भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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६३६ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) दन्तशूल में इसके पंचांग का उष्ण कल्क गालों के बाहर से लगाया जाता है। (३) इसके बीज कृमिघ्न होते हैं। अथ कुकुन्दरः (कुकुरवँदा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुकुन्दरस्ताम्रचूडः सूक्ष्मपत्रो मृदुच्छदः ॥ ३०५॥ कुकुन्दरः कटुस्तिक्तो ज्वररक्तकफापहः । तन्मूलमार्द्रं निक्षिप्तं वदने मुखशोषहृत् ।। ३०६ ।। कुकुरवँदा के नाम तथा गुण-कुकुन्दर, ताम्रचूड, सूक्ष्मपत्र और मृदुच्छद ये नाम कुकुरवँदा के हैं। कुकुरवँदा-कटु तथा तिक्तरसयुक्त, ज्वर, रक्त और कफ को दूर करने वाला होता है। इसकी जड़ गीली (ताजी) यदि मुख में रक्खी जाय तो मुख का सूखना बन्द हो जाता है। [३०५-३०६] १८४. कुकुरवंदा हिं०-कुकुरोदा, कुकुरवंदा, कुकुसुंगा । बं०-कुकुरनिर्मुली, भावूर्डा, भांगरूड़, गंगावली । ता०-नारंक्करंडै । ले०-Blumea lacera DC. (ब्लूमिया लॅसेरा डीसी.) । Fam. Compositae (कम्पोज़िटी) । यह सब प्रान्तों में २००० फीट तक उत्पन्न होता है। इसका क्षुप-वर्षायु, धूसरवर्ण का मृदुरोमश तथा टरपेंटाइन की जैसी तीव्रगंध युक्त होता है। पत्ते-३.८-१२.५ × २.२-६.३ से० मी० बड़े, नीचे के सनाल, कटे हुए तथा ऊपर के न्यूनाधिक विनाल, दीर्घवृत्ताकार आयताकार, मृदुरोमश दन्तुर तथा आधार क्रमशः संकुचित होता है। पुष्प-पीत तथा मुण्डक में आते हैं। फल-छोटे, आयताकार तथा कुछ चतुष्कोणीय होते हैं। इसकी ३, ४ अन्य जातियाँ देखने में आती हैं। समस्त क्षुप में उग्र गंध आती है। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल, तथा कपूर पाया जाता है। इससे तथा विशेषकर ब्लू. बालसमीफेरा नामक जाति से जो कपूर निकाला जाता है, उसे नागी कपूर या पत्री कपूर कहते हैं, जिसका वर्णन कर्पूर के साथ किया जा चुका है। गुण और प्रयोग-यह कड़वा, दीपन, वायुनाशी, कफघ्न, रक्तस्तंभक तथा ज्वरनाशक है। इसके गुण कपूर से मिलते-जुलते हैं। इसका स्वरस कृमिघ्न, ग्राही, ज्वरहर, उत्तेजक एवं मूत्रल है। मूल का विसूचिका में प्रयोग किया जाता है। इसकी जड़ मुख में रखने से मुखशोष में लाभ होता है। (१) रक्तार्श में इसका स्वरस मिरिच के साथ देते हैं। (२) इसके (ब्लू. बाल्समीफेरा के) स्वरस में बना लौहभस्म का प्रयोग वृक्कजन्य उदर में करते हैं। मूत्र रुकने पर स्वरस देते हैं। (३) ज्वर में इसको निर्गुण्डी क्वाथ के साथ देने से पसीना होता है तथा कफ निकलता है। मात्रा-पत्रचूर्ण ५-१५ रत्ती; स्वरस १ तोंला। अथ सुदर्शना । तस्या नामगुणानाह सुदर्शना सोमवल्ली चक्राह्वा मधुपर्णिका । सुदर्शना स्वादुरुष्णा कफशोथास्रवातजित् ।। ३०७ ।। सुदर्शन के नाम तथा गुण-सुदर्शना, सोमवल्ली, चक्राह्वा और मधुपर्णिका ये नाम सुदर्शन के हैं। सुदर्शन- स्वादिष्ट, उष्णवीर्य एवं कफ, शोथ और रक्तवात को दूर करने वाला होता है। [३०७] नोट-क्राइनम् की विभिन्न जातियों को सुदर्शन माना जाता है। श्री डॉ० वा० ग० देसाई ने क्रा० एशियाटिकम् (सं०) नागदमनी माना है, किन्तु इसका हिन्दी नाम सुदर्शन भी दिया है। कुछ ने गुडूचीभेद टिनोस्पोरा मलबारिका CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3.Foundation USA