भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 685, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 685

६३४ भावप्रकाशनिघण्टुः बलामोटा कटुस्तिक्ता लघुः पित्तकफापहा। मूत्रकृच्छ्रव्रणान् रक्षो नाशयेज्जालगर्दभम् ॥३००॥ सर्वग्रहप्रशमनी निःशेषविषनाशिनी। जयं सर्वत्र कुरुते धनदासुमतिप्रदा ॥३०१॥ **नागदमनी के नाम तथा गुण—**नागदमनी, बलामोटा, विशापहा, नागपुष्पी, नागपत्रा और महायोगेश्वरी ये नाम नागदमनी के हैं। **नागदमनी—**कटु तथा तिक्त रसयुक्त, लघु एवं पित्त, कफ, मूत्रकृच्छ्र, व्रण, राक्षसब बाधा, जालगर्दभ, सम्पूर्ण ग्रहबाधा और समस्त विष को दूर करने वाली तथा सर्वत्र जय करने वाली, धन तथा अच्छी मति को देने वाली होती है। [२९९-३०१] **नोट—**यह सन्दिग्ध द्रव्य हैं। मूर्वा नाम से पूर्वी भारत में प्रयुक्त सॅन्सेवेरिया राक्सबर्धियाना को कुछ लोग नागदौन मानते हैं। इसका पहले मूर्वा के साथ वर्णन किया जा चुका है। डॉ० वा० ग० देसाई ने सुदर्शन की एक जाति, क्राइनम् एशियाटिकम् लिन. (Crinum asiaticum Linn.) को नागदमनी लिखा हैं। कुछ ने दमनक (आर्टिमिसिआ), जिसका भावप्रकाशकार पुष्पवर्ग में स्वतन्त्र वर्णन करते हैं, नागदमन नाम से उल्लेख किया है। श्री ठा० बलवन्त सिंहजी ने 'बिहार की वनस्पतियाँ' नामक पुस्तक में एक वनस्पति प्युपेलिया लेप्पाशिया का उल्लेख किया है जिसे कुछ लोग नागदमनी मानते हैं। सुदर्शन एवं दमनक का आगे स्वतन्त्र वर्णन आया हुआ है। यहाँ संक्षेप में प्युपेलिया लेप्पाशिया का वर्णन किया गया है। १८१. नागदमनी ? सं०—नागदमनी ? ले०—Pupalia lappacea, Moq. (प्युपेलिया लेप्पॉसिया मो०)। Fam. Amaranthaceae (ॲमेरेन््येसी)। बिहार में यह मुंगेर, पलामू, संथाल परगना आदि स्थानों में विशेषकर पथरीली भूमि में होती है। इसमें गुल्मक रोमश होते हैं। शाखाएँ कमजोर होती हैं। **पत्ते—**मृदुरोमश, अभिमुख, लट्वाकार, लट्वाकार- आयताकार या प्रासवत्, १-४ इञ्च लम्बे होते हैं। **फलगुच्छ—**मुण्डकाकार, व्यास में ५ इञ्च एवं उस पर टेढ़े सूक्ष्म काँटे होते हैं, जिससे सम्पर्क में आने पर ये कपड़ों में चिपट जाते हैं। **गुण और प्रयोग—**इसे कुछ लोगों ने सर्पविष में उपयोगी माना है। अथ वीरतरुः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह वेल्लन्तररी जगति वीरतरुः प्रसिद्धः श्वेतासितारुणविलोहितनीलपुष्पः। स्याज्जातितुल्यकुसुमः शमिसूक्ष्मपत्रः स्यात्कण्टकी विजलदेशज एव वृक्षः॥३०२॥ वेल्लन्तरो रसे पाके तिक्तस्तृष्णाकफापहः। मूत्राघाताश्मजिद्ग्राही योनिमूत्रानिलार्त्तिजित्॥३०३॥ **वीरतरु के नाम तथा गुण—**वेल्लन्तर और वीरतरु ये दो नाम जगत् में प्रसिद्ध हैं, इसके **पुष्प—**जाती (चमेली) के फूलों के समान होते हैं और वे सफेद, काले, अरुण, गाढ़े लाल तथा नीले रंग के होते हैं। **पत्ते—**शमी के पत्तों के समान सूक्ष्म होते हैं और यह काँटेदार तथा निर्जल प्रदेशों में उत्पन्न होने वाला वृक्ष होता है। **वीरतरु—**विपाक तथा रस में तिक्त तथा ग्राही होता है एवं तृषा, कफ, मूत्राघात, पथरी, योनिरोग, मूत्ररोग एवं वातिक पीड़ा को नष्ट करने वाला होता है। १८२. वीरतरु हिं०—बेलन्तर, बीरतरु, बरबेल, वरतुली। ते०—लतुरा। मा०—खड़ी कंलई, कुंरात, खेरी। अजमेर०—खेड़ी। राजपुताना०—खेन। म०—सिगमकाटी। गु०—केल्लुंतरो। ता०—विड़तलै, वेल्लतुरू। ले०—Dichrostachys cinerea W. & A. (डाइक्रॉस्टॅचिस् सिनेरिया)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)।