकर्कोटकी देवी कन्या योगीश्वरीति च। नागारिर्नक्रदमनी विषकण्टकिनी तथा ॥२८७॥ वन्ध्याकर्कोटकी लघ्वी कफनुद् व्रणशोधिनी। सर्पदपंहरी तीक्ष्णा विसर्पविषहारिणी ॥२८८॥ वन ककोड़ा के नाम तथा गुण-बन्ध्याकर्कोटकी, देवी, कन्या, योगीश्वरी, नागारि, नक्रदमनी और विषकण्टकिनी ये नाम वन ककोड़ा के हैं। वनककोड़ा-लघु, कफनाशक, व्रणशोधक, साँप के अहङ्कार को दूर करने वाली (विष के प्रभाव को दूर करने वाली), तीक्ष्णवीर्य एवं विसर्प तथा विष को नष्ट करने वाली होती है। [२८७-२८८] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६२८ भावप्रकाशनिघण्टुः १७५. वनककोड़ा हिं०-बाँझककोड़ा, वनककोड़ा, बाँझखेखसा, बं०-तित्कांकरोल। म०-बाँझकटोली। गु०-बाँझकंटोला, कंकोडी। क०-माडहागल। ता०-पलुप्पकै। ते०-आगाकर। ले०-Momordica dioica Roxb. (मोमोर्डिका डायोइका राक्स.)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। यह इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के जंगल झाड़ियों में उत्पन्न होती है और वर्षा ऋतु में अधिक पाई जाती है। हिमालय में ५००० फीट की ऊँचाई तक पाई जाती है। इसकी लता, पत्र आदि खेखसा के समान ही होते हैं, केवल अन्तर यह है कि खेखसा में फल लगता है और इसमें फल नहीं लगता इसलिए इसको वन्ध्याकर्कोटकी कहते हैं। इसका कारण यह है कि यह द्विधैकलिंगक वनस्पति है, इसलिये नर और नारी पुष्पों की लतायें पृथक् होती हैं। नरपुष्पों की लता को वन्ध्याकर्कोटकी या बाँझककोड़ा और फल देने वाली नारी पुष्पों को उत्पन्न करने वाली लताएँ कर्कोटकी कही जाती हैं। इसकी लता-आरोही, चिकनी प्रायः दुर्गन्धयुक्त एवं कोनदार काण्ड वाली होती है। तन्तु निःशाख होते हैं। पत्ते-आकार में छोटे-बड़े हुआ करते हैं जो २ से ४ इञ्च के घेरे में लम्बाई युक्त गोलाकार, हृद्वत्, ३ भागों में विभक्त या अखण्ड, प्रायः लहरदार एवं दन्तुर धार वाले रहते हैं। पुष्प-बड़े, पीत वर्ण के; नर पुष्प-पतले एवं २-६ इञ्च लम्बे पुष्पडण्डों से युक्त होते हैं एवं नारीपुष्पों के दण्ड छोटे या उतने ही बड़े होते हैं। नरपुष्प में कोणपुष्पक बड़ा एवं पुष्प को आच्छादित किये रहता है तथा नारीपुष्प में यह छोटा होता है। फल-यह १-३ इञ्च लम्बा, दीर्घ वृत्ताभ और तीक्ष्णाग्र अथवा अंडाकार होता है तथा इस पर मुलायम काँटे सदृश बाह्य वृद्धियाँ होती हैं। जड़ बहुवर्षायु एवं कन्दवत् होती है। इसकी पत्ती एवं फल का शाकार्थ उपयोग होता है तथा कन्द एवं पत्रादि का चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। कर्कोटकी का स्वतंत्र वर्णन (गुण, प्रयोग आदि) आगे शाकवर्ग में आया है। रासायनिक संगठन-इसकी राख में मैंगनीज होता है। इसमें क्षाराभ भी पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह थोड़ी सी रक्तसंग्राहक, विषनाशक, कफघ्न एवं व्रणहर है। इसका कन्द कफनाशक एवं सभी विषों को दूर करने वाला है। (१) इसके कन्द को भूनकर या उसका चूर्ण रक्तार्श में देते हैं। (२) सर्पविष तथा बिच्छू के काटने पर इसका प्रयोग करते हैं। इसकी जड़ को पीस कर पिलाते हैं तथा नस्य देते हैं। (३) ज्वर में शाक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है (सु० उ० ३९-१५०)। तीव्र ज्वर एवं प्रलाप में इसका बाह्य लेप किया जाता है। (४) मूत्रकृच्छ्र में मूल को दूध के साथ पिलाते हैं। मार्कण्डिका (सनाय) । तस्या नामगुणानाह मार्कण्डिका भूमिवल्ली मार्कण्डी मृदुरेचनी ।। २८९ ।। मार्कण्डिका कुष्ठहरी ऊर्ध्वाधःकायशोधिनी । विषदुर्गन्धकाघ्नी गुल्मोदरविनाशिनी ।। २९० ।। सनाय के नाम तथा गुण-मार्कण्डिका, भूमिवल्ली, मार्कण्डी और मृदुरेचनी (मृदु विरेचन करने वाली) ये नाम सनाय के हैं। सनाय-कुष्ठनाशक, ऊपर तथा नीचे से शरीर का शोधन करने वाली एवं विष, दुर्गन्ध, खाँसी, गुल्म तथा उदर रोग को दूर करने वाली होती है। [२८९-२९०] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ६२९ १७६. सनाय हिं०-देशी सनाय। बं०-सोनपात, सोनामुखी। म०-सोनामुखी। गु०-मीठीआकबल, सोना मुखी। ते०- नेलातनेगेडु। ता०-निलाविरै। अ०-सनाय मक्की। अं०-Indian or Tinnevelly Senna (इंडियन या तिनेवेल्ली सेना)। ले०-Cassia angustifolia, Vahl (केशिया ॲंगस्टिफोलिया)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। इसका आदि स्थान अरब तथा सोमालीलैंड है। किन्तु अब इसकी खेती दक्षिण भारत में तिनेवेल्ली, मदुरा तथा त्रिचनापल्ली जिलों में होती है। मैसूर में भी इसकी उपज का प्रयत्न किया गया है। इसका सीधा गुल्म २-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-संयुक्त होते हैं जिनमें पत्रक १-८ जोड़े होते हैं। पत्रक- अंडाकार भालाकार, २.५-७ से० मी० लम्बे तथा ७-८ मि० मि० चौड़े (१-२ इञ्च × ०.२-०.६ इञ्च) एवं चिकने होते हैं। पुष्प-पत्रकोणीय सदण्डिक मंजरियों में पीतवर्ण के पुष्प आते हैं। फली-चपटी, १.४ से २.८ इञ्च लम्बी, करीब ०.८ इञ्च चौड़ी एवं हरिताभ भूरी होती है। यह के. अॅक्यूूटिफोलिया की फली से कम चौड़ी किन्तु अधिक लम्बी होती है। बीज-संख्या में ५-७, गहरे भूरे रंग के, अभिलट्वाकार एवं दबे हुए होते हैं। इसकी फली एवं पत्तों का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। ब्रिटिश फारमाकोपिया (British pharmacopoeia) में दो जाति की सनाय मान्य है। एक उपर्युक्त सनाय तथा दूसरी ॲलेक्सॉण्ड्रियन सेना (Alexandrian senna) जो कि केशिया अॅक्यूूटिफोलिया (Cassia acutifolia Delile) के जंगली पौधों से प्राप्त होती है। यह अफ्रीका तथा सूडान में होती है। इसको भारत में भी उगाने का प्रयत्न किया गया है। एक तीसरा भेद के. ऑब्ओव्हेटा (Cassia obovata (L.) Collad) होता है, जिसे इटालियन सेना (Italiansenna) कहते हैं, पंजाब, गुजरात, दक्षिण महाराष्ट्र एवं डेक्कन में पाया जाता है। यह देशी सनाय (Country senna) के नाम से भारतीय बाजार में सनाय के प्रतिनिधि रूप में बिकती है। रासायनिक संगठन-इसमें ह्वीन (Rhein, C₁₄ H₅ O₂ (OH)₂ COOH), एलोएमोडीन (Aloe-emodin, C₁₄ · H₅ O₂) (OH)₂ (CH₂ OH), केम्फेरिन (Kaempferin) एवं आइसोहॅम्नेटिन (Isorhamnetin) मुक्त रूप में या ग्लाइकोसाइड के रूप में होते हैं। इनके अतिरिक्त केम्फेरॉल (Kaempferol), माइरिसिल् अॅल्कोहोल (Myricyl alcohol) तथा फाइटोस्टेरोलिन (Phytosterolin) भी पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इसके पत्तों में गोंद, कॅल्शियम ऑक्सॅलेट (Calcium oxalate), राल तथा कुछ ग्लाइकोसाइड सम द्रव्य होते हैं। मेथिल अॅन्थ्रा क्विनोन (Methyl-anthraquinone) से संजात (Derivatives) कुल द्रव्य की मात्रा १-४% तक पाई गई है। गुण और प्रयोग-यह रेचन औषध है। इसका छोटी आँतों पर प्रभाव होता है, जिससे पुरस्सरण की क्रिया बढ़ती है। सेवन के ६-१० घण्टे पश्चात् साफ शौच होता है। इसमें कुछ मरोड़ होती है जो संभवतः इसके पत्तों में के रालीय द्रव्य के कारण या पत्तों में रहने वाले एमोडीन (Emodin) के कारण होती है। इसे दूर करने के लिये तथा स्वाद ठीक करने के लिये इसके साथ सुगन्धित द्रव्य या क्षारीय विरेचन एवं मुलेठी या द्राक्षा देना चाहिये। इसका उत्सर्ग दूध द्वारा होने के कारण दूध में विरेचक गुण आ जाता है। (१) जिनको कब्ज की शिकायत रहती है, उन्हें इसको दिया जाता है। (२) पित्तज्वर में विरेचन के लिये इसे देने से दूषित पित्त निकल जाता है, जिससे दाह, शिरःशूल आदि कम हो जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६३० भावप्रकाशनिघण्टुः (३) आवेष्टन युक्त विबन्ध (Spastic constipation) या प्रक्षोभयुक्त बृहदांत्र (Irritable colon) एवं बृहदांत्र शोथ (Colitis) में इसका प्रयोग निषिद्ध है। मात्रा-५.१५ रत्ती। अथ देवदाली पीतदेवदाली च । खेखसावत्फलव्रततिः । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह देवदाली तु वेणी स्यात्कर्कटी च गरागरी । देवताडो वृत्तकोशस्तथा जीमूत इत्यपि ।।२९१।। पीता परा खरस्पर्शा विषघ्नी गरनाशिनी । देवदाली रसे तिक्ता कफार्शःशोफपाण्डुताः । नाशयेद्वमनी तीक्ष्णा क्षयहिक्काकृमिज्वरान् ।।२९२।। देवदाली के नाम तथा गुण-देवदाली, वेणी, कर्कटी, गरागरी, देवताड, वृत्तकोश और जीमूत ये नाम देवदाली के हैं। दूसरी पीतदेवदाली के नाम-खरस्पर्शा, विषघ्नी और गरनाशिनी ये सब हैं। देवदाली-तिक्तरसयुक्त, वमन कराने वाली, तीक्ष्ण एवं कफ, अर्श (बवासीर), शोथ, पाण्डुरोग, क्षय, हिचकी, कृमि तथा ज्वर को नष्ट करने वाली होती है। [२९१-२९२] अथ तत्फलगुणानाह देवदालीफलं तिक्तं कृमिश्लेष्मविनाशनम् । स्रंसनं गुल्मशूलघ्नमशोंघ्नं वातजित्परम् ।।२९३।। देवदाली घघरवेल के फल का गुण-यह तिक्तरसयुक्त, स्रंसन एवं कृमि, कफ, गुल्म, शूल, अर्श तथा वायु को दूर करने वाला होता है। [२९३] १७७ देवदाली हिं०-देवदाली, सोनैया, बन्दाल, घघरवेल, घुसरान। बं०-बिंदाल, घोषालता, देवताड़, देयात्पड़। म०- देवडांगरी, कुकरवेल। गु०-कुकड़वेल। ते०-पनिबिर। क०-देवडंगर। अं०-Bristly Luffa (ब्रिस्टलि लफा)। ले०-Luffa echinata Roxb. (लुफा एचिनॅटा राक्स.) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । यह-सिन्ध, गुजरात, बिहार, देहरादून, उत्तरी अवध, बुन्देलखंड, उत्तर प्रदेश और बंगाल आदि स्थानों में अधिक उत्पन्न होती है। इसकी लता-खेखसा (कर्कोटकी) के समान होती है, कर्कोटकी का विस्तार अधिक सघन होता है, परन्तु देवदाली का विस्तार बहुत कम होता है। इसके काण्ड पतले एवं पाँच कोन वाले होते हैं। तन्तु द्विशाख शाखाओं वाले होते हैं। पत्ते-१-२ १/२ इञ्च के घेरे में गोलाकार, वृक्काकार, लट्वाकार, पञ्च कोणाकार अथवा पाँच भागवाले एवं गहरे कटे किनारे वाले तथा प्रत्येक भाग दन्तुर दीर्घवृत्ताभ होते हैं। पत्रदण्ड-१-२ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-श्वेत तथा व्यास में १/२-१ इञ्च होते हैं। पुं-पुष्प-२-८ इञ्च लम्बी मंजरियों में और उन्हीं पत्रकोणों में एकाकी स्त्री-पुष्प निकले रहते हैं। फल-१ से १।। इञ्च लम्बे, लगभग आधा इञ्च मोटे, १/६-१/४ इञ्च लम्बे सघन कड़े रोम (बाह्यवृद्धि) अथवा कोमल काँटों से आच्छादित रहते हैं। फल कच्चे होते हैं, तो यह काँटे हरे रंग के और सूखने पर भूरे रंग के हो जाते हैं। फलों के मुँह पर सूक्ष्म ढक्कन (Lid) होता है। जब फल जाड़े में पक कर सूख जाता है, तब यह ढक्कन अपने आप फल से अलग होकर गिर जाता है और फल के अन्दर के रेशेवाले तीन छिद्रों में से बीज निकलना आरम्भ होता है। इस लता का स्वाद बहुत कडुवा होता है। इसके फल का उपयोग किया जाता है। पंचांग का प्रयोग भी किया जा सकता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmı. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ६३१ इसी प्रजाति की एक दूसरी लता लुफा ग्रॅविओलेन्स राक्स. (Luffa graveolens. Roxb.) होती है, जिसमें पुष्प पीले रंग के, तन्तु ३-५ शाखाओं वाले, पुंपुष्प गुच्छबद्ध, पुंकेशर पाँच (देवदाली में केवल ३) किन्तु फल देवदाली की तरह काँटेदार होते हैं। काँटे कुछ मुलायम होते हैं। पीले, लाल और सफेद फूलों के भेद से देवदाली तीन प्रकार की मानी जाती है। इसमें सफेद फूल की देवदाली अधिक मिलती है, पीले फूल की कहीं-कहीं देखने में आती है और लाल फूल की देवदाली कम देखने में आती है। परन्तु गुणों में सब समान ही हैं। रक्त एवं पीत का रसायन के लिये उपयोग होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक एचिनेटिन् (Echinatin) नामक कड़वा पदार्थ तथा सॅपोनिन् होता है। बीजों में तेल होता है जो कड़वा नहीं होता। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कड़वा, मूत्रजनन, विरेचन, शिरोविरेचन, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा से हैजे की तरह वमन एवं विरेचन होता है। गर्भिणी में गर्भपात हो जाता है। इसका प्रभाव कड़वी तरोई की तरह होता है। इसका प्रयोग कामला, जलोदर, हिक्का, कास, श्वास, क्षय, कृमि, यकृत् प्लीहावृद्धि एवं आन्त्रशूल में किया जाता है। (१) इसके एक फल को कूटकर रात में जल में भिंगो दें। सुबह इसे मसल, कपड़े से छान ५-१० बूँद शिरोविरेचन के लिये नाक में डालें। इससे दिनभर पानी बहता है। कफज शिरोरोग तथा कामला में इसका प्रयोग करते हैं। कामला में इसके फल को मट्ठे के साथ खिलाते हैं तथा इसके पंचांग के क्वाथ से नहलाते हैं। नस्य के लिये १ रत्ती चूर्ण का भी नस्य कराते हैं। (२) इसका फांट या टिंक्चर (१ में २०), १०-२० बूँद की मात्रा में यकृत्-प्लीहावृद्धि, बाल यकृत् की प्रारंभिक अवस्था तथा इनसे उत्पन्न जलोदर में लाभदायक है। इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है तथा विरेचन भी होता है। (३) इसके फांट से व्रण, दूषित व्रण आदि धोये जाते हैं। (४) कफज्वर में अन्य कफनिःसारक द्रव्यों के साथ इसका प्रयोग लाभदायक है। (५) चूहे के विष में दही के साथ इसको देने से लाभ होता है। (सुश्रुत) मात्रा-१-२ रत्ती। अथ जलपिप्पली । तस्या नामानि गुणाँश्चाह जलपिप्पल्याभिहिता शारदी शकुलादनी । मत्स्यादनी मत्स्यगन्धा लाङ्गलीयपि कीर्त्तिता ।।२९४।। जलपिप्पलिका हृद्या चक्षुष्या शुक्रला लघुः ।।२९५।। संग्राहिणी हिमा रूक्षा रक्तदाहव्रणापहा । कटुपाकरसा रुच्या कषाया वह्निवर्द्धिनी ।।२९६।। जलपीपल के नाम तथा गुण-जलपिप्पली, शारदी, शकुलादनी, मत्स्यादनी, मत्स्यगन्धा और लाङ्गली ये नाम जलपीपल के हैं। जलपीपल-हृदय तथा नेत्रों के लिये हितकर, शुक्रजनक, लघु, मलसंग्राहक, शीतवीर्य, रूक्ष, रक्तविकार, दाह और व्रण, को नष्ट करने वाली, विपाक में कटुरस युक्त, रुचिकारक, कटु तथा कषाय रसयुक्त एवं अग्निवर्धक होती है। [२९४-२९६] १७८. जलपीपल हिं०-जलपीपल, पनिसि(स)गा, भुईओकरा, बुक्कन बूटी। बं०-बुक्कन, कांचड़ा। म०-जलपिप्पली, रतवेल। गु०-रतवेलीयौ। अं०-Purple Lippia (पर्पल लिपिआ)। ले०-Lippia nodiflora Mich. (लिप्पिआ नोडिफ्लोरा मिक्.)। Fam. Verbe-naceae (वर्बिनेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
६३२ भावप्रकाशनिघण्टुः
यह प्रायः सब प्रान्तों की गीली भूमि में अधिक पाई जाती है तथा बलूचिस्तान में भी होता है। यह प्रसर-(प्रसरी क्षुप) जाति की वनौषधि भूमि पर फैली हुई रहती है। पत्ते-अभिमुख, अभिलट्वाकार, आरावत् दन्तुर, कुंठिताग्र तथा .५-१ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-श्वेत रंग के छोटे पुष्प आते हैं, जो कोणपुष्पकों से युक्त, पत्रकोणीय, सदण्ड मुण्डकाकार व्यूह में आते हैं। फल-यही बाद में फल में परिवर्तित हो जाते हैं, जो पिप्पली की तरह दिखलाई पड़ते हैं। इसके स्वरस का उपयोग करते हैं। चरक में शाकवर्ग में इसका उल्लेख मिलता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कड़वा पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह कटु, स्नेहन, मूत्रजनन, संग्राही एवं ज्वरहर है। (१) सूजन पर इसका पोल्टिस बाँधने से जलन कम होती है तथा जल्दी पकती है। (२) इसके पत्तों का फांट बच्चों के अजीर्ण, अतिसार, साधारण सरदी तथा प्रसूति ज्वर में दिया जाता है। मात्रा-स्वरस १/२-२ चम्मच।
अथ गोजिह्वा। तस्या नामानि गुणांश्चाह गोजिह्वा गोजिका गोभी दार्विका खरपर्णिनी। गोजिह्वा वातला शीता ग्राहिणी कफपित्तनुत् ।।२९७।। हृद्या प्रमेहकासास्रव्रणज्वरहरी लघुः। कोमला तुवरा तिक्ता स्वादुपाकरसा स्मृता ।।२९८।। गोजिह्वा के नाम तथा गुण-गोजिह्वा, गोजिका, गोभी, दार्विका और खरपर्णिनी ये नाम गोभी के हैं। गोजिह्वा- वातकारक, शीतवीर्य, ग्राही, कफ-पित्तनाशक, हृदय के लिये हितकर, प्रमेह-कास-रक्तविकार, व्रण तथा ज्वर को दूर करने वाली एवं लघु, कोमल, कषाय, तिक्त तथा मधुर रसयुक्त और विपाक में मधुर होती है। [२९७-२९८] नोट-गोजिह्वा के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद देखा जाता है। कुछ ने एलिफण्टोपस् स्केबर (Elephantopus scaber) को गोजिह्वा माना है किन्तु श्री ठा० बलवन्तसिंहजी ने इसके स्थानिक नामों के आधार पर इसे गोजिह्वा न मानकर 'मयूरशिखा' माना है। कुछ ने यूनानी में प्रचलित द्रव्य गावजबान इसे माना है, जिसका ले० नाम ओनोस्मा ब्रॅक्टिएटम् है। कुछ इसे गावजबान से भिन्न मानते हैं। कुछ ने कॅकसीनिया ग्लॉका (Caccinia glauca, Savi) को गावजबान माना है जो बलूचिस्तान में होता है तथ गुण में बल्य, मूत्रल एवं स्नेहन है तथा इसका आमवात एवं फिरंग में प्रयोग किया जाता है। चरक के दशेमानि में गोजिह्वा का उल्लेख नहीं है। शाक में इसका उल्लेख मिलता है तथा विसर्प के लेपों में भी वर्णन है। चरक, सुश्रुत दोनों इसे व्रणरोपण मानते हैं। सुश्रुत में उपदंश, व्रण एवं ग्रन्थिविसर्प में तथा शाक के रूप में इसका प्रयोग मिलता है। यहाँ पर दोनों का वर्णन किया गया है।
१७९. गोजिह्वा (१) सं०-मयूरशिखा ? हिं०-गोभी । बं०-लता, गोजिया । म०-गोजोभ, हस्तिपत । गु०-भोंपाथरी, गलजीभी । बि०-मयूरजूटी, माराचूड़ा, मयूरचुटिया, मयूरशिखार। ले०-Elephantopus scaber Linn. (एलिफॅण्टोपस् स्केबर लिन.) । Fam. Compositae (कम्पोजिटी) । यह भारत के सभी उष्ण भागों में होती है। इसका क्षुप-स्वावलम्बी तथा ८-१८ इञ्च ऊँचा होता है। मूलीय पत्ते- पत्र गुच्छों के रूप में, ४-६ इञ्च लम्बे एवं अभिलट्वाकार या अभिप्र्रासवत् होते हैं। काण्ड पतला, द्विविभक्त तथा रोमयुक्त होता है, जिस पर पत्ते १-३ इञ्च लम्बे, अवृन्त एवं काण्डसंसक्त तथा दूर-दूर होते हैं। पुष्पव्यूह-मुण्डक के रूप में
गुडूच्यादिवर्गः ६३३ आते हैं जो सूक्ष्म तथा समूहबद्ध होकर प्रायः ३, पत्रवत् एवं हृद्वत् कोणपुष्पकों के बीच में रहते हैं । प्रत्येक मुण्डक में पुष्पसंख्या प्रायः २-५ तक होती है । मुण्डकगुच्छ कोणपुष्पकों के साथ मयूर की शिखा के सदृश दिखलाई देते हैं । इसके आदिवासियों में प्रचलित नाम मयूरशिखा के समानार्थक हैं, जिससे इसे श्री ठा० बलवन्त सिंह जी ने शास्त्रीय मयूरशिखा माना है । रासायनिक संगठन-इसके पत्ते एवं काण्ड के सुरासारीय सत्त्व में प्रति जैविकीय क्रिया (Antibiotic activity) पाई गई है । गुण और प्रयोग-यह स्नेहन, शीतल, मूत्रजनन, बल्य एवं ज्वरनाशक है । (१) इसके पंचांग का क्वाथ मूत्रकृच्छ्र में पिलाते हैं । (२) ज्वर में इसके पंचांग को चावल की पेया में पका कर देते हैं । इससे पेट का दर्द भी दूर होता है । (३) रक्तातिसार तथा बच्चों के अतिसार में इसका मूल उपयोगी होता है । (४) इसको गरी के तेल में पका कर व्रण एवं छाजन पर लगाते हैं । (५) इसकी जड़ को वमन रोकने के लिये देते हैं तथा मिरिच के साथ चूर्ण बनाकर दन्तशूल में लगाते हैं । १८०. गोजिह्वा (२) गावजबान सं०-गोजिह्वा, दर्वीपत्रा, वृषजिह्वा, खरपत्रा । हिं०-म०-गु०-फा०-गाजवाँ, गावजबान । अ०-लिसानुस्सौर । ले०-Onosma bracteatum Wall. (ओनोस्मा ब्रॅक्टिएटम् वाल्,) । Fam. Boraginaceae (बोरैजिनेसी) । यह ईरान, अफगानिस्तान तथा पश्चिमी हिमालय में काश्मीर से कुमाऊँ तक ११५०० फीट तक पाया जाता है । इसका क्षुप-१५ इञ्च ऊँचा तथा रोमश होता है । पत्र-मूलीय, ६" x १" बड़े, सवृन्त, भालाकार एवं ऊपर के २" x २/३", लम्बाय्र, अंडाकार, मालाकार एवं ऊपरी सतह, रोम के कारण खुरदरी होती हैं । रोम का आधार दानेदार होता है । नीचे की सतह मृदु दबे हुये रोम से युक्त होती है । पुष्प-बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं जो २-३ इञ्च व्यास के तथा रोमश होते हैं । फल-१-६ इञ्च बड़े, अंडाकार तथा नोकदार होते हैं । इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है । यूनानी वाले इसके पत्तों को वर्ग गावजबान एवं पुष्पों को गुलेगावजबान के नाम से व्यवहार करते हैं । रासायनिक संगठन-इसके पत्तों को जल में भिंगोने से काफी लुआब निकलता है, जिसका स्वाद नमकीन होता है। इसकी राख में सोडियम् ९ १/२%, पोटैशियम् १४ १/२%, कॅल्शियम् २७%) मॅग्नेशियम् २ ३/४% एवं लौहं १% आदि के लवण पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-यह बल्य, हृद्य, मूत्रल, रसायन, स्नेहन एवं सौमनस्यजनन है । इसका प्रयोग फिरंग, आमवात, हृदय की धड़कन, मूत्रकृच्छ्र, आमाशय एवं बस्तिपक्षोभ एवं ज्वर में किया जाता है । (१) विषमज्वर में जब ठंड लगती है तब इसे आसव के साथ देने से प्यास कम होती है तथा बेचैनी दूर होती है। (२) फिरंग तथा सोजाक से उत्पन्न संधिशोथ में चोपचीनी के साथ इसका क्वाथ उपयोगी है । (३) हृदय की धड़कन तथा मूत्रकृच्छ्र में इसके फांट का प्रयोग किया जाता है । मात्रा-४-६ माशा दूध के साथ; पुष्प ३-६ माशा । अथ नागदमनी । तस्या नामगुणानाह विज्ञेया नागदमनी बलामोटा विषापहा । नागपुष्पी नागपत्रा महायोगेश्वरीति च ।।२९९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
६३४ भावप्रकाशनिघण्टुः बलामोटा कटुस्तिक्ता लघुः पित्तकफापहा। मूत्रकृच्छ्रव्रणान् रक्षो नाशयेज्जालगर्दभम् ॥३००॥ सर्वग्रहप्रशमनी निःशेषविषनाशिनी। जयं सर्वत्र कुरुते धनदासुमतिप्रदा ॥३०१॥ **नागदमनी के नाम तथा गुण—**नागदमनी, बलामोटा, विशापहा, नागपुष्पी, नागपत्रा और महायोगेश्वरी ये नाम नागदमनी के हैं। **नागदमनी—**कटु तथा तिक्त रसयुक्त, लघु एवं पित्त, कफ, मूत्रकृच्छ्र, व्रण, राक्षसब बाधा, जालगर्दभ, सम्पूर्ण ग्रहबाधा और समस्त विष को दूर करने वाली तथा सर्वत्र जय करने वाली, धन तथा अच्छी मति को देने वाली होती है। [२९९-३०१] **नोट—**यह सन्दिग्ध द्रव्य हैं। मूर्वा नाम से पूर्वी भारत में प्रयुक्त सॅन्सेवेरिया राक्सबर्धियाना को कुछ लोग नागदौन मानते हैं। इसका पहले मूर्वा के साथ वर्णन किया जा चुका है। डॉ० वा० ग० देसाई ने सुदर्शन की एक जाति, क्राइनम् एशियाटिकम् लिन. (Crinum asiaticum Linn.) को नागदमनी लिखा हैं। कुछ ने दमनक (आर्टिमिसिआ), जिसका भावप्रकाशकार पुष्पवर्ग में स्वतन्त्र वर्णन करते हैं, नागदमन नाम से उल्लेख किया है। श्री ठा० बलवन्त सिंहजी ने 'बिहार की वनस्पतियाँ' नामक पुस्तक में एक वनस्पति प्युपेलिया लेप्पाशिया का उल्लेख किया है जिसे कुछ लोग नागदमनी मानते हैं। सुदर्शन एवं दमनक का आगे स्वतन्त्र वर्णन आया हुआ है। यहाँ संक्षेप में प्युपेलिया लेप्पाशिया का वर्णन किया गया है। १८१. नागदमनी ? सं०—नागदमनी ? ले०—Pupalia lappacea, Moq. (प्युपेलिया लेप्पॉसिया मो०)। Fam. Amaranthaceae (ॲमेरेन््येसी)। बिहार में यह मुंगेर, पलामू, संथाल परगना आदि स्थानों में विशेषकर पथरीली भूमि में होती है। इसमें गुल्मक रोमश होते हैं। शाखाएँ कमजोर होती हैं। **पत्ते—**मृदुरोमश, अभिमुख, लट्वाकार, लट्वाकार- आयताकार या प्रासवत्, १-४ इञ्च लम्बे होते हैं। **फलगुच्छ—**मुण्डकाकार, व्यास में ५ इञ्च एवं उस पर टेढ़े सूक्ष्म काँटे होते हैं, जिससे सम्पर्क में आने पर ये कपड़ों में चिपट जाते हैं। **गुण और प्रयोग—**इसे कुछ लोगों ने सर्पविष में उपयोगी माना है। अथ वीरतरुः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वेल्लन्तररी जगति वीरतरुः प्रसिद्धः श्वेतासितारुणविलोहितनीलपुष्पः। स्याज्जातितुल्यकुसुमः शमिसूक्ष्मपत्रः स्यात्कण्टकी विजलदेशज एव वृक्षः॥३०२॥ वेल्लन्तरो रसे पाके तिक्तस्तृष्णाकफापहः। मूत्राघाताश्मजिद्ग्राही योनिमूत्रानिलार्त्तिजित्॥३०३॥ **वीरतरु के नाम तथा गुण—**वेल्लन्तर और वीरतरु ये दो नाम जगत् में प्रसिद्ध हैं, इसके **पुष्प—**जाती (चमेली) के फूलों के समान होते हैं और वे सफेद, काले, अरुण, गाढ़े लाल तथा नीले रंग के होते हैं। **पत्ते—**शमी के पत्तों के समान सूक्ष्म होते हैं और यह काँटेदार तथा निर्जल प्रदेशों में उत्पन्न होने वाला वृक्ष होता है। **वीरतरु—**विपाक तथा रस में तिक्त तथा ग्राही होता है एवं तृषा, कफ, मूत्राघात, पथरी, योनिरोग, मूत्ररोग एवं वातिक पीड़ा को नष्ट करने वाला होता है। १८२. वीरतरु हिं०—बेलन्तर, बीरतरु, बरबेल, वरतुली। ते०—लतुरा। मा०—खड़ी कंलई, कुंरात, खेरी। अजमेर०—खेड़ी। राजपुताना०—खेन। म०—सिगमकाटी। गु०—केल्लुंतरो। ता०—विड़तलै, वेल्लतुरू। ले०—Dichrostachys cinerea W. & A. (डाइक्रॉस्टॅचिस् सिनेरिया)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)।
गुडूच्यादिवर्गः ६३५ यह पश्चिमोत्तर प्रदेश, मध्य भारत, राजपूताना, डेक्कन, दक्षिण महाराष्ट्र तथा उत्तरी कन्नड़ से सिलोन तक होता है। मलाया तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में भी यह पाया जाता है। यह वृक्ष-झाड़दार, मध्यमाकार का या छोटे कद का काँटेदार होता है। इस पर सीधे, दृढ़, और तीखे काँटे रहते हैं। पत्ते-द्विपक्षवत् ३.२-६.३ से० मी० लम्बे होते हैं, जिसमें प्रधान पत्रदण्ड मृदुरोमश तथा प्रत्येक उपपक्ष के बीच ग्रन्थि होती है। उपपक्ष-८-१४ जोड़े, १-१.६ से० मी० लम्बे एवं विनाल होते हैं, जिस पर सूक्ष्म, तिर्यक्, रेखाकार, विनाल पत्रक-१२-२० जोड़ों की संख्या में होते हैं। सितम्बर से अक्तूबर तक इस पर २.५-३.८ से० मी० लम्बी विदण्डिक पुष्पमञ्जरी में पुष्प आते हैं। मञ्जरी का ऊपर का आधा भाग पीत एवं नीचे का आधा भाग लाल रहता है। ऊपर के पुष्पों के परागयुक्त पुंकेसर पीत रहते हैं तथा नीचे के पराग रहित पुंकेसर बहुत लम्बे एवं लाल रहते हैं। फली- ५-७.५ से० मी० लम्बी, ०.६-१.० से० मी० चौड़ी, चिपटी, गहरे भूरे रंग की तथा पकने पर ऐंठी हुई रहती है जिसमें ६-१० बीज होते हैं। सुश्रुत में इसका उल्लेख मिलता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ ग्राही होती है तथा आमवात, पथरी तथा वृक्क विकार में प्रयोग की जाती है। नेत्र-विकार में इसके कोमल पत्तों को पीसकर लगाते हैं। अथ छिक्कनी (नकछिकनी) । तस्या नामगुणानाह छिक्कनी क्षवकृत्तीक्ष्णा छिक्किका घ्राणदुःखदा । छिक्कनी कटुका रुच्या तीक्ष्णोष्णा वह्निपित्तकृत् । वातरक्तहरी कुष्ठकृमिवातकफापहा ।। ३०४ ।। नकछिकनी के नाम तथा गुण-छिक्कनी, क्षवकृत्, तीक्ष्णा, छिक्किका और घ्राणदुःखदा ये नाम नकछिकनी के हैं। नकछिकनी-कटुरसयुक्त, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, अग्नि तथा पित्तजनक एवं वातरक्त, कुष्ठ, क्रिमि, वात और कफ को नष्ट करने वाली होती है । [३०४] १८३. नकछिकनी हिं०-नकछिकनी छिकनी। बं०-हांचुटी, मेचिट्ट। म०-नाक शिंकणी। गु०-नाक छींकणी। ले०-Centipeda orbicularis, Lour. (सेंटिपीडा ऑर्बिक्युलेरिस् लोर.) । Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । यह प्रायः इस देश के सब प्रान्तों में विशेषकर आर्द्रभूमि में अधिक उत्पन्न होती है। क्षुप-बहुत छोटे, सुन्दर, पर जमीन पर फैले हुए रहते हैं। शाखायें-मूल के पास से निकलकर फैली हुई रहती हैं। पत्ते-बहुत छोटे, ६-१० × ३-४.५ मि० मि० बड़े, अभिप्रास्रवत् या अभिलट्वाकार, आयताकार और दूर-दूर दन्तुर होते हैं। पुष्प-छोटे-छोटे गोल मुण्डक में आते हैं, जिनमें प्रान्तीय पुष्प-स्त्री-पुष्प कई चक्रों में और जिह्वाकार; केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग तथा नालाकार एवं संख्या में कम होते हैं। अधःपत्रावलि दो चक्रों में रहती है। इसका चरक तथा सुश्रुत दोनों में उल्लेख है। चरक में इसे शिरोविरेचनोपग माना है तथा शिरोरोग एवं कटुस्कंध में पाठ है और सुश्रुत में अतिसार एवं विसूचिका के लिये इसे उपयोगी बतलाया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक क्षाराभ, अत्यल्प सॅपोनिन्, एक ग्लाइकोसाइड, उड़नशील तैल एवं अम्लस्वभावी कड़वा द्रव्य माइरियोगाइनिन् (Myriogynin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शिरोविरेचन, दीपन, ग्राही, उष्ण, कृमिघ्न एवं वातनाशक है। (१) प्रतिश्याय, सिर के भारीपन एवं अर्धवभेदक में इसके स्वरस या चूर्ण का नस्य देते हैं, जिससे बहुत छींकें आकर आराम मिलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
६३६ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) दन्तशूल में इसके पंचांग का उष्ण कल्क गालों के बाहर से लगाया जाता है। (३) इसके बीज कृमिघ्न होते हैं। अथ कुकुन्दरः (कुकुरवँदा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुकुन्दरस्ताम्रचूडः सूक्ष्मपत्रो मृदुच्छदः ॥ ३०५॥ कुकुन्दरः कटुस्तिक्तो ज्वररक्तकफापहः । तन्मूलमार्द्रं निक्षिप्तं वदने मुखशोषहृत् ।। ३०६ ।। कुकुरवँदा के नाम तथा गुण-कुकुन्दर, ताम्रचूड, सूक्ष्मपत्र और मृदुच्छद ये नाम कुकुरवँदा के हैं। कुकुरवँदा-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, ज्वर, रक्त और कफ को दूर करने वाला होता है। इसकी जड़ गीली (ताजी) यदि मुख में रक्खी जाय तो मुख का सूखना बन्द हो जाता है। [३०५-३०६] १८४. कुकुरवंदा हिं०-कुकुरोदा, कुकुरवंदा, कुकुसुंगा । बं०-कुकुरनिर्मुली, भावूर्डा, भांगरूड़, गंगावली । ता०-नारंक्करंडै । ले०-Blumea lacera DC. (ब्लूमिया लॅसेरा डीसी.) । Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । यह सब प्रान्तों में २००० फीट तक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-वर्षायु, धूसरवर्ण का मृदुरोमश तथा टरपेंटाइन की जैसी तीव्रगंध युक्त होता है। पत्ते-३.८-१२.५ × २.२-६.३ से० मी० बड़े, नीचे के सनाल, कटे हुए तथा ऊपर के न्यूनाधिक विनाल, दीर्घवृत्ताकार आयताकार, मृदुरोमश दन्तुर तथा आधार क्रमशः संकुचित होता है। पुष्प-पीत तथा मुण्डक में आते हैं। फल-छोटे, आयताकार तथा कुछ चतुष्कोणीय होते हैं। इसकी ३, ४ अन्य जातियाँ देखने में आती हैं। समस्त क्षुप में उग्र गंध आती है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, तथा कपूर पाया जाता है। इससे तथा विशेषकर ब्लू. बालसमीफेरा नामक जाति से जो कपूर निकाला जाता है, उसे नागी कपूर या पत्री कपूर कहते हैं, जिसका वर्णन कर्पूर के साथ किया जा चुका है। गुण और प्रयोग-यह कड़वा, दीपन, वायुनाशी, कफघ्न, रक्तस्तंभक तथा ज्वरनाशक है। इसके गुण कपूर से मिलते-जुलते हैं। इसका स्वरस कृमिघ्न, ग्राही, ज्वरहर, उत्तेजक एवं मूत्रल है। मूल का विसूचिका में प्रयोग किया जाता है। इसकी जड़ मुख में रखने से मुखशोष में लाभ होता है। (१) रक्तार्श में इसका स्वरस मिरिच के साथ देते हैं। (२) इसके (ब्लू. बाल्समीफेरा के) स्वरस में बना लौहभस्म का प्रयोग वृक्कजन्य उदर में करते हैं। मूत्र रुकने पर स्वरस देते हैं। (३) ज्वर में इसको निर्गुण्डी क्वाथ के साथ देने से पसीना होता है तथा कफ निकलता है। मात्रा-पत्रचूर्ण ५-१५ रत्ती; स्वरस १ तोंला। अथ सुदर्शना । तस्या नामगुणानाह सुदर्शना सोमवल्ली चक्राह्वा मधुपर्णिका । सुदर्शना स्वादुरुष्णा कफशोथास्रवातजित् ।। ३०७ ।। सुदर्शन के नाम तथा गुण-सुदर्शना, सोमवल्ली, चक्राह्वा और मधुपर्णिका ये नाम सुदर्शन के हैं। सुदर्शन- स्वादिष्ट, उष्णवीर्य एवं कफ, शोथ और रक्तवात को दूर करने वाला होता है। [३०७] नोट-क्राइनम् की विभिन्न जातियों को सुदर्शन माना जाता है। श्री डॉ० वा० ग० देसाई ने क्रा० एशियाटिकम् (सं०) नागदमनी माना है, किन्तु इसका हिन्दी नाम सुदर्शन भी दिया है। कुछ ने गुडूचीभेद टिनोस्पोरा मलबारिका CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3.Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ६३७ (Tinospora malabarica (Lam.) Miers.) जो पद्मगुडूची है, उसको सुदर्शन लिखा है। क्राइनम् की ३ जातियाँ पाई जाती हैं जिनमें से कुछ बागों में भी लगाई हुई मिलती हैं। यहाँ क्राइनम् का वर्णन किया गया है। १८५. सुदर्शन हि०-सुदर्शन, सुखदर्शन। बं०-सुखदर्शन। म०-गदाभी कंद, गदनीचा कांदा। ता०-विषमुंगिल। ले०- Crinum latifolium Linn. (क्राइनम् लैटिफोलियम् लिन.)। Fam. Amaryllidaceae (एमेरिलिडेसी)। यह समस्त भारत में होता है तथा बागों में लगाया हुआ भी पाया जाता है। इसका क्षुप-बहुवर्षायु तथा २, ३ हाथ ऊँचा होता है। पत्ते-भूमि से निकलते मालूम पड़ते हैं, जो २॥-४ फीट तक लम्बे होते हैं एवं जिनकी चौड़ाई मध्य भाग में ३-४॥ इञ्च तक होती है। पुष्प-बैंगनीपन लिये हुये सफेद रंग के सुगंधित सुन्दर फूल बीच में से निकलते हैं। कन्द-गोलाकार, व्यास में ५ इञ्च तक एवं उसकी मोटी गर्दन ३-५ इञ्च तक लम्बी होती है। हर साल पत्ते सूखकर नये आते हैं तथा पत्ते बड़े होने से पहले ही फूल आ जाते हैं। इसकी अन्य जातियाँ क्रा० एशियाटिकम् लिन. (C. asiaticum Linn.) एवं क्रा. डेफिक्सम् केर (C. defixum Ker-Gawl) भी पाई जाती हैं। इसके पत्र एवं कन्द का चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, मधुर, तीक्ष्ण, जंतुघ्न, कुष्ठघ्न, शोथहर, वामक, कफनाशक एवं ज्वरहर है। (१) कर्णशूल में इसके पत्तियों को गरम करके उसका स्वरस निकाल कर डालते हैं। (२) इसके पत्तों को गरम कर तथा एरण्ड तैल लगाकर बाँधने से सभी प्रकार की सूजन, फोड़े, बवासीर आदि कम होती है। संधिशोथ पर यह उपयोगी है। त्वचा के रोगों में इसका स्वरस या इससे सिद्ध तैल लगाते हैं। (३) कंद का प्रयोग कफज विकारों में वामक द्रव्य के रूप में किया जाता है। शुष्क द्रव्य (क्रा. एशियाटिकम्) की मात्रा दुगनी देनी पड़ती है। मात्रा-कंदस्वरस १-२ तोला वमनार्थ। अथाखुकर्णी (मूसाकर्णी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह आखुपर्णी त्वाखुपर्णी पर्णिका भूदरीभवा। आखुकर्णी कटुस्तिक्ता कषाया शीतला लघुः। विपाके कटुका मूत्रकफामयकृमिप्रणुत्।।३०८।। मूसाकर्णी के नाम तथा गुण-आखुकर्णी, आखुपर्णी, पर्णिका और भूदरीभवा ये नाम मूसाकर्णी के हैं। मूसाकर्णी-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, लघु, विपाक में कटुरसयुक्त एवं मूत्र तथा कफ-सम्बन्धी रोग और कृमि को दूर करने वाली होती है। [३०८] १८६. मूसाकर्णी हिं०-मूसाकानी, चूहाकानी, मूसाकर्णी। बं०-इन्दुरकाणीपाना। म०-उन्दिरकानी। गु०-उन्दरकानी। ले०- Ipomoea reniformis, Chois (आईपोमिया रेनीफॉर्म्मिस् को०.)। Fam. Convolvulaceae (कन्हॉलह्युलेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाई जाती है, विशेष कर उड़ीसा, बंगाल तथा दक्षिण हिन्दुस्तान में उत्पन्न होती है। यह प्रसरी क्षुप जाति की वनस्पति प्रायः वर्षा में उत्पन्न होती है तथा सितम्बर से दिसम्बर तक फूलती-फलती है। इसकी प्रायः प्रत्येक गाँठ से जड़ निकल कर यह फैलती जाती है। पत्ते-वृक्काकार, आध से १॥ इञ्च घेरे में लम्बाई CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
६३८ भावप्रकाशनिघण्टुः की अपेक्षा चौड़ाई में अधिक, दन्तुर एवं गोल गोल होते हैं। फूल-छोटे तथा पीले रंग के आते हैं। फल-दो-दो बीज वाले होते हैं। चिकित्सा में इसके पंचांग का व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शोधन, मूत्रल, रसायन, कृमिघ्न, त्वक्-दोषहर एवं आनुलोमिक है। इसकी क्रिया मण्डूकपर्णी की तरह होती है तथा अनन्तमूल की तरह या उसके साथ इसका प्रयोग किया जाता है। (१) इसका प्रयोग त्वचा के रोगों में किया जाता है। इससे पाखाना साफ होता है तथा शारीरिक शिथिलता दूर होती है। (२) कृमि के लिये इसके स्वरस एवं रक्त शालि (लाल चावल) की पीठी के साथ बनी पूपलिका (पुआ) निर्धूम अंगारे पर पका कर, विडङ्ग तैल एवं लवण के साथ देने का विधान है। (चरक वि० ७-२६, सु० उ० ५४-२७) मात्रा-५-१० रत्ती फांट बनाकर। अथ मयूरशिखा (मोरशिखा) । तस्या नामगुणानाह मयूराह्वशिखा प्रोक्ता सहस्राहिर्मधुच्छदा। नीलकण्ठशिखा लघ्वी पित्तश्लेष्मातिसारजित् ।।३०९।। मोरशिखा के नाम तथा गुण-मयूराह्वशिखा ('मयूर' के पर्यायवाची शब्दों के अन्त में 'शिखा' जोड़ देने से जो शब्द बनते हैं वे सब; जैसे-नीलकण्ठशिखा आदि), सहस्रादि और मधुच्छदा ये नाम मोरशिखा के हैं। मोरशिखा- लघु एवं पित्त, कफ तथा अतिसार को नष्ट करने वाली होती है। [३०९] नोट-अनेक वनस्पतियों को जो मयूरशिखा की आकृति की तरह दिखलाई देती हैं, मयूरशिखा के नाम से विभिन्न स्थानों पर प्रयुक्त किया जा रहा है। चरक-सुश्रुत में इसका वर्णन देखा नहीं जाता। भा० प्र० में इसे लघु एवं पित्त- कफनाशक तथा अतिसार में उपयोगी लिखा है। गोजिह्वा के अन्तर्गत वर्णित एलिफैण्टोपस् स्केवर लिन. (Elephantopus scaber Linn.) को श्री ठा० बलवन्त सिंह जी उसके स्थानिक नामों के आधार पर मयूरशिखा मानते हैं। सेलोसिआ क्रिस्टैटा (Celosia cristata) को कुछ ने मयूरशिखा माना है। कुछ ने एडिएण्टम् कॉडेटम् (Adiantum caudatum) को तथा कुछ ने अॅक्टिनोप्टेरिस् डाइकोटोमा (Actinopteris dichotoma) को मयूरशिखा लिखा है। यहाँ संक्षेप में इनका वर्णन किया गया है। १८७. मयूरशिखा (१) ले०-Actinopteris dichotoma, Bedd. (अॅक्टिनोप्टेरिस् डाइकोटोमा बेड.); Fam. Polypodiaceae (पॉलिपोडिएसी)। यह सभी स्थानों पर विशेषतया पेनिनसुला, शुष्क पहाड़ी स्थानों में ४००० फीट तक एवं नीलगिरी पर २००० फीट तक एवं कुमाऊँ में होती है। इसका क्षुप बहुत सुन्दर, ३-७ इञ्च ऊँचा एवं छोटे ताड़ की तरह दिखलाई देता है। बरसात में सूखी पहाड़ियों में पत्थरों के बीच में कहीं-कहीं यह दिखलाई देता है। पत्ते-व्यास में १-१.५ इञ्च, तालपत्र की तरह लम्बे पतले पत्रदण्ड पर रहते हैं जो मयूरशिखा की तरह दिखलाई देते हैं। गुण और प्रयोग-इसका रक्तस्तम्भक एवं कृमिघ्न रूप में प्रयोग किया जाता है। १८८. मयूरशिखा (२) ले०-Adiantum caudatum Linn. (एडिएण्टम् कॉडेटम् लिन.)। Fam. Polypoliaceae (पॉलिपोडिएसी)।
गुडूच्यादिवर्गः ६३९ यह सभी स्थानों में, मैदानी भागों एवं पहाड़ियों के निचले ढालों पर पाई जाती है। इसका क्षुप-हंसपदी की जाति का होता है। पत्रदण्ड-६-१६ इञ्च लम्बा, मृदुरोमश तथा चमकीले बादामी रंग का होता है। पत्रक-विनाल या कुछ आयताकार तथा एक किनारा सीधा एवं दूसरा कटा हुआ होता है। अधरतल पर, किनारे पर बीजाणुकोष केवल खण्डों के अन्त में होते हैं। गुण और प्रयोग-इसका चर्मरोग, मधुमेह, कास तथा ज्वर में प्रयोग किया जाता है। १८९. मयूरशिखा (३) हिं०-लालमुर्गा। ले०-Celosia cristata Linn. (सेलोसिआ क्रिस्टेटा लिन.)। Fam. Amacanthaceae (एमेरेन्थेसी)। यह बागों में लगायी हुई पाई जाती है एवं मैदानी भाग तथा हिमालय में ५००० फीट तक भी पाई जाती है। इसका क्षुप-मरसे के समान होता है। केवटीमोथा के अन्तर्गत वर्णित सफेद मुर्गा का यह भेद है। इसके पत्र प्रायः चौड़े होते हैं। पुष्प-छोटे तथा अत्यन्त सघन मंजरी में आते हैं। रासायनिक संगठन-इसके पौधे में बिटॉनिन् (Betanin) तथा नाइट्रोजन पदार्थ एवं इसके बीजों में एक स्थिर तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके पुष्प ग्राही होते हैं। इनका प्रयोग अतिसार तथा रक्तप्रदर में किया जाता है। इसके बीज स्नेहन हैं तथा मूत्रकृच्छ्र, कास एवं संग्रहणी में प्रयोग किये जाते हैं। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे गुडूच्यादिवर्गः समाप्तः। ❖
अथ पुष्पवर्गः
तत्रादौ कमलम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह
वा पुंसि पद्मं नलिनमरविन्दं महोत्पलम् । सहस्रपत्रं कमलं शतपत्रं कुशेशयम् ॥१॥ पङ्केरुहं तामरसं सारसं सरसीरुहम् । विसप्रसूनराजीवपुष्कराम्भोरुहाणि च ॥२॥ कमलं शीतलं वर्ण्यं मधुरं कफपित्तजित् । तृष्णादाहास्रविस्फोटविषवीसर्पनाशनम् ॥३॥ कमल के नाम—पद्म (यह नपुंसकलिङ्ग कभी-कभी पुंल्लिङ्ग में भी व्यवहृत होता है), नलिन, अरविन्द, महोत्पल, सहस्रपत्र, कमल, शतपत्र, कुशेशय, पङ्केरुह, तामरस, सारस, सरसीरुह, विसप्रसून, राजीव, पुष्कर और अम्भोरुह ये सब संस्कृत में होते हैं। कमल—शीतल, वर्ण्य, (शरीर के रंग) को उत्तम करने वाला, मधुर रस युक्त, कफ-पित्त नाशक एवम्—तृष्णा, दाह, रक्तविकार, विस्फोट (शरीर में छोटी-छोटी फुंसियों का होना), विष और विसर्प को दूर करने वाला होता है। [१- ३]
अथ नामोल्लेखपूर्वकं कमलभेदाँस्तद्गुणाँश्चाह
विशेषतः सितं पद्मं पुण्डरीकमिति स्मृतम् । रक्तं कोकनदं ज्ञेयं नीलमिन्दीवरं स्मृतम् ॥४॥ धवलं कमलं शीतं मधुरं कफपित्तजित् । तस्मादल्पगुणं किञ्चिदन्यद्रक्तोत्पलादिकम् ॥५॥ कमल के भेदों के नाम—विशेष करके श्वेत कमल “पुण्डरीक” कहा जाता है। लाल कमल को “कोकनद” एवम् नीले कमल को “इन्दीवर” कहते हैं। श्वेतकमल—शीतल, मधुर एवम् कफ-पित्त का नाशक होता है। रक्तकमल आदि श्वेतकमल की अपेक्षा न्यूनगुणवाले होते हैं। [४-५] नोट—भावप्रकाशकार कमल के ३ भेद श्वेत, रक्त तथा नील लिखते हैं। आगे श्वेत कुवलय (श्वेत कुमुद) का तथा कल्हार (रक्त कुमुद) का अलग वर्णन करते हैं। इसके अतिरिक्त एक स्थल कमल का और वर्णन करते हैं। अन्य निघण्टुओं ने वर्ण के आधार पर जो नाम दिये हैं उनमें आपस में पर्याप्त मतभिन्नता पाई जाती है। चरक, सुश्रुतादि में भी इनके कई भेदों का उल्लेख है। आधुनिक वानस्पतिक वर्गीकरण की दृष्टि से नेलंबिअम् स्पेसिओजम् में श्वेत एवं रक्त दो भेद पाये जाते हैं। इसे अधिकांश विद्वानों ने कमल माना है। इसमें नीला भेद नहीं पाया जाता। दूसरी प्रजाति (Genus) निंफिया की वेत, रक्त तथा नील जातियाँ (Species) पायी जाती हैं। इस प्रजाति को कुमुद कोई मानते हैं। संभव है इसी प्रजाति के नील जाति (Species) को कमल का नील भेद मान लिया गया हो। गुणों की दृष्टि से दोनों (कमल एवं कुमुद) में पर्याप्त समता होने के कारण एक का दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। सभी प्रकार के कमल बल्य कषाय एवं रक्तपित्तहर होते हैं। (च० सू० अ० २७) पुण्डरीक प्रायः श्वेत कमल को, कोकनद रक्तकमल को एवं इन्दीवर नील कमल को कहा गया है। विकसित होने की दृष्टि से इनके दो भेद सूर्य-विकाशी एवं चन्द्र-विकाशी मानते हैं। जो प्रातः खिलते हैं तथा शाम को संकुचित हो जाते हैं उन्हें सूर्य-विकाशी तथा जो रात को खिले रहते हैं तथा दिन को संकुचित रहते हैं उन्हें चन्द्र- विकाशी कहा जाता है। कमल सूर्य-विकाशी तथा कुमुद प्रायः चन्द्रविकाशी होते हैं।
पुष्पवर्ग: ६४१ जैसा कि ऊपर कहा गया है कमल (नेलंबिअम् स्पेसिओजम्) में कोई जाति (Species) भेद नहीं पाया जाता है केवल वर्ण-भेद से दो प्रकार श्वेत एवं गुलाबी पाये जाते हैं। इसमें पत्तियाँ तथा पुष्प प्रायः पानी की सतह के ऊपर निकले रहते हैं। इसमें स्त्री-केशर पृथक्-पृथक् कर्णिका में इतस्ततः धँसे हुए तथा बाह्यदल (Sepals) कर्णिका के नीचे से निकले रहते हैं। इसमें दूध होता है तथा पत्र-नाल पर दूर-दूर छोटे कांटे होते हैं। कुमुद (निफिया) में पत्तियाँ तथा पुष्प प्रायः पानी की सतह तक निकले रहते हैं। इनमें स्त्री केशर चक्राकार स्थित, न्यूनाधिक परस्पर संयुक्त और कर्णिका में किंचित् धँसे रहते हैं। ऊपर के कुछ बाह्यदल कर्णिका से संलग्न रहते हैं। यहाँ कमल का वर्णन किया गया है। कुमुद का आगे वर्णन किया गया है। १. कमल हिं०-कमल, पुरइन। बं०-पद्म। उड़ि०-पद्म। म०-गु०-कमल। प०-कवलककरी। क०-बिलिया तावरे। ते०-कलावा, तम्मिपुव्वु। ता०-तामरै, अम्बल्। मला०-तमर। अ०-कातिलुन्नहल। अं०-Sacred lotus (सैक्रेड लोटस्)। ले०-Nelumbium speciosum Willd. (नेलंबियम् स्पेसिओजम् विल्ड)। Fam. Nymphaeaceae (निंफिएसी)। यह भारत के सभी उष्ण प्रदेशों में होता है। यह तालाबों में होने वाला विस्तृत जलीय क्षुप है। इसकी जड़ कीचड़ में फैलती है। पत्र-पतले, १-३ फुट व्यास के, चक्राकार, चिकने, चमकीले, नतोदर तथा वृन्तगोलायत होते हैं। पत्रनाल-बहुत लम्बा तथा उस पर दूर- दूर छोटे काँटे होते हैं। फूल-एकाकी, ४-१० इञ्च व्यास में, श्वेत या गुलाबी, सुगंधित तथा लम्बे दंड पर आता है। गर्मी तथा वर्षा काल में यह फूलते हैं। कर्णिका (बीजाधार) स्पंज के समान एवं धूसर होती है जिसमें १/२ इञ्च लम्बे, गोल, काले तथा चिकने बीज रहते हैं। इन्हें (हिं०) कमलगट्ठा, (सं०) पद्मबीज, (म०) कमलकाकडी, (गु०) पबडी कहा जाता है। रासायनिक संगठन-इसके कंद तथा बीजों में राल, ग्लूकोज, मेटार्बिन (Metarbin), टैनिन, वसा तथा नेलंबिन (Nelumbine) नामक क्षाराभ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-कमल के पुष्प-(पंखुड़ियाँ) शीत, दाह प्रशमन, हृदय-बल्य, हृदयसंरक्षक, रक्तसंग्राहक, मूत्रजनन, मूत्र विरजनीय एवं ग्राही होते हैं। इनका प्रयोग रक्तपित्त, ज्वर, मूत्रकृच्छ्र एवं अतिसार में किया जाता है। (१) तीव्र ज्वर में हृदय पर ज्वर का कुप्रभाव न हो तथा उसे बल मिले इस दृष्टि से इसका फांट मिश्री मिलाकर दिया जाता है। इसके साथ श्वेत तथा रक्तचंदन, बालक, मुलेठी, मुस्तक मिलाते हैं। डिजिटैलिस की तरह इसका हृदय पर प्रभाव पड़ता है जिससे धड़कन कम होकर हृदय को बल मिलता है। (२) गर्भावस्था में रक्तस्राव प्रारंभ होने पर इसके फांट से त्वरित लाभ होता है। मात्रा-पंखड़ियां १-२ तो० फाँट बनाकर। अथ पद्मिनी। तस्या लक्षणनामगुणानाह मूलनालदलोत्फुल्लफलैः समुदिता पुनः। पद्मिनी प्रोच्यते प्राज्ञैर्बिसिन्यादि च सा स्मृता ॥६॥ पद्मिनी के लक्षण-मूल, नाल, पत्र और फल से युक्त, खिले हुए कमल को विद्वान् लोग "पद्मिनी" कहते हैं। पंचांग (पद्मिनी) के नाम-इसके बिसिनी आदि भी नाम हैं। [६] ४४ भाव. I
६४२ भावप्रकाशनिघण्टुः "आदिशब्दान्नलिनी-कमलिनीत्यादि ।।६।। यहाँ पर आदि पद से—नलिनी, कमलिनी इत्यादि भी नामान्तर समझना चाहिये। [६] पद्मिनी शीतला गुर्वी मधुरा लवणा च सा। पित्तासृक्कफनुद्रूक्षा वातविष्टम्भकारिणी ।।७।। पद्मिनी—शीतल, पाक में गुरु, मधुर तथा लवण रस युक्त, रूक्ष, एवम्—वातविष्टम्भ (अधो वायु का शुद्ध न खुलना) पैदा करने वाली होती है तथा पित्त, रक्तविकार और कफ की नाशक होती है। [७] अथ नवपत्रादि। तस्य नामान्याह संवर्तिका नवदलं बीजकोशस्तु कर्णिका। किञ्जल्कः केशरः प्रोक्तो मकरन्दो रसः स्मृतः। पद्मनालं मृणालं स्यात्तथा बिसमिति स्मृतम् ।।८।। कमल के नवीन पत्ते आदि के नाम—संवर्तिका—यह कमल के नवीन पत्तों का नाम है। कर्णिका—बीजकोश (जिसमें बीज रहते हैं) का नामान्तर है। किञ्जल्क-कमल के केशर को कहते हैं। मकरन्द—कमलपुष्प के रस का वाचक है। मृणाल तथा बिस ये दो नाम कमल के नाल के हैं। [८] कमल के विभिन्न अंगों के अन्य पर्यायवाची तथा विभिन्न भाषाओं के नाम—कमलकर्णिका—सं०—बीजकोश, वराटक। हिं०—कमल का छत्ता। म०—धांगुड, ढांपणी। गु०—धीतेलां, कुमडा (रात्रिविकाशी)। कमलनाल—सं०—बिस, मृणाल। हिं०—मुरार, भसींड। म०—भिसें। कमलकन्द—सं०—शालूक, करहाटक। गु०—लोढ। अथ संवर्तिका (नये पत्ते)। तस्या गुणानाह संवर्तिका हिमा तिक्ता कषाया दाहतृट्प्रणुत्। मूत्रकृच्छ्रगुदव्याधिरक्तपित्तविनाशिनी ।।९।। संवर्तिका (कमल के नवीन पत्र)—शीतल, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवम्—दाह, प्यास, मूत्रकृच्छ्र, गुदासम्बन्धी रोग (अर्श आदि) और रक्तपित्त को नष्ट करने वाली होती है। [९] अथ कर्णिका। तस्या गुणानाह पद्मस्य कर्णिका तिक्ता कषाया मधुरा हिमा। मुखवैशद्यकृल्लघ्वी तृष्णाऽस्रकफपित्तनुत् ।।१०।। कर्णिका (बीज कोश)—तिक्त, कषाय तथा मधुर रस युक्त, शीतल, लघु और मुख को स्वच्छ करने वाली एवम्—तृषा, रक्तविकार, कफ तथा पित्त को नाश करने वाली होती है। [१०] कमल के बीज—इसके बीज पौष्टिक, मधुर, स्नेहन, ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भसंस्थापक एवं शीत होते हैं। खाद्य के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी पेया बनाकर वमन तथा हिचकी में देने से लाभ होता है। प्रदर में भी इसे देते हैं। मात्रा—१/४-१/२ तो० पेया बनाकर। अथ किञ्जल्कः (केशर)। तस्य गुणानाह किञ्जल्कः शीतलो वृष्यः कषायो ग्राहकोऽपिसः। कफपित्ततृषादाहरक्तार्शोविषशोथजित् ।।११।। किञ्जल्क (कमल का केशर)—शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक), कषाय रस युक्त, ग्राही एवम्—कफ, पित्त, तृषा, दाह, रक्तार्श (खूनी बवासीर), विष और शोथ को दूर करने वाला होता है। [११] कमल का केशर—यह ग्राही, शीतवीर्य, रक्तपित्तशामक एवं दाहप्रशमन होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmù. Digitized by S3 Foundation USA
पुष्पवर्गः ६४३ इसका चूर्ण मिश्री के साथ रक्तार्श, रक्तप्रदर तथा ऊर्ध्वग रक्तपित्त में देने से लाभ होता है। मात्रा-चूर्ण ५-१५ रत्ती। अथ मृणालं शालूकञ्च। तयोर्गुणानाह मृणालं शीतलं वृष्यं पित्तदाहास्रजिद् गुरु ।।१२।। दुर्जरं स्वादुपाकञ्च स्तन्यानिलकफप्रदम्। संग्राहि मधुरं रूक्षं शालूकमपि तद्गुणम् ।।१३।। मृणाल (कमल नाल)-शीतल वृष्य (वीर्यवर्धक), गुरु, कठिनता से पचने वाला, रूक्ष, विपाक में मधुर, संग्राही, मधुर रस युक्त, दुग्धवर्धक, वायु तथा कफ को उत्पन्न करने वाला एवम्-पित्त, दाह और रक्त विकार को दूर करने वाला होता है। शालूक (कमल कन्द)-यह भी गुणों में मृणाल के तुल्य ही होता है। [१२-१३] इसकी पेया बनाकर अतिसार, रक्तातिसार एवं कुपचन में दी जाती है। अर्श में चूर्ण का उपयोग करते हैं। चर्मरोगों में इसका लेप किया जाता है। मात्रा-१/२-१ तो० पेया बनाकर। अथ स्थलकमलम्। तस्य नामगुणानाह पद्मचारिण्यतिचराऽव्यथा पद्मा च शारदा। पद्माऽनुष्णा कटुस्तिक्ता कषाया कफवातजित्। मूत्रकृच्छ्राश्मशूलघ्नो श्वासकासविषापहा ।।१४।। स्थलकमल के नाम-पद्मचारिणी, अतिचरा, अव्यथा, पद्मा और शारदा ये सब हैं। स्थलकमल-किञ्चित् उष्णवीर्य, कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवम्-कफ, वात, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, शूल, श्वास, कास तथा विष को दूर करने वाला है। [१४] नोट-इस सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। चरक, सुश्रुत तथा वाग्भट में इसका उल्लेख नहीं है। वृंद के 'सिद्धयोग' में स्थलपद्म का प्रयोग मिलता है। इसके कल्क को दूध के साथ पिलाने से प्लीहा रोग तथा सभी प्रकार के शोथ में लाभदायक माना है। श्री कण्ठ ने इसको 'माणकम्' लिखा है। इसके कहीं चार प्रकार मानते हैं- चतुर्धा स्थलपद्मानि सेवन्ती गुलदावदी। नैपाली च गुलावश्च बकुलश्च कदम्बकः ।।१।। निम्नलिखित दो पौधों को स्थल कमल कुछ विद्वानों ने माना है। २. स्थलपद्म (१) ले०-Ionidium suffruticosum Ging. (आयोनिडिअम् सफ्रुटिकोसम्) । Fam. Violaceae (ह्रायोलेसी)। हिं०-रतनपुरुष। इसके छोटे बहुवर्षायु क्षुप बुन्देलखण्ड, आगरा, बंगाल, मद्रास, गुजरात, खानदेश तथा कर्नाटक में पाये जाते हैं। पत्ते-कुन्तल क्रम में, लगभग अवृन्त, .७-१" लम्बे और भालाकार होते हैं। पुष्प-एकाकी तथा गुलाबी रंग के आते हैं। पाँच आभ्यन्तर दलों में, एक दल लम्बे दलदण्ड (Claw) और लगभग वृत्ताकार दलोत्सर (limb) से युक्त होता है। मूल तथा पंचांग का चिकित्सा में व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक क्षारभ पाया जाता है।