भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुडूच्यादिवर्गः ६३५ यह पश्चिमोत्तर प्रदेश, मध्य भारत, राजपूताना, डेक्कन, दक्षिण महाराष्ट्र तथा उत्तरी कन्नड़ से सिलोन तक होता है। मलाया तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में भी यह पाया जाता है। यह वृक्ष-झाड़दार, मध्यमाकार का या छोटे कद का काँटेदार होता है। इस पर सीधे, दृढ़, और तीखे काँटे रहते हैं। पत्ते-द्विपक्षवत् ३.२-६.३ से० मी० लम्बे होते हैं, जिसमें प्रधान पत्रदण्ड मृदुरोमश तथा प्रत्येक उपपक्ष के बीच ग्रन्थि होती है। उपपक्ष-८-१४ जोड़े, १-१.६ से० मी० लम्बे एवं विनाल होते हैं, जिस पर सूक्ष्म, तिर्यक्, रेखाकार, विनाल पत्रक-१२-२० जोड़ों की संख्या में होते हैं। सितम्बर से अक्तूबर तक इस पर २.५-३.८ से० मी० लम्बी विदण्डिक पुष्पमञ्जरी में पुष्प आते हैं। मञ्जरी का ऊपर का आधा भाग पीत एवं नीचे का आधा भाग लाल रहता है। ऊपर के पुष्पों के परागयुक्त पुंकेसर पीत रहते हैं तथा नीचे के पराग रहित पुंकेसर बहुत लम्बे एवं लाल रहते हैं। फली- ५-७.५ से० मी० लम्बी, ०.६-१.० से० मी० चौड़ी, चिपटी, गहरे भूरे रंग की तथा पकने पर ऐंठी हुई रहती है जिसमें ६-१० बीज होते हैं। सुश्रुत में इसका उल्लेख मिलता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ ग्राही होती है तथा आमवात, पथरी तथा वृक्क विकार में प्रयोग की जाती है। नेत्र-विकार में इसके कोमल पत्तों को पीसकर लगाते हैं। अथ छिक्कनी (नकछिकनी) । तस्या नामगुणानाह छिक्कनी क्षवकृत्तीक्ष्णा छिक्किका घ्राणदुःखदा । छिक्कनी कटुका रुच्या तीक्ष्णोष्णा वह्निपित्तकृत् । वातरक्तहरी कुष्ठकृमिवातकफापहा ।। ३०४ ।। नकछिकनी के नाम तथा गुण-छिक्कनी, क्षवकृत्, तीक्ष्णा, छिक्किका और घ्राणदुःखदा ये नाम नकछिकनी के हैं। नकछिकनी-कटुरसयुक्त, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, अग्नि तथा पित्तजनक एवं वातरक्त, कुष्ठ, क्रिमि, वात और कफ को नष्ट करने वाली होती है । [३०४] १८३. नकछिकनी हिं०-नकछिकनी छिकनी। बं०-हांचुटी, मेचिट्ट। म०-नाक शिंकणी। गु०-नाक छींकणी। ले०-Centipeda orbicularis, Lour. (सेंटिपीडा ऑर्बिक्युलेरिस् लोर.) । Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । यह प्रायः इस देश के सब प्रान्तों में विशेषकर आर्द्रभूमि में अधिक उत्पन्न होती है। क्षुप-बहुत छोटे, सुन्दर, पर जमीन पर फैले हुए रहते हैं। शाखायें-मूल के पास से निकलकर फैली हुई रहती हैं। पत्ते-बहुत छोटे, ६-१० × ३-४.५ मि० मि० बड़े, अभिप्रास्रवत् या अभिलट्वाकार, आयताकार और दूर-दूर दन्तुर होते हैं। पुष्प-छोटे-छोटे गोल मुण्डक में आते हैं, जिनमें प्रान्तीय पुष्प-स्त्री-पुष्प कई चक्रों में और जिह्वाकार; केन्द्रीय पुष्प उभयलिंग तथा नालाकार एवं संख्या में कम होते हैं। अधःपत्रावलि दो चक्रों में रहती है। इसका चरक तथा सुश्रुत दोनों में उल्लेख है। चरक में इसे शिरोविरेचनोपग माना है तथा शिरोरोग एवं कटुस्कंध में पाठ है और सुश्रुत में अतिसार एवं विसूचिका के लिये इसे उपयोगी बतलाया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक क्षाराभ, अत्यल्प सॅपोनिन्, एक ग्लाइकोसाइड, उड़नशील तैल एवं अम्लस्वभावी कड़वा द्रव्य माइरियोगाइनिन् (Myriogynin) पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शिरोविरेचन, दीपन, ग्राही, उष्ण, कृमिघ्न एवं वातनाशक है। (१) प्रतिश्याय, सिर के भारीपन एवं अर्धवभेदक में इसके स्वरस या चूर्ण का नस्य देते हैं, जिससे बहुत छींकें आकर आराम मिलता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA